दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के सात वर्ष | 28 Nov 2023

प्रिलिम्स के लिये:

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण न्यायाधिकरण (NCLT), दिवाला, शोधन अक्षमता

मेन्स के लिये:

IBC के समक्ष चुनौतियाँ, भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना से संबंधित मुद्दे, संसाधनों को जुटाना, वृद्धि, विकास एवं रोज़गार 

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) को वर्ष 2016 में पेश किया गया। यह भारत में तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान और क्रेडिट संस्कृति में सुधार करने में एक परिवर्तनकारी उपकरण रहा है।

  • हालाँकि CRISIL रेटिंग की एक हालिया रिपोर्ट में कुछ चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है जो IBC के सात वर्ष पूरे होने पर इसकी सफलता को प्रभावित कर रही हैं।

टिप्पणी:

  • CRISIL रेटिंग भारत की अग्रणी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CRISIL लिमिटेड की सहायक कंपनी है।
  • यह एक पूर्ण-सेवा रेटिंग एजेंसी है जो विनिर्माण कंपनियों से लेकर वित्तीय संस्थानों तक ऋण उपकरणों की संपूर्ण शृंखला की रेटिंग करती है।

IBC की सफलता में क्या बाधा आ रही है?

  • गिरती रिकवरी दरें:
    • मार्च 2019 और सितंबर 2023 के दौरान रिकवरी दर में 43% से 32% तक की उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है।
      • पुनर्प्राप्ति/रिकवरी दर स्वीकृत दावों का प्रतिशत है जिसे लेनदार IBC के तहत कॉर्पोरेट देनदार के रिज़ॉल्यूशन या परिसमापन से वसूल करते हैं।
    • मूल कारण
      • सीमित न्यायिक पीठ की शक्ति: IBC समाधान प्रक्रिया न्यायाधीशों की कमी के कारण बाधित होती है, जिसके परिणामस्वरूप मामले की प्रोसेसिंग/कार्रवाई मंद पड़ जाती है। जिस कारण इसके समाधान में अधिक समय लगता है।
      • डिफॉल्ट की पहचान में देरी: डिफॉल्ट की पहचान और उसे स्वीकार करने में समय लेने वाली प्रक्रियाएँ पुनर्प्राप्ति दर को कम करने में योगदान देती हैं। यह समाधान कार्यवाही को समय पर शुरू करने में बाधा उत्पन्न करता है, जिससे वसूली दर कम हो जाती है।
    • प्रभाव:
      • परिसंपत्ति मूल्य में कमी
      • ऋणदाताओं और हितधारकों को प्रभावित करने वाली वसूली इष्टतम से कम।
  • बढ़ा हुआ समाधान समय:
    • औसत समाधान समय 324 से बढ़कर 653 दिन हो गया है, जो निर्धारित 330 दिनों से कहीं अधिक है।
    • मूल कारण:
      • लंबे समय तक पूर्व-IBC प्रवेश चरण: इस चरण में विलंब, वित्तीय वर्ष 2022 में 650 दिनों तक (वित्तीय वर्ष 2019 में लगभग 450 दिनों से अधिक) रहा।
    • प्रभाव:
      • धीमी समाधान प्रक्रियाएँ।
      • कार्यवाही शुरू करने में देरी के कारण वसूली दर का दमन।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 क्या है?

  • परिचय:
    • IBC, 2016 भारत का शोधन अक्षमता कानून है जो कॉर्पोरेट, साझेदारी फर्मों एवं व्यक्तियों के दिवाला और शोधन अक्षमता से संबंधित मौजूदा कानूनों को समेकित तथा संशोधित करता है।
      • दिवाला एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी व्यक्ति या संगठन की देनदारियाँ  उसकी संपत्ति से अधिक हो जाती हैं और वह संस्था अपने दायित्वों या ऋणों को पूरा करने के लिये पर्याप्त नकदी जुटाने में असमर्थ होती है क्योंकि उनका भुगतान बकाया हो जाता है।
      • शोधन अक्षमता की स्थिति तब होती है जब किसी व्यक्ति या कंपनी को कानूनी तौर पर उनके देय बिलों का भुगतान करने में असमर्थ घोषित कर दिया जाता है।
    • IBC का लक्ष्य दिवाला समाधान के लिये समयबद्ध और लेनदार-संचालित प्रक्रिया प्रदान करना तथा देश में क्रेडिट संस्कृति व कारोबारी माहौल में सुधार करना है।
    • IBC शोधन अक्षमता कंपनियों से जुड़े दावों का समाधान करती है। इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को प्रभावित करने वाली खराब ऋण समस्याओं से निपटना था।
  • नियामक प्राधिकरण:
    • भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) की स्थापना दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत की गई थी।
    • यह एक वैधानिक निकाय है, जो भारत में कॉर्पोरेट, साझेदारी फर्मों व व्यक्तियों के दिवाला और शोधन अक्षमता समाधान के लिये नियम एवं विनियम बनाने तथा लागू करने हेतु ज़िम्मेदार है।
    • IBBI में 10 सदस्य हैं, जो वित्त मंत्रालय, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • निर्णायक प्राधिकारी:
    • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (National Company Law Tribunal- NCLT) का कंपनियों, अन्य सीमित देयता संस्थाओं पर अधिकार क्षेत्र है।
    • ऋण वसूली न्यायाधिकरण (Debt Recovery Tribunal- DRT) के पास सीमित देयता भागीदारी के अलावा अन्य व्यक्तियों और साझेदारी फर्मों पर अधिकार क्षेत्र है।
  • IBC में संशोधन:
    • उभरती चुनौतियों से निपटने और इसकी प्रभावशीलता बढ़ाने के लिये पिछले 12 महीनों में IBC में महत्त्वपूर्ण संशोधन हुए हैं।
      • इन संशोधनों में अलग-अलग आधार पर परिसंपत्तियों की बिक्री या समाधान योजनाओं को मंज़ूरी देना, NCLT पीठों की संख्या बढ़ाकर 16 करना और दावे दायर करने के लिये समयसीमा बढ़ाना शामिल है।
      • अद्वितीय चुनौतियों का समाधान करने के लिये सेक्टर-विशिष्ट संशोधन, कॉर्पोरेट देनदारों के ऑडिट के प्रावधान और फॉर्म G2 में संशोधन पेश किये गए हैं।
  • उपलब्धियाँ:
    • CRISIL के अनुसार, वर्ष 2016 में अपनी स्थापना के बाद से IBC ने सात वर्षों में 808 मामलों में फँसे 3.16 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ का निपटान किया है।
    • इसने ऋण वसूली न्यायाधिकरण, वित्तीय संपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण एवं सुरक्षा हित का प्रवर्तन (SARFAESI) अधिनियम, 2002 तथा लोक अदालत जैसे पिछले तंत्रों की तुलना में बेहतर वसूली दरों के साथ बड़ी मात्रा में तनावग्रस्त संपत्तियों का निपटान किया है।
    • IBC ने उच्च वसूली दर हासिल की है, लेनदारों को औसतन 32% स्वीकृत दावों और 169% परिसमापन मूल्य का एहसास हुआ है।
      • इसके विपरीत अन्य तंत्रों में पुनर्प्राप्ति दर 5-20% के बीच थी।
    • IBC का निवारक प्रभाव स्पष्ट है क्योंकि उधारकर्त्ताओं ने कंपनियों के नुकसान के डर से सक्रिय रूप से दिवालिया प्रक्रिया मामले में शामिल होने से पहले 9 लाख करोड़ रुपए से अधिक के ऋण का निपटान किया है।
      • यह उधारकर्त्ताओं के बीच एक महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक परिवर्तन को उजागर करता है, जो समय पर निपटान को प्रोत्साहित करने में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की प्रभावकारिता को प्रदर्शित करता है।

IBC संबंधित चुनौतियों का समाधान कैसे कर सकता है?

  • CRISIL रेटिंग ने IBC के प्रदर्शन को बढ़ाने के लिये एक CDE दृष्टिकोण का सुझाव दिया, जहाँ  C का अर्थ क्षमता (Capacity) वृद्धि, D का अर्थ डिजिटलीकरण (Digitalisation) तथा E का अर्थ बड़े कॉरपोरेट्स के लिये प्री-पैक रिज़ॉल्यूशन का विस्तार (Expansion of pre-pack resolutions to large corporates) है।
    • क्षमता वृद्धि मामले में IBC कार्यान्वयन के लिये उत्तरदायी NCLT जैसे प्रमुख संस्थानों के बुनियादी ढाँचे तथा मानव संसाधनों को बढ़ाना शामिल है।
      • इसका उद्देश्य समाधान के विभिन्न चरणों में 13,000 मामलों के बैकलॉग को कम करके संबंधित मामलों के समाधान में गतिशीलता प्रदान करना है।
    • डिजिटलीकरण का तात्पर्य IBC प्रक्रिया में शामिल सभी हितधारकों को जोड़ने के लिये एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना है।
      • इससे डेटा विषमता को खत्म करने, पारदर्शिता बढ़ाने तथा त्वरित निर्णय लेने की सुविधा मिलेगी।
    • प्री-पैकेज़्ड इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (PPIRP) को बड़े निगमों तक विस्तारित करने से समय के साथ मूल्य में गिरावट को रोकने में मदद मिलेगी।

विधिक दृष्टिकोण:

महत्वपूर्ण संस्थानों के बारे में विस्तार से पढ़ें:

www.drishtijudiciary.com

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा हाल ही में समाचारों में आए 'दबावयुक्त परिसंपत्तियों के धारणीय संरचना पद्धति (स्कीम फॉर सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स/S4A)' का सर्वोत्कृष्ट वर्णन करता है? (2017)

(a) यह सरकार द्वारा निरूपित विकासपरक योजनाओं की पारिस्थितिकीय कीमतों पर विचार करने की पद्धति है ।
(b) यह वास्तविक कठिनाइयों का सामना कर रही बड़ी कॉर्पोरेट इकाइयों की वित्तीय संरचना के पुनर्संरचन के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक की स्कीम है ।
(c) यह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के बारे में सरकार की विनिवेश योजना है।
(d) यह सरकार द्वारा हाल ही में क्रियान्वित 'इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' का एक महत्त्वपूर्ण उपबंध है।

उत्तर: (b)