EPFO का नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण | 02 Feb 2024

प्रिलिम्स के लिये:

EPFO का नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण, कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन (EPFO), विकसित भारत के लिये कार्यबल में महिलाएँ, लैंगिक उत्पीड़न की रोकथाम (POSH), आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS), लैंगिक असमानता

मेन्स के लिये:

EPFO का नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण, केंद्र और राज्यों द्वारा देश के कमज़ोर वर्गों के लिये कल्याण योजनाएँ तथा इन योजनाओं का प्रदर्शन।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन (Employees' Provident Fund Organisation- EPFO) और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Ministry of Women and Child Development- MoWCD) ने संयुक्त रूप से देश के कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये नियोक्ताओं के समर्थन का आकलन करने तथा प्रोत्साहित करने के लिये नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण (Employer Rating Survey) का शुभारंभ किया है।

कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन क्या है? 

  • यह एक सरकारी संगठन है जो भारत में संगठित क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिये भविष्य निधि तथा पेंशन खातों का प्रबंधन करता है।
    • यह कर्मचारी भविष्य-निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम (Employees’ Provident Fund and Miscellaneous Provisions Act), 1952 का कार्यान्वन करता है।
  • कर्मचारी भविष्य-निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों के लिये भविष्य निधि की स्थापना का प्रावधान करता है।
  • इसका संचालन भारत सरकार के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  • ग्राहकवर्ग की संख्या तथा किये गए वित्तीय लेन-देन की मात्रा के मामले में यह विश्व के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा संगठनों में से एक है।

नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण से संबंधित प्रमुख पहलू क्या हैं?  

  • परिचय: 
    • नियोक्ता रेटिंग सर्वेक्षण का शुभारंभ EPFO (श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय) तथा MoWCD द्वारा "विकसित भारत के लिये कार्यबल में महिलाएँ" (Women in the Workforce for Viksit Bharat) कार्यक्रम में किया गया था।
    • सर्वेक्षण के डेटा तथा महिला कर्मचारियों की प्रतिक्रिया का उद्देश्य महिलाओं की कार्यबल भागीदारी के आधार पर नीति निर्माण के लिये मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करना है।
    • सर्वेक्षण का प्राथमिक उद्देश्य कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के लिये उनकी प्रतिबद्धता तथा समर्थन के आधार पर नियोक्ताओं का मूल्यांकन एवं उन्हें रेटिंग प्रदान करना है। इसमें महिलाओं के रोज़गार के लिये अनुकूल परिवेश विकसित करने हेतु नियोक्ताओं द्वारा प्रदान किये गए उपायों तथा सुविधाओं का आकलन करना शामिल है।
  • नियोक्ताओं को रेटिंग प्रदान करना:
    • सर्वेक्षण में देश के कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के लिये नियोक्ताओं के समर्थन के आधार पर उनकी रेटिंग करना शामिल है। यह समावेशी कार्य वातावरण विकसित करने में नियोक्ताओं की प्रगति तथा प्रयासों को मापने के लिये एक उपकरण के रूप में कार्य करता है।
  • प्रश्नावली:
    • सर्वेक्षण में एक विस्तृत प्रश्नावली शामिल की गई है जिसमें संगठन का विवरण मांगा गया है। जिसमें यह भी शामिल है कि क्या इसमें कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न के निवारण (POSH) औपचारिकताओं, कर्मचारियों के बच्चों के लिये क्रेच सुविधाओं तथा अतिरिक्त कार्यावधि के  दौरान परिवहन सुविधाओं को संबोधित करने के लिये एक आंतरिक शिकायत समिति प्रदान करने से संबंधित प्रश्न पूछे गए हैं।
      • EPFO ने संपूर्ण देश भर में अपने लगभग 300 मिलियन ग्राहकों को उक्त प्रश्नावली वितरित की है जिससे यह बड़े पैमाने पर डेटा एकत्र करने का एक व्यापक प्रयास बन गया है।
  • समान कार्य के लिये समान वेतन:
    • सर्वेक्षण में पुरुष तथा महिला श्रमिकों के लिये 'समान काम के लिये समान वेतन' के संबंध में जवाब मांगा गया है और साथ ही महिलाओं के लिये सुविधाजनक अथवा दूरस्थ कार्य की उपलब्धता से संबंधित प्रश्न भी शामिल किये हैं।

नोट: EPFO की वर्ष 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सेवानिवृत्ति निधि निकाय के अंतर्गत 21.23 लाख प्रतिष्ठानों में 29.88 करोड़ सदस्य हैं।

भारत में महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी की स्थिति क्या है?

  • पिछले कुछ वर्षों में महिला श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate - LFPR) में सुधार हुआ है लेकिन इसमें से अधिकांश वृद्धि अवैतनिक कार्य श्रेणी में देखी गई है।
    • LFPR कामकाजी उम्र की आबादी (15 वर्ष और उससे अधिक आयु) का वह प्रतिशत है जो या तो कार्यरत है या बेरोज़गार है, लेकिन इच्छुक है और रोज़गार की तलाश में है।
  • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey - PLFS) के अनुसार, महिला भागीदारी दर वर्ष 2017-18 में 17.5% से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 27.8% हो गई, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा "घरेलू उद्यमों में सहायक" के रूप में कार्यरत महिलाओं का है। जिन्हें अपने काम के लिये कोई नियमित वेतन नहीं मिलता है।
    • भारत में पुरुषों के लिये LFPR 2017-18 में 75.8% से बढ़कर 2022-23 में 78.5% हो गया और महिलाओं के लिये LFPR में वृद्धि 23.3% से बढ़कर 37.0% हो गई।

श्रम बल में महिलाओं की कम भागीदारी के क्या कारण हैं?

  • पितृसत्तात्मक सामाजिक प्रथा: 
    • पितृसत्तात्मक मानदंड और लैंगिक आधार पर निर्दिष्ट पारंपरिक भूमिकाएँ अक्सर महिलाओं की शिक्षा तथा रोज़गार के अवसरों तक पहुँच को सीमित करती हैं।
    • गृहिणी के रूप में महिलाओं की भूमिका के संबंध में सामाजिक अपेक्षाएँ श्रम बल में उनकी सक्रिय भागीदारी को हतोत्साहित करती है। 
  • पारिश्रमिक में अंतर:
    • भारत में महिलाओं को अक्सर समान काम के लिये पुरुषों की तुलना में वैतनिक असमानता/कम वेतन की समस्या का सामना करना पड़ता है।
      • विश्व असमानता रिपोर्ट, 2022 के अनुसार, भारत में 82% श्रम आय पर पुरुषों का कब्ज़ा है, जबकि श्रम आय पर महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 18% है।
    • वेतन का यह अंतर महिलाओं को औपचारिक रोज़गार के अवसर तलाशने से हतोत्साहित कर सकता है।
  • अवैतनिक देखभाल कार्य:
    • अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य का महिलाओं पर असंगत रूप से दबाव पड़ता है, जिससे भुगतान वाले रोज़गार के लिये उनका समय तथा ऊर्जा सीमित हो जाती है। 
      • भारत में विवाहित महिलाएँ अवैतनिक देखभाल और घरेलू काम पर प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक समय का योगदान करती हैं, जबकि पुरुष 3 घंटे से भी कम समय का योगदान करते हैं।
      • यह प्रचलन (महिलाओं की स्थिति) विभिन्न आय स्तर और जाति समूहों में समान रूप से देखा जा सकता है, जिससे घरेलू ज़िम्मेदारियों के मामले में गंभीर लैंगिक असमानता की स्थिति उत्पन्न होती है।
    • घरेलू ज़िम्मेदारियों का यह असमान वितरण श्रम बल में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी में बाधा बन सकता है।
  • सामाजिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह:
    • कुछ समुदायों में घर से बाहर काम करने वाली महिलाओं को पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है जिससे श्रम बल भागीदारी दर कम हो सकती है।

महिलाओं की उच्च श्रम भागीदारी बड़े पैमाने पर समाज को कैसे प्रभावित कर सकती है?

  • आर्थिक विकास:
    • श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सीधे आर्थिक विकास से संबंधित है। जब महिला आबादी के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का उपयोग कम हो जाता है तो इसके परिणामस्वरूप संभावित उत्पादकता और आर्थिक उत्पादन का नुकसान होता है।
    • श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि उच्च सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product- GDP) और समग्र आर्थिक समृद्धि में योगदान कर सकती है।
  • गरीबी का न्यूनीकरण:
    • महिलाओं को आय-अर्जित करने के अवसरों तक पहुँच प्रदान करने से यह उनके परिवारों को गरीबी रेखा से बाहर निकलने में मदद कर सकती है जिससे जीवन स्तर बेहतर हो सकता है तथा परिवारों की स्थिति में सुधार हो सकता है।
  • मानव पूंजी विकास:  
    • शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाएँ अपने बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य परिणामों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं जिसके अंतर-पीढ़ीगत लाभ हो सकते हैं।
  • लैंगिक समानता और सशक्तीकरण:
    • श्रम बल में महिलाओं की उच्च भागीदारी से पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं और मानदंडों को चुनौती दी जा सकती है जिससे लैंगिक समानता को बढ़ावा मिल सकता है।
    • आर्थिक सशक्तीकरण महिलाओं को अपने जीवन, निर्णय लेने की शक्ति और स्वायत्तता पर अधिक नियंत्रण रखने में सक्षम बनाता है।
      • आर्थिक सशक्तीकरण महिलाओं की सौदेबाज़ी की शक्ति को बढ़ा सकता है और लिंग आधारित हिंसा तथा अपमानजनक रिश्तों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को कम कर सकता है।
  • प्रजनन क्षमता और जनसंख्या वृद्धि:  
    • अध्ययनों से पता चला है कि श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से प्रजनन दर में कमी आती है।
    • ‘फर्टिलिटी ट्रांज़िशन’ के नाम से जानी जाने वाली इस घटना का संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और परिवार नियोजन तक बेहतर पहुँच से है, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या का अधिक सतत् विकास होता है। 
  • श्रमिक बाज़ार और टैलेंट पूल: 
    • श्रमबल में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने से कौशल की कमी और श्रमिक बाज़ार के असंतुलन को दूर करने में सहायता मिल सकती है, जिससे प्रतिभा तथा संसाधनों का अधिक कुशल आवंटन हो सकेगा।

महिलाओं के रोज़गार की सुरक्षा के लिये क्या पहल की गई हैं?

आगे की राह

  • लैंगिक समानता से संबंधित चर्चा के मुद्दे पर महिलाओं के घरेलू कार्य और कार्यात्मक जीवन में विभाजन करना बंद करके महिलाओं के औपचारिक एवं अनौपचारिक सभी कार्यों को महत्त्व देना होगा।
  • सांस्कृतिक संदर्भ और स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के लिये कार्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।
  • महिलाओं की श्रम शक्ति में उच्चतर सहभागिता को बढ़ावा देना और समर्थन करना न केवल लैंगिक समानता का मामला है, बल्कि सामाजिक प्रगति तथा विकास का एक महत्त्वपूर्ण संचालक भी है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन विश्व के देशों के लिये 'सार्वभौमिक लैंगिक अंतराल सूचकांक' का श्रेणीकरण प्रदान करता है? (2017)

(a) विश्व आर्थिक मंच
(b) संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद
(c) संयुक्त राष्ट्र महिला (UN वुमन)
(d) विश्व स्वास्थ्य संगठन

उत्तर: (a)


मेन्स: 

प्रश्न: “महिला सशक्तीकरण जनसंख्या संवृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।” चर्चा कीजिये। (2019)