चुनाव याचिका | 06 Apr 2026
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने निर्णय दिया कि यदि चुनाव अधिकरण के समक्ष किसी मुद्दे को पहले नहीं उठाया गया हो, तो अपीलीय न्यायालय चुनाव याचिकाओं को नए साक्ष्य या विशेषज्ञ परीक्षण जैसे फिंगरप्रिंट विश्लेषण के लिये पुनर्विचार (रिमांड) हेतु वापस नहीं भेज सकते।
- परिणामस्वरूप, चुनावी विवादों का निर्णय केवल उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही किया जाना चाहिये, ताकि मूल कार्यवाही की अखंडता बनी रहे।
चुनाव याचिका
- परिचय: चुनाव याचिका भारत में किसी चुनाव परिणाम की वैधता को चुनौती देने का एकमात्र न्यायिक उपाय है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता एवं पवित्रता सुनिश्चित करता है।
- संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत, संसद या राज्य विधानसभाओं के लिये कोई भी चुनाव चुनाव याचिका के अलावा नहीं चुनौती दी जा सकती।
- वैधानिक एवं संवैधानिक आधार: संसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों से संबंधित चुनाव याचिकाएँ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा विनियमित होती हैं, जबकि अधिकांश स्थानीय निकायों (पंचायतों एवं नगरपालिकाओं) से संबंधित चुनावी विवाद 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के अंतर्गत राज्यों द्वारा बनाए गए संबंधित कानूनों के अनुसार संचालित होते हैं।
- संसद या राज्य विधानसभा के चुनावों से संबंधित याचिकाएँ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में दायर की जाती हैं।
- हालाँकि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव को चुनौती सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 71 के अंतर्गत दायर की जाती है।
- पात्रता एवं समय-सीमा: चुनाव याचिका किसी भी प्रत्याशी या संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के किसी भी मतदाता द्वारा परिणाम घोषित होने की तिथि से 45 दिनों की सख्त समय-सीमा के भीतर दायर की जा सकती है।
- चुनाव को शून्य घोषित करने के आधार: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 के अंतर्गत, किसी चुनाव को शून्य घोषित किया जा सकता है यदि प्रत्याशी अयोग्य पाया जाए, भ्रष्ट आचरण (जैसे- रिश्वत, अनुचित प्रभाव या धर्म/जाति के आधार पर अपील) में लिप्त हो अथवा नामांकन पत्रों को अनुचित रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया गया हो।
- अपील संबंधी प्रावधान: उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है, जिसे 30 दिनों के भीतर दायर करना अनिवार्य है।
- न्यायिक परिणाम: न्यायालय चुनाव याचिका को निरस्त कर सकता है, चुनाव को शून्य घोषित कर सकता है (जिससे उपचुनाव आवश्यक हो जाता है) अथवा यदि याचिकाकर्त्ता को वैध मतों का बहुमत प्राप्त हुआ सिद्ध हो जाए, तो उसे विजेता घोषित कर सकता है।
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