कोविड-19 वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों हेतु नो-फॉल्ट मुआवज़ा नीति | 13 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकार को कोविड-19 टीकाकरण अभियान के पश्चात इसके गंभीर प्रतिकूल प्रभावों या इसके कारण जिन व्यक्तियों की मृत्यु हुई उनके लिये "नो-फॉल्ट" देयता मुआवज़ा नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।
कोविड-19 वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों हेतु मुआवज़े के दावों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्णय रहा?
- नो-फॉल्ट देयता का सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने नो-फॉल्ट देयता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए निर्णय लिया कि पीड़ित व्यक्तियों या उनके परिवारों को वित्तीय राहत प्राप्त करने हेतु वैक्सीन निर्माता या राज्य की लापरवाही अथवा साशय किये गए कदाचार को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होगी।
- यह सिद्धांत भारतीय विधि में पहले से विद्यमान है (जैसे– मोटर वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में) और ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम तथा जापान जैसे देशों में वैक्सीन-जनित क्षति मुआवज़ा योजनाओं का एक मानक घटक है।
- व्यक्तिगत मुकदमों की अस्वीकृति: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि पीड़ित परिवारों को वैक्सीन निर्माताओं के विरुद्ध लापरवाही या कदाचार के लिये दीवानी या उपभोक्ता न्यायालयों की सहायता लेनी चाहिये।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नागरिकों के “अनेक व्यक्तिगत कानूनी संघर्षों” से भिन्नात्मक और असमान परिणामों की स्थिति उत्पन्न होगी तथा इससे संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
- राज्य का सकारात्मक दायित्व: अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, जिसमें स्वास्थ्य शामिल है) का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने ज़ोर देते हुए कहा कि संविधान राज्य को एक "दूरस्थ दर्शक" के बजाय एक "सक्रिय कल्याण और गरिमा का संरक्षक" मानता है।
- चूँकि सामूहिक टीकाकरण कार्यक्रम एक राज्य-नेतृत्व वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप था, इसलिये राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह उन लोगों का समर्थन करे जिन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़े, चाहे वे कितने ही दुर्लभ क्यों न हों (उदाहरण के लिये, भारत में कुछ रक्त के थक्के से संबंधित विकारों के लिये प्रति दस लाख खुराक पर केवल 0.001)।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि अभियान आधिकारिक तौर पर "स्वैच्छिक" था, इसे अनवैक्सीनेटेड व्यक्तियों पर प्रशासनिक प्रतिबंधों के माध्यम से प्रभावी रूप से अनिवार्य बना दिया गया था।
- मुआवज़ा निगरानी का अनुसरण करना: एक अलग चिकित्सा बोर्ड स्थापित करने से इनकार करते हुए इसने माना कि टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटना (AEFI) संबंधी समितियाँ पर्याप्त हैं, लेकिन इस बात पर बल दिया कि राज्य की ज़िम्मेदारी "केवल निगरानी तक सीमित नहीं रह सकती है, उचित मुआवज़ा प्रदान करने तक विस्तारित
- उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मुआवज़ा संबंधी नीति केंद्र सरकार द्वारा दायित्व की स्वीकारोक्ति के समान नहीं है।होनी चाहिये।"
- पिछला न्यायिक रुख:
- गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ मामला, 2021: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को कोविड-19 मौतों के लिये अनुग्रह अनुदान (एक्स ग्रेशिया) सहायता हेतु दिशा-निर्देशों की सिफारिश करने का निर्देश दिया, राशि प्राधिकरण पर छोड़ दी।
- इसके बाद, NDMA ने दिशा-निर्देश जारी किये, जिसमें प्रति मृतक 50,000 रुपये निर्धारित किये गए, जो राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से राज्यों द्वारा देय थे।
- अस्वीकृति को रोकने के लिये एक सरलीकृत प्रक्रिया स्थापित की गई अर्थात सकारात्मक परीक्षण के 30 दिनों के भीतर होने वाली मौतों को कोविड-19 मौतों के रूप में माना जाता था और मृत्यु प्रमाण-पत्र पर विवादों को हल करने के लिये ज़िला-स्तरीय शिकायत निवारण समितियाँ स्थापित की गईं।
- जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ मामला, 2022: उच्चतम न्यायालय ने वैक्सीन अनुमोदन प्रक्रिया की वैधता और सरकार के टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटना (AEFI) निगरानी तंत्र को बरकरार रखा, साथ ही यह फैसला सुनाया कि शारीरिक अखंडता अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है और किसी भी व्यक्ति का जबरन टीकाकरण नहीं किया जा सकता है।
- गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ मामला, 2021: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को कोविड-19 मौतों के लिये अनुग्रह अनुदान (एक्स ग्रेशिया) सहायता हेतु दिशा-निर्देशों की सिफारिश करने का निर्देश दिया, राशि प्राधिकरण पर छोड़ दी।
कोविड-19 वैक्सीन के दुष्प्रभाव
- सामान्य दुष्प्रभाव: ये दुष्प्रभाव सामान्यतः हल्के से मध्यम होते हैं और विशेषतः 1–3 दिनों के भीतर स्वयं ठीक हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, थकान, सिरदर्द, बुखार आदि।
- दुर्लभ गंभीर प्रतिकूल प्रभाव: ये दुष्प्रभाव असामान्य रूप से उत्पन्न होते हैं, लेकिन कठोर निगरानी प्रणालियों के माध्यम से इनकी पुष्टि की गई है।
- मायोकार्डिटिस और पेरिकार्डिटिस: हृदय की माँसपेशी या उसकी आस्तरण में सूजन। यह mRNA वैक्सीनों (जैसे–फाइज़र-बायोएनटेक, मॉडर्ना) से संबंधित पाया गया है और अधिकतर किशोरों एवं युवा पुरुषों में दूसरी खुराक के बाद देखा गया है।
- थ्रोंबोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) के साथ थ्रोंबोसिस: एक असामान्य रक्त स्कंदन बनने वाली बीमारी जिसमें प्लेटलेट्स की संख्या कम होती है, जो मुख्यतः कुछ वायरल वेक्टर वैक्सीनों (जैसे– एस्ट्राजेनेका या जैनसेन के पहले के फॉर्मूलेशन) से जुड़ी होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आदेशित "नो-फॉल्ट देयता" सिद्धांत क्या है?
इसका अर्थ है कि COVID-19 वैक्सीन से हुए चोट के शिकार व्यक्तियों या उनके परिवारों को, निर्माताओं या राज्य की लापरवाही या जानबूझकर की गई गलती साबित किये बिना, आर्थिक राहत प्राप्त करने का अधिकार है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का आधार कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद थे?
निर्णय में अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, जिसमें स्वास्थ्य शामिल है) एवं अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) पर आधारित तर्क प्रस्तुत किया गया और यह माना गया कि व्यक्तिगत वादों के कारण असंगत परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
3. कोविड-19 वैक्सीन से जुड़े दो असामान्य लेकिन गंभीर दुष्प्रभाव क्या हैं?
मायोकार्डिटिस/पेरिकार्डिटिस (हृदय की सूजन), जो युवा पुरुषों में mRNA टीकों से जुड़ी है और थ्रोंबोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) के साथ थ्रोंबोसिस, जो वायरल वेक्टर टीकों से जुड़ा एक असामान्य रक्त स्कंदन विकार है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. कोविड-19 वैश्विक महामारी को रोकने के लिये बनाई जा रही वैक्सीनों के प्रसंग में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- सीरम संस्थान ने mRNA प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर कोविशील्ड नामक कोविड-19 वैक्सीन निर्मित की।
- स्पुतनिक V वैक्सीन रोगवाहक (वेक्टर) आधारित प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर बनाई गई है।
- कोवैक्सीन एक निष्कृत रोगजनक आधारित वैक्सीन है।
उपर्युक्त कथनों में कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. 'रिकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन' के संबंध में हाल के घटनाक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- इन टीकों के विकास में जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग किया जाता है।
- बैक्टीरिया और वायरस का उपयोग वेक्टर के रूप में किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
प्रश्न. भारत में न्यूमोकोकल संयुग्मी वैक्सीन के उपयोग का क्या महत्त्व है? (2020)
- ये वैक्सीन न्यूमोनिया और साथ ही तानिकाशोथ और सेप्सिस के विरुद्ध प्रभावी हैं।
- उन प्रतिजैविकियों पर निर्भरता कम की जा सकती है जो औषध-प्रतिरोधी जीवाणुओं के विरुद्ध प्रभावी नहीं हैं।
- इन वैक्सीन के कोई गौण प्रभाव नहीं हैं और न ही ये वैक्सीन कोई प्रत्यूर्जता संबंधी अभिक्रियाएँ करती हैं।
नीचे दिये गए क्रूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1,2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही नहीं है? (2019)
(a) यकृतशोथ B विषाणु HIV की तरह ही संचरित होता है।
(b) यकृतशोथ C का टीका होता है, जबकि यकृतशोथ B का कोई टीका नहीं होता।
(c) सार्वभौम रूप से यकृतशोथ B और C विषाणुओं से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या HIV से संक्रमित लोगों की संख्या से कई गुना अधिक है।
(d) यकृतशोथ B और C विषाणुओं से संक्रमित कुछ व्यक्तियों में अनेक वर्षों तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते।
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत सरकार द्वारा चलाया गया 'मिशन इंद्रधनुष' किससे संबंधित है? (2016)
(a) बच्चों और गर्भवती महिलाओं का प्रतिरक्षण
(b) पूरे देश में स्मार्ट सिटी का निर्माण
(c) बाहरी अंतरिक्ष में पृथ्वी-सदृश ग्रहों के लिये भारत की स्वयं की खोज
(d) नई शिक्षा नीति
उत्तर: (a)
