सोडियम-आयन बैटरी | 06 Feb 2026
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रिक वेहिकल, महत्त्वपूर्ण खनिज, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन
मुख्य परीक्षा के लिये: बैटरी प्रौद्योगिकी एवं भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महत्त्वपूर्ण खनिज तथा रणनीतिक स्वायत्तता
चर्चा में क्यों?
आधुनिक अवसंरचना का आधार बनती जा रही बैटरियों के संदर्भ में लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी पर भारत की अत्यधिक निर्भरता उसे आपूर्ति संबंधी जोखिमों तथा आयात पर निर्भरता के प्रति संवेदनशील बनाती है। इस परिप्रेक्ष्य में सोडियम-आयन बैटरी (SiB) एक अधिक सुरक्षित एवं लचीले विकल्प के रूप में उभर रही है, जिसके चलते भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु रणनीतिक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।
सारांश
- लिथियम-आयन बैटरियों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता उसे आयात-निर्भरता तथा महत्त्वपूर्ण खनिज संबंधी जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे सोडियम-आयन बैटरियाँ इलेक्ट्रिक वेहिकल, ग्रिड स्टोरेज तथा स्वच्छ ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिये एक सुरक्षित, लागत-प्रभावी एवं सुरक्षित संसाधन के विकल्प के रूप में उभरती हैं।
- हालाँकि, सोडियम-आयन बैटरियाँ सामरिक लाभ प्रदान करती हैं, किंतु भारत में इनके व्यापक विस्तार के लिये लक्षित नीतिगत समर्थन, आपूर्ति-शृंखला का विकास, विनिर्माण पारितंत्र का सुदृढ़ीकरण तथा प्रारंभिक बाज़ार परिनियोजन आवश्यक है।
सोडियम-आयन बैटरी क्या हैं?
- परिचय: सोडियम-आयन बैटरी लिथियम-आयन बैटरियों का लागत-प्रभावी एवं सुरक्षित विकल्प हैं, जो ऊर्जा भंडारण के लिये प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सोडियम संसाधनों (जैसे– समुद्री लवण) का उपयोग करती हैं।
- ये त्वरित चार्जिंग, निम्न तापमान पर उत्कृष्ट प्रदर्शन तथा दीर्घ आयु प्रदान करती हैं, जिससे ये इलेक्ट्रिक वेहिकल (EV), ग्रिड स्टोरेज तथा सौर अनुप्रयोगों के लिये उपयुक्त बनती हैं।
- लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में सोडियम-आयन बैटरियाँ:
- ऊर्जा घनत्व: ऐतिहासिक रूप से सोडियम लिथियम की तुलना में भारी होने के कारण सोडियम-आयन बैटरियों की विशिष्ट ऊर्जा कम रही है।
- हालाँकि, आधुनिक स्तरीकृत संक्रमण-धातु ऑक्साइड कैथोड के उपयोग से सोडियम-आयन बैटरियों का ऊर्जा घनत्व अब लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों के ऊर्जा घनत्व के क़रीब पहुँच रहा है।
- सुरक्षा प्रोफाइल: सोडियम-आयन बैटरियाँ स्वभावतः अधिक सुरक्षित होती हैं। थर्मल रन-अवे की स्थिति में इनमें लिथियम-आयन सेल की तुलना में तापमान काफी कम रहता है।
- परिवहन संबंधी लाभ: लिथियम-आयन बैटरियों के विपरीत, जिन्हें खतरनाक वस्तु माना जाता है और लगभग 30% चार्ज की अवस्था में ही परिवहन करना पड़ता है, सोडियम-आयन बैटरियों को बिना किसी क्षरण के शून्य वोल्ट पर संगृहीत एवं परिवहन किया जा सकता है।
- इससे परिवहन के दौरान अग्नि संबंधी जोखिम समाप्त होता है तथा लॉजिस्टिक लागत में कमी आती है।
- ऊर्जा घनत्व: ऐतिहासिक रूप से सोडियम लिथियम की तुलना में भारी होने के कारण सोडियम-आयन बैटरियों की विशिष्ट ऊर्जा कम रही है।
- भारत के लिये सोडियम-आयन बैटरियों का महत्त्व:
- आयात निर्भरता में कमी: लिथियम-आयन बैटरियों की सफलता के पीछे कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ निहित हैं, क्योंकि ये लिथियम, कोबाल्ट, निकेल तथा ग्रेफाइट जैसे दुर्लभ महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता है।
- सोडियम का स्रोत सोडा ऐश जैसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध घरेलू संसाधन हैं, जो रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक सशक्त मार्ग प्रदान करते हैं।
- SiB भारत को उन प्रमुख खनिजों से जुड़े वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम और मूल्य अस्थिरता से सुरक्षित रख सकते हैं, जो कुछ ही देशों (जैसे– चीन) द्वारा नियंत्रित हैं।
- बड़े पैमाने पर बाज़ार के लिये लागत लाभ: सोडियम-आयन बैटरी में करंट कलेक्टर एल्यूमिनियम से बनाए जाते हैं, जिससे इनकी लागत कम होती है, वज़न हल्का होता है और सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
- यह SiBs को भारत के मूल्य-संवेदनशील बाज़ारों के लिये उपयुक्त बनाता है, जैसे– इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन, तिपहिया वाहन और ग्रिड ऊर्जा भंडारण।
- अपनाने की सुविधा: चूँकि सोडियम-आयन बैटरी का निर्माण मौजूदा PLI-प्रोत्साहित बुनियादी ढाँचे का उपयोग करके (न्यूनतम बदलावों के साथ) किया जा सकता है, इसलिये भारत पूरी तरह से नया ईकोसिस्टम बनाए बिना उत्पादन को तेज़ी से बढ़ा सकता है।
- लागत अनुमानों के अनुसार, 2030 के दशक के मध्य तक सोडियम-आयन बैटरी लिथियम-आयन बैटरी की तुलना में अधिक किफायती हो सकती हैं।
- विश्व स्तर पर निर्माण क्षमता के तेज़ी से विस्तार के मद्देनज़र, भारत के लिये प्रतिस्पर्द्धा बनाए रखने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु शीघ्र एवं निर्णायक रूप से अपनाना आवश्यक है।
- आयात निर्भरता में कमी: लिथियम-आयन बैटरियों की सफलता के पीछे कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ निहित हैं, क्योंकि ये लिथियम, कोबाल्ट, निकेल तथा ग्रेफाइट जैसे दुर्लभ महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता है।
बैटरी निर्माण को मज़बूत करने हेतु भारत की पहल
- उन्नत रसायन कोशिका बैटरी स्टोरेज के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (PLI): यह योजना उन्नत बैटरी सेल्स के घरेलू निर्माण को प्रोत्साहित करती है और तकनीकी अपनाने, अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा उत्पादन क्षमता के विस्तार को बढ़ावा देती है।
- PLI योजना के तहत ACC के लिये 50 GWh घरेलू उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 40 GWh चार लाभार्थी कंपनियों को आवंटित किया गया है। लेकिन अब तक केवल लगभग 1 GWh ही चालू किया गया है और कोई प्रोत्साहन राशि प्राप्त नहीं हुई है, जो ज़मीन पर प्रगति की धीमी गति को दर्शाता है।
- नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन: यह मिशन खोज, खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और विदेशी संपत्तियों के माध्यम से महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करता है।
- खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड के माध्यम से विदेशों में खनिज साझेदारी: विदेशों में लिथियम और अन्य महत्त्वपूर्ण खनिज संपत्तियों का अधिग्रहण तथा विकास।
- बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022: बैटरी के संग्रह, पुनर्चक्रण और नवीनीकरण के लिये विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) को अनिवार्य करता है।
भारत में SiBs को बड़े पैमाने पर लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- वज़न संबंधी बाधा: लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में अधिक वज़न के कारण यह उच्च रेंज और सीमित स्थान वाले अनुप्रयोगों, जैसे– कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये कम उपयुक्त है।
- निर्माण संबंधी जटिलताएँ: सोडियम-आयन सेल्स नमी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिये इनके लिये डिपर वैक्यूम ड्राइंग और सख्त प्रक्रिया नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
- निर्माण के दौरान उच्च ऊर्जा खपत प्रारंभिक लागत बढ़ा सकती है, जब तक कि उन्नत तकनीकें पूरी तरह विकसित नहीं हो जातीं।
- अल्पविकसित आपूर्ति शृंखला: भारत में सोडियम-विशिष्ट कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट और सेपरेटर के लिये पर्याप्त विकसित ईकोसिस्टम उपलब्ध नहीं है।
- बैटरी-ग्रेड सामग्री के लिये प्रसंस्करण अवसंरचना अभी शुरुआती स्तर पर है और इसके लिये सेल असेंबली के अलावा अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होती है।
- नीति और नियामक अंतराल: वर्तमान प्रोत्साहन योजनाएँ मुख्य रूप से लिथियम पर केंद्रित हैं और सोडियम-आयन बैटरी रसायनों के लिये स्पष्ट लक्ष्य या समर्थन नहीं दिया गया है।
- समर्पित सुरक्षा मानकों और प्रमाणन मार्गों के अभाव के कारण वेहिकल की मंज़ूरी और उनके व्यावसायिक रोलआउट की गति धीमी हो जाती है।
- बाज़ार में कम विश्वास: लिथियम-आयन की तुलना में वास्तविक परिस्थितियों में कम उपयोग के कारण मूल उपकरण निर्माता (OEMs) का विश्वास कम होता है।
- पर्याप्त पायलट परियोजनाओं और प्रदर्शन की कमी बड़े पैमाने पर अपनाने में देरी करती है, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वेहिकल (EV) प्लेटफॉर्मों में।
भारत में SiBs को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- फार्म-टू-बैटरी हार्ड कार्बन रणनीति: आयातित हार्ड कार्बन (जो SiBs में एनोड के रूप में उपयोग किया जाता है) के स्थान पर कृषि अपशिष्ट का उपयोग किया जाना चाहिये।
- चावल उत्पादक क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा) और नारियल उत्पादक क्षेत्रों (केरल, तमिलनाडु) के पास उच्च तापमान वाले पायरोलिसिस इकाइयाँ स्थापित की जानी चाहिये।
- इससे पराली दहन से होने वाली प्रदूषण की समस्या कच्चे माल के समाधान में परिणत हो जाती है, जिससे एनोड के लिये बैटरी-ग्रेड हार्ड कार्बन की घरेलू आपूर्ति का सृजन होता है।
- मरुस्थल-केंद्रित विनिर्माण क्लस्टर: सोडियम-आयन कारखानों को राजस्थान या कच्छ जैसे शुष्क क्षेत्रों में स्थापित किया जाना चाहिये।
- निम्न आर्द्रता के कारण ड्राई-रूम की ऊर्जा आवश्यकताएँ कम होंगी जिससे परिचालन लागत घटेगी तथा नमी संबंधी विनिर्माण चुनौतियाँ कम होंगी।
- मानकीकरण के माध्यम से रणनीतिक बाज़ार प्रवेश: प्रारंभिक चरण में तिपहिया वाहनों और बसों के लिये सोडियम-आयन बैटरी पैक के आकार का मानकीकरण किया जाना चाहिये। ये सेगमेंट अपेक्षाकृत बड़े बैटरी पैक को समायोजित कर सकते हैं और दोपहिया वाहनों में विस्तार से पूर्व आवश्यक पैमाना उपलब्ध कराते हैं।
- हाइब्रिड सोडियम-लिथियम बैटरी पैक: दैनिक उपयोग के लिये सोडियम-आयन और उच्च प्रदर्शन आवश्यकताओं के लिये लिथियम-आयन को संयोजित करने वाले द्वि-रसायन पैकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- रासायनिक उन्नयन हेतु प्रोत्साहन: घरेलू रासायनिक उद्योगों को औद्योगिक सोडा ऐश को बैटरी-ग्रेड सोडियम कार्बोनेट में उन्नत करने हेतु प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। इससे आपूर्ति शृंखला की महत्त्वपूर्ण कमियों को दूर किया जा सकेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी।
निष्कर्ष:
सोडियम-आयन बैटरियाँ भारत को आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने का एक व्यवहार्य मार्ग प्रदान करती हैं। लक्षित नीतिगत समर्थन और पारिस्थितिक तंत्र के विकास के साथ, ये लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी की पूरक बन सकती हैं। दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिये इनका शीघ्र अंगीकरण महत्त्वपूर्ण है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत में सोडियम-आयन बैटरी के व्यापक उत्पादन में आने वाली तकनीकी और पारिस्थितिक तंत्र संबंधी चुनौतियों पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. सोडियम-आयन बैटरी क्या हैं और ये भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
सोडियम-आयन बैटरियाँ लिथियम के स्थान पर प्रचुर उपलब्ध सोडियम का उपयोग करती हैं, जिससे आयात-निर्भरता घटती है और ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है। साथ ही ये अधिक सुरक्षित और तुलनात्मक रूप से किफायती ऊर्जा भंडारण समाधान प्रदान करती हैं।
प्रश्न 2. सोडियम-आयन बैटरी की तुलना लिथियम-आयन बैटरी से कैसे की जाती है?
इनका ऊर्जा घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है परंतु सुरक्षा अधिक होती है, सामग्री-जोखिम कम होता है, परिवहन अपेक्षाकृत सरल होता है तथा प्रदर्शन LFP श्रेणी की बैटरियों के तुल्य होता है।
प्रश्न 3. भारत में बैटरी निर्माण को कौन-सी सरकारी पहलें समर्थन देती हैं?
प्रमुख पहलों में उन्नत रसायन विज्ञान सेल बैटरी भंडारण के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन और बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022 शामिल हैं।
प्रश्न 4. भारत में सोडियम-आयन बैटरी के उत्पादन को बढ़ाने में मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
कम ऊर्जा घनत्व, नमी संवेदनशील विनिर्माण प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त रूप से विकसित आपूर्ति-शृंखला, लिथियम-केंद्रित नीतिगत ढाँचा और सीमित बाज़ार विश्वास प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
प्रश्न 5. भारत में सोडियम-आयन बैटरी को अपनाने में तेज़ी लाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
कृषि अपशिष्ट का हार्ड कार्बन हेतु उपयोग, मरुस्थल-केंद्रित विनिर्माण क्लस्टर, हाइब्रिड बैटरी पैक, सार्वजनिक परिवहन के लिये मानकीकरण तथा रासायनिक उन्नयन हेतु प्रोत्साहन।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न 1. विद्युत् वाहन बैटरियों के संदर्भ में निम्नलिखित तत्त्वों पर विचार कीजिये: (2025)
- कोबाल्ट
- ग्रेफाइट
- लिथियम
- निकेल
उपर्युक्त में से कितने सामान्यतया बैटरी के कैथोड बनाने के लिये उपयुक्त होते हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) केवल तीन
(d) सभी चार
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा धातु युग्म क्रमशः सबसे हल्की धातु और सबसे भारी धातु को निरूपित करता है? (2008)
(a) लिथियम और पारा
(b) लिथियम और ऑस्मियम
(c) एल्यूमिनियम और ऑस्मियम
(d) एल्यूमिनियम और पारा
उत्तर: (b)