WTO के IFD समझौते का भारत द्वारा विरोध | 27 Mar 2026
प्रिलिम्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन, विकास हेतु निवेश सुगमता (IFD) समझौता, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, बेल्ट एंड रोड पहल, द्विपक्षीय निवेश संधियाँ
मेन्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन (WTO) सुधार और बहुपक्षवाद का संकट, खाद्य सुरक्षा बनाम वैश्विक व्यापार नियम (सार्वजनिक शेयरधारिता का मुद्दा), भारत की व्यापार नीति और रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक शासन में बहुपक्षीय समझौतों की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत ने दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये और लगभग 37 अन्य देशों के साथ विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चीन-समर्थित विकास हेतु निवेश सुगमता (IFD) संबंधी समझौते के खिलाफ आपत्ति व्यक्त की।
सारांश
- भारत बहुपक्षवाद, WTO कन्सेंसस के क्षरण और नीतिगत संप्रभुता एवं खाद्य सुरक्षा (PSH मुद्दा) के लिये खतरों के कारण IFD समझौते का विरोध करता है।
- इसका रुख रणनीतिक भी है, जिसका उद्देश्य दोहा विकास एजेंडे की प्राथमिकताओं को सुरक्षित करने और चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव का सामना करने के लिये वार्त्ता का लाभ उठाना है।
विकास के लिये निवेश सुविधा (IFD) समझौता क्या है?
- परिचय: वर्ष 2017 में चीन के नेतृत्व में विकासशील और अल्प विकसित देशों (LDC) के एक समूह द्वारा शुरू की गई IFD पहल का उद्देश्य निवेश और व्यापार में सुधार के लिये एक वैश्विक समझौता विकसित करना है।
- उद्देश्य: इसका प्राथमिक लक्ष्य नौकरशाही प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके, लालफीताशाही को कम करके तथा विकासशील और अल्प विकसित देशों (LDC) का समर्थन करके निवेशकों के लिये निवेश करना, दिन-प्रतिदिन का व्यवसाय करना और परिचालन के विस्तार को आसान बनाना है।
- प्रमुख विशेषता:
- बहुपक्षीय प्रकृति: इसे एक बहुपक्षीय समझौते (मराकेश समझौते के तहत) के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
- इसका अर्थ यह है कि यह केवल उन WTO सदस्यों के लिये कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा जो स्वेच्छा से इसे स्वीकार और अनुसमर्थन करते हैं, न कि संपूर्ण WTO के सदस्यों के लिये।
- बहिष्करण: प्रस्तावकों का दावा है कि यह समझौता स्पष्ट रूप से बाज़ार पहुँच, निवेश संरक्षण, निवेशक-राज्य विवाद समाधान (ISDS) और सरकारी खरीद जैसे विवादास्पद मुद्दों को बाहर करता है।
- बहुपक्षीय प्रकृति: इसे एक बहुपक्षीय समझौते (मराकेश समझौते के तहत) के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
IFD समझौते के संबंध में भारत की चिंताएँ क्या हैं?
- गैर-जनादेशित मुद्दा: भारत का तर्क है कि निवेश सुविधा एक "गैर-व्यापार मुद्दा" है।
- WTO की स्थापना वस्तुओं, सेवाओं और बौद्धिक संपदा में वैश्विक व्यापार को विनियमित करने के लिये की गई थी।
- एक सर्वसम्मति वाले बहुपक्षीय जनादेश के बगैर WTO के जनादेश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को विनियमित करने के लिये विस्तारित करना मूल मराकेश समझौते का उल्लंघन करता है।
- बहुपक्षवाद और सहमति के लिये खतरा: WTO पारंपरिक रूप से बहुपक्षवाद और सहमति पर कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक सदस्य की समान आवाज़ होती है।
- भारत को आशंका है कि "बहुपक्षीय मार्ग" (इच्छुक गठबंधन द्वारा समर्थित) के माध्यम से IFD को आगे बढ़ाने से यह सर्वसम्मति-आधारित व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।
- यह "दो-स्तरीय" WTO को तैयार कर सकता है, जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा भारी रूप से प्रभुत्वशील हो, जिससे वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज़ को दरकिनार कर दिया जाएगा।
- सोवरेन पॉलिसी स्पेस की कमी: IFD ढाँचा एक पूर्व-निवेश अपील प्रणाली और स्वतंत्र जाँच निकायों का प्रस्ताव करता है।
- भारत चिंतित है कि FDI पर कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक नियम विकासशील राष्ट्रों की घरेलू नीति स्वायत्तता को सीमित कर देंगे।
- सरकारों को अपनी अद्वितीय व्यापक आर्थिक स्थितियों, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं (जैसे– परमाणु ऊर्जा और रक्षा के लिये अपवादों की कमी) और स्थानीय विकास लक्ष्यों के अनुसार विदेशी निवेशों को विनियमित करने के लिये लचीलेपन की आवश्यकता होती है।
- मुख्य मांगों के लिये सामरिक रुख: व्यापार विशेषज्ञ इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि भारत का विरोध सामरिक है।
- भारत WTO को दोहा विकास एजेंडा (DDA) से लंबित लंबित मुद्दों को संबोधित करने के लिये मजबूर करने के लिये IFD पर अपने अवरोध का लाभ उठा रहा है।
- इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा के लिये सार्वजनिक भंडारण (PSH) हेतु एक स्थायी समाधान सुरक्षित करना है [जो भारत की MSP व्यवस्था और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) जैसी योजनाओं के लिये आवश्यक है], जो वर्ष 2013 की बाली "शांति खंड" के बावज़ूद अनसुलझा बना हुआ है।
चीन का दृष्टिकोण
- IFD का समर्थन करने वाले 128 देशों में से 98 देश बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के भी सदस्य हैं।
- भाग लेने वाली अर्थव्यवस्थाओं में नियामकीय प्रक्रियाओं के मानकीकरण के माध्यम से IFD अप्रत्यक्ष रूप से चीन के बड़े पैमाने के सीमा-पार अवसंरचना नेटवर्क के संचालन वातावरण को मज़बूत कर सकता है।
- IFD को विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने से नियामकीय समन्वय मज़बूत हो सकता है, जो चीन के बढ़ते विदेशी निवेश विस्तार को अधिक अनुकूल बना सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो भारत (जैसे– दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र) के लिये रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
आगे की राह
- दोहा एजेंडा को प्राथमिकता देना: विश्व व्यापार संगठन को नए गैर-अनिवार्य बहुपक्षीय समझौतों को अपनाने से पहले कृषि सब्सिडी, विकासशील देशों के लिये विशेष एवं विभेदक व्यवहार (S&DT) और निष्क्रिय हो चुके विवाद निपटान अपीलीय निकाय की बहाली जैसे महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय मुद्दों के समाधान को प्राथमिकता देनी चाहिये।
- द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs): एक कठोर वैश्विक ढाँचे के बजाय भारत को लचीली द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) पर बातचीत जारी रखनी चाहिये, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करते हुए उसकी संप्रभु नियामक शक्तियों और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करें।
- गठबंधन निर्माण: राजनयिक अलगाव से बचने के लिये भारत को अफ्रीकी संघ और अन्य विकासशील देशों के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर IFD के दीर्घकालिक जोखिमों को समझाना चाहिये तथा विश्व व्यापार संगठन के बहुपक्षीय स्वरूप की रक्षा के लिये सहमति बनानी चाहिये।
- सार्वजनिक भंडारण (PSH) के लिये IFD का उपयोग: भारत IFD पर अपने वीटो अधिकार का उपयोग एक महत्त्वपूर्ण सौदेबाज़ी के साधन के रूप में कर सकता है। विश्व व्यापार संगठन में भारत की मुख्य मांग खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण हेतु स्थायी समाधान सुनिश्चित करना है।
- भारत संकेत दे सकता है कि वह बहुपक्षीय समझौतों पर अपनी कड़ी स्थिति पर पुनर्विचार तभी करेगा, जब विकसित देश सार्वजनिक भंडारण (PSH) के लिये स्थायी समाधान पर सहमत हों।
निष्कर्ष
भारत का दृष्टिकोण आर्थिक, विकासात्मक और रणनीतिक हितों के बीच एक संतुलित समन्वय को दर्शाता है। हालाँकि IFD निवेश को सुगम बनाने में लाभ प्रदान करता है, फिर भी भारत विश्व व्यापार संगठन की बहुपक्षीय संरचना को बनाए रखने और खाद्य सुरक्षा जैसी अपनी घरेलू प्राथमिकताओं की रक्षा को लेकर सतर्क बना हुआ है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. खाद्य सुरक्षा और नीतिगत संप्रभुता के संदर्भ में IFD समझौते के प्रति भारत के विरोध पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. WTO में IFD समझौता क्या है?
एक बहुपक्षीय समझौता, जिसका उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाकर और पारदर्शिता में सुधार लाकर FDI को सुगम बनाना है।
2. भारत IFD समझौते का विरोध क्यों कर रहा है?
बहुपक्षवाद और नीतिगत संप्रभुता के क्षरण तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की उपेक्षा को लेकर चिंताओं के कारण।
3. सार्वजनिक भंडारण (PSH) मुद्दा क्या है?
यह सरकारी खरीद और खाद्यान्नों के रियायती वितरण से संबंधित है, जो WTO की सब्सिडी सीमाओं से अधिक है।
4. ‘पीस क्लॉज़’ (2013 बाली) क्या है?
यह भारत जैसे विकासशील देशों को बिना किसी कानूनी कार्रवाई के अस्थायी तौर पर सब्सिडी की सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति देता है।
5. चीन IFD समझौते से किस प्रकार जुड़ा है?
IFD के कई सदस्य चीन के BRI का हिस्सा हैं, जिससे चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रश्न 1. 'एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ऑन द एप्लीकेशन ऑफ सेनेटरी एंड फाइटोसेनेटरी मेज़र्स और 'पीस क्लाज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं। (2015)
(a) खाद्य और कृषि संगठन
(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन
(c) विश्व व्यापार संगठन
(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में आपको कभी-कभी समाचारों में 'ऐंबर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016)
(a) WTO मामला
(b) SAARC मामला
(c) UNFCCC मामला
(d) FTA पर भारत-यूरोपीय संघ वार्त्ता
उत्तर: (a)
मेन्स:
प्रश्न . यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को ज़िंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं, विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)
प्रश्न 2. “WTO के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन तथा प्रोन्नति करना है। परंतु (संधि) वार्त्ताओं की दोहा परिधि मृतोन्मुखी प्रतीत होती है जिसका कारण विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद है।'' भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)