अंतरिक्ष में पेटेंट संबंधी कानून | 31 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
पृथ्वी-आधारित बौद्धिक संपदा (IPR) कानून चंद्रमा या मंगल पर जल निष्कर्षण जैसी जीवन-रक्षक प्रौद्योगिकियों के विकास के लिये आवश्यक संप्रभुता‑मुक्त और खुले नवाचार मॉडल से टकराते हैं। इससे बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय सहयोग की स्पष्ट आवश्यकता होने के बावजूद एक गंभीर कानूनी चुनौती उत्पन्न होती है।
वर्तमान पेटेंट संबंधी कानून बाह्य अंतरिक्ष के लिये अनुपयुक्त क्यों है?
- बाह्य अंतरिक्ष में वर्तमान पेटेंट संबंधी कानून: वर्तमान में, अंतरिक्ष-अन्वेषण करने वाले राष्ट्रों ने बाह्य अंतरिक्ष में गतिविधियों और आविष्कारों पर अपने राष्ट्रीय पेटेंट कानूनों को लागू करने के लिये सार्वभौमिक रूप से 'पंजीकरण-आधारित अधिकार क्षेत्र' के सिद्धांत [बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 (OST) का अनुच्छेद VIII] को अपनाया है। अर्थात् यदि कोई आविष्कार अमेरिकी-पंजीकृत मॉड्यूल पर किया जाता है, तो उसे कानूनी दृष्टि से अमेरिका के अधिकार क्षेत्र के भीतर घटित माना जाता है।
- मूल रूप से कानूनी संघर्ष: पृथ्वी की पेटेंट व्यवस्था क्षेत्राधिकार के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ अधिकार विशिष्ट राष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े होते हैं। यह व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून से टकराती है, क्योंकि वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुच्छेद II के अनुसार किसी भी खगोलीय पिंड पर राष्ट्रीय संप्रभुता का दावा निषिद्ध है।
- ISS मॉडल और इसकी सीमाएँ: अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) एक अंतरसरकारी समझौते के तहत कार्य करता है जो अधिकार क्षेत्र को मॉड्यूल-दर-मॉड्यूल आवंटित करता है, प्रत्येक को अपने भागीदार देश के क्षेत्र के रूप में मानता है।
- यह व्यवस्था स्थिर और खंडित संरचनाओं के लिये तो काम कर सकती है, लेकिन साझा प्लेटफॉर्म पर बहुराष्ट्रीय टीमों द्वारा संयुक्त रूप से तकनीक विकसित करने वाले एकीकृत लुनार बेस (Lunar Base) के लिये उपयुक्त नहीं है, जहाँ आविष्कार के वास्तविक स्थान की सीमाएँ कमज़ोर हो जाती हैं।
- सैद्धांतिक स्तर पर अंतरिक्ष संबंधी कानूनों में विरोधाभास: जीवन-रक्षा से जुड़ी आवश्यक तकनीकों (जैसे- जीवन-समर्थन प्रणालियाँ) पर पेटेंट के माध्यम से विशिष्ट अधिकार स्थापित होने से व्यवहार में दूसरों को बाहर किये जाने की स्थिति बन सकती है, जो 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि (OST) के उस प्रावधान से संभावित रूप से टकराता है जिसके अनुसार अंतरिक्ष का उपयोग ‘समस्त मानवता के हित में’ किया जाना चाहिये (OST, 1967 का अनुच्छेद-I)।
- असुलझे सिद्धांत और कानूनी कमियाँ: यह स्पष्ट नहीं है कि औद्योगिक संपदा के संरक्षण हेतु 1883 के पेरिस कन्वेंशन में निहित ‘अस्थायी उपस्थिति’ सिद्धांत (जो ट्रांज़िट में सामान पर पेटेंट लागू करने को सीमित करता है) अंतरिक्ष उपकरणों पर लागू होता है या नहीं, जिससे कानूनी अनिश्चितता उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, पंजीकरण प्रणाली ‘फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस’ जैसी रणनीतियों को भी प्रोत्साहित कर सकती है, जहाँ संस्थाएँ अप्रभावी प्रवर्तन वाले क्षेत्रों के अधिकार-क्षेत्र का उपयोग कर पेटेंट दावों से बचने का प्रयास करती हैं।
- समन्वय की सीमाएँ: संचालनात्मक समन्वय तंत्र, जैसे– NASA आर्टेमिस समझौते हस्तक्षेप को कम कर सकते हैं, वे अधिकार क्षेत्र का गठन नहीं करते हैं इसलिये अंतरिक्ष क्षेत्रों में स्वामित्व और प्रवर्तन से संबंधित प्रश्नों का समाधान नहीं कर पाते।
- अंतरिक्ष-विशिष्ट बौद्धिक संपदा (IP) तंत्रों पर बढ़ती चर्चाओं के बावजूद, समन्वय अभी भी असमान बना हुआ है और अधिकांश राज्य केवल नियम-अनुसरणकर्त्ता बने हुए हैं, जिससे स्वामित्व और प्रवर्तन से जुड़े प्रश्न अब भी अनसुलझे हैं।
बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967
- परिचय: बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 सभी खगोलीय गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली मूलभूत कानूनी रूपरेखा है। यह शांतिपूर्ण उपयोग, गैर-अधिग्रहण (Non-appropriation) तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत स्थापित करती है, ताकि संघर्ष को रोका जा सके और यह सुनिश्चित हो कि अंतरिक्ष से समस्त मानवता को लाभ प्राप्त हो।
- उत्पत्ति एवं स्थिति: संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 1966 में अंगीकृत, 1967 में प्रभावी हुई तथा इसके 115 से अधिक पक्षकार देश हैं, जिससे यह लगभग सार्वभौमिक हथियार-नियंत्रण एवं अंतरिक्ष-शासन साधन बन जाती है। भारत ने इस संधि पर 1967 में हस्ताक्षर किये और 1982 में इसकी पुष्टि की।
- मौलिक सिद्धांत:
- अनुच्छेद I: समस्त मानवता के हित में अंतरिक्ष अन्वेषण का प्रावधान करता है तथा सभी राज्यों के लिये अंतरिक्ष को मुक्त घोषित करता है।
- अनुच्छेद II: गैर-अधिग्रहण के सिद्धांत की स्थापना करता है, जिसके अंतर्गत अंतरिक्ष में संप्रभुता के दावों पर प्रतिबंध है।
- अनुच्छेद IV: शांतिपूर्ण उपयोग को लागू करता है तथा खगोलीय पिंडों पर सामूहिक विनाश के हथियारों और सैन्य ठिकानों पर रोक लगाता है।
- अनुच्छेद VII: किसी राज्य के अंतरिक्ष पिंडों से होने वाली क्षति के लिये राज्य की देयता निर्धारित करता है।
- अनुच्छेद VI: निजी गतिविधियों सहित सभी राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यों के लिये राज्य की ज़िम्मेदारी की पुष्टि करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. अंतरिक्ष में पेटेंट संबंधी कानून समस्याग्रस्त क्यों है?
क्योंकि पेटेंट कानून क्षेत्रीय होता है, जबकि बाह्य अंतरिक्ष पर बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुच्छेद II के तहत गैर-संप्रभुता का सिद्धांत लागू होता है।
2. बाह्य अंतरिक्ष संधि का अनुच्छेद VIII पेटेंट पर कैसे लागू होता है?
यह राज्यों को उनके द्वारा पंजीकृत अंतरिक्ष वस्तुओं पर अधिकार क्षेत्र प्रयोग करने की अनुमति देता है, जिससे राष्ट्रीय पेटेंट कानूनों का विस्तार अंतरिक्ष तक हो जाता है।
3. भविष्य के अंतरिक्ष आवासों के लिये ISS मॉडल अनुपयुक्त क्यों है?
ISS में मॉड्यूल-आधारित अधिकार क्षेत्र अपनाया जाता है, जो एकीकृत और बहुराष्ट्रीय चंद्र या मंगल आवासों में प्रभावी नहीं है, क्योंकि वहाँ आविष्कार सामूहिक रूप से विकसित किये जाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)
इसरो द्वारा प्रक्षेपित मंगलयान:
- को मंगल ऑर्बिटर मिशन भी कहा जाता है।
- के कारण अमेरिका के बाद मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाला भारत दूसरा देश बना।
- ने भारत को अपने अंतरिक्ष यान को अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की परिक्रमा करने में सफल होने वाला एकमात्र देश बना दिया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
प्रश्न: अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के थेमिस मिशन, जो हाल ही में खबरों में था, का उद्देश्य क्या है? (2008)
(a) मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना का अध्ययन करना।
(b) शनि के उपग्रहों का अध्ययन करना।
(c) उच्च अक्षांश पर आकाश के रंगीन प्रदर्शन का अध्ययन करना।
(d) तारकीय विस्फोटों का अध्ययन करने के लिये एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला का निर्माण करना।
उत्तर: (c)