सेंटिनल प्रजाति के रूप में एंपरर पेंगुइन | 13 Apr 2026

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने एंपरर पेंगुइन को एक संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किया है, जो अंटार्कटिका में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिये एक संकेतक (सेंटिनल) प्रजाति के रूप में भी कार्य करता है।

  • एंपरर पेंगुइन सबसे बड़ी और सबसे भारी पेंगुइन प्रजाति है, जिसकी पहचान उसकी गर्दन और छाती पर सुनहरे-नारंगी रंग की धारियों से होती है।
  • यह अपने अस्तित्व के लिये समुद्री बर्फ पर अत्यधिक निर्भर होता है, जिसका उपयोग वह जीवनयापन करने, शिकार करने और प्रजनन के लिये करता है, अत: जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
  • वैश्विक तापवृद्धि के कारण एंपरर पेंगुइन की संख्या में उल्लेखनीय कमी का अनुमान है, जिसमें 2080 के दशक तक लगभग 50% तक कमी आने की संभावना बताई गई है।

सेंटिनल प्रजाति

  • परिचय: सेंटिनल प्रजातियों का स्वास्थ्य किसी पारिस्थितिक तंत्र की स्थिति को दर्शाता है, जो पर्यावरणीय क्षरण की  प्रारंभिक चेतावनी का संकेत करता है।
    • कोयला खदानों में कैनरी पक्षियों का ऐतिहासिक उपयोग 'सेंटिनल सिद्धांत' का एक सटीक उदाहरण है, क्योंकि वे मनुष्यों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड के प्रति कहीं अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया करते थे।
  • कार्य: ये प्रजातियाँ अक्सर निश्चित आवासों में रहती हैं, पर्याप्त समय तक जीवित रहकर विषाक्त पदार्थों का संचय करती हैं और इनमें ऐसे जैविक गुण होते हैं जो पर्यावरणीय प्रभावों को और अधिक स्पष्ट कर देते हैं।
    • ये प्रदूषण, रोग और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय तनाव कारकों के प्रति शीघ्र और स्पष्ट रूप से प्रतिक्रिया करती हैं।
  • उदाहरण: मेढक (अपनी पारगम्य त्वचा के कारण संवेदनशील), मधुमक्खियाँ (कृषि रसायनों की निगरानी करने वाली), ध्रुवीय भालू (आर्कटिक प्रदूषण के संकेतक) और कुछ मछली प्रजातियाँ (औद्योगिक अपवाह का पता लगाने वाली) सेंटिनल प्रजातियों के रूप में कार्य करती हैं तथा इनकी संख्या में गिरावट व्यापक पारिस्थितिक तनाव का संकेत देती है।

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