हडसोनियन गॉडविट | 26 Mar 2026
हडसोनियन गॉडविट उन 42 प्रजातियों में से एक है, जिन्हें ब्राज़ील के कैंपो ग्रांडे (Campo Grande) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वन्य पशुओं की प्रवासी प्रजाति संरक्षण कन्वेंशन (CMS COP15) में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये प्रस्तावित किया गया है।
- हडसोनियन गॉडविट की आबादी में 95% की गिरावट ने वैश्विक संरक्षण प्रयासों की तत्काल आवश्यकता को उजागर कर दिया है।
हडसोनियन गॉडविट
- परिचय: हडसोनियन गॉडविट (लिमोसा हेमेस्टिका) एक प्रवासी तटीय पक्षी है, जो अपनी वार्षिक 30,000 किमी. की यात्रा के दौरान आर्कटिक में प्रजनन स्थलों से लेकर दक्षिण अमेरिका के पैटागोनिया में अपने ग्रीष्मकालीन आवास तक बिना रुके 11,000 किमी. तक उड़ान भरने में सक्षम है।
- संरक्षण संकट: हडसोनियन गॉडविट को IUCN रेड लिस्ट में ‘असुरक्षित’ श्रेणी में रखा गया है। इसका अस्तित्व एक अत्यंत सटीक ‘जियोलॉजिकल क्लॉक’ और प्रवास के दौरान ठहराव स्थलों पर प्रचुर भोजन संसाधनों पर निर्भर करता है, जो वर्तमान में तेज़ी से प्रभावित हो रहे हैं।
- मुख्य खतरे:
- जलवायु परिवर्तन (आर्कटिक): वसंत ऋतु के समय में बदलाव से एक पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण गॉडविट के चूज़ों के जन्म का समय और उनके मुख्य भोजन (कीटों) की अधिकतम उपलब्धता का समय अब एक-दूसरे से असंगत रहता है।
- आवास परिवर्तन (दक्षिण अमेरिका): दक्षिणी चिली में सैल्मन और ऑयस्टर पालन के तेज़ी से बढ़ने के कारण महत्त्वपूर्ण ज्वारीय (इंटरटाइडल) भोजन स्थलों पर बड़े पैमाने पर ढाँचागत विकास हो रहा है।
- आर्द्रभूमि का क्षरण (उत्तरी अमेरिका): संयुक्त राज्य अमेरिका में बदलती कृषि पद्धतियों के चलते वे उथले जल वाले आर्द्रभूमि क्षेत्र, जिन पर ये पक्षी विश्राम और पुनः ऊर्जा प्राप्त करने के लिये निर्भर करते हैं, लगातार कम होते जा रहे हैं।
CMS पर कन्वेंशन
- वन्य जीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर कन्वेंशन (CMS), जिसे बॉन कन्वेंशन के रूप में भी जाना जाता है, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तहत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है। यह राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी प्रजातियों और उनके आवासों की सुरक्षा के लिये एक वैश्विक ढाँचा प्रदान करता है।
- CMS के तहत, रेंज स्टेट्स (वे देश जहाँ से ये पक्षी गुज़रते हैं) कानूनी रूप से उन प्रजातियों की रक्षा करने के लिये बाध्य हैं जिन्हें विलुप्त होने के खतरे में सूचीबद्ध किया गया है। इन देशों को उनके आवासों का संरक्षण और पुनर्स्थापन करना होगा, साथ ही उनके प्रवास के मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी रोकना होगा।
- वर्ष 1979 में बॉन, जर्मनी में अपनाया गया और वर्ष 1983 में लागू हुआ यह समझौता, उन प्रजातियों की अनूठी चुनौती का समाधान करता है जो प्रजनन, भोजन और प्रवास हेतु चक्र के रूप में सीमाओं को पार करती हैं, जिसके लिये समन्वित अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
- CMS दो परिशिष्टों के माध्यम से कार्य करता है:
- परिशिष्ट I में उन लुप्तप्राय प्रवासी प्रजातियों को शामिल किया गया है जिन्हें सख्त सुरक्षा की आवश्यकता है, जैसे कि उनके शिकार पर प्रतिबंध और उनके आवासों का पुनर्स्थापन, इसमें 188 प्रजातियाँ सूचीबद्ध हैं, जिनमें भारत के ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिरैया), साइबेरियन क्रेन (सफेद सारस), ओलिव रिडले कछुआ तथा लेदरबैक कछुआ शामिल हैं।
- परिशिष्ट II उन प्रजातियों पर केंद्रित है जिनकी संरक्षण स्थिति प्रतिकूल है और यह समझौतों तथा समझौता ज्ञापनों (MoUs) के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
- पक्षकारों का सम्मेलन (COP) निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है, जो इसके कार्यान्वयन की समीक्षा करता है और संरक्षण के उपायों को अद्यतन करता है।
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