अंतरिक्ष अन्वेषण को बढ़ावा देने हेतु लद्दाख में नवीन टेलीस्कोप
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026-27 ने लद्दाख में दो नई विश्व स्तरीय दूरबीनों (टेलीस्कोप) — नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (NLST) और नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इंफ्रारेड टेलिस्कोप (NLOT) को स्वीकृति प्रदान की है, साथ ही मौजूदा हिमालयन चंद्रा टेलिस्कोप के उन्नयन को भी स्वीकृति प्रदान की है।
- इस कदम को भारत और 'ग्लोबल साउथ' में अवलोकनात्मक खगोल विज्ञान के लिये एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में देखा जा रहा है।
- लद्दाख, जहाँ पहले से ही हान्ले डार्क स्काई रिज़र्व स्थित है, आदर्श उच्च-तुंगता, शुष्क एवं स्वच्छ वायुमंडलीय स्थितियाँ प्रदान करता है, जो इसे विश्व के सबसे अच्छे खगोलीय स्थलों में से एक बनाता है।
नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST) क्या है?
- परिचय: नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST) सौर भौतिकी हेतु समर्पित एक अत्याधुनिक सुविधा होगी। यह अनुमानतः आगामी 5-6 वर्षों में शुरू हो जाएगी।
- इसे पैंगोंग त्सो झील के निकट मिरक क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा। इसमें 2-मीटर का द्वारक (एपर्चर) होगा तथा यह कोडाइकनाल सौर वेधशाला (1899) एवं उदयपुर सौर वेधशाला (1975) के बाद भारत की तीसरी भू-आधारित सौर वेधशाला होगी।
- ऑपरेशनल स्पेक्ट्रम: यह टेलीस्कोप विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के दृश्य एवं निकट-अवरक्त तरंगदैर्ध्य में संचालित होगा।
- वैज्ञानिक उद्देश्य:
- मूलभूत सौर गतिकी एवं चुंबकत्व का अध्ययन करना।
- सौर घटनाओं का अवलोकन करना तथा स्पेस-वेदर प्रोसेस का मानचित्रण करना।
- यह डेटा राष्ट्रीय अंतरिक्ष परिसंपत्तियों जैसे- उपग्रह और प्रक्षेपण यानों की सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- अंतरिक्ष मिशनों के साथ समन्वय: NLST से प्राप्त डेटा ISRO के आदित्य-L1 मिशन (भारत का अंतरिक्ष आधारित सौर वेधशाला) को पूरक करेगा, जिससे हेलियोफिजिक्स में भारत की नेतृत्व भूमिका सुदृढ़ होगी।
नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड टेलीस्कोप (NLOT) क्या है?
- परिचय: नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड टेलीस्कोप (NLOT), जो हांले में बनाया जाएगा, 13.7 मीटर अपर्चर वाला सेगमेंटेड-मिरर टेलीस्कोप होगा और ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रम में कार्यरत विश्व के सबसे बड़े दूरबीनों में से एक बन जाएगा।
- NLOT की अगले दशक तक तैयार होने की संभावना है।
- प्रौद्योगिकी: एक एकल ग्लास उपकरण बजाय, NLOT का प्राथमिक दर्पण 90 छोटे षट्भुज आकार के सेगमेंटेड मिररों से बना होगा, जो एक बड़े यूनिट के रूप में कार्य करेंगे।
- यह डिज़ाइन अंतर्राष्ट्रीय थर्टी मीटर टेलीस्कोप (TMT) परियोजना में भारत के अनुभव का लाभ प्राप्त करता है।
- वैज्ञानिक उद्देश्य: एक्सोप्लैनेट्स, तारकीय विकास और सुपरनोवा पर अग्रिम अनुसंधान करना।
- ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित संकेत खोजने का प्रयास करना।
- भौगोलिक लाभ: हांले की उच्च ऊँचाई, शीत और शुष्क वायुमंडलीय स्थिति तथा स्पष्ट आकाश के कारण यहां एकत्रित डेटा में अन्य स्थानों पर आम डिफ्रैक्शन संबंधी समस्याएँ नहीं होंगी।
हिमालयन चंद्र टेलीस्कोप (HCT) क्या है?
- परिचय: HCT एक 2.01 मीटर ऑप्टिकल-इन्फ्रारेड टेलीस्कोप है, जो हांले, लद्दाख में इंडियन एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी में स्थित है।
- इसने पहला प्रकाश (First Light) वर्ष 2000 में प्राप्त किया था और वर्ष 2003 से नियमित वैज्ञानिक अवलोकन शुरू किये।
- टेलीस्कोप को कर्नाटक के होसाकोटे में स्थित विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अनुसंधान एवं शिक्षा केंद्र (CREST) से एक समर्पित सैटेलाइट लिंक के माध्यम से रिमोटली ऑपरेट किया जाता है।
- यह उन्नत उपकरणों से सुसज्जित है, जिनमें हिमालया फेंट ऑब्जेक्ट स्पेक्ट्रोग्राफ (HFOSC), नियर-इन्फ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ (TIRSPEC) और हांले ईशेल स्पेक्ट्रोग्राफ (HESP) शामिल हैं।
- उच्च पॉइंटिंग और ट्रैकिंग सटीकता, उत्कृष्ट छवि गुणवत्ता, और धुंधले सितारों पर गाइड करने में सक्षम ऑटो-गाइडर प्रणाली के साथ, HCT ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड खगोल विज्ञान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से सुपरनोवा जैसी अस्थायी ब्रह्मांडीय घटनाओं के अध्ययन में।
- अपग्रेड विवरण: इस टेलीस्कोप को 3.7 मीटर सेगमेंटेड प्राथमिक दर्पण प्रणाली में अपग्रेड किया जाएगा।
- भविष्य में भूमिका: यह ऑप्टिकल-इन्फ्रारेड तरंग दैर्ध्य में कार्य करता रहेगा।
- इसका संचालन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सुविधाओं जैसे- LIGO-इंडिया (महाराष्ट्र में गुरुत्वीय तरंग वेधशाला) और स्क्वायर किलोमीटर एरे (ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में रेडियो टेलीस्कोप परियोजना) का पूरक होगा।
खगोलशास्त्र में इन विकासों का महत्त्व क्या है?
- विशिष्ट देशांतर लाभ: NLST और NLOT दोनों ही इस विशेष देशांतर पर काम करने वाले अनन्य सुविधाएँ होंगी।
- यह आकाश की वैश्विक निगरानी में एक महत्त्वपूर्ण अंतर को कम करता है, जिससे ऐसे खगोलीय घटनाओं की लगातार निगरानी संभव हो जाती है, जिन्हें अन्य समय क्षेत्रों के दूरबीनें मिस कर सकती हैं।
- यह आकाश की वैश्विक निगरानी में एक महत्त्वपूर्ण कमी को पूरा करता है, जिससे उन खगोलीय घटनाओं की निरंतर निगरानी संभव हो पाती है जो अन्य समय क्षेत्रों में स्थित दूरबीनों से छूट सकती हैं।
- डेटा संप्रभुता: ये सुविधाएँ उच्च गुणवत्ता वाला ऐसा डेटा उत्पन्न करेंगी जो पहले अंतर्राष्ट्रीय निर्भरता के बिना भारतीय वैज्ञानिकों के लिये दुर्गम था।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: यह परियोजना ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की वैज्ञानिक क्षमताओं को बढ़ावा देती है, जो भारतीय शोधकर्त्ताओं को प्राथमिकता के आधार पर टेलीस्कोप अवलोकन समय प्रदान करती है और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को सुगम बनाती है।
- अंतरिक्ष मौसम की निगरानी: NLST (नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप) सोलर फ्लेयर्स और कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) की निगरानी के लिये महत्त्वपूर्ण होगा। भारत के उपग्रहों, संचार ग्रिड और बिजली बुनियादी ढाँचे को सौर तूफानों से बचाने के लिये इन 'अंतरिक्ष मौसम' की घटनाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नेशनल लार्ज़ सोलर टेलीस्कोप (NLST) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
NLST का उद्देश्य सौर चुंबकत्व, गतिशीलता और सोलर फ्लेयर व कोरोनल मास एजेक्शन (CMEs) जैसी अंतरिक्ष मौसम घटनाओं का अध्ययन करना है, ताकि उपग्रहों और संचार प्रणाली की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
2. नेशनल लार्ज़ ऑप्टिकल–नियर इन्फ्रारेड टेलीस्कोप (NLOT) को अद्वितीय क्यों बनाता है?
NLOT एक 13.7 मीटर का सेगमेंटेड-मिरर टेलीस्कोप होगा, जो अपने तरंगदैर्ध्य क्षेत्र में विश्व के सबसे बड़े टेलीस्कोपों में से एक होगा और यह एक्सोप्लानेट्स और ब्रह्मांडीय विकास पर शोध की सुविधा प्रदान करेगा।
3. लद्दाख को इन दूरबीनों के लिये क्यों चुना गया?
हनले उच्च ऊँचाई, शुष्क वायुमंडल और साफ आकाश प्रदान करता है, जिससे विकिरण न्यूनतम होती है तथा सटीक खगोलीय अवलोकन के लिये यह आदर्श स्थान है।
4. HCT अपग्रेड भारत के खगोलशास्त्र तंत्र में कैसे योगदान देता है?
हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप (HCT) को 3.7-मीटर के सेगमेंटेड मिरर के साथ अपग्रेड करने से 'ट्रांजिएंट एस्ट्रोनॉमी' (अल्पकालिक खगोलीय घटनाओं के अध्ययन) को मज़बूती मिलेगी और यह लीगो-इंडिया तथा स्क्वायर किलोमीटर एरे जैसी सुविधाओं का पूरक बनेगा।
5. खगोलशास्त्र में “डेटा संप्रभुता” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि भारत उच्च गुणवत्ता वाले खगोलीय डेटा का उत्पादन और नियंत्रण देश में ही करता है, जिससे विदेशी वेधशालाओं पर निर्भरता कम होती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के संदर्भ में हाल ही में समाचार में आए दक्षिणी ध्रुव पर स्थित एक कण सूचकांक (पार्टिकल डिटेक्टर)' आइसक्यूब (IceCube)', के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- यह विश्व का सबसे बड़ा बर्फ में एक घन किलोमीटर घेरे वाला न्यूट्रिनो सूचकांक (पार्टिकल डिटेक्टर) है।
- यह डार्क मैटर की खोज के लिये बनी शक्तिशाली दूरबीन है।
- यह बर्फ में गहराई में दबा हुआ है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न.1 अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के संदर्भ में हाल ही में खबरों में रहा "भुवन" क्या है? (वर्ष 2010)
(A) भारत में दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये इसरो द्वारा लॉन्च किया गया एक छोटा उपग्रह
(B) चंद्रयान-द्वितीय के लिए अगले चंद्रमा प्रभाव जाँच को दिया गया नाम
(C) भारत की 3डी इमेजिंग क्षमताओं के साथ इसरो का एक जियोपोर्टल
(D) भारत द्वारा विकसित अंतरिक्ष दूरदर्शी
उत्तर: (C)
लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाना
चर्चा में क्यों?
सांसदों (MPs) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने की मांग करते हुए एक नोटिस प्रस्तुत किया है। बताया जा रहा है कि इस नोटिस पर 100 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किये हैं। इसमें ‘पक्षपातपूर्ण आचरण’ और नेता प्रतिपक्ष (LoP) को बोलने की अनुमति न दिये जाने को मुख्य कारण बताया गया है।
- इस कदम से लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है?
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 94 उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट करता है, जिनमें लोकसभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद त्याग देते हैं।
- अनुच्छेद 94(a) के तहत, यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते हैं तो वे स्वतः ही पद धारण करना छोड़ देते हैं।
- अनुच्छेद 94(b) उन्हें लिखित त्यागपत्र प्रस्तुत करके किसी भी समय इस्तीफा देने की अनुमति प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 94(c) के तहत, उन्हें सदन के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव से हटाया जा सकता है।
- यह प्रावधान केवल लोकसभा पर लागू होता है, राज्यसभा पर नहीं।
- प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ: विशिष्ट चरण लोकसभा में कार्य संचालन और प्रक्रिया नियमों के नियम 200-203 द्वारा नियंत्रित होते हैं।
- 14 दिन का नोटिस: निष्कासन का प्रस्ताव कम-से-कम 14 दिन का नोटिस देने के बाद ही पेश किया जा सकता है।
- यह सूचना लोकसभा के महासचिव को लिखित रूप में दी जानी चाहिये, जिस पर कम-से-कम एक सदस्य के हस्ताक्षर होने चाहियें।
- प्रस्ताव की स्वीकृति: यदि प्रस्ताव विधिवत है तो उसे कार्यसूची में दर्ज किया जाता है।
- पीठासीन अधिकारी सदन को नोटिस पढ़कर सुनाते हैं कि किसी प्रस्ताव पर चर्चा के लिये उसे स्वीकार किये जाने हेतु सदन में कम-से-कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
- यदि 50 से कम सदस्य खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव को सदन की अनुमति नहीं मिलती और उसे रद्द कर दिया जाता है।
- प्रस्ताव के लिये सख्त दिशा-निर्देश: प्रस्ताव में लगाए गए आरोप विशिष्ट, स्पष्ट रूप से व्यक्त और सटीक होने चाहियें।
- इसमें तर्क-वितर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति, आरोप या मानहानि कारक बयान शामिल नहीं होने चाहियें।
- चर्चा को केवल प्रस्ताव में बताए गए आरोपों तक ही सीमित रखा जाना चाहिये।
- 14 दिन का नोटिस: निष्कासन का प्रस्ताव कम-से-कम 14 दिन का नोटिस देने के बाद ही पेश किया जा सकता है।
- प्रस्ताव पारित करना: निष्कासन के सफल होने के लिये, सदन के सभी सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। तकनीकी रूप से इसे प्रभावी बहुमत कहा जाता है।
- परिणाम: यदि प्रस्ताव प्रभावी बहुमत से पारित हो जाता है, तो अध्यक्ष को तत्काल पद से हटा दिया जाएगा।
- विशेष रूप से, लोकसभा के भंग होने पर अध्यक्ष अपना पद नहीं छोड़ते हैं। अध्यक्ष नव निर्वाचित लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक अपने पद पर बने रहते हैं।
- हालाँकि, यदि किसी व्यक्ति को प्रस्ताव द्वारा हटाया जाता है, तो वह तुरंत प्रभावी हो जाती है।
- कार्यवाही के दौरान अध्यक्ष की भूमिका: अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता तब तक नहीं कर सकते, जब तक उनके निष्कासन के लिये कोई प्रस्ताव विचाराधीन हो (अनुच्छेद 96)।
- अध्यक्ष को सदन में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है। वे प्रथम दृष्ट्या (एक साधारण सदस्य के रूप में) मतदान कर सकते हैं, लेकिन मतों की समानता (टाई) की स्थिति में निर्णायक मत का प्रयोग नहीं कर सकते।
- ऐतिहासिक मामले: अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव केवल तीन बार ही पेश किये गए हैं:
- वर्ष 1954: जी.वी मावलंकर (प्रथम अध्यक्ष) के विरुद्ध।
- वर्ष 1966: हुकम सिंह के विरुद्ध।
- वर्ष 1987: बलराम जाखड़ के विरुद्ध।
- परिणाम: तीनों प्रस्ताव असफल रहे और इस प्रक्रिया के माध्यम से आज तक किसी भी अध्यक्ष को पद से नहीं हटाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. लोकसभा अध्यक्ष को किस अनुच्छेद के तहत हटाया जा सकता है?
अनुच्छेद 94(c) के तहत, सदन के उस समय के कुल सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है।
2. ‘प्रभावी बहुमत’ (Effective Majority) का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है- लोकसभा के उस समय के कुल सदस्यों का बहुमत (रिक्त सीटों को छोड़कर), न कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का।
3. हटाने का प्रस्ताव लाने के लिये नोटिस की क्या प्रक्रिया है ?
नियम 200–203 के तहत महासचिव (सेक्रेटरी जनरल) को कम-से-कम 14 दिन पहले लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
4. क्या अध्यक्ष हटाने की कार्यवाही के दौरान पीठासीन हो सकते हैं ?
नहीं। अनुच्छेद 96 के अनुसार, अध्यक्ष इस कार्यवाही के दौरान पीठासीन नहीं हो सकते, लेकिन वे भाग ले सकते हैं और पहली बार मतदान कर सकते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- लोकसभा अथवा राज्य की विधानसभा के चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किये जाने के लिये किये गए मतदान का कम-से-कम 50 प्रतिशत मत पाना अनिवार्य है।
- भारत के संविधान में अधिकथित उपबंधों के अनुसार, लोकसभा में अध्यक्ष का पद बहुमत वाले दल को जाता है तथा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (D)
प्रश्न. लोकसभा अध्यक्ष के पद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)
- वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
- यह आवश्यक नहीं कि अपने निर्वाचन के समय वह सदन का सदस्य हो, परंतु अपने निर्वाचन के छह माह के भीतर सदन का सदस्य बनना होगा।
- यदि वह त्यागपत्र देना चाहे तो उसे अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को संबोधित करना होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) 1, 2 और 3
(d) कोई नहीं
उत्तर: (b)
एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (ACC-PLI)
चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारत की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (ACC-PLI) योजना के कार्यान्वयन में आने वाली गंभीर चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है।
ACC-PLI योजना क्या है?
- परिचय: भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा अक्तूबर, 2021 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य अगली पीढ़ी के बैटरी सेल, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में उपयोग की जाने वाली लिथियम-आयन बैटरी के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
- एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल्स लिथियम-आयन जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं, जो वाहनों और इनवर्टर में पारंपरिक रूप से उपयोग की जाने वाली लेड-एसिड बैटरी के विपरीत उच्च ऊर्जा घनत्व, लंबी आयु और तीव्र चार्जिंग प्रदान करते हैं।
- उद्देश्य: इस योजना का उद्देश्य कैथोड, एनोड और इलेक्ट्रोलाइट निर्माण सहित एक घरेलू बैटरी आपूर्ति शृंखला विकसित करना है , ताकि आयात पर निर्भरता (विशेष रूप से चीन पर) कम की जा सके, निजी निवेश और वैश्विक प्रौद्योगिकी साझेदारी को आकर्षित किया जा सके, बैटरी की लागत कम की जा सके, साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों एवं ऊर्जा भंडारण को अपनाने में तेज़ी लाई जा सके।
- लक्ष्य: इस योजना का लक्ष्य 2026 तक 50 GWh की बैटरी निर्माण क्षमता का सृजन करना है, जिसके लिये 18,100 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय किया गया है।
- प्रोत्साहन: निर्माताओं को बेची गई बैटरी के प्रति किलोवाट-घंटे पर 2,000 रुपये तक का प्रोत्साहन दिया जाता है, बशर्ते न्यूनतम निवेश 1,100 करोड़ रुपये हो और घरेलू मूल्यवर्द्धन की आवश्यकताएँ चरणबद्ध तरीके से पूरी की जानी चाहियें (दो साल के भीतर 25% और पाँच साल के भीतर 60%)।
- शुरुआती उत्साह के बावजूद, प्रस्तावित 50 गीगावाट क्षमता में से केवल 30 गीगावाट क्षमता ही आवंटित की गई थी और अक्तूबर 2025 तक केवल 1.4 गीगावाट क्षमता ही संचालित की गई है, जबकि 8.6 गीगावाट क्षमता विकास के अधीन है, लेकिन उसमें देरी हो रही है।
- स्थिति: चूँकि बैटरी का उत्पादन शुरू नहीं हुआ है, इसलिये 2,900 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले कोई प्रोत्साहन राशि वितरित नहीं की गई है तथा परियोजना का कार्यान्वयन धीमा हो गया है, कुछ कंपनियों ने विस्तार योजनाओं में कटौती की है।
- इसके कारण अपेक्षाओं और वास्तविक परिणामों में बड़ा अंतर आया है। अनुमानित 1.03 मिलियन नौकरियों के मुकाबले केवल 1,118 नौकरियाँ ही सृजित हुईं और साथ ही, इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में वृद्धि भी अनुमानों से कम रही है।
उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (PLI)
- परिचय: मार्च 2020 में शुरू की गई उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव- PLI) का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, आयात को कम करना और रोज़गार सृजित करना है, जिसकी शुरुआत तीन क्षेत्रों से हुई तथा बाद में इसका विस्तार 14 प्रमुख क्षेत्रों तक किया गया।
- कार्यप्रणाली: PLI योजना के तहत, घरेलू और विदेशी दोनों कंपनियों को भारत में विनिर्माण के लिये वित्तीय प्रोत्साहन प्राप्त होते हैं, जिनकी गणना पाँच साल तक की अवधि में राजस्व में वृद्धि के प्रतिशत के रूप में की जाती है।
- लक्षित क्षेत्र: इसमें मोबाइल विनिर्माण, ऑटोमोबाइल और ऑटो घटक, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र, सौर पीवी मॉड्यूल, एसीसी बैटरी और ड्रोन शामिल हैं।
- प्रोत्साहन: यह बिक्री में वृद्धि से जुड़े होते हैं, साथ ही चुनिंदा क्षेत्रों का मूल्यांकन प्रदर्शन और स्थानीय मूल्यवर्द्धन के आधार पर भी किया जाता है, जबकि वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के लिये अनुसंधान एवं विकास निवेश को बढ़ावा दिया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ACC-PLI योजना क्या है?
यह एक सरकारी योजना है, जिसे वर्ष 2021 में उन्नत बैटरी सेल, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण में उपयोग होने वाली लिथियम-आयन बैटरी के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये शुरू किया गया था।
2. एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल्स क्या हैं?
आधुनिक उच्च-प्रदर्शन वाली बैटरियाँ हैं, जिनमें पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियों की तुलना में उच्च ऊर्जा घनत्व, लंबी आयु और तीव्र चार्जिंग की क्षमता होती है।
3. यह योजना भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह बैटरी के आयात को कम करने, स्थानीय आपूर्ति शृंखला बनाने और इलेक्ट्रिक वाहनों एवं स्वच्छ ऊर्जा भंडारण के विकास में सहायता करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
कथन-I: वस्तुओं के वैश्विक निर्यात में भारत का निर्यात 3.2% है।
कथन-II: भारत में कार्यरत अनेक स्थानीय कंपनियों एवं भारत में कार्यरत कुछ विदेशी कंपनियों ने भारत की ‘उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव)’ योजना का लाभ उठाया है।
उपर्युक्त कथनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
(a) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं तथा कथन-II, कथन-I की सही व्याख्या है।
(b) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं तथा कथन-II, कथन-I की सही व्याख्या नहीं है।
(c) कथन-I सही है किंतु कथन-II सही नहीं है।
(d) कथन-I सही नहीं है किंतु कथन-II सही है।
उत्तर: (d)
भारत ने CTF-154 समुद्री प्रशिक्षण बल का नेतृत्व संभाला
प्रथम बार, भारतीय नौसेना ने कम्बाइंड टास्क फोर्स (CTF) 154 की कमान संभाली है, जो कम्बाइंड मैरीटाइम फोर्सेज़ (CMF) के अधीन संचालित एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय समुद्री प्रशिक्षण बल है। यह विकास सहकारी समुद्री सुरक्षा तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।
CTF-154
- परिचय: CTF-154, जिसकी स्थापना वर्ष 2023 के मई माह में कम्बाइंड मैरीटाइम फोर्सेज़ (CMF) के अंतर्गत की गई थी, एक बहुराष्ट्रीय कार्यबल है, जो मध्य-पूर्व तथा व्यापक क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिये समर्पित है।
- CMF, जिसका मुख्यालय बहरीन में स्थित है, विश्व की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय नौसैनिक साझेदारी है, जिसमें 47 राष्ट्र सम्मिलित हैं। यह संगठन महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्रों में सुरक्षा तथा नियम-आधारित व्यवस्था के अनुरक्षण हेतु प्रतिबद्ध है।
- प्रशिक्षण का प्रमुख फोकस: यह कार्यबल समुद्री क्षेत्र जागरूकता, लॉ ऑफ द सी, समुद्री अवरोधन अभियानों, समुद्री बचाव एवं सहायता तथा नेतृत्व विकास पर कार्य करता है।
- संरचना: CTF-154 का मुख्य कर्मी दल कनाडा, मिस्र, जॉर्डन, सेशेल्स, तुर्की और संयुक्त राज्य अमेरिका के कर्मचारियों से मिलकर बना है, जो इसकी बहुराष्ट्रीय प्रकृति को दर्शाता है।
- भूमिका: यह CTF-150 (समुद्री सुरक्षा), CTF-151 (दस्युतापूर्ण गतिविधियों का मुकाबला), CTF-152 (अरब सागर सुरक्षा) और CTF-153 (लाल सागर सुरक्षा) के साथ समन्वयपूर्वक कार्य करता है।
- अभ्यास: यह समुद्री सुरक्षा संवर्द्धन प्रशिक्षण (MSET), कंपास रोज़ तथा उत्तरी/दक्षिणी तैयारियों के अभ्यास आयोजित करता है, ताकि साझेदार देशों की समुद्री डकैती, अवैध तस्करी और अनियमित प्रवास के विरुद्ध क्षमता को सुदृढ़ किया जा सके।
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और पढ़ें: संयुक्त समुद्री बल (CMF) |
हिमालय क्षेत्रों पर रेगिस्तानी बैक्टीरिया का प्रभाव
हाल ही में, एक नए अध्ययन में पश्चिमी भारत से पूर्वी हिमालय की चोटियों तक उठने वाली रेगिस्तानी धूल के ऊँचे गुबार के साथ ले जाए जाने वाले वायुजनित रोगजनकों की पहचान की गई है, जो श्वसन और त्वचा रोगों से संबंधित हैं।
- परिचय: यह अध्ययन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के एक स्वायत्त संस्थान, बोस संस्थान के शोधकर्त्ताओं ने पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों से उठने वाली धूल भरी आंधियों की दो वर्षों से अधिक समय तक निरंतर निगरानी के आधार पर किया गया था।
- यह प्रयास इस बात की समझ की कमी को दूर करने के लिये किया गया था कि सीमा पार से आने वाली धूल द्वारा ले जाए जाने वाले वायुजनित सूक्ष्मजीव ठंडे, ऑक्सीजन की कमी के कारण होने वाले हिमालयी वातावरण में मानव स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
- मुख्य निष्कर्ष: शक्तिशाली धूल भरी आंधियाँ सैकड़ों किमी. की दूरी तय करती हैं, इंडो-गंगा के मैदान को पार करने के बाद हिमालय की पहाड़ियों पर फैल जाती हैं। धूल के ये गुबार अपने साथ वायु में मौजूद जीवाणुओं को ले जाते हैं, जिनमें रोग उत्पन्न करने वाले रोगाणु भी शामिल हैं।
- विस्तार की प्रक्रिया: स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव एक दोहरी प्रक्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं, रेगिस्तानी धूल और उससे जुड़े रोगजनकों का क्षैतिज लंबी दूरी का परिवहन और हिमालय की तलहटी से प्रदूषित हवा का लंबवत ऊपर की ओर उठना। ये दोनों प्रक्रियाएँ मिलकर उच्च-ऊँचाई वाले क्षेत्रों में वायुमंडलीय बैक्टीरिया समुदाय को बदल देती हैं।
- महत्त्व: अपनी तरह का यह पहला मात्रात्मक अध्ययन सीमा पार धूल परिवहन को हिमालयी वायुमंडलीय सूक्ष्मजीव विज्ञान में परिवर्तन और संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों से जोड़ता है, जो विकसित भारत @ 2047 की परिकल्पना के अनुरूप राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्ययोजनाओं और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के लिये महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
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लोन रिकवरी एजेंट के आचरण पर सख्त नियम
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वाणिज्यिक बैंकों के लिये रिकवरी एजेंट की नियुक्ति और आचरण को विनियमित करने वाले दिशा-निर्देशों का एक मसौदा जारी किया है। इन निर्देशों को ‘भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - रिस्पॉन्सिबल बिज़नेस कंडक्ट) द्वितीय संशोधन निर्देश, 2026’ शीर्षक दिया गया है, जो 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होंगे।
- निषिद्ध प्रथाएँ: एजेंट अपमानजनक भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते, उधारकर्त्ताओं को धमकी नहीं दे सकते, अत्यधिक या गुमनाम कॉल नहीं कर सकते, निर्धारित समय के बाहर संपर्क नहीं कर सकते या उधारकर्त्ताओं या गारंटर को सार्वजनिक रूप से अपमानित नहीं कर सकते।
- कठोर वसूली विधियों का पुनर्गठन: उधारकर्त्ताओं, गारंटरों या उनके रिश्तेदारों, मित्रों अथवा सहकर्मियों के प्रति मौखिक, शारीरिक या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाली धमकी या उत्पीड़न को कठोर वसूली पद्धति माना जाएगा। ऋण की वास्तविक राशि या भुगतान न करने के परिणामों के संबंध में झूठे या भ्रामक बयान देना भी प्रतिबंधित है।
- संस्थागत उत्तरदायित्व: सभी बैंकों को ऋण वसूली, वसूली एजेंटों (लोन रिकवरी एजेंट) की नियुक्ति और गिरवी रखी गई संपत्ति पर कब्ज़ा करने के संबंध में एक औपचारिक नीति स्थापित करनी होगी। इस नीति में पात्रता मानदंड, उचित जाँच-पड़ताल के मानक, आचार संहिता, निर्दिष्ट गतिविधियाँ और वसूली एजेंटों के लिये प्रदर्शन मूल्यांकन मानक शामिल होने चाहिये।
- शिकायत निवारण तंत्र: प्रत्येक बैंक को वसूली प्रक्रियाओं से संबंधित शिकायतों के लिये एक समर्पित तंत्र स्थापित करना होगा।
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