राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025–26 | राजस्थान | 21 Feb 2026
चर्चा में क्यों?
राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26, जिसे राज्य बजट के साथ जारी किया गया है, राज्य के समष्टि आर्थिक प्रदर्शन के लिये एक प्रामाणिक दस्तावेज़ के रूप में कार्य करती है। इस वर्ष की रिपोर्ट अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘विकसित राजस्थान @2047’ के रोडमैप को औपचारिक रूप प्रदान करती है और पारंपरिक विभागीय रिपोर्टिंग के स्थान पर परिणामों पर केंद्रित 13 विषयगत अध्यायों में परिवर्तित हो गई है।
मुख्य बिंदु:
- समष्टि-आर्थिक समुच्चय: अनंतिम आँकड़ों के अनुसार, राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) आकार और विकास दर के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है, जो व्यापक राष्ट्रीय आर्थिक ढाँचे में इसकी भूमिका को और मज़बूत करता है।
- GSDP विकास दर: प्रचलित कीमतों पर सकल राज्य घरेलू उत्पाद ₹18.75 लाख करोड़ अनुमानित है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10.24% की वृद्धि दर्शाता है।
- प्रति व्यक्ति आय (PCI):
- प्रचलित कीमतों पर: ₹2,02,349 (₹2 लाख का आँकड़ा पार किया)।
- स्थिर कीमतों पर: ₹1,03,189।
- मुद्रास्फीति (CPI): राजस्थान की मुद्रास्फीति दर 4.8% पर स्थिर रही, जो राष्ट्रीय औसत से थोड़ी कम है। इसका श्रेय कृषि क्षेत्र में कुशल आपूर्ति-शृंखला प्रबंधन को दिया गया है।
- राजकोषीय घाटा: इसे GSDP के 4.3% पर प्रबंधित किया गया, जो उच्च पूंजीगत व्यय को बनाए रखते हुए संशोधित FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- कर राजस्व: कर अनुपालन के ‘मिशन डिजिटलीकरण’ के कारण SGST संग्रह में महत्त्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है।
- GSVA की क्षेत्रीय संरचना: प्रचलित कीमतों पर सकल राज्य मूल्यवर्द्धन (GSVA) में अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:
- सेवा क्षेत्र (47.7%): यह क्षेत्र राज्य के GSVA में सबसे बड़ा योगदान देता है, जो पर्यटन, आतिथ्य, वित्तीय सेवाओं, IT-सक्षम सेवाओं और लॉजिस्टिक्स द्वारा संचालित है।
- पर्यटन एक 'ग्रोथ इंजन' बना हुआ है, जो राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ उठा रहा है।
- यह सबसे प्रमुख क्षेत्र है, जिसे महामारी के बाद पर्यटन में आए उछाल और जयपुर व जोधपुर में ‘फिनटेक’ (FinTech) पहलों से गति मिली है।
- उद्योग क्षेत्र (26.5%): MSME, औद्योगिक पार्कों में निवेश और औद्योगिक प्रोत्साहन नीतियों के कार्यान्वयन के सहयोग से औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन मज़बूत हुआ है।
- राजस्थान अपनी रणनीतिक स्थिति और प्रचुर संसाधनों का लाभ उठाते हुए अपने विनिर्माण आधार, नवीकरणीय ऊर्जा उद्योगों तथा डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- यह विकास MSME नीति 2024 और पत्थर, सीमेंट तथा हाइड्रोकार्बन उत्पादन में राजस्थान के नेतृत्व से प्रेरित है।
- कृषि क्षेत्र (25.7%): रोज़गार और मूल्यवर्द्धन दोनों के मामले में कृषि एक महत्त्वपूर्ण योगदानकर्त्ता बनी हुई है। हालाँकि सेवाओं की तुलना में GSVA में इसकी हिस्सेदारी कुछ कम हुई है।
- सेवा क्षेत्र की तुलना में कम हिस्सेदारी के बावजूद, यह 60% से अधिक आबादी को रोज़गार प्रदान करता है। खाद्यान्न उत्पादन 283.98 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच गया है।
- कृषि क्षेत्र ग्रामीण आजीविका का आधार बना हुआ है, जबकि राज्य की योजनाओं के तहत बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी संबद्ध गतिविधियों में विविधीकरण तेज़ी पकड़ रहा है।
- विकसित राजस्थान @2047 के मुख्य स्तंभ: आर्थिक समीक्षा कुछ रणनीतिक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर प्रकाश डालती है, जैसे:
- ऊर्जा संक्रमण: राजस्थान 31,500 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का नेतृत्व कर रहा है। समीक्षा में ‘ग्रीन हाइड्रोजन नीति’ और पीएम-कुसुम योजना पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
- बुनियादी ढाँचा: राज्य के 13 ज़िलों में पानी की कमी को दूर करने के लिये 9 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे और पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) के चरणों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- गिग इकोनॉमी: राजस्थान 'प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम' को लागू करने वाला देश का पहला राज्य है, जो अब कुल कार्यबल के 2% हिस्से को शामिल करता है।
- कृषि 2.0: प्राकृतिक कृषि (1 लाख हेक्टेयर) और ‘राजस्थान मिलेट्स प्रोत्साहन मिशन’ पर ज़ोर दिया गया है, ताकि भारत के ‘मिलेट बाउल ऑफ इंडिया’ के रूप में राज्य की स्थिति का लाभ उठाया जा सके।
- सामाजिक क्षेत्र और मानव विकास: राजस्थान के सामने रोज़गार सृजन और विशेष रूप से शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिये रोज़गार के अवसरों की गुणवत्ता बढ़ाने की दोहरी चुनौती है।
- श्रम: 'प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम' (PMEGP) जैसी योजनाएँ स्वरोज़गार और सूक्ष्म उद्यम विकास को बढ़ावा देने में सहायक रही हैं।
- शिक्षा: महात्मा गांधी अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों का विस्तार और 1,500 से अधिक माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक प्रशिक्षण का एकीकरण किया गया है।
- स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत-MGRBY एक प्रमुख योजना बनी हुई है, जो 'आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर' (OOPE) यानी मरीजों के निजी व्यय को कम करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए 1.36 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य कवर प्रदान करती है।
- महिला सशक्तीकरण: लखपति दीदी योजना ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में सफलतापूर्वक एकीकृत किया है, जिससे महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) बढ़कर 42% हो गई है।
पहला स्वदेशी कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ ‘कृष्णा’ चेन्नई में लॉन्च किया गया | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 21 Feb 2026
चर्चा में क्यों?
भारतीय नौसेना ने फरवरी 2026 में चेन्नई के कट्टुपल्ली स्थित L&T शिपयार्ड में अपना पहला स्वदेश निर्मित और डिज़ाइन किया गया कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ (CTS) 'कृष्णा' लॉन्च किया।
मुख्य बिंदु:
- प्रथम स्वदेशी CTS: 'कृष्णा', रक्षा मंत्रालय के साथ हस्ताक्षरित एक अनुबंध के तहत लार्सन एंड टुब्रो (L&T) द्वारा भारतीय नौसेना के लिये निर्मित किये जा रहे तीन कैडेट प्रशिक्षण जहाजों में से पहला है।
- 'कृष्णा' पूरी तरह से सुसज्जित एक पाल-प्रशिक्षण और मोटर चालित जहाज़ है, जो प्रशिक्षण के उद्देश्य से 150 कैडेटों तथा अधिकारियों को रखने में सक्षम है।
- इस जहाज़ का नाम कृष्णा नदी के नाम पर रखा गया है, जो भारत की सबसे लंबी नदियों में से एक है।
- लॉन्च समारोह: इस कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ का उद्घाटन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान की पत्नी, अनुपमा चौहान द्वारा किया गया।
- रणनीतिक महत्त्व: यह आधुनिक नौसैनिक अभियानों और समुद्री जीवन से परिचित अच्छी तरह से प्रशिक्षित अधिकारियों को तैयार करके भारत की 'ब्लू-वॉटर' (Blue-water) नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाता है।
- इस जहाज़ में आधुनिक नेविगेशन (नौवहन), संचार और सुरक्षा प्रणालियाँ मौजूद हैं, जो कैडेटों को अत्याधुनिक समुद्री तकनीक का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करती हैं।
- डिज़ाइन और निर्माण: इस पोत को पूरी तरह से स्वदेशी रूप से डिज़ाइन और निर्मित किया गया है तथा इसे 2026 के अंत तक भारतीय नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है।
- आत्मनिर्भर भारत: यह परियोजना स्वदेशी रक्षा जहाज़ निर्माण क्षमताओं को बढ़ावा देकर 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहल को सुदृढ़ करती है।
यूरोपियन यूनियन ने खोला भारत में अपना पहला ‘लीगल गेटवे’ ऑफिस | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 21 Feb 2026
चर्चा में क्यों?
यूरोपीय संघ (EU) ने नई दिल्ली में अपने पहले 'यूरोपीय लीगल गेटवे ऑफिस' का उद्घाटन किया। यह भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच भारतीय छात्रों, शोधकर्त्ताओं और पेशेवरों विशेष रूप से सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) क्षेत्र में कानूनी तथा पारदर्शी आवाजाही को सुविधाजनक बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
मुख्य बिंदु:
- अपनी तरह का पहला कार्यालय: भारत में 'यूरोपीय लीगल गेटवे ऑफिस' किसी भी साझेदार देश में यूरोपीय संघ (EU) द्वारा खोली गई इस तरह की पहली सुविधा है।
- यह कार्यालय यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों में कार्य, अध्ययन और अनुसंधान के अवसरों हेतु वैध आवागमन के माध्यम पर स्पष्ट तथा विश्वसनीय जानकारी प्रदान करने के लिये एक 'वन-स्टॉप हब' के रूप में कार्य करता है।
- मुख्य फोकस: इस पहल का उद्देश्य भारतीय ICT छात्रों, पेशेवरों और शोधकर्त्ताओं को पात्रता मानदंड, कौशल एवं योग्यता आवश्यकताओं तथा पूरे यूरोपीय संघ में उपलब्ध अवसरों के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करना है।
- यह 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में अपनाए गए 'भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक एजेंडा' के तहत व्यापक सहयोग का हिस्सा है।
- परिचालन संरचना: लीगल गेटवे ऑफिस तीन परस्पर जुड़े घटकों के माध्यम से कार्य करेगा:
- भारत में एक गेटवे ऑफिस।
- यूरोपीय संघ में एक सपोर्ट ऑफिस।
- एक डिजिटल टूल, जो आवाजाही और वीज़ा प्रक्रियाओं पर केंद्रीय सूचना केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
- रणनीतिक महत्त्व: इस पहल से प्रवासन और गतिशीलता पर भारत-यूरोपीय संघ के सहयोग के गहराने, शिक्षा एवं रोज़गार के क्षेत्र में संबंध मज़बूत होने तथा दोनों क्षेत्रों की प्रतिभाओं एवं अर्थव्यवस्थाओं के लिये पारस्परिक रूप से लाभकारी अवसर उत्पन्न होने की उम्मीद है।
- अर्थव्यवस्था और कौशल: यह कार्यालय विशेष रूप से डिजिटल, वैज्ञानिक और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत के विशाल एवं कुशल कार्यबल तथा वैश्विक प्रतिभा पूल में इसके योगदान की मान्यता को दर्शाता है; साथ ही, यह यूरोपीय नियोक्ताओं व् संस्थानों को भारतीय प्रतिभाओं के साथ जुड़ने में भी सहायता प्रदान करता है।
केरल ने ज्वारीय बाढ़ को ‘राज्य-विशिष्ट आपदा’ घोषित किया | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 21 Feb 2026
चर्चा में क्यों?
जलवायु-संवेदनशील नीति की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए, केरल सरकार ने हाल ही में 'ज्वारीय बाढ़' (उच्च ज्वार के दौरान समुद्र का स्थानीय इलाकों में प्रवेश) को 'राज्य-विशिष्ट आपदा' घोषित किया है।
मुख्य बिंदु:
- ज्वारीय बाढ़: इसे 'सनी डे फ्लडिंग' या 'नुइसेंस फ्लडिंग' (Nuisance Flooding) के रूप में भी जाना जाता है। यह तब होती है जब तूफान या भारी बारिश की अनुपस्थिति में भी उच्च ज्वार के दौरान समुद्र का स्तर स्थानीय सीमा से ऊपर बढ़ जाता है।
- केरल का संदर्भ: एर्नाकुलम (कोच्चि), अलाप्पुझा और त्रिशूर जैसे ज़िलों में, समुद्र का पानी बैकवाटर और जल-निकासी प्रणालियों के माध्यम से दिन में दो बार घरों तथा दुकानों में प्रवेश करता है, जिससे पुरानी (क्रोनिक) जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है।
- इसे ‘आपदा’ का दर्जा क्यों?: ऐतिहासिक रूप से, आपदा राहत केवल चक्रवात या भूस्खलन जैसी ‘आकस्मिक’ घटनाओं के लिये आरक्षित थी। केरल का यह बदलाव कई महत्त्वपूर्ण कारकों पर आधारित है:
- बारंबारता और तीव्रता: जलवायु परिवर्तन और समुद्र के स्तर में वृद्धि (SLR) के कारण उच्च ज्वार अब स्थानीय इलाकों में काफी अंदर तक पहुँच रहे हैं।
- जो कभी एक मामूली असुविधा थी, वह अब जीवन और संपत्ति के लिये दैनिक खतरा बन गई है।
- ‘धीमी गति’ का संकट: सुनामी के विपरीत, ज्वारीय बाढ़ एक धीमी गति से आने वाली आपदा है। समय के साथ, यह घरों की नींव को नष्ट कर देती है, फर्नीचर खराब कर देती है और कृषि भूमि को लवणीय (खारी) बना देती है।
- नीतिगत कमी को दूर करना: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत, मानक राहत कोष का उपयोग ‘नियमित’ ज्वारीय घटनाओं के लिये नहीं किया जा सकता था।
- इसे 'राज्य-विशिष्ट' घोषित करके, सरकार अब घर की मरम्मत और आजीविका के नुकसान के लिये वित्तीय सहायता प्रदान कर सकती है।
- आपदा प्रबंधन के लिये महत्त्व: यह परिभाषा को ‘आकस्मिक आघात’ से हटाकर ‘संचयी हानि’ की ओर ले जाता है, जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये 'सेंडाई फ्रेमवर्क' के अनुरूप है।
- तटीय भारत के लिये मिसाल: अन्य संवेदनशील राज्य (जैसे ओडिशा, पश्चिम बंगाल) भी इसका अनुसरण कर सकते हैं क्योंकि समुद्र का बढ़ता स्तर पूरी 7,500 किमी लंबी भारतीय तटरेखा के लिये खतरा उत्पन्न कर रहा है।