नागरिक-केंद्रित सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज | 23 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
लैंसेट रिपोर्ट ‘भारत के लिये नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य प्रणाली (A Citizen-Centred Health System for India)’ नागरिक-केंद्रित सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने हेतु एक रोडमैप प्रस्तुत करती है, जो विकसित भारत @2047 की दृष्टि के अनुरूप है।
- रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि जब विश्व स्वास्थ्य संगठन वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है और अमेरिका वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व से पीछे हट रहा है, तब भारत के पास अपने स्वास्थ्य सेवा वितरण को सुधारने तथा ग्लोबल साउथ के लिये एक प्रबल आवाज़ के रूप में उभरने का अवसर है।
भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पर लैंसेट रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?
- सार्वजनिक व्यय में गतिरोध: नीति प्रतिबद्धताओं के बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP के 2% से कम बना हुआ है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के 2.5% लक्ष्य से पीछे है।
- अव्यवस्थित स्वास्थ्य प्रबंधन: वर्तमान प्रणाली अलग-अलग साइलो में काम करती है (जैसे- टीबी, मलेरिया, मातृ स्वास्थ्य के लिये अलग कार्यक्रम), जिससे उपचार की निरंतरता का अभाव रहता है। रोगियों को अक्सर एक ही रोग के लिये कई सेवा-प्रदाताओं के बीच जाना पड़ता है।
- इनपुट-आधारित शासन: स्वास्थ्य प्रशासन सख्त ‘लाइन-आइटम बजट’ पर निर्भर करता है (जिसमें वेतन या निर्माण जैसे विशिष्ट मदों के लिये सख्ती से धन आवंटित किया जाता है), जिससे स्थानीय नवाचार और स्थानीय रोग-भार के प्रति उत्तरदायित्व बाधित होता है।
- आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE): भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50% OOPE है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में शामिल है।
- प्राथमिक देखभाल की कमी: रिपोर्ट बताती है कि बीमा योजनाएँ ‘अस्पताल-केंद्रित’ हैं, जिससे बाह्य रोगी उपचार (जहाँ अधिकांश गरीब परिवार पैसा व्यय करते हैं) काफी हद तक असुरक्षित रह जाता है।
- बाधाओं में प्रतिमान परिवर्तन: रिपोर्ट के अनुसार, भारत में UHC के मार्ग में अब राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्तपोषण या अवसंरचना की कमी (जिनमें विस्तार हुआ है) प्रमुख बाधाएँ नहीं रहीं। इसके बजाय मुख्य चुनौतियाँ असमान गुणवत्ता, खंडन (फ्रैगमेंटेशन) और अप्रभावी शासन हैं।
- ‘मिसिंग मिडिल’: जहाँ गरीबों के लिये सरकारी योजनाएँ हैं और अमीरों के पास निजी बीमा है, वहीं मध्यम वर्ग को अक्सर बहुत अधिक स्वास्थ्य व्यय उठाना पड़ता है, जबकि उसे सीमित सहायता मिलती है।
- मानव संसाधन का मूल्यांकन: वर्तमान HR नीति ‘योग्यताओं’ (डिग्रियों) की गिनती पर अत्यधिक ज़ोर देती है, बजाय ‘क्षमताओं, प्रेरणाओं और मूल्यों’ के मूल्यांकन के, जिससे ASHA जैसे अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ताओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
सिफारिशें
- UHC (सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज) का प्राथमिक वाहक: इसके लिये यह सिफारिश की गई कि स्वास्थ्य प्रणाली सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित और सार्वजनिक रूप से प्रदान की जानी चाहिये।
- निजी क्षेत्र को इस प्रकार संरचित और निर्देशित किया जाना चाहिये कि वह पूरक भूमिका निभाए—विशेषकर उन क्षेत्रों में तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को पूरा करे जहाँ सार्वजनिक ढाँचा अपर्याप्त है। साथ ही, मरीज़ों के हित की कीमत पर मुनाफा अधिकतम करने की प्रवृत्ति को रोकने के लिये उस पर कठोर राज्य विनियमन लागू होना आवश्यक है।
- वैश्विक बजट और विकेंद्रीकरण की ओर परिवर्तन: कठोर मद-आधारित बजट व्यवस्था से आगे बढ़कर ज़िलों के लिये “वैश्विक बजट” अपनाया जाना चाहिये। इससे स्थानीय प्राधिकरणों को वित्तीय स्वायत्तता मिलेगी, ताकि वे केंद्रीय निर्देशों के बजाय स्थानीय आवश्यकताओं और लक्षित स्वास्थ्य परिणामों के आधार पर संसाधनों का आवंटन कर सकें।
- पंचायती राज संस्थाओं (PRI) और शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों के प्रबंधन के लिये सशक्त बनाना। रिपोर्ट केरल मॉडल का हवाला देती है, जहाँ स्थानीय सरकारों के पास स्वास्थ्य कार्यप्रणाली पर नियंत्रण है, जिससे बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- कार्यस्थल पर काम करने वाले कर्मियों को सशक्त बनाना: मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं (ASHA) को केवल "स्वयंसेवकों" के बजाय मुख्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के रूप में माना जाना चाहिये।
- सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO) के पदों का विस्तार करना ताकि वे बुनियादी बाह्य रोगी देखभाल सँभाल सकें, जिससे विशेषज्ञ डॉक्टरों पर भार कम हो।
- प्रौद्योगिकी सक्षम ("पूंजी-कुशल" तकनीक): एक केंद्रीकृत डेटाबेस के बजाय जो गोपनीयता को जोखिम में डालता है, रिपोर्ट एक संघीय डेटा संरचना (डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के अनुरूप) की सिफारिश करती है।
- इसके तहत, रोगी का डेटा स्थानीय स्तर पर (अस्पताल/क्लिनिक में) रहता है और केवल रोगी की स्पष्ट सहमति के साथ "सहमति प्रबंधकों" के माध्यम से साझा किया जाता है।
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) को प्रभावी ढंग से लागू करके और आवश्यकता के बिंदु पर देखभाल के लिये AI तथा जीनोमिक्स को तैनात करके, समुदायों को उन्नत नैदानिक सेवाएँ उनके नज़दीक प्रदान की जा सकती हैं, जिससे ग्रामीण मरीज़ों को शहरों की यात्रा करने की आवश्यकता कम हो जाती है।
- नागरिक संबद्धता: जन सुनवाई (पब्लिक हियरिंग) और रोगी कल्याण समितियों जैसे सार्वजनिक भागीदारी के लिये औपचारिक तंत्र का निर्माण करना, जिनके पास स्वास्थ्य केंद्रों का ऑडिट करने के वास्तविक अधिकार हो।
- स्वतंत्र, ज़िला-स्तरीय शिकायत निवारण निकाय स्थापित करना, जहाँ नागरिक बदले की भावना के बगैर सेवा से वंचित किये जाने या भ्रष्टाचार की रिपोर्ट कर सकें।
निष्कर्ष
“वैश्विक बजट” और डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं का उपयोग करके “मिसिंग मिडिल” की कमी को कम करते हुए, भारत स्वास्थ्य सेवा को एक महँगे विशेषाधिकार से बदलकर एक सुलभ अधिकार में परिवर्तित कर सकता है। यह संरचनात्मक सुधार विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक स्वस्थ मानव पूंजी सुनिश्चित करने की एक अनिवार्य शर्त है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में बाधाएँ अब संसाधनों से अधिक शासन से जुड़ी हैं। चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. रिपोर्ट के अनुसार, भारत का वर्तमान सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय कितना है?
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय अभी भी GDP का 2% से कम है, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) का लक्ष्य इसे 2.5% तक बढ़ाना था।
2. भारत में स्वास्थ्य व्यय का कितना हिस्सा आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) होता है?
भारत में स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50% भाग आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) से होता है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है।
3. रिपोर्ट के अनुसार भारत के स्वास्थ्य शासन में किस संरचनात्मक समस्या की पहचान करती है?
इस प्रणाली में लाइन-आइटम बजटिंग का पालन किया जाता है, जिससे वित्तीय लचीलापन, स्थानीय नवाचार और परिणाम आधारित जवाबदेही पर प्रतिबंध लग जाता है।
4. स्वास्थ्य प्रणाली के समन्वय के लिये किस डिजिटल मिशन पर बल दिया गया है?
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) को इंटरऑपरेबल डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना सक्षम बनाने के लिये हाइलाइट किया गया है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' के उद्देश्य हैं? (2017)
- गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण के बारे में जागरूकता उत्पन्न करना।
- छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया के मामलों को कम करना।
- बाजरा, मोटे अनाज और बिना पॉलिश किये चावल की खपत को बढ़ावा देना।
- पोल्ट्री अंडे की खपत को बढ़ावा देना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: A
मेन्स
प्रश्न. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)
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