बाल मृत्यु दर पर UN IGME 2025 रिपोर्ट | 24 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
यूनाइटेड नेशन इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मोर्टेलिटी एस्टीमेशन (UN IGME) ने अपनी 'लेवल्स एंड ट्रेंड्स इन चाइल्ड मोर्टेलिटी' शीर्षक वाली रिपोर्ट 2025 जारी की। रिपोर्ट 2015 के बाद से बाल उत्तरजीविता संबंधी वैश्विक प्रगति में चिंताजनक कमी को रेखांकित करती है, साथ ही भारत को बाल मृत्यु दरों में निरंतर कमी के लिये वैश्विक अग्रणी "उदाहरण" के रूप में मान्यता देती है।
UN IGME 2025 रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- वैश्विक स्वास्थ्य भार: वर्ष 2024 में अनुमानित 49 लाख बच्चों की मृत्यु अपने पाँचवें जन्मदिन से पहले हो गई, जिसमें 23 लाख नवजात शिशु शामिल हैं।
- इसके अतिरिक्त वर्ष 2024 में 5-24 वर्ष की आयु के 21 लाख अन्य बच्चों और युवाओं की भी मृत्यु हुई।
- बाल मृत्यु दर भौगोलिक रूप से अत्यधिक केंद्रित है। वैश्विक स्तर पर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की कुल मौतों में उप-सहारा अफ्रीका की भागीदारी 58% रही, इसके बाद दक्षिण एशिया (25%) का स्थान है।
- प्रगति में कमी: वर्ष 2000 के बाद से वैश्विक स्तर पर पाँच वर्ष से कम उम्र की मृत्यु दर में आधे से अधिक की कमी आई है, हालाँकि वर्ष 2015 के बाद 60% से अधिक की कमी देखने को मिली है।
- इस धीमी प्रगति का संबंध बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिये कम फंडिंग, स्वास्थ्य देखभाल तक असमान पहुँच और निरंतर सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से है, जो पोषण और टीकाकरण जैसी आवश्यक सेवाओं की पहुँच को सीमित करते हैं।
- कुपोषण पर पहली बार डेटा: पहली बार रिपोर्ट में मृत्यु के कारणों को सीधे एकीकृत किया गया है, जिससे पता चला है कि गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) 1-59 महीने की आयु के बच्चों में 1,00,000 से अधिक मौतों (लगभग 5%) का सीधा कारण बना।
- इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव कहीं अधिक है, क्योंकि SAM सामान्य संक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरक्षा को कमज़ोर कर देता है।
- मृत्यु के प्राथमिक कारण:
- नवजात शिशु (0-28 दिन): नवजात शिशुओं में समय से पहले जन्म (36%) और प्रसव के दौरान (21%)।
- नवजात पश्चात (1-59 माह): निमोनिया, डायरिया और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियाँ अभी भी घातक बनी हुई हैं।
भारत का प्रदर्शन: एक वैश्विक मिसाल
- पाँच वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर (U5MR): भारत ने इसमें 79% की भारी गिरावट दर्ज की है, जो वर्ष 1990 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 127 मौतों से घटकर वर्ष 2024 में 27 रह गई है।
- नवजात मृत्यु दर (NMR): NMR में 70% की गिरावट देखी गई है, जो वर्ष 1990 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 57 से गिरकर 2024 में 17 हो गई है।
- शिशु मृत्यु दर (IMR): वर्ष 2024 में IMR घटकर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर लगभग 23.3 रह गई है।
मृत्यु दर संकेतक
- नवजात मृत्यु दर (NMR):
- परिभाषा: किसी दिये गए वर्ष में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर जन्म के प्रथम 28 दिनों के भीतर होने वाले शिशुओं की मृत्यु की संख्या।
- राष्ट्रीय NMR (NFHS-5): 24.9 प्रति 1,000 जीवित जन्म (NFHS-4 में 29.5 से कम)।
- शिशु मृत्यु दर (IMR):
- परिभाषा: किसी दिये गए वर्ष में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर एक वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु की संख्या।
- राष्ट्रीय IMR (NFHS-5): 35.2 प्रति 1,000 जीवित जन्म (NFHS-4 में 40.7 से कम)।
- पाँच वर्ष से कम आयु मृत्यु दर (U5MR):
- परिभाषा: जन्म से ठीक पाँच वर्ष की आयु के बीच एक बच्चे की मृत्यु की संभावना, जिसे प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर व्यक्त किया जाता है।
- राष्ट्रीय U5MR (NFHS-5): 41.9 प्रति 1,000 जीवित जन्म (NFHS-4 में 49.7 से कम)।
- मातृ मृत्यु अनुपात (MMR):
- परिभाषा: प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु (गर्भावस्था से संबंधित जटिलताओं या प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु) की संख्या।
- राष्ट्रीय MMR: भारत के रजिस्ट्रार जनरल की प्रतिदर्श पंजीकरण प्रणाली (SRS) ने वर्ष 2018-20 में इसमें कमी दर्ज कर इसे 97 प्रति लाख जीवित जन्म कर दिया, जो वर्ष 2014-16 में 130 प्रति लाख जीवित जन्म था। यह कमी भारत को वर्ष 2030 तक मातृ मृत्यु अनुपात को 70 से कम करने के सतत विकास लक्ष्य (SDG) के काफी करीब ले आई है।
शिशु मृत्यु दर को कम करने में भारत की सफलता के मुख्य कारक क्या हैं?
- संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना: जननी सुरक्षा योजना (JSY) और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) जैसी योजनाओं ने अस्पताल में होने वाले जन्मों में भारी वृद्धि की है, जिससे कुशल प्रसव सहायता और सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित हुआ है।
- नवजात शिशु देखभाल बुनियादी ढाँचा: ज़िलों में विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों (SNCU) के विस्तार, जिसमें टेली-SNCU जैसे डिजिटल नवाचार शामिल हैं, ने समय से पहले जन्मे और बीमार नवजात शिशुओं की जान बचाई है।
- रोकथाम योग्य स्वास्थ्य देखभाल: सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) (जिसे मिशन इंद्रधनुष द्वारा सुदृढ़ किया गया) ने निमोनिया, रोटावायरस और खसरा जैसी रोके जाने योग्य बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण कवरेज में भारी विस्तार किया है।
- एकीकृत प्रबंधन: आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं द्वारा ज़मीनी स्तर पर नवजात और बाल रोगों के एकीकृत प्रबंधन (IMNCI) प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन ने बाल रोगों के शीघ्र निदान और उपचार को सक्षम बनाया है।
- पोषण और स्तनपान पर ध्यान: पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन) का उद्देश्य कुपोषण मुक्त भारत की प्राप्ति है, हालाँकि एनीमिया मुक्त भारत अभियान (2018) एनीमिया के स्तर को कम करने पर केंद्रित है।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 कमज़ोर आबादी के लिये भोजन और पोषण के कानूनी अधिकारों को सुनिश्चित करता है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के तहत गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव और पोषण में सहायता के लिये वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) योजना (1975) छह वर्ष से कम आयु के बच्चों को पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करती है।
- माँ (मातृत्वपूर्ण स्नेह) कार्यक्रम देशव्यापी अभियान इष्टतम स्तनपान प्रथाओं, विशेष रूप से पहले छह महीनों के लिये विशिष्ट स्तनपान को बढ़ावा देता है, जो शिशु की प्रतिरक्षा के लिये एक शक्तिशाली प्राकृतिक उपाय है।
भारत में बाल मृत्यु दर के मुख्य कारण क्या हैं?
- नवजात मृत्यु दर का लगातार उच्च बोझ: एक बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश बाल मृत्यु पहले महीने में होती हैं, जो समयपूर्व जन्म, जन्म के समय श्वासावरोध और संक्रमणों के कारण होती हैं, जिससे प्रारंभिक जीवन में जीवित रहना एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
- कुपोषण: एक ‘मौन गुणक’: व्यापक कुपोषण और मातृ रक्ताल्पता (Anemia) निरंतर बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप कम वज़न वाले शिशुओं का जन्म होता है, जो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर उन्हें निवारणीय रोगों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देता है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार, भारत में महिलाओं में एनीमिया का स्तर अभी भी काफी अधिक है—15–49 वर्ष आयु वर्ग की 57% महिलाएँ प्रभावित हैं, जबकि इसी आयु वर्ग की 52.2% गर्भवती महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं। यह स्थिति मातृ स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी गंभीर चिंताओं को दर्शाती है।
- गहरी क्षेत्रीय असमानताएँ: यह चुनौती केवल राज्यों के बीच असमानता तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों और ज़िलों के भीतर मौजूद सामाजिक असमानताएँ भी एक प्रमुख समस्या हैं।
- उदाहरण के लिये केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने बेहतर स्वास्थ्य अवसंरचना के कारण विकसित देशों के समान मृत्यु दर प्राप्त कर ली है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार तथा मध्य प्रदेश जैसे राज्य अभी भी उच्च मृत्यु दर की चुनौती से जूझ रहे हैं।
- मातृ शिक्षा, गरीबी, जातिगत वंचना और कम सामाजिक पूंजी जैसे कारक भारत में मृत्यु दर में असमानताओं के प्रमुख कारण बने हुए हैं।
- दूरदराज़, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से सुसज्जित SNCU और बाल गहन चिकित्सा (पेडियाट्रिक ICU) तक तत्काल पहुँच का अभाव गंभीर बाल आपात स्थितियों के उपचार में ‘गोल्डन आवर’ की देरी का कारण बनता है।
- अपर्याप्त स्वास्थ्य अवसंरचना: विशेष नवजात देखभाल इकाइयों (SNCUs) की सीमित उपलब्धता और आपातकालीन उपचार में देरी, विशेषकर दूरदराज़ क्षेत्रों में, एक प्रमुख बाधा बनी हुई है।
- भारत में निमोनिया और दस्त जैसी बीमारियाँ नवजात अवधि के बाद मृत्यु के प्रमुख कारण बनी हुई हैं, जो दर्शाता है कि चुनौती केवल सुरक्षित प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि पहले पाँच वर्षों में बाल जीवन सुनिश्चित करने तक फैली हुई है, जिसका मुख्य कारण जल, सफाई और स्वच्छता (WASH) की लगातार कमी है।
- देखभाल की गुणवत्ता की कमी: उच्च संस्थागत प्रसव के बावजूद, प्रसव के दौरान खराब गुणवत्ता वाली देखभाल और कुशल कर्मियों की कमी नवजात शिशुओं के प्रभावी बचाव में बाधा डालती है।
- SDG लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव: भारत पर सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.2 को पूरा करने का दबाव है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को 25 से कम और नवजात मृत्यु दर को 1,000 जीवित जन्मों पर 12 से कम करना है।
- हालाँकि प्रगति हुई है, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिये तेज़ और अधिक लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।
भारत में शिशु मृत्यु दर को और कम करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- पहले 28 दिनों को लक्षित करना: भारत को श्वासावरोध और समयपूर्व जन्म से निपटने के लिये प्रसव के दौरान देखभाल की गुणवत्ता और नवजात शिशुओं की तत्काल स्क्रीनिंग पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा।
- नवजात बचाव प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना: सबसे बड़े लाभ नवजात चरण को सुधारने से ही मिलेंगे।
- सभी सुविधाओं में कंगारू मदर केयर (KMC) को संस्थागत बनाना और प्रारंभिक अनिवार्य नवजात देखभाल (EENC), जैसे– तत्काल स्तनपान, ब्रेस्ट मिल्क बैंक की स्थापना और सुरक्षित प्रसव प्रोटोकॉल का कड़ाई से अनुपालन, न्यूनतम लागत में नवजात मृत्यु दर को बड़े पैमाने पर कम करने के लिये प्रभावी हस्तक्षेप सिद्ध हो सकते हैं।
- प्रसव देखभाल में गुणवत्ता के अंतर को दूर करना: भारत ने उच्च संस्थागत प्रसव हासिल किये हैं, लेकिन नवजात शिशु की सुरक्षा केवल पहुँच पर नहीं, बल्कि देखभाल की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
- लेबर रूम मानकों को सुधारने के लिये LaQshya जैसे कार्यक्रमों को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिये और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को नवजात शिशु पुनरुज्जीवन में नियमित रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, विशेषकर जन्म के तुरंत बाद के “गोल्डन मिनट” के दौरान।
- कुपोषण चक्र को तोड़ना (पहले 1,000 दिन): बाल मृत्यु दर मातृ और प्रारंभिक बाल पोषण से घनिष्ठ रूप से जुड़ी है।
- POSHAN अभियान 2.0 और एनीमिया मुक्त भारत को सुदृढ़ बनाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, ताकि कम जन्म-भार वाले शिशुओं और कमज़ोर प्रतिरक्षा चक्र जैसी चुनौतियों को संबोधित किया जा सके और ध्यान केवल कैलोरी सेवन पर नहीं बल्कि पोषण की गुणवत्ता और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों पर केंद्रित हो।
- उच्च-भार वाले क्षेत्रों का लक्ष्यीकरण: संसाधनों को उच्च मृत्यु दर वाले राज्यों और आकांक्षी ज़िलों पर केंद्रित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही पहुँच की बाधाओं को दूर करने के लिये 'मोबाइल मेडिकल यूनिट' और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं जैसी जनजातीय स्वास्थ्य रणनीतियों को प्राथमिकता देना होगा।
- रीयल-टाइम कार्रवाई के लिये डेटा का उपयोग: टीकाकरण ट्रैकिंग हेतु U-WIN का विस्तार करना जल्दी से अंतराल की पहचान करने और सुधारात्मक कदम सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है।
- अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों को सशक्त बनाना: आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता प्रारंभिक पहचान और संदर्भ देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- उन्हें बेहतर उपकरण, प्रशिक्षण और समय पर प्रोत्साहन प्रदान करने से सीधे ज़मीनी स्तर पर बच्चों के जीवन रक्षा में सुधार होगा।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभ उसके बच्चों के स्वास्थ्य और जीवित रहने पर निर्भर करता है। इसे हासिल करने के लिये स्वास्थ्य, पोषण और WASH (जल, स्वच्छता और स्वच्छता) क्षेत्रों में समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो भारत को कुपोषण और मृत्यु दर के चक्र को तोड़ने और SDG 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाए।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. काफी प्रगति के बावजूद, भारत में नवजात मृत्यु दर एक बड़ी चुनौती क्यों बनी हुई है? उपाय सुझाइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. UN IGME रिपोर्ट 2025 क्या है?
यह एक संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट है जो वैश्विक बाल मृत्यु दर (Child Mortality) के रुझानों का अनुमान लगाती है। यह रिपोर्ट प्रगति में धीमी गति और विभिन्न देशों के स्तर पर प्रदर्शन को उजागर करती है।
2. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 5 वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर (U5MR) कितनी है?
भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) 2024 में 1,000 जीवित जन्मों पर 27 तक घट गई, जो दीर्घकालीन रूप से महत्त्वपूर्ण कमी को दर्शाती है।
3. भारत में शिशु मृत्यु दर को कम करने में किन योजनाओं ने योगदान दिया है?
प्रमुख योजनाओं में JSY, JSSK, UIP, पोषण अभियान, ICDS, PMMVY और एनीमिया मुक्त भारत शामिल हैं।
4. शिशु मृत्यु दर के प्रमुख कारण क्या हैं?
नवजात संबंधी कारण (समय से पहले जन्म, जन्म के समय की जटिलताएँ) और संक्रामक रोग (निमोनिया, दस्त, मलेरिया) इसके प्रमुख कारण हैं।
5. बाल स्वास्थ्य से संबंधित SDG 3.2 क्या है?
इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर U5MR को 25 से नीचे और NMR को 12 से नीचे लाना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' के उद्देश्य हैं? (2017)
- गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण के बारे में जागरूकता पैदा करना।
- छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया के मामलों को कम करना।
- बाजरा, मोटे अनाज और बिना पॉलिश किये चावल की खपत को बढ़ावा देना।
- पोल्ट्री अंडे की खपत को बढ़ावा देना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. क्या लैंगिक असमानता, गरीबी और कुपोषण के दुश्चक्र को महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफाइनेंस) प्रदान करके तोड़ा जा सकता है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिये। (2021)