ज्योतिबा फुले
चर्चा में क्यों?
हाल ही में ज्योतिबा फुले (1827–1890) की द्विशताब्दी ने एक समाज सुधारक और संवैधानिक विचारधारा के अग्रदूत के रूप में उनके योगदान को रेखांकित किया।
- ज्योतिबा फुले के विचारों ने समानता, गरिमा और शक्ति के पुनर्वितरण पर आधारित समाज की पुनर्कल्पना की, जिसमें सामाजिक पदानुक्रम, आर्थिक शोषण तथा राज्य की उदासीनता के आपसी संबंध को उजागर किया गया।
ज्योतिबा फुले के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: ज्योतिबा फुले, जिनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को हुआ था, एक अग्रणी समाज सुधारक थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी रूढ़िवाद को चुनौती दी और दलितों एवं महिलाओं के अधिकारों के लिये संघर्ष किया। फुले को भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।
- मुख्य योगदान:
- शैक्षिक सुधार: ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने वर्ष 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला और बाद में वर्ष 1855 में पुणे में श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के लिये रात्रि विद्यालयों की शुरुआत की।
- समाज सुधार:
- रूढ़िवाद का विरोध: ज्योतिबा फुले ने जातिगत उत्पीड़न का विरोध किया, चिपलूणकर और तिलक जैसे ब्राह्मणवादी विचारकों की आलोचना की, उत्पीड़ित वर्गों तथा महिलाओं के उत्थान के लिये ब्रिटिश शासन का समर्थन किया।
- जाति-विरोधी आंदोलन: ज्योतिबा फुले ने वर्ष 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित पदानुक्रम के खिलाफ संघर्ष करना था। अपनी पुस्तक गुलामगिरी में उन्होंने जातिगत उत्पीड़न की तुलना अमेरिकी दासता से की।
- दीनबंधु, कृष्णराव पांडुरंग भालेकर द्वारा वर्ष 1877 में स्थापित एक मराठी साप्ताहिक समाचार-पत्र सत्यशोधक समाज के लिये एक माध्यम के रूप में कार्य करता था।
- वर्ष 1857 के विद्रोह की आलोचना: इसे ब्राह्मणवादी शासन को बहाल करने के लिये एक उच्च जाति के प्रयास के रूप में देखा गया।
- आर्थिक सुधार: जाति पदानुक्रम को समाप्त करने के लिये निचली जातियों के लिये अनिवार्य शिक्षा और आर्थिक उत्थान का समर्थन किया।
- धार्मिक स्वतंत्रता: अपने सत्सार (सत्य का सार) में फुले ने पंडिता रमाबाई के ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के अधिकार का बचाव किया।
- कृषि में सुधार: शेतकऱ्यांचा आसूड में, ज्योतिबा फुले ने एक ब्रिटिश और ब्राह्मण नौकरशाही गठबंधन द्वारा शूद्र किसानों के शोषण की आलोचना की।
- तर्कवाद: सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक में उन्होंने एक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज की वकालत की जहाँ ईश्वर को एक प्रेमपूर्ण और तर्कसंगत निर्माता के रूप में देखा जाता है। इसने पारंपरिक पदानुक्रमों को ध्वस्त कर दिया।
- प्रमुख प्रकाशन: तृतीय रत्न (1855), पोवाडा: छत्रपति शिवाजीराजे भोसले यांचा (1869), गुलामगिरी (1873), शेतकऱ्यांचा आसूड (1881)।
- प्रेरणा: वह थॉमस पेन की 'द राइट्स ऑफ मैन' से प्रभावित थे और सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिये महिलाओं और निचली जातियों की शिक्षा को कुंजी के रूप में देखते थे।
- मान्यता: उन्हें 11 मई, 1888 को एक महाराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता विठ्ठलराव कृष्णाजी वंदेकर द्वारा महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को हुआ था।
2. महात्मा ज्योतिबा फुले के प्रमुख योगदान क्या थे?
वे एक समाज सुधारक, शिक्षाविद् और जाति प्रथा के कटु आलोचक थे।
3. महात्मा ज्योतिबा फुले महिला शिक्षा में क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
उन्होंने भारत में महिला शिक्षा का बीड़ा उठाया और उसे बढ़ावा दिया।
4. महात्मा ज्योतिबा फुले की सामाजिक सुधार में क्या भूमिका थी?
उन्होंने जातिगत भेदभाव के उन्मूलन और उपेक्षित वर्गों के उत्थान के लिये काम किया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. सत्यशोधक समाज ने आयोजित किया: (2016)
(a) बिहार में जनजातीय उत्थान के लिये एक आंदोलन
(b) गुजरात में मंदिर प्रवेश आंदोलन
(c) महाराष्ट्र में जाति-विरोधी आंदोलन
(d) पंजाब में किसान आंदोलन
उत्तर: (c)
कल्पक्कम स्थित PFBR ने निर्णायक मोड़ प्राप्त की
हाल ही में तमिलनाडु के कल्पक्कम स्थित स्वदेशी विकसित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकलिटी हासिल की, जो भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।
- निर्णायक मोड़ वह अवस्था है जब एक परमाणु रिएक्टर स्व-धारित शृंखला अभिक्रिया प्राप्त कर लेता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि रिएक्टर का कोर नियोजित रूप से कार्य कर रहा है और अब विद्युत उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
भारत का तीन-चरणों वाला परमाणु कार्यक्रम
- परिचय: भारत का परमाणु कार्यक्रम सीमित यूरेनियम और प्रचुर थोरियम संसाधनों के कुशल उपयोग के लिये तीन-चरणीय क्रमिक रणनीति पर आधारित है: PHWRs → फास्ट ब्रीडर रिएक्टर → थोरियम-आधारित रिएक्टर।
- दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर (PHWRs): इनमें प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में तथा भारी जल को शीतलक और मॉडरेटर के रूप में उपयोग किया जाता है। ये भारत की वर्तमान परमाणु ऊर्जा क्षमता (8,180 मेगावाट विद्युत) की रीढ़ हैं और कार्यक्रम के प्रथम चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- भारत का लक्ष्य वर्ष 2032 तक 22,400 मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन करना है और फ्लीट-मोड निर्माण के माध्यम से PHWR क्षमता का विस्तार करना है।
- फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR): फास्ट ब्रीडर रिएक्टर वह रिएक्टर होता है जो जितना ईंधन उपभोग करता है उससे अधिक ईंधन उत्पन्न करता है, क्योंकि यह उर्वर पदार्थ (जैसे– U-238) को विखंडनीय पदार्थ (जैसे– प्लूटोनियम) में परिवर्तित करता है। इसमें MOX ईंधन का उपयोग होता है और यह परमाणु ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- FBR प्लूटोनियम उत्पन्न करके और U-233 के उत्पादन को सक्षम करके यूरेनियम-आधारित रिएक्टरों और थोरियम-आधारित रिएक्टरों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करते हैं, जो तीसरे चरण के लिये आवश्यक है।
- कल्पक्कम में भारत का प्रोटोटाइप 500 MWe FBR उन्नत कमीशनिंग में है। योजना में समर्पित ईंधन चक्र सुविधा शामिल है।
- एक बार परिचालन हो जाने पर भारत रूस के बाद वाणिज्यिक FBR चलाने वाला दूसरा देश होगा, जबकि कई देशों ने सुरक्षा चिंताओं के कारण ऐसे कार्यक्रम बंद कर दिये हैं।
- थोरियम: थोरियम (Th-232), रिएक्टरों में विकिरण के माध्यम से विखंडनीय U-233 में परिवर्तित हो जाता है। यह भारत के विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करके दीर्घकालिक ऊर्जा उत्पादन को सक्षम बनाता है।
- भारत के पास विश्व स्तर पर सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो तटीय और अंतर्देशीय रेत में पाए जाते हैं। थोरियम का उपयोग दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की कुंजी है।
- रणनीतिक महत्त्व: PFBR की प्रगति भारत के परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण को सुदृढ़ करती है और विशाल थोरियम भंडार के भविष्य के उपयोग को सक्षम बनाती है, जबकि आयातित यूरेनियम और HALEU जैसे उन्नत ईंधन के साथ PHWR का उपयोग पूर्ण FBR तैनाती की प्रतीक्षा किये बगैर पहले थोरियम उपयोग की अनुमति देता है।
- भविष्य की योजनाओं में थोरियम-आधारित रिएक्टर, मोल्टन साल्ट रिएक्टर (MSR) और विस्तारित ईंधन पुनर्चक्रण शामिल हैं, जिसका लक्ष्य ऊर्जा स्वतंत्रता और सतत परमाणु विकास है।
आर्टेमिस II मिशन ने अपोलो 13 मिशन का रिकॉर्ड तोड़ा
नासा के आर्टेमिस II मिशन ने अंतरिक्ष में मनुष्यों द्वारा तय की गई सबसे लंबी दूरी का एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है, जिसने वर्ष 1970 के अपोलो 13 (Apollo 13) की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को पीछे छोड़ दिया है।
- आर्टेमिस II के क्रू ने पृथ्वी से अब तक की सबसे लंबी दूरी 2,52,756 मील तय कर ली है. ये अपोलो 13 के 2,48,655 मील के रिकॉर्ड से अधिक है।
आर्टेमिस II मिशन
- परिचय: आर्टेमिस II वर्ष 1972 के अपोलो 17 (Apollo 17) के बाद नासा का पहला मानवयुक्त चंद्र मिशन है। यह आर्टेमिस कार्यक्रम के अंतर्गत पहली मानव उड़ान है, जिसका लक्ष्य मानव अंतरिक्ष अन्वेषण को नई ऊँचाइयों पर ले जाना है।
- सहयोग: इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं, जिनमें से तीन नासा (NASA) से और एक कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) से हैं, जो ओरियन (Orion) अंतरिक्ष यान पर सवार होकर चंद्रमा की यात्रा करेंगे।
- मिशन प्रकार: 1 अप्रैल को स्पेस लॉन्च सिस्टम के माध्यम से प्रक्षेपित यह अंतरिक्ष यान चंद्रमा के चारों ओर एक फ्री-रिटर्न लूनर फ्लाईबाई कक्षा का अनुसरण करता है।
- मुख्य घटनाएँ: इस मिशन में चंद्रमा के अत्यंत निकट पहुँचना (लगभग 4,067 मील), चंद्रमा के 'सुदूर हिस्से' (Far Side) का अवलोकन, एक सूर्य ग्रहण का अनुभव और एक नियोजित 'संचार ब्लैकआउट' शामिल हैं।
- महत्त्व: एकत्र किया गया डेटा (चित्र, टेलीमेट्री और अवलोकन) भविष्य के आर्टेमिस मिशनों, जिसमें मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग/अवतरण शामिल है, को सहायता प्रदान करेगा और चंद्रमा पर मनुष्यों की स्थायी उपस्थिति दर्ज करने में योगदान देगा।
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गुरु तेग बहादुर का प्रकाश पर्व
केंद्रीय गृहमंत्री एवं सहकारिता मंत्री ने सिख धर्म के 9वें गुरु, 'हिंद दी चादर' गुरु तेग बहादुर जी के प्रकाश पर्व पर शुभकामनाएँ दी हैं।
- प्रकाश पर्व (जिसे प्रकाश उत्सव भी कहा जाता है) का अर्थ "प्रकाश का त्योहार" होता है और यह सिख धर्म में किसी सिख गुरु की जयंती मनाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।
- प्रारंभिक जीवन और उत्तराधिकार: उनका जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में त्याग मल (Tyag Mal) के रूप में हुआ था, वह छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद के पुत्र थे।
- उन्होंने मुगल सेनाओं के खिलाफ कार्तिकपुर (1634) के युद्ध में अपनी वीरता के लिये 'तेग बहादुर' की उपाधि अर्जित की और बाद में वह 8वें गुरु, गुरु हरकृष्ण के उत्तराधिकारी बने और सिखों के 9वें गुरु बने।
- प्रमुख दर्शन: उन्होंने गुरु नानक के 'इक ओंकार' (एक ईश्वर) के सिद्धांत को कायम रखा और 'निर्भऊ' (निर्भयता) एवं 'निर्वैर' (वैर-भाव का अभाव) पर आधारित जीवन का समर्थन किया।
- उनका आध्यात्मिक स्वभाव उनके पिता की मीरी और पीरी (लौकिक और आध्यात्मिक अधिकार) की अवधारणा से गहराई से प्रभावित था।
- यात्राएँ और स्थापनाएँ: उन्होंने सिख धर्म का प्रसार करने के लिये संपूर्ण उत्तरी और पूर्वी भारत (जिसमें असम और ढाका शामिल हैं) में अधिक यात्राएँ कीं।
- उन्होंने शिवालिक की तराई में चक नानकी की स्थापना की, जो बाद में आनंदपुर साहिब के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
- साहित्यिक योगदान: उनकी आध्यात्मिक रचनाओं में 15 रागों में रचित भजन शामिल हैं, जिनमें 59 शब्द और 57 श्लोक हैं, जिन्हें बाद में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा गुरु ग्रंथ साहिब में औपचारिक रूप से शामिल किया गया।
- सर्वोच्च बलिदान: मुगल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल में, जिसने धार्मिक उत्पीड़न और जबरन धर्म संपरिवर्तन की कठोर नीतियाँ लागू कीं, गुरु तेग बहादुर कश्मीरी ब्राह्मणों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिये आगे आए।
- 1675 में, इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करते हुए, उन्हें दिल्ली में उनके निष्ठावान अनुयायियों- भाई मति दास, भाई सती दास और भाई दयाल दास के साथ सार्वजनिक रूप से शहीद कर दिया गया।
- ऐतिहासिक विरासत: दिल्ली में उनके शहादत स्थलों को गुरुद्वारा शीश गंज (जहाँ उनके निष्पादन तथा भाई जैता द्वारा उनके शीश को सुरक्षित ले जाने की घटना चिह्नित है) और गुरुद्वारा रकाब गंज (जहाँ लखी शाह द्वारा उनके शरीर का दाह संस्कार किया गया) द्वारा चिह्नित किया गया है।
- अक्सर ‘हिंद दी चादर’ (भारत की ढाल) के रूप में पूजनीय, उनके बलिदान ने सीधे तौर पर उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह को खालसा की स्थापना के माध्यम से सिख समुदाय का सैन्यीकरण करने के लिये प्रेरित किया।
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भारतीय सेना का प्रौद्योगिकी रोडमैप
भारतीय सेना ने नई दिल्ली में आधिकारिक तौर पर एक 'रणनीतिक प्रौद्योगिकी रोडमैप' जारी किया है, जो विशेष रूप से मानवरहित विमान प्रणालियों (UAS) और 'लोइटरिंग म्यूनिशन' पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य सैन्य परिचालन आवश्यकताओं को घरेलू औद्योगिक क्षमताओं के साथ तालमेल में लाना है।
- रणनीतिक स्वदेशीकरण: यह रोडमैप उद्योग, अकादमिक जगत और अनुसंधान एवं विकास संस्थानों को ठोस और दीर्घकालिक दिशा प्रदान करता है, जिससे वे अपने निवेश को सेना की विशिष्ट प्राथमिकताओं वाले क्षेत्रों में केंद्रित कर सकें।
- ऑपरेशनल सेतु: यह परिचालन आवश्यकताओं और प्रौद्योगिकी विकास के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है, जिससे भारत में एक संरचित तथा मांग-आधारित ड्रोन पारितंत्र के विकास को सुनिश्चित किया जा सके।
- आधुनिक युद्ध कौशल: वैश्विक संघर्षों से मिले सबक को रेखांकित करते हुए यह रोडमैप ड्रोन तकनीक के माध्यम से 'बड़े पैमाने पर तैनाती' और 'सटीक लक्ष्य भेदन' के बीच एक आवश्यक संतुलन बनाने पर ज़ोर देता है।
- आत्मनिर्भरता: यह पहल ‘समग्र राष्ट्र दृष्टिकोण’ को बढ़ावा देती है, जिसमें सशस्त्र बलों, रक्षा उद्योग और स्टार्ट-अप्स को एकजुट कर एक मज़बूत तथा आत्मनिर्भर रक्षा विनिर्माण क्षेत्र का निर्माण किया जाता है।
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