प्रिलिम्स फैक्ट्स (15 Jan, 2026)



समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी

स्रोत: द हिंदू

भारत नीली अर्थव्यवस्था, डीप ओशन मिशन और BioE3 पहल के तहत समुद्री एवं अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी पर अपने प्रयासों को तेज़ कर रहा है, जिससे आयात निर्भरता कम हो और अगली पीढ़ी के जैव निर्माण में नेतृत्व स्थापित किया जा सके।

समुद्री जैव प्रौद्योगिकी क्या है?

  • परिचय: इसमें समुद्री सूक्ष्मजीवों, शैवाल और अन्य समुद्री जीवों का अध्ययन तथा अनुप्रयोग शामिल हैं, ताकि जैव-सक्रिय यौगिक, औद्योगिक एंज़ाइम, बायोमटेरियल, खाद्य सामग्री एवं बायोस्टिमुलेंट विकसित किये जा सकें।
    • ये जीव प्राकृतिक रूप से अत्यधिक दबाव, लवणता, कम रोशनी और पोषक तत्त्वों की कमी जैसी परिस्थितियों से अनुकूलित होते हैं, जिससे ये जलवायु-सहनशील जैव निर्माण के लिये अत्यंत मूल्यवान बन जाते हैं।
  • भारत की वर्तमान स्थिति: भारत में सिंचित समुद्री बायोमास (मुख्यतः शैवाल) लगभग 70,000 टन प्रतिवर्ष ही है। भारत अभी भी आगर, कैरेजीनन और एल्जिनेट्स का आयात करता है, जिनका उपयोग खाद्य, फार्मास्यूटिकल, कॉस्मेटिक और चिकित्सकीय उत्पादों में किया जाता है।
  • नीतिगत पहल: 'ब्लू इकोनॉमी' (नीली अर्थव्यवस्था) ढाँचा, 'डीप ओशन मिशन' और 'BioE3' जैसी नीतिगत पहलों का उद्देश्य एकीकृत समुद्री जैव विनिर्माण (Biomanufacturing) को बढ़ावा देना है, जो खेती (Cultivation), निष्कर्षण (Extraction) और अनुवर्ती (Downstream) अनुप्रयोगों को आपस में जोड़ता है।
    • मुख्य अभिनेता में ICAR- केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), Sea6 Energy और ClimaCrew जैसी निजी कंपनियाँ और राज्य स्तर की पहलें शामिल हैं, जो उच्च मूल्य वाले समुद्री जैव उत्पादों का अन्वेषण कर रही हैं।
  • महत्त्व: भारत के पास 11,000 किमी. से अधिक तटरेखा और 2 मिलियन वर्ग किमी. से अधिक का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) है, जो इसे विश्व के सबसे समृद्ध समुद्री जैव विविधता भंडारों में से एक तक पहुँच प्रदान करता है।
    • समुद्री जैव निर्माण नए भोजन, रसायन, जैव ईंधन और बायोमटेरियल के स्रोत खोल सकता है, साथ ही भूमि, स्वच्छ जल और कृषि पर दबाव को कम करने में सहायता करता है।

अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी (स्पेस बायोटेक्नोलॉजी) क्या है?

  • परिचय: अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी यह अध्ययन करती है कि सूक्ष्मजीव, पौधे और मानव जैविक प्रणाली माइक्रोग्रैविटी और विकिरण परिस्थितियों में कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। इसके अनुप्रयोगों में शामिल हैं:
    • अंतरिक्ष आधारित भोजन उत्पादन
    • क्लोज़्ड-लूप जीवन समर्थन प्रणाली का पुनर्जनन
    • सामग्रियों के लिये सूक्ष्मजीव जैव निर्माण
    • अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य प्रबंधन, जिसमें माइक्रोबायोम और प्रोबायोटिक अनुसंधान शामिल हैं।
  • भारत की प्रगति: ISRO का माइक्रोग्रैविटी बायोलॉजी प्रोग्राम सूक्ष्मजीव, शैवाल और जैविक प्रणालियों पर प्रयोग कर रहा है।
    • यह अनुसंधान दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों का समर्थन करता है, जिसमें अंतरिक्ष में पोषण, स्वास्थ्य और सततता से जुड़े मुद्दों को संबोधित किया जाता है।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है क्योंकि यह क्षेत्र अभी प्रारंभिक और अनुसंधान-प्रधान है।
  • महत्त्व: अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान महत्त्वाकांक्षाओं के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह सुरक्षित भोजन उत्पादन, जीवन-समर्थन प्रणाली का पुनर्जनन और दीर्घकालिक अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य प्रबंधन को सक्षम बनाती है।

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी में वैश्विक पहलें

देश/क्षेत्र

प्रमुख पहलें

यूरोपीय संघ (EU)

बड़े पैमाने पर समुद्री जैव अन्वेषण (क्षितिज यूरोप/Horizon Europe के अंतर्गत), शैवाल बायोमटेरियल और जैव-सक्रिय यौगिक कार्यक्रम, जो साझा अनुसंधान अवसंरचना द्वारा समर्थित हैं।

चीन

समुद्री शैवाल की जल-खेती का तीव्र विस्तार, जो गहरे समुद्र अन्वेषण और औद्योगिक समुद्री जैव प्रक्रियाकरण के साथ एकीकृत है।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया

व्यापक समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान पारिस्थितिक तंत्र।

अमेरिका (NASA), ESA, JAXA, चीन (Tiangong)

प्रोटीन क्रिस्टलीकरण, पौधों की वृद्धि, माइक्रोबायोम, पुनर्योजी चिकित्सा और क्लोज़्ड-लूप जीवन-समर्थन प्रणालियों पर माइक्रोग्रैविटी अनुसंधान।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ओशन मिशन क्या है?
यह भारत का प्रमुख मिशन है, जिसका उद्देश्य गहरे समुद्र की खोज, मानवयुक्त पनडुब्बियों का संचालन तथा खनिज, ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी के लिये समुद्री जैव संसाधनों का जैव-अन्वेषण करना है।

2. ब्लू इकोनॉमी फ्रेमवर्क क्या है?
यह भारत का नीतिगत दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य महासागरीय संसाधनों के सतत उपयोग के माध्यम से आर्थिक वृद्धि, आजीविका, जलवायु लचीलापन तथा समुद्र‑आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना है।

3. BioE3 पहल क्या है?
यह भारत की जैव अर्थव्यवस्था विस्तार पहल है, जो उच्च मूल्य वाले जैव विनिर्माण और हरित जैव प्रसंस्करण के माध्यम से अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार पर केंद्रित है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स

प्रश्न. पीड़कों को प्रतिरोध के अतिरिक्त, वे कौन-सी संभावनाएँ हैं जिनके लिये आनुवंशिक रूप से रूपांतरित पादपों का निर्माण किया गया है? (2012)

  1. सूखा सहन करने के लिये उन्हें सक्षम बनाना
  2. उत्पाद में पोषकीय मान बढ़ाना
  3. अंतरिक्ष यानों और अंतरिक्ष स्टेशनों में उन्हें उगने और प्रकाश संश्लेषण करने के लिये सक्षम बनाना
  4. उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाना

निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3 और 4

(c) केवल 1, 2 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (c)


प्रश्न. कवकमूलीय (माइकोराइज़ल) जैव प्रौद्योगिकी को निम्नीकृत स्थलों के पुनर्वासन में उपयोग में लाया गया है, क्योंकि कवकमूल के द्वारा पौधों में: (2013)

  1. सूखे का प्रतिरोध करने एवं अवशोषण क्षेत्र बढ़ाने की क्षमता आ जाती है
  2. pH की अतिसीमाओं को सहन करने की क्षमता आ जाती है
  3. रोगग्रस्तता से प्रतिरोध की क्षमता आ जाती है

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


भैरव बटालियन

स्रोत: द हिंदू 

भैरव बटालियन भारतीय सेना की नवगठित आधुनिक वॉर फेयर फोर्स, जयपुर में आयोजित सेना दिवस परेड में पहली बार शामिल हुई।

भैरव बटालियन

  • परिचयभैरव बटालियनें भारतीय सेना की तेज़ गति से कार्य करने वाली विशेष आक्रामक इकाइयाँ हैं। जिसे पैरा स्पेशल फोर्सेज़ और पैदल सेना इकाइयों के बीच परिचालन अंतर को समाप्त करने के लिये तैयार किया गया है।
    • भैरव बटालियन एक विशेषीकृत सैन्य संरचना है, जो रणनीतिक स्तर पर कार्यरत पैरा स्पेशल फ़ोर्सेस (SF) तथा सामरिक स्तर की घटक (घातक) प्लाटूनों के बीच मौजूद परिचालन अंतर को भरने का कार्य करती है। जहाँ घातक प्लाटून बटालियन स्तर पर सीमित क्षेत्र में आक्रामक अभियानों का संचालन करती हैं, वहीं पैरा स्पेशल फ़ोर्सेस शत्रु क्षेत्र के भीतर गहराई में जाकर दीर्घकालिक एवं रणनीतिक मिशनों को अंजाम देती हैं। इसके विपरीत, भैरव बटालियनें सीमावर्ती क्षेत्रों में उत्पन्न तत्काल परिस्थितियों अथवा अल्प सूचना पर प्रारंभ किये जाने वाले आक्रामक अभियानों के लिये त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता प्रदान करती हैं।
    • यह हाइब्रिड और प्रौद्योगिकी-संचालित युद्ध की मांगों को पूरा करने के लिये आधुनिकीकरण और बल के पुनर्गठन हेतु वर्ष 2025 की एक भारतीय सेना पहल है।
  • संरचना: प्रत्येक बटालियन एक सघन, एकीकृत संरचना है जिसमें पैदल सेना, तोपखाना, वायु रक्षा और सिग्नल से लगभग 200-250 कर्मी शामिल हैं। सेना "संस ऑफ द सॉइल" (मिट्टी के लाल) भर्ती अवधारणा लागू करती है, जिसमें तैनाती क्षेत्रों में बेहतर भूभाग और परिचित जलवायु के लिये स्थानीय सैनिकों को प्राथमिकता दी जाती है।
  • तैनाती: अब तक 15 भैरव बटालियन गठित की गई हैं, इसे 23-25 बटालियन तक विस्तारित करने की योजना है। इन्हें कॉर्प्स और विभाग-स्तरीय फॉर्मेशन के अधीन रखा जा रहा है, विशेषकर संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्रों - राजस्थान, जम्मू, लद्दाख और पूर्वोत्तर में।
  • मानवरहित और हाइब्रिड वॉर पर केंद्रित: ये इकाइयाँ सेना के मानवरहित युद्ध को बढ़ावा देने की दिशा में एक आधारशिला हैं, इन्हें दुश्मन के ठिकानों और शत्रु क्षेत्र के भीतर गहन ढाँचों को निशाना बनाने के लिये ड्रोन के उपयोग हेतु प्रशिक्षित किया गया है। इसका समर्थन करने के लिये सेना एक लाख से अधिक ड्रोन ऑपरेटिवों का एक पूल तैयार कर रही है।

और पढ़ें: बदलती युद्ध शैलियाँ और सैन्य क्षेत्र में भारत की प्रगति


स्मार्टफोन का सोर्स कोड

स्रोत: द हिंदू 

केंद्र सरकार और MAIT (मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) (जो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ICT हार्डवेयर सेक्टर का शीर्ष संगठन है) ने उन रिपोर्टों का खंडन किया है, जिनमें दावा किया गया था कि स्मार्टफोन निर्माताओं से उनका सोर्स कोड साझा करने की मांग की जाएगी और स्पष्ट किया है कि ऐसी कोई मांग विचाराधीन नहीं है।

  • सोर्स कोड: यह प्रोग्राम किये गए मौलिक निर्देशों का समूह है, जो स्मार्टफोन के ऑपरेटिंग सिस्टम, हार्डवेयर फंक्शन और एप्लिकेशन को नियंत्रित करता है, जिससे डिवाइस का संचालन सुरक्षित और कुशलता के साथ होता है।
    • हालाँकि एंड्रॉयड के कुछ भाग ओपन‑सोर्स हैं, लेकिन निर्माता इसमें प्रोप्रायटरी संबंधी बदलाव और हार्डवेयर संबंधी विशिष्ट अनुकूलन को जोड़ते हैं।
    • फिर भी, सोर्स कोड को गोपनीय रखा जाता है, क्योंकि यह कॉमर्शियल सीक्रेट को प्रोटेक्ट करता है और एक महत्त्वपूर्ण सिक्योरिटी बैरियर के रूप में कार्य करता है, जो दुरुपयोग और शोषण को रोकता है।
  • सोर्स कोड के डिस्क्लोज़ की सीमाएँ: फुल सोर्स कोड को डिस्क्लोज़ करना वैश्विक स्तर पर दुर्लभ है, यह आमतौर पर केवल सीमित रक्षा संदर्भों में ही होता है।
    • इंटरनल कोड को डिस्क्लोज़ करने से साइबर हमलों और डेटा चोरी की संवेदनशीलता बढ़ने की संभावना होती है।
    • एप्पल जैसी वैश्विक कंपनियाँ भी सरकारों के साथ फुल सोर्स कोड साझा नहीं करतीं।
  • सोर्स कोड का विनियमन: भारत में कोई कानून निजी कंपनियों द्वारा सोर्स कोड के पब्लिक डिस्क्लोज़ को अनिवार्य नहीं बनाता।
    • टेलीकॉम‑संबंधी पूर्व मानकों में, जिनमें दूरसंचार विभाग (DoT) के अंतर्गत राष्ट्रीय संचार सुरक्षा केंद्र (NCSS) द्वारा जारी भारतीय दूरसंचार सुरक्षा आश्वासन आवश्यकताएँ (Indian Telecom Security Assurance Requirements- ITSAR), 2023 शामिल हैं, सोर्स कोड को डिस्क्लोज़ करने का उल्लेख है, इसमें वर्ष 2025 में संशोधन कर ऐसे प्रावधानों को हटा दिया गया।
    • पूर्व में स्मार्टफोन भारतीय टेलीग्राफ (संशोधन) नियम, 2017 के अनिवार्य परीक्षण और प्रमाणन का दूरसंचार उपकरण (MTCTE) फ्रेमवर्क के अंतर्गत आते थे।
      • हालाँकि, दूरसंचार अधिनियम, 2023 के बाद, दूरसंचार विभाग और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने स्मार्टफोनों को MTCTE से बाहर कर दिया, क्योंकि उनका पहले से ही भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित मानकों के तहत प्रमाणन होता है।
    • नीतिगत निगरानी अब परामर्श‑आधारित, गैर‑हस्तक्षेप के दृष्टिकोण का पालन करती है; किसी भी सुरक्षा समीक्षा के लिये अब केवल आंतरिक परीक्षण रिपोर्ट की आवश्यकता होती है, जिसमें बौद्धिक संपदा (IP) को शामिल नहीं किया जाता।
    • यह फ्रेमवर्क साइबर सुरक्षा, व्यापार सुगमता और बौद्धिक संपदा संरक्षण के बीच संतुलन बनाता है, जो वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप हैं।

और पढ़ें: तकनीकी संप्रभुता के लिये भारत की खोज


चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद में राज्यपाल शासन

स्रोत: द हिंदू

मिज़ोरम के राज्यपाल ने चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद (CADC) में राज्यपाल शासन को अगले छह महीने के लिये बढ़ा दिया है, यह कहते हुए कि राजनीतिक अस्थिरता अभी भी बनी हुई है, जबकि राज्य मंत्रिमंडल ने इसके विस्तार का विरोध किया था।

  • चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद में राज्यपाल शासन सबसे पहले जुलाई 2025 में लंबे समय तक चल रही राजनीतिक अस्थिरता के कारण लगाया गया था।
  • चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद: इसे मिज़ोरम में चकमा लोगों के राजनीतिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिये भारतीय संविधान के छठे अनुसूची के तहत वर्ष 1972 में स्थापित किया गया था।
    • यह अपने क्षेत्राधिकार के भीतर निर्दिष्ट विषयों पर विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करता है।
  • चकमा समुदाय: मिज़ोरम में मिज़ो के बाद चकमा (Chakma) दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जनजाति है जो चकमा (चंगमा भजचारे) भाषा बोलते हैं।
    • ये एक बौद्ध समुदाय है, जो परंपरागत रूप से झूम कृषि करता है और चटगाँव हिल ट्रैक्ट्स तथा भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्सों (मुख्य रूप से मिज़ोरम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश) में निवासरत है।
  • छठी अनुसूची के तहत ज़िला परिषद: छठी अनुसूची का उद्देश्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में जनजातीय क्षेत्रों के आत्म-शासन को सुनिश्चित करना है, साथ ही जनजातीय भूमि, संसाधनों, संस्कृति और पहचान का अनुरक्षण करना है।
    • अनुच्छेद 244(2) के तहत, इन क्षेत्रों का प्रशासन स्वायत्त ज़िला परिषद (ADC) के रूप में किया जाता है, जिसे आगे स्वायत्त क्षेत्रों में विभाजित भी किया गया है।
      • राज्यपाल के पास इन क्षेत्रों का गठन करने, परिवर्तित करने या पुनर्गठित करने के अधिकार हैं।
    • प्रत्येक स्वायत्त ज़िले में अधिकतम 30 सदस्यों वाली एक ज़िला परिषद होती है (जिसमें अधिकतम 4 मनोनीत और शेष निर्वाचित होते हैं) और प्रत्येक स्वायत्त क्षेत्र में एक क्षेत्रीय परिषद होती है।
    • ये परिषदें भूमि, वन (आरक्षित वनों को छोड़कर), उत्तराधिकार तथा गैर-जनजातीय साहूकारी एवं व्यापार के विनियमन से संबंधित विषयों पर क़ानून बना सकती हैं, जो राज्यपाल की स्वीकृति के अधीन होते हैं।
  • स्वायत्त परिषदों में राज्यपाल शासन: छठी अनुसूची के तहत प्रशासनिक विफलता की स्थिति में राज्यपाल किसी स्वायत्त ज़िला परिषद (ADC) में हस्तक्षेप कर सकता है और अस्थायी रूप से उसकी शक्तियों को सँभाल सकता है।
    • ऐसा हस्तक्षेप राज्य सरकार के परामर्श से किया जाना अपेक्षित है, जो संघीय भावना के अनुरूप हो।

और पढ़ें: स्वायत्त ज़िला परिषद


ABDM का अध्यक्ष नियुक्त होने वाले पहले भारतीय

स्रोत: इकॉनोमिक्स टाइम्स 

संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा वरिष्ठ भारतीय राजनयिक डी.बी. वेंकटेश वर्मा को वर्ष 2026-27 के कार्यकाल के लिये निरस्त्रीकरण मामलों पर सलाहकार बोर्ड (Advisory Board on Disarmament Matters- ABDM) का अध्यक्ष नामित किया गया है।

  • ABDM में इससे पूर्व भारतीय राजनयिक सदस्य के रूप में शामिल रहे हैं, लेकिन वर्ष 2026 पहली बार है जब किसी भारतीय को इसका अध्यक्ष (चेयरपर्सन) नियुक्त किया गया है।
  • ABDM: इसकी स्थापना वर्ष 1978 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 10वें विशेष सत्र के पश्चात की गई थी।
    • यह शस्त्र सीमा-निर्धारण (Arms Limitation) एवं निरस्त्रीकरण से संबंधित मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव को परामर्श देने वाली एक विशेषज्ञ सलाहकार संस्था के रूप में कार्य करता है।
  • संरचना: ABDM में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिन्हें निरस्त्रीकरण एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा में उनकी विशेषज्ञता के आधार पर विश्व के सभी क्षेत्रों से संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा चयनित किया जाता है।
    • संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण अनुसंधान संस्थान (UNIDIR) के निदेशक पदेन (Ex-officio) सदस्य के रूप में कार्य करते हैं तथा अध्यक्ष पद का वार्षिक रूप से क्षेत्र या चर्चा विषय के आधार पर रोटेशन किया जाता है।
  • कार्यप्रणाली एवं सत्र: ABDM वर्ष में दो बार बैठक करता है, जो न्यूयॉर्क और जिनेवा में क्रमशः आयोजित होती हैं।
    • इसकी कार्यसूची संयुक्त राष्ट्र महासचिव की मांगों और बोर्ड की अपनी अनुशंसाओं के आधार पर बनाई जाती है।
    • प्रत्येक सत्र के पश्चात अध्यक्ष महासचिव को एक निजी रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जिसे महासचिव बोर्ड की गतिविधियों पर वार्षिक रिपोर्ट के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा के समक्ष पेश करते हैं।
  • कार्य: बोर्ड संयुक्त राष्ट्र महासचिव को शस्त्र नियंत्रण और निरस्त्रीकरण नीतियों पर परामर्श देता है, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर अनुसंधान और अध्ययन का समर्थन करता है, UNIDIR का ट्रस्टी बोर्ड के रूप में कार्य करता है तथा संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सूचना कार्यक्रम का मार्गदर्शन करता है। यह विशेषज्ञ नेतृत्व वाले सहयोग के माध्यम से वैश्विक शांति और सुरक्षा में योगदान देता है।

और पढ़ें: परमाणु निरस्त्रीकरण: भारत का संतुलक कार्य


मकर संक्रांति 2026

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

मकर संक्रांति भारत का एक प्रमुख फसल उत्सव है, जो प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों में इसे स्थानीय परंपराओं, विशिष्ट रीति-रिवाज़ों और विविध नामों के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

  • सौर और खगोलीय आधार: अधिकांश हिंदू त्योहारों के विपरीत यह सौर कैलेंडर के अनुसार लगभग 14 जनवरी को मनाया जाता है, जो सूर्य के मकर राशि में उत्तरायण की यात्रा का प्रतीक है।
    • यह शीत ऋतु से उष्ण महीनों की ओर परिवर्तन को दर्शाता है और निष्क्रियता के अंत का प्रतीक है।
  • कृषि एवं मौसमी महत्त्व: यह मुख्यतः एक फसल उत्सव है, जो शीत ऋतु के अंत और नए कृषि-चक्र की शुरुआत का संकेत देता है तथा प्रकृति की प्रचुरता के प्रति कृतज्ञता को प्रोत्साहित करता है।
  • क्षेत्रीय विविधता: इसे अलग-अलग नामों और रीति-रिवाज़ों से मनाया जाता है:
    • तमिलनाडु में पोंगल: चार दिनों तक मनाया जाने वाला उत्सव, जिसमें कोलम सजावट की जाती है।
    • पंजाब में लोहड़ी: अलाव जलाना और सामूहिक गीत-संगीत।
    • असम में माघ बिहू: भोज, मेजी अलाव (बाँस और घास का अलाव) और सामुदायिक भोजन।
    • बिहार में खिचड़ी: चावल और दाल से बना पारंपरिक व्यंजन।
    • गुजरात और राजस्थान में पतंगबाज़ी: विशेष रूप से अहमदाबाद का अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव
  • सामाजिक एकजुटता का संदेश: तिल–गुड़ जैसी मिठाइयों के आदान-प्रदान की परंपरा सौहार्द, साझा भावना और सामुदायिक एकजुटता को बढ़ावा देती है, जिससे सामाजिक सद्भाव सुदृढ़ होता है।

और पढ़ें: फसल उत्सव