ऑपरेशन मेघ चक्र | 26 Sep 2022

प्रिलिम्स के लिये:

मेघ चक्र, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन अगेंस्ट सेक्सुअल ऑफेंसेज़ एक्ट 2012 (पॉक्सो-अधिनियम)।

मेन्स के लिये:

बाल यौन शोषण से संबंधित मुद्दे और निवारक उपाय / पहल।

चर्चा में क्यों?

एक ऑपरेशन जिसका कोड-नाम "मेघ चक्र" है, न्यूज़ीलैंड के अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इंटरपोल की सिंगापुर विशेष इकाई से प्राप्त जानकारी के बाद चलाया जा रहा है।

  • यह बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के प्रसार और उसे साझा करने के खिलाफ केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) द्वारा संचालित एक अखिल भारतीय अभियान है।

ऑपरेशन मेघ चक्र के प्रमुख बिंदु:

  • 20 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में 59 स्थानों पर तलाशी ली गई।
  • यह आरोप लगाया गया है कि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक क्लाउड-आधारित भंडारण का उपयोग करके बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के ऑनलाइन संचलन , डाउनलोडिंग और प्रसारण में शामिल थे।
  • इस ऑपरेशन का उद्देश्य भारत में विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जानकारी एकत्र करना, वैश्विक स्तर पर संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ जुड़ना और इस मुद्दे पर इंटरपोल चैनलों के माध्यम से निकटता से समन्वय करना है।
  • जाँच में 500 से अधिक समूहों की पहचान की गई थी, जिनमें 5000 से अधिक अपराधी और लगभग 100 देशों के नागरिक भी शामिल थे।
  • नवंबर 2021 में CBI द्वारा "ऑपरेशन कार्बन" नामक ऐसे ही एक अभ्यास कोड का संचालन किया गया था।

बाल यौन शोषण से जुड़े मुद्दे:

  • बहुस्तरीय समस्या: बाल यौन शोषण एक बहुस्तरीय समस्या है जो बच्चों की शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, कल्याण और व्यवहार संबंधी पहलुओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकियों के कारण प्रवर्धन: मोबाइल और डिजिटल प्रौद्योगिकियों ने बाल शोषण एवं दुर्व्यवहार को और बढ़ा दिया है। ऑनलाइन शरारत, उत्पीड़न तथा चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसे बाल शोषण के नए रूप भी सामने आए हैं।
  • अप्रभावी कानून: हालाँकि भारत सरकार ने यौन अपराधों के खिलाफ बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (POCSO अधिनियम) बनाया है, लेकिन यह बच्चों को यौन शोषण से बचाने में विफल रही है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:
    • कम सज़ा दर: विगत 5 वर्षों के औसत को देखें तो लंबित मामलों की संख्या 90% है, इस प्रकार POCSO अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की दर केवल 32% है।
    • न्यायिक विलंब: कठुआ बलात्कार मामले में मुख्य आरोपी को दोषी ठहराने में 16 महीने लग गए, जबकि पॉक्सो अधिनियम में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि पूरी सुनवाई और दोषसिद्धि की प्रक्रिया एक साल में पूरी की जानी है।
    • बच्चे के लिये प्रतिकूल: बच्चे की आयु-निर्धारण से संबंधित चुनौतियाँ। विशेष रूप से ऐसे कानून जो जैविक उम्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि मानसिक उम्र पर।

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012:

  • यह बच्चों के हितों की रक्षा और भलाई के लिये बच्चों को यौन उत्पीड़न, दुर्व्याव्हार एवं अश्लील साहित्य के अपराधों से बचाने के लिये अधिनियमित किया गया था।
  • यह अठारह वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को बच्चे के रूप में परिभाषित करता है और बच्चे के स्वस्थ शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने के लिये हर स्तर पर बच्चे के सर्वोत्तम हित तथा कल्याण को सर्वोपरि मानता है।
  • यह यौन शोषण के विभिन्न रूपों को परिभाषित करता है, जिसमें भेदक और गैर-मर्मज्ञ हमले, साथ ही यौन उत्पीड़न एवं अश्लील साहित्य शामिल हैं।
  • ऐसा लगता है कि कुछ परिस्थितियों में यौन आक्रमण बढ़ गए हैं, जैसे कि जब दुर्व्यवहार का सामना करने वाला बच्चा मानसिक रूप से बीमार होता है अथवा जब दुर्व्यवहार परिवार के किसी सदस्य, पुलिस अधिकारी, शिक्षक या डॉक्टर जैसे विश्वसनीय लोगों द्वारा किया जाता है।
  • यह जाँच प्रक्रिया के दौरान पुलिस को बाल संरक्षक की भूमिका भी प्रदान करता है।
  • अधिनियम में कहा गया है कि बाल यौन शोषण के मामले का निपटारा अपराध की रिपोर्ट की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिये।
  • अगस्त 2019 में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिये मृत्यु दंड सहित कठोर सज़ा देने के लिये इसमें संशोधन किया गया था।

संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

  • संविधान प्रत्येक बच्चे को सम्मान के साथ जीने का अधिकार (अनुच्छेद 21), व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21), निजता का अधिकार (अनुच्छेद 21), समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), भेदभाव (अनुच्छेद 15) और शोषण के विरुद्ध (अनुच्छेद 23 व 24) अधिकार की गारंटी प्रदान करता है।
    • 6-14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21 A)।
  • राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों और विशेष रूप से अनुच्छेद 39 (F) यह सुनिश्चित करने के लिये राज्य पर एक दायित्व आरोपित करता है कि बच्चों को समग्र तरीके से स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण स्थिति में विकसित होने के अवसर एवं सुविधाएँ प्रदान की जाएँ तथा बचपन व युवावस्था में शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक परित्याग के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया जाए।

संबंधित पहलें:

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs):  

भारत के संविधान में शोषण के खिलाफ अधिकार द्वारा निम्नलिखित में से किसकी परिकल्पना की गई है? (2017)

  1. मानव तस्करी और बलात् श्रम का निषेध
  2. अस्पृश्यता का उन्मूलन
  3. अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा
  4. कारखानों और खदानों में बच्चों के नियोजन पर रोक

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) के तहत अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के खिलाफ अधिकार से संबंधित हैं।
  • अनुच्छेद 23 में मानव के अवैध व्यापार और बलात् श्रम पर रोक लगाने का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि मानव तस्करी एवं बेगार तथा इसी तरह के अन्य प्रकार के जबरन श्रम निषिद्ध हैं, इस प्रावधान का कोई भी उल्लंघन कानून के अनुसार दंडनीय अपराध होगा। अत: कथन 1 सही है।
  • अनुच्छेद 24 में कारखानों आदि में बच्चों के नियोजन पर रोक लगाने का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खदान में काम करने के लिये या किसी अन्य खतरनाक रोज़गार में नहीं लगाया जाएगा। अत: कथन 4 सही है।

अतः विकल्प (c) सही है।

स्रोत: द हिंदू