भारत-म्याँमार सीमा | 24 Mar 2026

स्रोत: द हिंदू 

मिज़ोरम होते हुए म्याँमार में प्रवेश करने वाले सात विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने भारत-म्याँमार सीमा की सुभेद्यता को उजागर किया है और सीमा सुरक्षा तथा बाड़ लगाने में देरी पर चिंताओं को पुनः बढ़ा दिया है।

  • भारत-म्याँमार सीमा: म्याँमार के साथ भारत की 1,643 किमी. लंबी सीमा अरुणाचल प्रदेश (520 किमी.), नगालैंड (215 किमी.), मणिपुर (398 किमी.) और मिज़ोरम (510 किमी.) से होकर गुज़रती है।
    • इस सीमा की रक्षा असम राइफल्स (भारत का सबसे पुराना अर्द्धसैनिक बल) द्वारा की जाती है, जो विशिष्ट रूप से गृह मंत्रालय (MHA) के प्रशासनिक नियंत्रण और भारतीय सेना के परिचालन नियंत्रण के तहत कार्य करता है।
  • मुक्त आवाजाही व्यवस्था (FMR): गहरे जातीय और सांस्कृतिक संबंधों के कारण भारत और म्याँमार एक FMR साझा करते हैं। 
    • दिसंबर 2024 में चार सीमावर्ती राज्यों में वीज़ा-मुक्त आवाजाही को 16 किमी. से घटाकर 10 किमी. तक सीमित करने के लिये इसे विनियमित किया गया था।
  • बाड़ लगाने में देरी: वर्ष 2024 में सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) ने भारत-म्याँमार सीमा पर बाड़ लगाने और सहायक बुनियादी ढाँचे के निर्माण के लिये ₹31,000 करोड़ की परियोजना को स्वीकृति प्रदान की।
    • हालाँकि, अनुमोदित 1,643 किमी. में से केवल 390.39 किमी. को स्वीकृति मिली है और मात्र 43.75 किमी. का कार्य पूरा हुआ है।
    • सीमावर्ती सड़कों की प्रगति भी उतनी ही चिंताजनक है; 3,194.8 किमी. स्वीकृत सड़क बुनियादी ढाँचे में से केवल 11.5 किमी. का निर्माण पूरा हो पाया है।
    • इसके अतिरिक्त बायोमेट्रिक-सक्षम प्रवेश/निकास द्वारों के माध्यम से आवाजाही को विनियमित करने के प्रयासों को कड़े स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ा है, जिससे नियोजित 43 द्वारों की संख्या घटकर केवल 20 कार्यात्मक रह गई है।
  • सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ: असुरक्षित भारत-म्याँमार सीमा विद्रोहियों के लिये सुरक्षित ठिकाने, हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों ('गोल्डन ट्रायंगल' से निकटता), मानव तस्करी और म्याँमार के वर्ष 2021 के तख्तापलट के बाद शरणार्थियों की आमद की सुविधा प्रदान करती है, जिससे बड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • भारत को उन्नत निगरानी प्रणालियों के साथ एक व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) स्थापित करनी चाहिये, एकीकृत कमान के लिये असम राइफल्स के दोहरे नियंत्रण के मुद्दे को हल करना चाहिये और सुरक्षा एवं स्थानीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने के लिये सीमावर्ती आबादी के साथ सामुदायिक जुड़ाव सुनिश्चित करना चाहिये।

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