लुईस मॉडल और भारत | 02 Nov 2023

प्रिलिम्स के लिये:

लुईस मॉडल, अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार, भारत की GDP में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा, प्रच्छन्न बेरोज़गारी, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, स्टार्ट-अप इंडिया, मेक इन इंडिया 2.0

मेन्स के लिये:

भारत में लुईस मॉडल के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ, भारत के लिये लुईस मॉडल के विकल्प।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

लुईस मॉडल चीन के लिये सफल साबित हुआ है हालाँकि कृषि से औद्योगीकरण में संक्रमण के दौरान चुनौतियों का सामना करने के कारण भारत इसके कार्यान्वयन से जूझ रहा है। 

  • इसके अतिरिक्त उच्च  पूंजी तीव्रता की ओर विनिर्माण रुझान के कारण भारत प्रतिक्रिया में 'फार्म-एज़-फैक्टरी' श्रम मॉडल में स्थानांतरित होने पर विचार कर रहा है।

लुईस मॉडल:

  • परिचय: 
    • वर्ष 1954 में अर्थशास्त्री विलियम आर्थर लुईस ने "श्रम की असीमित आपूर्ति के साथ आर्थिक विकास" को प्रस्तावित किया।
    • मॉडल के सार ने सुझाव दिया कि कृषि में अतरिक्त श्रम को विनिर्माण क्षेत्र में पुनर्निर्देशित किया जा सकता है, इसके लिये श्रमिकों को कृषि क्षेत्र से दूर आकर्षित करने के लिये पर्याप्त मज़दूरी का प्रस्ताव देना आवश्यक है।
      • यह बदलाव, सैद्धांतिक रूप से, औद्योगिक विकास को उत्प्रेरित करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा।
  • लुईस मॉडल और चीन:
    • चीन में इस मॉडल का अनुप्रयोग सफल रहा। चीन ने एक दोहरे ट्रैक दृष्टिकोण का उपयोग किया, जिसने अपनी जनसंख्या लाभ और अधिशेष ग्रामीण श्रम का उपयोग करते हुए, राज्य की योजना के साथ बाज़ार की शक्तियों को जोड़ा।
      • इस रणनीति ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया तथा निर्यात एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया।
    • बुनियादी ढाँचे, शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास में व्यापक निवेश ने चीन की उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप तेज़ी से औद्योगीकरण हुआ, गरीबी में कमी आई और अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव आया।
  • लुईस मॉडल और भारत:
    • कृषि, जो ऐतिहासिक रूप से भारत के अधिकांश कार्यबल को रोज़गार देती है, ने इस सन्दर्भ में  कमी का अनुभव किया है।

      • अपेक्षाओं के विपरीत, इस बदलाव से मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र को लाभ नहीं हुआ है, जिसने रोज़गार के हिस्से में केवल मामूली वृद्धि का अनुभव किया है।
    • विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार वर्ष 2011-12 में अपने उच्चतम स्तर 12.6% से घटकर वर्ष 2022-23 में 11.4% हो गया है।
      • विनिर्माण रोज़गार में कमी मुख्य रूप से सेवाओं और निर्माण में श्रम के बढ़ने की प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो अर्थशास्त्री लुईस द्वारा उल्लिखित अपेक्षित संरचनात्मक परिवर्तन के विपरीत है।

भारत में लुईस मॉडल के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ: 

  • कम वेतन संबंधी बाधाएँ: शहरी विनिर्माण सुविधाओं में कम वेतन और अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा, शहरी जीवन की उच्च लागत को देखते हुए, ग्रामीण कृषि मज़दूरों को स्थानांतरित करने के लिये लुभाने में विफल रही है तथा इसने लुईस मॉडल के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न की है।
  • विनिर्माण में तकनीकी बदलाव: विनिर्माण उद्योग तेज़ी से पूंजी-गहन हो रहे हैं, जो रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी श्रम-विस्थापन प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को दर्शाते हैं।

    • यह परिवर्तन श्रम-गहन क्षेत्रों द्वारा अधिशेष कृषि श्रमिकों को समायोजित करने की नियोजन क्षमता को प्रतिबंधित करता है।
  • प्रच्छन्न बेरोज़गारी: भारत को कृषि क्षेत्र में प्रच्छन्न बेरोज़गारी के परिदृश्य का सामना करना पड़ता है, जहाँ अतिरिक्त श्रमिक उन गतिविधियों में संलग्न है जो उत्पादकता अथवा आय में वृद्धि में योगदान नहीं देती हैं। 
    • अतिरिक्त श्रम की इस स्थिति के कारण श्रमिकों का अन्य उद्योगों में स्थानांतरण जटिल हो जाता है।
  • कौशल भिन्नता: कार्यबल का कौशल और जो कौशल उद्योग तलाशते हैं, दोनों में भिन्नता होती है।
    • वर्तमान शिक्षा प्रणाली आधुनिक नौकरी बाज़ार की मांगों के लिये व्यक्तियों को पूर्ण रूप से तैयार नहीं कर सकती है, जिसके परिणामस्वरूप कौशल में अंतर की स्थिति उत्पन्न होती है जो उद्योगों में श्रमिकों के नियोजन में बाधा डालता है।
  • व्हाइट कॉलर जॉब पर अत्यधिक ज़ोर: आमतौर पर समाज में व्हाइट कॉलर जॉब्स को तकनीकी अथवा व्यावसायिक कौशल से अधिक प्राथमिकता दी जाती है।
    • ब्लू-कॉलर जॉब के प्रति यह पूर्वाग्रह कुशल व्यव्सायों और तकनीकी नौकरियों के लिये कार्यबल की उपलब्धता को सीमित कर सकता है, जिससे औद्योगिक विकास प्रभावित हो सकता है।

भारत में औद्योगिक क्षेत्र के विकास हेतु हालिया सरकारी पहलें:

नोट: जैसे-जैसे भारत अपने औद्योगिक क्षेत्र की उन्नति का प्रयास कर रहा है, उसे अपने विकास पथ को बढ़ाने के लिये पूरक विकल्पों की भी तलाश करनी चाहिये

भारत के लिये लुईस मॉडल के अतिरिक्त अन्य विकल्प:

  • फार्म-एज़-फैक्टरी मॉडल: यह मॉडल श्रमिकों को कृषि से विनिर्माण क्षेत्र में स्थानांतरित करने के बजाय भारत के कृषि क्षेत्र के भीतर मूल्य संवर्धन और उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव देता है।
    • कृषि व्यवसाय, जैव-ईंधन और खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने पर ज़ोर देकर इस दृष्टिकोण का उद्देश्य ग्रामीण श्रमिकों के लिये रोज़गार के अवसर, आय सृजन तथा नवाचार को बढ़ावा देना है।
  • इस मॉडल के अनुसार, सेवाओं में भारत के तुलनात्मक लाभ का उपयोग देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये किया जाना चाहिये।
    • सूचना प्रौद्योगिकी, बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग, पर्यटन, स्वास्थ्य देखभाल और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति मज़बूत है।

    • ये क्षेत्र उच्च कौशल वाले रोज़गार उत्पन्न कर सकते हैं, निर्यात को बढ़ावा दे सकते हैं और विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकते हैं।

  • अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण: केवल आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण व्यक्तियों की क्षमताओं और स्वतंत्रता को बढ़ाने पर ज़ोर देता है।
    • शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक समर्थन को प्राथमिकता देकर, इस दृष्टिकोण का उद्देश्य व्यक्तियों को उसकी पसंद एवं अवसरों के साथ आगे बढ़ाना है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

मेन्स:

प्रश्न. "सुधारोत्तर अवधि में सकल-घरेलू-उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।" कारण बताइए। औद्योगिक नीति में हाल में किये गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहाँ तक सक्षम हैं? (2017)

प्रश्न. सामान्यतः देश कृषि से उद्योग और बाद में सेवाओं को अन्तरित होते हैं पर भारत सीधे ही कृषि से सेवाओं को अन्तरित हो गया है। देश में उद्योग के मुकाबले सेवाओं की विशाल संवृद्धि के क्या कारण हैं? क्या भारत सशक्त औद्योगिक आधार के बिना एक विकसित देश बन सकता है? (2014)

प्रश्न. श्रम प्रधान निर्यातों के लक्ष्य को प्राप्त करने में विनिर्माण क्षेत्रक की विफलता का कारण बताइए। पूंजी-प्रधान निर्यातों की अपेक्षा अधिक श्रम-प्रधान निर्यातों के लिये उपायों को सुझाइए। (2017)