बैंड-टेल स्कॉर्पियन फिश

प्रीलिम्स के लिये:

न्यूरोटॉक्सिन, बैंड-टेल स्कॉर्पियन फिश

मेन्स के लिये:

मन्नार की खाड़ी का जैव विविधीय महत्त्व 

चर्चा में क्यों

हाल ही में सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट (Central Marine Fisheries Research Institute- CMFRI) के शोधकर्त्ताओं द्वारा मन्नार की खाड़ी में स्थित सेतुकराई तट पर एक दुर्लभ प्रजाति की मछली की खोज की गई है।

Scorpion fish

प्रमुख बिंदु:

  • ऐसा पहली बार है कि जब भारतीय जल क्षेत्र में कोई विशेष जलीय प्रजाति जीवित खोज़ी गई हो।
  • सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा इस मछली की खोज़ मन्नार की खाड़ी में समुद्री घास के मैदान (Seagrass Meadows) का सर्वेक्षण करने के दौरान की गई।
  • वैज्ञानिकों द्वारा बताया गया कि छिपकर रहने वाली यह  ‘बैंड-टेल स्कॉर्पियन फिश’ मछली की एक दुर्लभ प्रजाति है जो ज़हरीले काँटों से युक्त है।
  • इसका जूलॉजिकल नाम स्कोर्पेनोसप्सिस नेगलेक्टा (Scorpaenospsis neglecta) है।
  • बैंड-टेल स्कॉर्पियन फिश शिकार करते समय तथा शिकार से बचने के लिये अपना रंग बदलने में भी सक्षम है। 
  • पानी के अंदर सर्वेक्षण के दौरान यह मछली एक भ्रामक स्थिति उत्पन्न करती है जोकि एक मूंगा कंकाल (Coral Skeleton) की तरह दिखाई देती है। 
  • मछली को 'स्कोर्पियन फ़िश' कहे जाने का प्रमुख कारण इसकी रीढ़ में न्यूरोटॉक्सिक विष (Neurotoxic Venom) की उपस्थिति है।

न्यूरोटॉक्सिन (Neurotoxic):

  • न्यूरोटॉक्सिन एक विषाक्त पदार्थ हैं जो तंत्रिका ऊतक (Nerve Tissue) के लिये हानिकारक होता हैं। 
  • न्यूरोटॉक्सिन बहिर्जात रासायनिक न्यूरोलॉजिकल का एक विशाल वर्ग है।  
  • यह विकासशील और परिपक्व दोनों प्रकार के ऊतकों के कार्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है। 
  • जब मछली की रीढ़ किसी कठोर सतह या व्यक्ति के साथ लगती/चुभती है तो इसकी रीढ़ में उपस्थित विष तुरंत सतह में प्रवेश कर जाता है जो बहुत दर्द उत्पन्न कर सकता है। 

मन्नार की खड़ी:

  • यह इलाका समुद्री जैव विविधता के मामले में दुनिया के सबसे धनी क्षेत्रों में से एक है।
  • यूनेस्को के मुताबिक मन्नार की खाड़ी में 4,223 समुद्री प्रजातियों का वास है तथा यह जैव विविधता के मामले में भारत के सबसे संपन्न तटीय क्षेत्रों में से एक है। 

सेतुकराई(Sethukarai):

  • सेतुकराई तमिलनाडु का प्रमुख तीर्थस्थल है।
  • ऐसी मान्यता है कि भगवान राम ने लंका तक जाने के लिये सेतुकराई से ही पुल का निर्माण किया था।

स्रोत: द हिंदू