डेली न्यूज़ (09 Feb, 2021)



पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में वृद्धि: एडीआर

चर्चा में क्यों?

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (Association for Democratic Reforms- ADR) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 से वर्ष 2019 के बीच भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हुई है।

  • ADR नई दिल्ली स्थित एक भारतीय गैर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1999 में की गई थी।

प्रमुख बिंदु:  

पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल: 

  • नव पंजीकृत राजनीतिक दल या या ऐसे राजनीतिक दल जिन्होंने राज्य स्तरीय पार्टी बनने के लिये विधानसभा या आम चुनावों में पर्याप्त प्रतिशत वोट हासिल नहीं किये हैं, या जिसने पंजीकृत होने के बाद कभी चुनाव नहीं लड़ा है, उन्हें गैर-मान्यता प्राप्त दल माना जाता है।
    • ऐसी पार्टियों को मान्यता प्राप्त पार्टियों को दिये जाने वाले सभी लाभ नहीं प्राप्त होते हैं।

मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल:

  • एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल कुछ निर्धारित शर्तों को पूरा करने के पश्चात् राष्ट्रीय या राजकीय दल बन सकता है।
  • राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी बनने के लिये एक राजनीतिक दल को पिछले/आखिरी चुनाव के दौरान मान्य वोटों का एक निश्चित न्यूनतम मतदान प्रतिशत या राज्य विधानसभा अथवा लोकसभा में कुछ सीटों की संख्या को सुरक्षित करना होता है।
  • राजनीतिक दलों को आयोग द्वारा दी गई मान्यता उन्हें प्रतीकों के आवंटन, राज्य के स्वामित्व वाले टेलीविज़न और रेडियो स्टेशनों पर राजनीतिक प्रसारण के लिये समय का प्रावधान तथा मतदाता सूची तक पहुँच जैसे कुछ विशेषाधिकारों को निर्धारित करती है।
  • निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश:
    • भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा 'पार्टी फंड एवं चुनाव व्यय में पारदर्शिता तथा जवाबदेही, गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुतीकरण’ पर दिशा-निर्देश जारी किये गए थे, जो  1 अक्तूबर, 2014 से सभी राजनीतिक दलों पर लागू होते हैं।
    • आवश्यक दिशा-निर्देश:  
      • सभी गैर-मान्यता प्राप्त दलों को संबंधित राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय में अपनी अपेक्षित रिपोर्ट प्रस्तुत करना आवश्यक है।
      • जनता द्वारा देखे जाने के लिये वार्षिक लेखा परीक्षण खातों, योगदान रिपोर्ट और चुनाव खर्च के विवरण की स्कैन की गई प्रतियाँ प्राप्त होने के तीन दिनों के भीतर संबंधित राज्य के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की वेबसाइट पर अपलोड की जाएंगी।

रिपोर्ट में शामिल प्रमुख तथ्य:  

  • राजनीतिक दलों की संख्या में वृद्धि: 
    • भारत के चुनाव आयोग में 2,360 राजनीतिक दल पंजीकृत हैं और उनमें से 97.50% गैर-मान्यता प्राप्त हैं।
    • वर्ष 2010 के 1,112 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों की संख्या बढ़कर वर्ष 2019 में 2,301 हो गई।
  • राजनीतिक दलों को प्राप्त हुआ दान:
    • वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिये कुल 2,301 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों में से केवल 78 या 3.39% की योगदान रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है।

ADR के सुझाव:

  • वर्ष 2016 में 255 दलों को पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों की सूची से हटा दिया गया था क्योंकि या तो उनका कोई अस्तित्व नहीं था या वे सक्रिय नहीं थे।
    • यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिये, ताकि उन सभी राजनीतिक दलों को हटाया जा सके जो 5 वर्ष से अधिक समय तक किसी भी चुनाव न शामिल हों, साथ ही इसका प्रयोग पंजीकरण प्रक्रिया को मज़बूत करने के एक माध्यम के रूप में किया जाना चाहिये।
  • मनी लॉन्ड्रिंग, भ्रष्ट चुनावी प्रथाओं और धन शक्ति के दुरुपयोग से बचने के लिये राजनीतिक दलों के पंजीकरण का विनियमन महत्त्वपूर्ण है।
    • अतः भारतीय निर्वाचन आयोग को ऐसे दलों (जो नियमों का पालन करने में विफल होते हैं) को पंजीकृत दलों की सूची से हटाने हेतु कड़े कदम उठाने के अलावा एक राजनीतिक दल के रूप में व्यक्तियों के संघ के पंजीकरण हेतु सख्त मानदंड लागू किया जाना चाहिये।
  • गैर-मान्यता प्राप्त दलों की आयकर की जाँच की जानी चाहिये, विशेषकर उन लोगों की जो चुनाव में हिस्सा नहीं लेते हैं, परंतु स्वैच्छिक योगदान की प्राप्ति की घोषणा करते हैं।

स्रोत:  द हिंदू


असम का जेरेंगा पोथर और ढेकियाजुली टाउन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री ने असम में दो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थानों का दौरा किया है।

  • पहला ऐतिहासिक स्थान असम के शिवसागर का जेरेंगा पोथर है, जहाँ 17वीं शताब्दी में अहोम राजकुमारी जॉयमती ने अपने जीवन का बलिदान दिया था।
  • दूसरा ऐतिहासिक स्थान असम का ढेकियाजुली टाउन है, जो कि वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से संबंधित है।

प्रमुख बिंदु

जेरेंगा पोथर

  • शिवसागर शहर का एक खुला मैदान जेरेंगा पोथर, 17वीं शताब्दी की अहोम राजकुमारी जॉयमती की वीरता के लिये काफी लोकप्रिय है।
    • पूर्व में रंगपुर के नाम से प्रसिद्ध, शिवसागर शक्तिशाली अहोम वंश का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने छह शताब्दियों (1228-1826) तक असम पर शासन किया था।
    • अहोम राज्य वंश की स्थापना छो लुंग सुकफा ने की थी।
  • वर्ष 1671 से वर्ष 1681 तक अहोम साम्राज्य राजनैतिक उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था, इसी समय अहोम साम्राज्य के राजकुमार गोदापानी (जॉयमती के पति) दुश्मनों के हाथों पकड़े जाने से पूर्व ही नागा हिल्स भाग गए थे।
  • हालाँकि राजकुमार गोदापानी के दुश्मनों ने उनकी पत्नी राजकुमारी जॉयमती को इस उम्मीद में पकड़ लिया कि वह राजकुमार गोदापानी के ठिकाने का पता बता देगी, लेकिन कई दिनों तक एक खुले मैदान में कांटेदार पौधे से बाँधे जाने और यातना के बावजूद राजकुमारी जॉयमती ने दुश्मनों को किसी भी प्रकार की सूचना देने से इनकार कर दिया।
  • अंततः उन्होंने पति के लिये अपने जीवन का बलिदान कर दिया, राजकुमार गोदापानी असम के राजा बने और असम में स्थिरता और शांति के युग की शुरुआत हुई।
    • राजकुमारी जॉयमती की मृत्यु शिवसागर शहर के जेरेंगा पोथर मैदान में हुई थी।
  • स्थान का महत्त्व 
    • जेरेंगा पोथर स्वयं में एक संरक्षित पुरातात्त्विक स्थल नहीं है, हालाँकि इसके आसपास के क्षेत्र में कई संरक्षित स्थल हैं, इसके पूर्व में ना पुखुरी टैंक स्थित है, जबकि पश्चिम में पोहु गढ़ है, जिसे अहोम युग के दौरान बनाया गया एक प्राकृतिक चिड़ियाघर है। 
    • इसके पास ही एक बड़ा जोयसागर तालाब है, जिसे वर्ष 1697 में अहोम राजा स्वर्गदेव रूद्र सिंहा ने बनवाया था, साथ ही यहाँ विष्णु डोल मंदिर भी है।
    • वर्ष 2017 में इस क्षेत्र का उपयोग शीर्ष और प्रभावशाली साहित्यिक निकाय, असम साहित्य सभा के शताब्दी समारोह के लिये भी किया गया था।

ढेकियाजुली टाउन

  • कई जानकार मानते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम उम्र के शहीद संभवतः असम के ढेकियाजुली टाउन से ही थे।
  • 20 सितंबर, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के हिस्से के रूप में असम के स्वतंत्रता सेनानियों के जुलूसों ने असम के कई शहरों में विभिन्न पुलिस स्टेशनों तक मार्च का आह्वान किया था।
  • ‘मृत्यु बाहिनी’ के नाम से प्रसिद्ध इन समूहों में महिलाओं और बच्चों सहित लोगों की व्यापक भागीदारी रही और ये लोग औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले पुलिस स्टेशनों पर तिरंगा फहराने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहे थे।
  • हालाँकि ब्रिटिश प्रशासन ने उन लोगों के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग किया, जिसमें अकेले ढेकियाजुली टाउन में कम-से-कम 15 लोगों की गोली से मृत्यु हो गई, इनमें तीन महिलाएँ थीं, जिसमें 12 वर्षीय तिलेश्वरी बरुआ भी शामिल थीं।
    • तिलेश्वरी बरुआ को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम उम्र के शहीदों में से एक के रूप में जाना जाता है।
    • यही कारण है कि ढेकियाजुली टाउन में 20 सितंबर को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


ओडिशा का सीमा विवाद

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ओडिशा और आंध्र प्रदेश के मध्य तब फिर से सीमा विवाद उत्पन्न हो गया जब आंध्र प्रदेश द्वारा ओडिशा के कोरापुट ज़िले में कोटिया पंचायत (Kotia Panchayat) के तीन गाँवों में पंचायत चुनावों की घोषणा की गई।

ODISHA

प्रमुख बिंदु:

ओडिशा के साथ सीमा विवाद:

  • ओडिशा को 1 अप्रैल, 1936 को बंगाल-बिहार-ओडिशा प्रांत से अलग किया गया था, लेकिन दोनों के मध्य अंतर-राज्य सीमा विवाद आज भी जारी है।
  • ओडिशा राज्य के 30 ज़िलों में से 8 ज़िलों की  पड़ोसी राज्यों के साथ सीमा विवाद की स्थिति बनी हुई है।
  • 30 में से 14 ज़िले आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और झारखंड के साथ सीमाएँ साझा करते हैं, हालाँकि आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे कोरापुट ज़िले के कोटिया पंचायत के गाँवों को लेकर उत्पन्न विवाद एकमात्र प्रमुख सीमा विवाद है।

कोटिया विवाद के बारे में: 

  • वर्ष 1960 के बाद से कोटिया ग्राम पंचायत को लेकर ओडिशा और आंध्र प्रदेश के मध्य क्षेत्रीय क्षेत्रीय गतिरोध बना हुआ है। विवाद में कोटिया ग्राम पंचायत के 21 से अधिक गाँव शामिल हैं। 
  • कोटिया पंचायत के निवासियों को ओडिशा के कोरापुट ज़िले के पोट्टंगी ब्लॉक और आंध्र प्रदेश के विजयनगरम ज़िले में सालुर ब्लॉक दोनों से लाभ प्राप्त होता है और वे अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों के लिये दोनों ब्लॉकों पर निर्भर हैं।

आंध्र प्रदेश के साथ जल विवाद: 

  • वर्ष 2006 में ओडिशा ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (ISRWD) अधिनियम, 1956 की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को अंतर्राज्यीय नदी वंसधारा (Inter-State River Vamsadhara) से संबंधित आंध्र प्रदेश के साथ चल रहे अपने जल विवादों के बारे में एक शिकायत दर्ज की।

अन्य राज्यों के साथ विवाद:

  • पश्चिम बंगाल:
    • ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच बालासोर ज़िले में 27 भूखंडों और ओडिशा के मयूरभंज ज़िले में कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद है।
    • मयूरभंज ज़िला अपने लौह अयस्क भंडार और छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य जिसमें नर्तकियाँ रंगीन मुखौटे पहनती हैं) के लिये जाना जाता है।
  • झारखंड:
    • ओडिशा और झारखंड के बीच सीमा विवाद बैतरणी नदी (Baitarani River) के मार्ग परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुआ है।
      • बैतरणी नदी ओडिशा के क्योंझर ज़िले की पहाड़ी शृंखला से निकलती है।
      • यह प्रायद्वीपीय भारत के पूर्व की ओर बहती है और बंगाल की खाड़ी में मिलती है।
      • इस नदी के जलग्रहण क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा ओडिशा राज्य में  तथा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का एक छोटा हिस्सा झारखंड राज्य में आता है।
  • छत्तीसगढ़:
    • छत्तीसगढ़ के साथ ओडिशा के नबरंगपुर और झारसुगुड़ा ज़िलों से संबंधित गाँवों का विवाद है।
    • वर्ष 2018 में केंद्र सरकार द्वारा महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (Mahanadi Water Disputes Tribunal) का गठन किया गया था।

आगे की राह: 

  • अंतर्राज्यीय संवाद (Inter State Dialogues) अंतर्राज्यीय परिषद (Inter State Councils) और अधिकरण में विचार-विमर्श तथा इस प्रकार  के विवादों को सुलझाने हेतु सहकारी संघवाद की भावना को अपनाने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू 


क्लीन फ्यूल हाइड्रोजन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली (IIT-D) के शोधकर्त्ताओं द्वारा कम लागत पर जल से स्वच्छ ईंधन हाइड्रोजन उत्पन्न करने की एक तकनीक विकसित की गई है।

  • यह दुनिया भर में क्लीनर और ग्रीनर ऊर्जा स्रोतों की तलाश के लिये किये जा रहे प्रयासों के क्रम में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • हाइड्रोजन गैस जीवाश्म ईंधन के नवीकरणीय विकल्प के रूप में एक व्यवहार्य विकल्प है और प्रदूषण को कम करने के लिये उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकती है।

प्रमुख बिंदु

क्लीन फ्यूल हाइड्रोजन के बारे में:

  • आईआईटी-दिल्ली के शोधकर्त्ताओं ने औद्योगिक खपत के लिये कम लागत, स्वच्छ हाइड्रोजन ईंधन उत्पन्न करने हेतु सल्फर-आयोडीन (Sulphur-Iodine- SI) थर्मोकेमिकल हाइड्रोजन चक्र (SI Cycle) के रूप में जानी जाने वाली प्रक्रिया द्वारा जल को सफलतापूर्वक विभाजित किया है।
  • सामान्यतः SI Cycle में ऑक्सीजन से हाइड्रोजन के पृथक्करण के लिये  गैर-नवीकरणीय स्रोतों जैसे- कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस की तुलना में उच्च मात्रा में ताप की आवश्यकता होती है। यह हाइड्रोजन गैस के बड़े पैमाने पर उत्पादन को आर्थिक रूप से गैर-व्यवहार्य और पर्यावरण के प्रतिकूल बनाता है।
  • गहन ऊर्जा, सल्फर-डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन के लिये सल्फ्यूरिक अम्ल  का रुपांतरण संक्षारक कदम के रूप में उपयुक्त उत्प्रेरक डिज़ाइन का विकास किया जाना मुख्य उपलब्धि रही।

सल्फर-आयोडीन चक्र

प्रक्रिया:

  • सल्फर-आयोडीन चक्र (SI चक्र) एक त्रि-चरणीय थर्मोकेमिकल चक्र है जिसका उपयोग हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिये किया जाता है। इस चक्र में सभी रसायनों का पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। सल्फर-आयोडीन चक्र की प्रक्रिया को पर्याप्त ताप की आवश्यकता होती है।
  • ताप, हाइड्रोजन गैस प्राप्त करने के प्रारंभिक चरण में उच्च-तापमान एंडोथर्मिक रासायनिक प्रतिक्रियाओं (High Temperature Endothermic Chemical Reactions) के चक्र में प्रवेश करता है और अंतिम चरण में सीमित तापमान एक्सोथर्मिक प्रतिक्रिया (Low-Temperature Exothermic Reaction) चक्र से बाहर निकलता है।

त्रि-चरणीय थर्मोकेमिकल चक्र

  • प्रथम चरण-  
    • सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) के साथ आयोडाइड (I2) की प्रतिक्रिया के बाद हाइड्रोडिक एसिड (Hydriodic acid- HI) और सल्फ्यूरिक एसिड (H2SO4) का उत्पादन होता है।
      • I2 + SO2 + 2H2O → 2HI + H2SO4
  • द्वितीय चरण 
    • जल, SO2 और अवशिष्ट H2SO4 को हाइड्रोडिक एसिड (HI) प्राप्त करने के लिये संक्षेपण द्वारा ऑक्सीजन के अपघटन से अलग किया जाता है।
      • 2H2SO4  → 2SO2 + 2H2O + O2 
  • तृतीय चरण 
    • हाइड्रोडिक एसिड (HI) से हाइड्रोजन गैस (H2) प्राप्त की जाती है।
      • 2HI → I2 + H2
    • चक्र में प्रवेश करने और बाहर निकलने वाले ताप के मध्य का अंतर, उत्पादित हाइड्रोजन के दहन के ताप के रूप में चक्र से बाहर निकलता है।
  • सल्फर-आयोडीन चक्र की प्रमुख चुनौतियाँ जल और आयोडीन के अधिशेष को कम करना और पृथक्करण प्रक्रियाएँ हैं जो आसवन की तुलना में कम ऊर्जा का उपभोग करती हैं।
  • परंपरागत रूप से सल्फर-आयोडीन चक्र का विकास कई देशों द्वारा चौथी पीढ़ी के परमाणु रिएक्टरों के साथ हाइड्रोजन के उत्पादन के लिये किया गया है।

खोज का महत्त्व:

  • हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रौद्योगिकी को बढ़ावा:
    • इस खोज के माध्यम से कम लागत वाले हाइड्रोजन की उपलब्धता के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग में वृद्धि और सुधार होगा जो विद्युत चालित वाहन, प्राथमिक और विभिन्न प्रकार की वाणिज्यिक व्यवस्था के लिये बैकअप पॉवर, औद्योगिक एवं आवासीय भवन और एयर टैक्सी जैसे फ्यूचरिस्टिक-साउंडिंग एप्लीकेशन के क्षेत्र में एक स्वच्छ तथा विश्वसनीय वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत का लाभ प्रदान करेगा।
      • हाइड्रोजन ईंधन सेल एक विद्युत रासायनिक जेनरेटर है जो उप-उत्पादों के रूप में ताप और जल का प्रयोग करके हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोजन से विद्युत उत्पादन करता है।
  • उत्सर्जन लक्ष्य का पालन करने में सहायक
    • यह भारत को पेरिस जलवायु समझौते में अपनी प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (आईएनडीसी) लक्ष्य का पालन करने में मदद कर सकता है तथा यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य में शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।
  • FAME इंडिया योजना का अनुपूरक:
    • यह हाइब्रिड/इलेक्ट्रिक वाहनों के बाज़ार के विकास और विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करने के उद्देश्य से शुरू की गई FAME इंडिया योजना के कुशल कार्यान्वयन के पूरक का कार्य करेगा।

ईंधन के रूप में हाइड्रोजन के लाभ:

  • पर्यावरण के अनुकूल:
    • हाइड्रोजन को एक ऊर्जा वाहक के रूप में उपयोग करने का लाभ यह है कि जब यह ऑक्सीजन के साथ जुड़ता है तो केवल जल और ऊष्मा ही उपोत्पाद होते हैं।
    • हाइड्रोजन ईंधन सेल के उपयोग से ग्रीनहाउस गैस या अन्य पार्टिकुलेट उत्पन्न नहीं होते हैं।
  • नॉन टॉक्सिक
    • हाइड्रोजन एक गैर-विषाक्त पदार्थ है जो ईंधन स्रोत के लिये दुर्लभ है। यह पर्यावरण के अनुकूल है और इससे मानव स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता है।
  • अत्यधिक कुशल:
    • हाइड्रोजन एक कुशल ऊर्जा रूप है क्योंकि इसमें डीज़ल या गैस की तुलना में प्रत्येक पाउंड ईंधन बहुत अधिक ऊर्जा क्षमता होती है।
  • आदर्श अंतरिक्षयान ईंधन:
    • हाइड्रोजन ऊर्जा की दक्षता और शक्ति इसे अंतरिक्षयान के लिये एक आदर्श ईंधन स्रोत बनाती है जो अन्वेषण मिशनों के लिये तीव्रता से रॉकेट भेजने में सक्षम है।

ईंधन के रूप में हाइड्रोजन से हानि 

  • गैस की तुलना में हाइड्रोजन में गंध का अभाव होता है, जो किसी भी रिसाव का पता लगाना लगभग असंभव बना देता है।
  • हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील और वाष्पशील पदार्थ है, इसके संभावित खतरे के रूप में ढुलाई तथा भंडारण की गंभीर चुनौती देखी जाती है।

स्रोत:  द हिंदू


न्यायिक निर्णयों का आर्थिक प्रभाव

चर्चा में क्यों 

हाल ही में नीति आयोग ने अनुसंधान संगठन ‘उपभोक्ता एकता और ट्रस्ट सोसायटी (Consumer Unity and Trust Society- CUTS) अंतर्राष्ट्रीय’ को न्यायालयों एवं न्यायाधिकरणों द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णयों के ‘आर्थिक प्रभाव’ तथा ‘न्यायालयों व न्यायाधिकरणों की ‘न्यायिक सक्रियता’ पर एक अध्ययन करने के लिये कहा है।

  • न्यायिक सक्रियता: इसका तात्पर्य न्यायपालिका द्वारा सरकार के अन्य दो अंगों (विधायिका और कार्यपालिका) को उनके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिये बाध्य करने हेतु निभाई गई मुखर भूमिका से है। इसे "न्यायिक गतिशीलता" के रूप में भी जाना जाता है। यह "न्यायिक संयम" के बिल्कुल विपरीत है, जिसका अर्थ है न्यायपालिका द्वारा आत्म-नियंत्रण बनाए रखना।

प्रमुख बिंदु

संगठन का संचालन:

  • यह अध्ययन जयपुर-मुख्यालय CUTS (उपभोक्ता एकता और ट्रस्ट सोसायटी) सेंटर फॉर कॉम्पिटिशन, इन्वेस्टमेंट एंड इकोनॉमिक रेगुलेशन द्वारा किया जाना है, जिसकी उपस्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है।
  • यह एक पंजीकृत, मान्यता प्राप्त, गैर-लाभकारी, गैर-पक्षपातपूर्ण, गैर-सरकारी संगठन (NGO) है जो सामाजिक न्याय तथा आर्थिक इक्विटी की सीमा के भीतर और इसके अलावा भी उसका अनुसरण करता है।

उद्देश्य:

  • अध्ययन का उद्देश्य "न्यायपालिका को उसके द्वारा दिये गए निर्णयों के आर्थिक प्रभाव के बारे में संवेदनशील बनाने हेतु विवरण प्रदान करना है।”
  • इसका एक उद्देश्य निर्णयों के आर्थिक प्रभाव का लागत-लाभ विश्लेषण करना भी है।

परियोजनाओं का अध्ययन:

  • इसका प्रयोजन सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court- SC) या राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal- NGT) के न्यायिक निर्णयों द्वारा "प्रभावित" पाँच प्रमुख परियोजनाओं का अध्ययन करना है।
    • विश्लेषण की जाने वाली परियोजनाओं में गोवा के मोपा में एक हवाई अड्डे का निर्माण, गोवा में लौह अयस्क खनन पर रोक और तमिलनाडु के थूथुकुडी में स्टारलाइट कॉपर प्लांट को बंद करना शामिल है।
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रेत खनन और निर्माण गतिविधियों से संबंधित NGT के अन्य फैसले हैं।

प्रक्रिया:

  • यह परियोजना के बंद होने के कारण प्रभावित लोगों, पर्यावरणविद, विशेषज्ञों के साक्षात्कार साथ-साथ बंदी के व्यावसायिक आकलन की योजना बना रहा है।

महत्त्व:

  • निर्णयों का उपयोग वाणिज्यिक न्यायालयों, NGT, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिये एक प्रशिक्षण इनपुट के रूप में किया जाएगा।
  • यह अपने निर्णयों में "न्यायपालिका द्वारा आर्थिक रूप से ज़िम्मेदार दृष्टिकोण" को बढ़ावा देने के लिये नीति निर्माताओं के बीच सार्वजनिक संवाद में योगदान देगा।
  • यह अध्ययन नीति आयोग द्वारा शुरू की गई व्यापक योजना का भी एक हिस्सा है जिसके तहत वह एक न्यायिक प्रदर्शन सूचकांक स्थापित करना चाहता है, जो ज़िला न्यायालयों और अधीनस्थ स्तरों पर न्यायाधीशों के प्रदर्शन को मापेगा।

पूर्व अध्ययन:

  • वर्ष 2017 में CUTS अंतर्राष्ट्रीय ने किसी भी राजमार्ग के 500 मीटर के भीतर शराब की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आर्थिक प्रभाव पर एक मूल्यांकन अध्ययन भी किया था।
  • अध्ययन से पता चलता है कि जिन मामलों में पर्याप्त सामाजिक और आर्थिक आयाम शामिल हैं, उनका आकलन करने के लिये विस्तार से यह अध्ययन करने की आवश्यकता है कि क्या वे पूर्व की तरह लागू करने के योग्य हैं और क्या अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की परिकल्पना की गई है।
  • ऐसा तब किया जा सकता है जब न्यायालयों ने इन पहलुओं का अध्ययन करने के लिये विशेषज्ञ समितियों का गठन किया हो और जो निर्णय सुनाए जाने से पहले लागत/लाभों का विश्लेषण करने के लिये अर्थशास्त्रियों को संलग्न कर सकते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व मामलों के लिये ऐसे विशेषज्ञ समूह समितियों की स्थापना की थी जैसे- वर्ष 2014 में न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित सड़क सुरक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय की समिति और वर्ष 2015 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (Board of Control for Cricket in India- BCCI) के भीतर सुधारों हेतु जस्टिस लोढ़ा समिति का गठन।

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स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस