स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 | 28 Jan 2026

प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, प्रकृति-आधारित समाधान, सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (NMSA), राष्ट्रीय जल मिशन, राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम (NAP)

मेन्स के लिये: जलवायु एवं जैव विविधता रणनीति के रूप में प्रकृति-आधारित समाधान, वैश्विक पर्यावरण शासन में वित्तपोषण की कमियाँ, पर्यावरण क्षरण में सब्सिडी की भूमिका, भारत का राजकोषीय संघवाद और जैव विविधता संरक्षण

स्रोत: डाउन टू अर्थ 

चर्चा में क्यों? 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने “स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026” नामक रिपोर्ट जारी की, जिसमें एक गंभीर असंतुलन उजागर हुआ है अर्थात्, प्रकृति की सुरक्षा पर खर्च किये गए प्रत्येक 1 अमेरिकी डॉलर की तुलना में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने पर 30 अमेरिकी डॉलर खर्च किये जा रहे हैं।

सारांश

  • 'स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026' एक गंभीर वित्तीय असंतुलन को उजागर करता है, जहाँ संरक्षण में निवेश किये गए प्रत्येक 1 डॉलर की तुलना में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों पर 30 डॉलर खर्च किये जा रहे हैं। यह असंतुलन पर्यावरण के लिये हानिकारक सब्सिडी और प्रकृति संबंधी नकारात्मक वित्त में निजी क्षेत्र के वर्चस्व से प्रेरित है।
  • भारत के लिये, दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखते हुए जैव विविधता की रक्षा करने हेतु, नेचर ट्रांजिशन एक्स-कर्व, ग्रीन टैक्सोनॉमी, सब्सिडी और प्राइवेट कैपिटल एकत्रित करने जैसे सुधारों के माध्यम से प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 के मुख्य बिंदु क्या हैं?

  • प्रकृति-नकारात्मक वित्त: प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों (जैसे– जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण, अस्थिर कृषि, वनों की कटाई) के लिये वैश्विक वित्तीय प्रवाह वर्ष 2023 में 7.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया। यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 7% है।
    • निजी क्षेत्र प्रकृति-नकारात्मक प्रवाह में 4.9 ट्रिलियन डॉलर का योगदान करता है, जो मुख्य रूप से ऊर्जा, उपयोगिताओं और बुनियादी सामग्री जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है।
    • सरकारें प्रतिवर्ष लगभग 2.4 ट्रिलियन डॉलर की पर्यावरण के लिये हानिकारक सब्सिडी (EHS) प्रदान करती हैं, जिसमें जीवाश्म ईंधन का समर्थन प्रमुख है, उसके बाद अस्थिर कृषि और जल सब्सिडियाँ आती हैं। 
      • ये सब्सिडियाँ बाज़ार मूल्यों को विकृत करती हैं, जिससे पर्यावरण विनाश संरक्षण की तुलना में सस्ता हो जाता है।
  • प्रकृति-सकारात्मक वित्त: प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) में निवेश केवल 220 बिलियन डॉलर पर था।
    • इससे एक विशाल असमानता उत्पन्न होती है, जहाँ हानिकारक निवेश संरक्षण पर होने वाले व्यय और प्रकृति की सुरक्षा पर खर्च किये गए का अनुपात 30:1 है, जिसके परिणामस्वरूप एक स्पष्ट और अस्थिर असंतुलन उत्पन्न होता है।
    • हालाँकि, जैव विविधता और परिदृश्य संरक्षण पर खर्च बढ़ रहा है — वर्ष 2022 और 2023 के बीच इसमें 11% की वृद्धि हुई है, जबकि वर्ष 2023 में प्रकृति-आधारित समाधानों के लिये अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त 2022 की तुलना में 22% अधिक और 2015 के स्तर से 55% ऊपर था।
  • प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) के लिये वित्तीय अंतराल: NbS वित्त मुख्य रूप से सार्वजनिक धन द्वारा संचालित होता है (कुल NbS वित्त का 90% सरकारों से आता है)।

प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) क्या हैं?

  • परिभाषा: प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions- NbS) से आशय ऐसे कार्यों से है जो प्राकृतिक अथवा संशोधित पारितंत्रों का संरक्षण करें, उनका सतत प्रबंधन करें तथा उनका पुनर्स्थापन करें, ताकि जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और आपदा जोखिम जैसी सामाजिक चुनौतियों का प्रभावी एवं अनुकूलनशील ढंग से समाधान किया जा सके, साथ ही मानव कल्याण और जैव विविधता संरक्षण दोनों को एक साथ लाभ पहुँचे।
  • उदाहरण:
    • मैंग्रोव पुनर्स्थापन: तटीय क्षेत्रों को तूफानों से बचाता है (आपदा प्रबंधन) तथा कार्बन अवशोषण बढ़ाता है (जलवायु परिवर्तन)।
    • कृषि-वानिकी: फसल उत्पादकता में वृद्धि करता है (खाद्य सुरक्षा) तथा मृदा स्वास्थ्य बनाए रखता है (जैव विविधता संरक्षण)।
    • शहरी हरित क्षेत्र: शहरी ऊष्मा-द्वीप प्रभाव को कम करते हैं (शहरी नियोजन)।

Nature-based_Solutions

प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) के वित्तपोषण को व्यापक बनाने में चुनौतियाँ क्या हैं?

  • उच्च पूर्व-परीक्षण (Due Diligence) लागत: प्रत्येक स्थल की जैविक जटिलता और मानकीकृत डेटा की कमी के कारण विशेष, महंगी मूल्यांकन प्रक्रियाएँ आवश्यक होती हैं। इससे लेन-देन की लागत पारंपरिक ग्रे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की तुलना में काफी बढ़ जाती है, जिससे मुख्यधारा के निवेशक पीछे हटते हैं।
    • NbS एक नवजात संपत्ति वर्ग है जिसमें सीमित ऐतिहासिक प्रदर्शन डेटा उपलब्ध है। जोखिम-समायोजित रिटर्न का प्रमाण न होने के कारण क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ जोखिम का सटीक मूल्यांकन नहीं कर पातीं और निवेशक उच्च प्रीमियम की मांग करते हैं।
  • तरलता संबंधी बाधाएँ: प्रकृति में निवेश स्वाभाविक रूप से अल्पतरल और दीर्घकालिक (10–20 वर्ष) होते हैं। सक्रिय द्वितीयक बाज़ार न होने के कारण निवेशक आसानी से अपनी हिस्सेदारी बेच या व्यापार नहीं कर सकते, जिससे ‘लॉक-इन’ जोखिम उत्पन्न होता है जो 3-5 वर्ष के छोटे निवेश क्षितिज वाले निजी निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
  • मुद्रा और संप्रभु जोखिम: उच्च प्रभाव वाले NbS अवसरों का अधिकांश हिस्सा वैश्विक दक्षिण (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र) में स्थित है, जबकि पूंजी ग्लोबल नॉर्थ में केंद्रित है।
    • इससे निवेशक विदेशी मुद्रा अस्थिरता और संप्रभु जोखिम के संपर्क में आ जाते हैं, जिसके लिये अक्सर उच्च लागत हेजिंग उपकरणों की आवश्यकता होती है, जो रिटर्न को कम कर देते हैं।
  • डेटा की कमी: कार्बन के विपरीत, ‘प्रकृति’ को मापना कठिन है। निवेशकों के पास जैव विविधता परियोजनाओं में निवेश पर प्रतिफल (ROI) का मूल्यांकन करने के लिये मानकीकृत मीट्रिक उपलब्ध नहीं हैं।

भारत के लिये कम NbS वित्तपोषण के निहितार्थ क्या हैं?

  • सब्सिडी विरोधाभास: भारत एक गंभीर वित्तीय-पारिस्थितिक विरोधाभास का सामना कर रहा है, जहाँ ‘प्रकृति-नकारात्मक’ सब्सिडियाँ (जैसे– रासायनिक उर्वरक, भूमिगत जल पंपिंग के लिये मुफ्त विद्युत) ‘प्रकृति-सकारात्मक’ आवंटनों (जैसे– MoEFCC का बजट या जैविक कृषि के लिये बजट) की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह व्यवहारात्मक रूप से उसी मृदा और जलभृतियों (Aquifers) को नुकसान पहुँचाने के लिये भुगतान करना है, जिन पर अर्थव्यवस्था निर्भर करती है।
  • सार्वजनिक वित्त पर अत्यधिक निर्भरता: वैश्विक उत्तर के विपरीत, जहाँ संरक्षण में निजी पूंजी प्रवेश कर रही है, भारत में प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) लगभग पूरी तरह से सरकारी वित्तपोषित हैं, जैसे– क्षतिपूर्ति वनरोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) जैसी योजनाओं के माध्यम से।
    • इससे खज़ाने (exchequer) पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान (CSR/इंपैक्ट निवेश) बहुत कम रहता है।
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) जोखिम: भारत का 50% से अधिक कार्यबल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में संलग्न होने के कारण अर्थव्यवस्था में ‘प्रकृति-निर्भरता अनुपात’ असाधारण रूप से उच्च है।
    • पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं (जैसे– परागण, जलस्तर) का पतन भारत में औद्योगिक देशों की तुलना में तेज़ी से प्रणालीगत वित्तीय अस्थिरता को उत्पन्न कर सकता है।
  • हरित वर्गीकरण/ग्रीन टैक्सोनॉमी का अभाव: भारत अभी भी एक औपचारिक ‘हरित वर्गीकरण/ग्रीन टैक्सोनॉमी’ विकसित करने की प्रक्रिया में है, जो यह परिभाषित करेगा कि कौन-से निवेश या परियोजनाएँ 'हरित' मानी जाएँ।
    • इस नियामकीय अंतराल के कारण वित्तीय संस्थानों को ऐसी परियोजनाओं को ऋण देने की गुंजाइश मिल जाती है, जो स्वयं को सतत बताती हैं, किंतु वास्तव में ‘प्रकृति-नकारात्मक’ होती हैं (ग्रीनवॉशिंग)। इससे भारतीय NbS परियोजनाओं में वास्तविक वैश्विक पूंजी के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है।
  • वित्तीय संघवाद का विरोधाभास: जहाँ भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ (पेरिस समझौता, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल रूपरेखा) केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं, वहीं प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) का वास्तविक क्रियान्वयन विशेषकर भूमि और जल से संबंधित मुख्यतः राज्य विषय होता है।
    • इससे असंगति उत्पन्न होती है, जहाँ केंद्र संरक्षण को प्राथमिकता देता है, जबकि राजस्व-संकटग्रस्त राज्य त्वरित वित्तीय लाभ के लिये खनन और रियल एस्टेट जैसे दोहनकारी उद्योगों को प्राथमिकता देते हैं।

प्राकृतिक समाधान को प्रभावी ढंग से बढ़ाने हेतु कौन-कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • प्रकृति संक्रमण X-कर्व: UNEP ने प्रकृति संक्रमण X-कर्व की प्रस्तावना की है, जो एक दोहरी रणनीति है—एक ओर हानिकारक सब्सिडी जैसी प्रकृति-विरोधी गतिविधियों को तेज़ी से समाप्त करना और दूसरी ओर प्रकृति-सकारात्मक बाज़ारों का विस्तार करना। इसमें पूंजी को विनाशकारी गतिविधियों से हटाकर पुनर्योजी गतिविधियों में लगाकर विकास को पर्यावरणीय क्षति से अलग किया जाता है।
  • बाह्य प्रभावों का मूल्य निर्धारण: पर्यावरणीय लागत को इसमें शामिल करने के लिये कार्बन टैक्स या "प्रकृति-उत्तरदायित्व" शुल्क जैसे तंत्र लागू करें, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना महंगा तथा संरक्षण करना लाभकारी बन सके।
  • अनिवार्य प्रकटीकरण: सरकारों को प्रकृति से संबंधित वित्तीय प्रकटीकरणों को अनिवार्य (जो TNFD - प्रकृति संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण कार्यबल के अनुरूप हों) करना चाहिये।
    • कंपनियों को अपने शेयरधारकों को अपनी "प्रकृति पर निर्भरता" और "प्रकृति पर प्रभाव" की रिपोर्ट देना अनिवार्य है।
  • नवोन्मेषी साधन: मुख्यधारा के निवेशकों को आकर्षित करने के लिये "ग्रीन बॉण्ड", "स्थिरता-संबंधित ऋण" और "जैव विविधता क्रेडिट" जैसे वित्तीय उत्पादों का विस्तार करना।
    • सार्वजनिक संस्थाओं (जैसे– विश्व बैंक या राष्ट्रीय विकास बैंक) को NbS परियोजनाओं में निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिये "प्राथमिक नुकसान गारंटी" या रियायती पूंजी प्रदान करनी चाहिये।
  • मानकीकृत मापदंड: केवल CO2 पर ध्यान देने के बजाय जैव विविधता के लिये मानकीकृत मापदंड (जैसे– औसत प्रजाति प्रचुरता) अपनाएँ, ताकि ग्रीनवॉशिंग रोकी जा सके।
  • समेकित नीति: वित्त, कृषि और ऊर्जा मंत्रालयों को अपनी नीतियों को कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (GBF) लक्ष्यों के अनुरूप संरेखित करना चाहिये, जिससे एक मंत्रालय वही नीतिगत कार्रवाई न करे जिसे दूसरा मंत्रालय बचाने का प्रयास कर रहा हो।

निष्कर्ष

द स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 में चेतावनी दी गई है कि वर्तमान आर्थिक प्रणालियाँ पर्यावरणीय विनाश को वित्तीय समर्थन दे रही हैं। भारत के लिये यह आवश्यक है कि प्रकृति संक्रमण X-कर्व को लागू करके प्रकृति-निर्भर अर्थव्यवस्था से प्रकृति-सकारात्मक विकास मॉडल में बदलाव किया जाए, ताकि जैव विविधता की रक्षा हो और 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आर्थिक लक्ष्य की प्राप्ति सुनिश्चित हो सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान से निपटने में प्रकृति-आधारित समाधानों के महत्त्व की जाँच कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. द स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 रिपोर्ट में क्या बताया गया है?
यह दिखाती है कि वैश्विक वित्त बड़ी मात्रा में प्रकृति-विनाशकारी गतिविधियों का समर्थन करता है, हानिकारक और संरक्षणात्मक निवेश के बीच 30:1 का असंतुलन है।

2. प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) क्या हैं?
NbS वे क्रियाएँ हैं जो पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा, पुनर्स्थापना या प्रबंधन करती हैं, ताकि सामाजिक चुनौतियों का समाधान हो और जैव विविधता तथा मानव कल्याण में लाभ मिले।

3. NbS में निजी निवेश सीमित क्यों है?
उच्च जाँच लागत, मानकीकृत मापदंडों का अभाव, लंबी परिपक्वता अवधि और द्वितीयक बाज़ारों की अनुपस्थिति निजी पूंजी को रोकती है।

4. भारत के लिये कम NbS वित्तपोषण क्यों जोखिमपूर्ण है?
भारत की अर्थव्यवस्था प्राकृतिक प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर है; पारिस्थितिक तंत्र का पतन कृषि, आजीविका और समग्र आर्थिक स्थिरता के लिये खतरा बन सकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स

प्रश्न. बेहतर नगरीय भविष्य की दिशा में कार्यरत संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र पर्यावास (UN-Habitat) की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017) 

  1. संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावास को आज्ञापित किया गया है कि वह सामाजिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से धारणीय ऐसे कस्बों एवं शहरों को संवर्द्धित करे जो सभी को पर्याप्त आश्रय प्रदान करते हों।  
  2. इसके साझीदार सिर्फ सरकारें या स्थानीय नगर प्राधिकरण ही हैं। 
  3. संयुक्त राष्ट्र पर्यावास, सुरक्षित पेयजल व आधारभूत स्वच्छता तक पहुँच बढ़ाने और गरीबी कम करने के लिये संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के समग्र उद्देश्य में योगदान करता है। 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) 1, 2 और 3 

(b) केवल 1 और 3 

(c) केवल 2 और 3 

(d) केवल 1 

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न: कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारंबारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)

प्रश्न. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)