भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण: संभावनाएँ, क्षमता और नीतिगत अनुशंसाएँ | 08 Jan 2026
प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क, भारत विद्या कोष
मेन्स के लिये: उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण और राष्ट्रीय विकास, ब्रेन ड्रेन बनाम ब्रेन सर्कुलेशन, शिक्षा और आर्थिक वृद्धि के बीच संबंध, मृदु शक्ति (सॉफ्ट पावर) और कूटनीति में उच्च शिक्षा की भूमिका
चर्चा में क्यों?
नीति आयोग ने ‘भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण: संभावनाएँ, क्षमता और नीतिगत अनुशंसाएँ (Internationalisation of Higher Education in India: Prospects, Potential, and Policy Recommendations)’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत को उच्च शिक्षा का वैश्विक गंतव्य बनाने हेतु एक समग्र रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।
सारांश
- नीति आयोग की रिपोर्ट में उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को भारत के ब्रेन ड्रेन, छात्र गतिशीलता के असंतुलन और विदेशी मुद्रा के बड़े बहिर्वाह जैसी चुनौतियों से निपटने तथा अनुसंधान, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने हेतु एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में रेखांकित किया गया है।
- प्रस्तावित रोडमैप में छात्रवृत्तियाँ, USD 10 अरब का अनुसंधान कोष, नियामक एवं वीज़ा सुधार, तथा वैश्विक शैक्षणिक साझेदारियाँ शामिल हैं, जिनका उद्देश्य NEP 2020 और SDGs के अनुरूप भारत को छात्रों का शुद्ध निर्यातक से बदलकर वैश्विक शिक्षा केंद्र में परिवर्तित करना है।
भारत के लिये उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) की समस्या का समाधान: भारत में आवक-जावक (Inbound-Outbound) छात्रों का अनुपात 1:28 है, जो विदेशों की ओर छात्र पलायन की ओर एक गंभीर प्रवृत्ति को दर्शाता है।
- यह स्थिति उल्लेखनीय ब्रेन ड्रेन तथा घरेलू शैक्षणिक क्षमता में कमी को परिलक्षित करती है।
- वर्ष 2011 से अब तक 16 लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता का परित्याग किया है, जिसका एक कारण विदेशों में शैक्षणिक–आप्रवासन रहा है। उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण ब्रेन ड्रेन को ब्रेन सर्कुलेशन में परिवर्तित कर सकता है।
- आर्थिक तथा विदेशी मुद्रा बहिर्गमन में कमी: भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय वर्ष 2025 तक लगभग ₹6.2 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
- यह राशि लगभग GDP के 2% के बराबर तथा भारत के व्यापार घाटे (वित्त वर्ष 2024–25) के लगभग 75% के समकक्ष है। घरेलू स्तर पर गुणवत्तापूर्ण अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराकर विदेशी मुद्रा बहिर्गमन की इस स्थिति को सीमित किया जा सकता है।
- भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता का सुदृढ़ीकरण: भारतीय छात्रों का अमेरिका, ब्रिटेन तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे उच्च-आय एवं रणनीतिक देशों में अत्यधिक संकेन्द्रण (लगभग 8.5 लाख से अधिक छात्र) दीर्घकाल में भारत की ज्ञान-अर्थव्यवस्था और नवाचार आधार को कमज़ोर कर सकता है।
- इसके विपरीत, वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना शोध गुणवत्ता में सुधार करता है तथा संस्थागत रैंकिंग को सुदृढ़ बनाता है।
- शोध एवं सॉफ्ट पावर का विस्तार: वर्तमान में भारत में लगभग 47,000 अंतर्राष्ट्रीय छात्र (2022) अध्ययनरत हैं, किंतु सशक्त नीतिगत समर्थन के साथ 2047 तक यह संख्या 7.89–11 लाख तक पहुँच सकती है।
- वर्ष 2001 से, अंतर्राष्ट्रीय छात्र प्रवाह में 518% की वृद्धि हुई है, जो भारत की एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में महत्त्वपूर्ण लेकिन यह अभी तक पूरी तरह से विकसित या सक्रिय नहीं हुई है, जो भारत की क्षमता को उजागर करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय छात्रों और शिक्षकों का आगमन शोध उत्पादन, अंतर-सांस्कृतिक अधिगम और वैश्विक सहयोगों को प्रोत्साहन प्रदान करता है।
- यह भारत को एक वैश्विक ज्ञान केंद्र (Global Knowledge Hub) के रूप में स्थापित करता है और शैक्षिक कूटनीति को सशक्त बनाता है।
- वर्ष 2001 से, अंतर्राष्ट्रीय छात्र प्रवाह में 518% की वृद्धि हुई है, जो भारत की एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में महत्त्वपूर्ण लेकिन यह अभी तक पूरी तरह से विकसित या सक्रिय नहीं हुई है, जो भारत की क्षमता को उजागर करता है।
- राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों का समर्थन: अंतर्राष्ट्रीयकरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारत की 2047 विकास दृष्टि के विकास दृष्टि के अनुरूप है।
- यह आर्थिक विकास और तकनीकी नेतृत्व के लिये आवश्यक उच्च-कुशल कार्यबल के निर्माण में सहायता करता है।
भारत में उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रमुख चुनौतियाँ
- सीमित छात्रवृत्तियाँ एवं वित्तीय सहायता: नीति आयोग द्वारा सर्वेक्षण किये गए भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में से लगभग 41% ने अपर्याप्त छात्रवृत्तियों को सबसे बड़ी बाधा बताया है।
- जर्मनी तथा फ्राँस जैसे देशों में वहनीय शिक्षा के साथ छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है, जिससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता अपेक्षाकृत कमज़ोर हो जाती है।
- शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कमज़ोर वैश्विक धारणा: भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रति वैश्विक स्तर पर गुणवत्ता संबंधी धारणा अब भी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है।
- हालाँकि IITs एवं IISc जैसे संस्थानों ने कई क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, तथापि QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स: एशिया 2026 में किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय का शीर्ष 50 में स्थान न बना पाना वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा तथा अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड विश्वसनीयता में विद्यमान अंतराल को स्पष्ट करता है।
- वीज़ा की प्रदायगी और जटिल नियामकीय ढाँचा: नियामक संस्थाओं, वीज़ा स्वीकृति में विलंब तथा सिंगल-विंडो प्रणाली के अभाव के कारण विदेशी छात्र एवं संकाय भारत आने से हतोत्साहित होते हैं।
- ऑस्ट्रेलिया की छात्र-अनुकूल वीज़ा व्यवस्था के विपरीत, भारत में अब तक त्वरित शैक्षणिक वीज़ा तंत्र विकसित नहीं हो पाया है।
- अपर्याप्त अंतर्राष्ट्रीय परिसर अवसंरचना: अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीय छात्रावास, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, समृद्ध पुस्तकालय तथा समर्पित छात्र-सेवाओं का अभाव है।
- केवल कुछ ही परिसर, जैसे– IIT मद्रास वैश्विक मानकों के अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध करा पाते हैं।
- विदेशी संकाय को आकर्षित करने में कठिनाई: कठोर भर्ती नियम, वेतन-सीमाएँ तथा स्थायी पद-सुरक्षा (टेन्योर) के अभाव के कारण अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविद् भारत में कार्य करने से परहेज़ करते हैं:
- परिणामस्वरूप, भारतीय विश्वविद्यालय अमेरिका एवं यूरोप के उन संस्थानों से प्रतिस्पर्द्धा करने में पिछड़ जाते हैं, जहाँ अनुकूलित अनुबंध एवं उच्च पारिश्रमिक उपलब्ध हैं।
- अंतरविषयक एवं शोध-प्रधान पाठ्यक्रमों की कमी: वैश्विक मानकों पर आधारित, शोध-केंद्रित तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रारूपों में संचालित अंतरविषयक पाठ्यक्रमों की संख्या सीमित है।
- यूरोप में सामान्य रूप से प्रचलित जॉइंट डिग्री एवं डुअल कैंपस प्रोग्राम्स भारत में अब भी अपवाद बने हुए हैं।
- कमज़ोर अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग एवं आउटरीच: भारत में समन्वित वैश्विक विपणन रणनीति तथा सुदृढ़ एलुमनाई नेटवर्क का अभाव है।
- इसके विपरीत, कनाडा जैसे देश दूतावासों एवं डिजिटल अभियानों के माध्यम से स्वयं को प्रभावी ढंग से वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
- सांस्कृतिक एवं सामाजिक समायोजन की चुनौतियाँ: अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को भाषा संबंधी बाधाओं, सांस्कृतिक अलगाव तथा सीमित सहायक पारिस्थितिक तंत्र का सामना करना पड़ता है, जिससे भारत अपेक्षाकृत अधिक छात्र-अनुकूल गंतव्यों की तुलना में कम आकर्षक प्रतीत होता है।
उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये नीति आयोग ने क्या सुझाव दिये हैं?
- वैश्विक प्रतिभा के लिये छात्रवृत्ति और फेलोशिप: नीति आयोग अंतर्राष्ट्रीय छात्रों हेतु विश्वबंधु छात्रवृत्ति और विदेशी शिक्षकों व शोधकर्त्ताओं के लिये विश्वबंधु फेलोशिप शुरू करने की सिफारिश करता है, ताकि भारत का वैश्विक शैक्षणिक आकर्षण बढ़ सके।
- राष्ट्रीय अनुसंधान कोष का निर्माण: प्रस्तावित भारत विद्या कोष एक 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संप्रभु अनुसंधान कोष होगा, जिसमें आधा कोष प्रवासी भारतीयों और दानदाताओं से जुटाया जाएगा तथा शेष आधा भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाएगा।
- बहुपक्षीय शैक्षणिक गतिशीलता ढाँचा: नीति आयोग ने टैगोर फ्रेमवर्क (Tagore Framework) नामक एक Erasmus+-शैली का गतिशीलता कार्यक्रम प्रस्तावित किया है, जो भारत और ASEAN, BRICS, BIMSTEC आदि समूहों के पक्षकार देशों के मध्य छात्रों और शिक्षकों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा।
- Erasmus+ कार्यक्रम यूरोपीय संघ की एक व्यापक पहल है, जो व्यक्तियों और संस्थानों के लिये शिक्षा, प्रशिक्षण, युवा और खेल क्षेत्र में गतिशीलता (Mobility) के विभिन्न अवसर प्रदान करती है।
- वीज़ा की प्रदायगी और नियामकीय सुधार: रिपोर्ट में सरल प्रवेश-निर्गमन नियम, विदेशी शिक्षकों के लिये तेज़ नियुक्ति मार्ग, प्रतिस्पर्द्धी वेतन और वीज़ा, कर पहचान संख्या, बैंकिंग तथा आवास के लिये एक एकीकृत प्रणाली की सिफारिश की गई है।
- नीति आयोग अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने की अनुमति देने के लिये नियमों में ढील देने की सिफारिश करता है, जिसमें कैंपस के अंदर कैंपस जैसे नवाचारी मॉडल भी शामिल हैं।
- रैंकिंग और गुणवत्ता मापदंडों में सुधार: इसमें राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) के मापदंडों को विस्तारित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि आउटरीच और समावेशिता तथा वैश्वीकरण एवं साझेदारियाँ जैसे संकेतकों को शामिल कर अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता को बेहतर ढंग से मापा जा सके।
- ब्रांडिंग, आउटरीच और एलमनाई सहभागिता: इसमें भारत की आन (Bharat ki AAN – Alumni Ambassador Network) बनाने का प्रस्ताव है, ताकि भारतीय उच्च शिक्षा की वैश्विक ब्रांडिंग के लिये भारतीय प्रवासी समुदाय का वैश्विक दूत के रूप में उपयोग किया जा सके।
- संस्थागत और सांस्कृतिक तैयारी: अंतर्राष्ट्रीय छात्र सहायता प्रणाली, सांस्कृतिक समन्वय और दीर्घकालीन अंतर्राष्ट्रीयकरण के माध्यम से संस्थागत क्षमता के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष
भारत की उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण अब रणनीतिक रूप ले चुका है, जो GDP, नवाचार और वैश्विक प्रभाव पर असर डालता है और SDG 4 (गुणवत्ता शिक्षा) तथा SDG 17 (वैश्विक साझेदारी) के साथ संरेखित है। नीति आयोग का रोडमैप भारत को छात्रों के शुद्ध निर्यातक से वैश्विक शिक्षा केंद्र में बदलने के लिये व्यवस्थित सुधार एवं वैश्विक सहभागिता के माध्यम से इसे आकार देने का प्रयास करता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत के लिये उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक रणनीतिक आवश्यकता क्यों बन गया है? आर्थिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नीति आयोग को उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर रिपोर्ट जारी करने के लिये किस बात ने प्रेरित किया?
भारत में विदेशी छात्रों और भारतीय छात्रों का अनुपात 1:28 है, विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह बढ़ रहा है और ब्रेन ड्रेन भी बढ़ रहा है, जिससे एक रणनीतिक नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है।
2. भारतीय उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ क्या हैं?
मुख्य बाधाओं में सीमित छात्रवृत्तियाँ, कमज़ोर वैश्विक स्तर, जटिल वीज़ा प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और विदेशी शिक्षकों को नियुक्त करने में कठिनाई शामिल हैं।
3. नीति आयोग की मुख्य सिफारिशें क्या हैं?
मुख्य प्रस्तावों में विश्वबंधु छात्रवृत्तियाँ, भारत विद्या कोष ($10 बिलियन अनुसंधान कोष), Erasmus+- जैसा टैगोर फ्रेमवर्क और विदेशी कैंपस के लिये नियमों को आसान बनाना शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. संविधान के निम्नलिखित प्रावधानों में से भारत का शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है? (वर्ष 2012)
- राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत
- ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
- पाँचवीं अनुसूची
- छठी अनुसूची
- सातवीं अनुसूची
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3, 4 और 5
(c) केवल 1, 2 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर:(d)
मेन्स
प्रश्न 1. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना कीजिये तथा भारत में उन्हें प्राप्त करने के उपायों का विस्तार से उल्लेख कीजिये। (2021)
प्रश्न 2. भारत में डिजिटल पहल ने किस प्रकार से देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन में योगदान किया है? विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)
प्रश्न 3. भारत में उच्च शिक्षा की गुणता के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी बनाने के लिये उसमें भारी सुधारों की आवश्यकता है। क्या आपके विचार में विदेशी शैक्षिक संस्थाओं का प्रवेश देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा की गुणता की प्रोन्नति में सहायक होगा? चर्चा कीजिये। (2015)