सम्राट संप्रति | 03 Apr 2026

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस  

चर्चा में क्यों? 

महावीर जयंती (31 मार्च, 2026) के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कोबा, गांधीनगर में सम्राट संप्रति संग्रहालय का उद्घाटन किया।

  • यह संग्रहालय जैन इतिहास को संरक्षित करने और सम्राट संप्रति की विरासत का सम्मान करने के लिये एक समर्पित स्थान के रूप में कार्य करता है, जो अशोक महान के पोते थे।
  •  उन्होंने जैन धर्म के प्रसार में वैसी ही भूमिका निभाई जैसी अशोक ने बौद्ध धर्म के वैश्विक प्रसार में निभाई थी।

सम्राट संप्रति कौन थे?

  • परिचय: ये मौर्य साम्राज्य के पाँचवें सम्राट थे, जिन्होंने लगभग 224 से 215 ईसा पूर्व तक शासन किया।  ये  पौराणिक सम्राट अशोक के पोते और कुणाल के पुत्र थे।
    • 232 ईसा पूर्व में अशोक की मृत्यु के बाद, ऐतिहासिक अभिलेख से जानकारी मिलती है कि मौर्य साम्राज्य उनके पोतों दशरथ और संप्रति के बीच विभाजित हो गया था।
  • धार्मिक संबद्धता: जहाँ मौर्य वंश में विविध धर्म देखने को मिलते थे, चंद्रगुप्त मौर्य (जैन धर्म), अशोक (बौद्ध धर्म) और दशरथ (आजीविक) के साथ, संप्रति श्वेतांबर जैन परंपरा के लिये प्रमुख व्यक्ति हैं।
    • प्रायः "जैन अशोक" के रूप में संदर्भित संप्रति जैन धर्म के वैश्विक प्रसार में अपनी भूमिका के लिये इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।

सम्राट संप्रति ने जैन धर्म के प्रसार में किस प्रकार योगदान दिया?

  • मंदिर निर्माण और प्रतिमा विज्ञान: संप्रति ने मंदिर पूजा की "अनुष्ठान संस्कृति" स्थापित की, जिसने जैन धर्म को संपूर्ण उपमहाद्वीप में एक भौतिक और स्थायी उपस्थिति प्रदान की।
    • पारंपरिक जैन ग्रंथ उन्हें 125,000 नए मंदिरों (देरासर) के निर्माण और 36,000 पुराने मंदिरों के जीर्णोद्धार का श्रेय देते हैं। पश्चिमी भारत में कई प्राचीन जैन मंदिर, जिनमें विशिष्ट शिलालेख शामिल हैं, को पारंपरिक रूप से संप्रति के शासनकाल में स्थापना का श्रेय दिया जाता है।
    • ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पत्थर और धातु से बनी तीर्थंकरों की 12.5 मिलियन से अधिक मूर्तियों का निर्माण और अभिषेक करवाया था।
  • मिशनरी अभियान: संप्रति ने अहिंसा के सिद्धांतों को मौर्य साम्राज्य से बहुत दूर तक फैलाने के लिये मिशनरी भेजे।
    • ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार, उन्होंने पहले मौर्य सैनिकों को जैन भिक्षुओं के वेश में "गैर-आर्य" (अजेय या जनजातीय) क्षेत्रों में भेजा। विवरण बताते हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्याँमार (बर्मा) और यहाँ तक कि मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में दूत भेजे, जिससे जैन धर्म एक अंतर्राष्ट्रीय धर्म बन गया।
    • उन्होंने जैन धर्म को आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र (गुजरात) और राजपूताना (राजस्थान) जैसे क्षेत्रों में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
  • राज्य संरक्षण और नैतिक शासन: उज्जैन और पाटलिपुत्र जैसे प्रमुख केंद्रों से शासन करके उन्होंने सुनिश्चित किया कि जैन संस्थानों को शाही संरक्षण और सुरक्षा प्राप्त हो।
    • संप्रति ने राज्य के कल्याण कार्यक्रमों को जैन सिद्धांत करुणा  के साथ संरेखित किया।
    • उन्होंने संपूर्ण साम्राज्य में लगभग 700 सदा-वर्त (धर्मशालाएँ) स्थापित कीं। ये केंद्र गरीबों, यात्रियों और तपस्वी समुदाय को मुफ्त भोजन, आश्रय और चिकित्सा देखभाल प्रदान करते थे।
  • मठवासी रसद: उन्होंने सुनिश्चित किया कि जैन भिक्षु, जो विशेष रूप से पैदल यात्रा करते हैं और भिक्षा पर निर्भर रहते हैं, उनके पास साम्राज्य भर में अपनी लंबी यात्राओं के दौरान सुरक्षित मार्ग और शुद्ध भोजन तक पहुँच हो।

जैन धर्म के प्रमुख संप्रदाय

  • श्वेतांबर संप्रदाय (‘श्वेत वस्त्रधारी’): यह परंपरा पश्चिम और उत्तर भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान में अधिक प्रचलित है।
    • यह नाम उनके द्वारा अपनाए गए 'श्वेत वस्त्र' के आचरण को प्रतिबिंबित करता है, जो इस धार्मिक परंपरा में संन्यासियों के लिए निर्धारित वेशभूषा है।
    • वे मानते हैं कि सफेद वस्त्र पहनना आध्यात्मिक प्रगति में बाधा नहीं डालता, क्योंकि सच्ची मुक्ति बाहरी रूप-रंग पर नहीं, बल्कि आंतरिक वैराग्य पर निर्भर करती है।
    • श्वेतांबर संप्रदाय आगम ग्रंथों को भगवान महावीर की प्रामाणिक शिक्षाएँ मानता है। एक प्रमुख मान्यता यह है कि महिलाएँ वर्तमान जीवन में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं तथा वे 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ को भी स्त्री रूप में स्वीकार करते हैं।
    • यह संप्रदाय आगे तीन उप-संप्रदायों में विभाजित है—मूर्तिपूजक (मूर्ति उपासक), स्थानकवासी (मूर्ति-पूजा का विरोध करने वाले) और तेरापंथी (सुधारवादी एवं अत्यंत अनुशासित समूह)।
  • दिगंबर संप्रदाय (‘आकाशवस्त्रधारी’): इस संप्रदाय की व्याप्ति मुख्य रूप से दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक, और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में देखी जाती है।
    • दिगंबर साधु पूर्ण अपरिग्रह और त्याग का मार्ग अपनाते हुए वस्त्रों का परित्याग करते हैं, जो समस्त सांसारिक और भौतिक बंधनों से उनके पूर्ण वैराग्य को दर्शाता है।
    • दिगंबर संप्रदाय की मान्यता है कि मूल जैन आगम समय के साथ लुप्त हो गए थे। इसी कारण वे इन मूल शास्त्रों के स्थान पर महान आचार्यों और विद्वान मुनियों द्वारा रचित ग्रंथों को प्रमाण मानते हैं।
    • श्वेतांबरों के विपरीत वे मानते हैं कि महिलाएँ सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं और उन्हें पहले पुरुष रूप में पुनर्जन्म लेना पड़ता है।
    • उनके प्रमुख उप-संप्रदायों में बीसपंथ, तेरापंथ और तारणपंथ या समयपंथ आते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. सम्राट संप्रति कौन थे?
ये एक मौर्य सम्राट (224–215 ईसा पूर्व) थे, अशोक के पौत्र, जो जैन धर्म के प्रचार के लिये जाने जाते हैं।

2. संप्रति को "जैन अशोक" क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने राज्य समर्थन, मंदिरों और मिशनों के माध्यम से जैन धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बौद्ध धर्म के लिये अशोक की भूमिका के समान थी।

3. जैन धर्म में संप्रति का प्रमुख योगदान क्या था?
उन्होंने हज़ारों मंदिरों का निर्माण कराया, लाखों मूर्तियाँ स्थापित कराईं और जैन धर्म के प्रचार हेतु विभिन्न क्षेत्रों में मिशनरियों को भेजा।

4. संप्रति के शासनकाल में किन क्षेत्रों में जैन धर्म का प्रसार हुआ?
जैन धर्म का विस्तार गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु और भारत से बाहर अफगानिस्तान तथा म्याँमार तक हुआ।

5. संप्रति ने जन-कल्याण और शासन-प्रशासन को किस प्रकार समर्थन दिया?
उन्होंने सदा-वर्त नामक परोपकारी केंद्र स्थापित किये, जहाँ भोजन, आश्रय और चिकित्सा सेवा प्रदान की जाती थी, जो जैन धर्म के अहिंसा और करुणा के सिद्धांतों को दर्शाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत की धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में “स्थानकवासी” संप्रदाय का संबंध किससे है? (2018)

(a) बौद्ध मत

(b) जैन मत

(c) वैष्णव मत

(d) शैव मत  

उत्तर: (b)


प्रश्न. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. सौत्रांतिका और सम्मितीय जैन मत के संप्रदाय थे। 
  2. सर्वास्तिवादियों की मान्यता थी कि दृग्विषय (फिनोमिना) के अवयव पूर्णतः क्षणिक नहीं हैं, अपितु अव्यक्त रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)


प्रश्न. प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों के लिये सामान्य था? (2012)

  1. तपस्या और भोग के अतिवाद से बचाव 
  2. वेदों के अधिकार के प्रति उदासीन 
  3. अनुष्ठानों की प्रभावकारिता से इनकार

नीचे दिये गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) 


प्रश्न. अनेकांतवाद निम्नलिखित में से किसका एक मूल सिद्धांत और दर्शन है? (2009)

(a) बौद्ध धर्म

(b) जैन धर्म

(c) सिख धर्म

(d) वैष्णव धर्म

उत्तर: (b)