बायोमैटेरियल्स | 05 Feb 2026

स्रोत: द हिंदू

वैश्विक स्तर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था का मॉडल, निम्न-कार्बन विनिर्माण और जीवाश्म ईंधन आयात में कमी की ओर तेज़ी से बदलाव के मद्देनज़र, भारत में बायोमैटेरियल्स को अब नीतिगत व औद्योगिक स्तर पर एक स्वच्छ सामग्री विकल्प के रूप में अधिक महत्त्व दिया जा रहा है।

  • परिचय: बायोमैटेरियल वे पदार्थ हैं जो पूर्णतः या आंशिक रूप से जैविक स्रोतों से प्राप्त होते हैं या जिनका निर्माण जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।
    • इन्हें इस प्रकार विकसित किया जाता है कि ये परंपरागत पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों का विकल्प बन सकें या उनके साथ संयोजित होकर कार्य कर सकें। इसका उपयोग पैकेजिंग, वस्त्र, निर्माण एवं स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।
    • इसके सामान्य उदाहरणों में पौधों की शर्करा या स्टार्च से बने बायोप्लास्टिक, वस्त्रों में प्रयुक्त जैव-आधारित रेशे तथा जैव-अपघट्य शल्य-टाँके और ऊतक संरचना-आधार (टिश्यू स्कैफोल्ड) जैसे चिकित्सकीय बायोमैटेरियल शामिल हैं।
    • ड्रॉप-इन बायोमैटेरियल्स: रासायनिक रूप से जीवाश्म-आधारित सामग्रियों के समान होते हैं और मौजूदा विनिर्माण प्रणालियों के साथ संगत (कंपैटिबल) रहते हैं (जैसे– Bio-PET)।
  • प्रकार: बायोमैटेरियल्स को व्यापक रूप से उनके रासायनिक स्वरूप की जीवाश्म-आधारित (फॉसिल-बेस्ड) सामग्रियों से समानता और मौजूदा विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) प्रणालियों के साथ उनकी अनुकूलता (कंपैटिबिलिटी) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
    • ड्रॉप-आउट बायोमैटेरियल्स: पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों से रासायनिक रूप से भिन्न होते हैं और इनके लिये नई प्रसंस्करण, रीसाइक्लिंग या कंपोस्टिंग प्रणालियों की आवश्यकता होती है (जैसे– पॉलीलैक्टिक एसिड – PLA)।
    • नॉवेल बायोमैटेरियल्स: उन्नत जैव-अभियंत्रित (Bio-engineered) सामग्री, जो आत्म-उपचार (Self-healing) क्षमता, जैव-सक्रिय इंप्लांट्स तथा उन्नत सम्मिश्र (Advanced Composites) जैसी नई विशेषताएँ प्रदान करती हैं।
  • महत्त्व: स्वदेशी बायोमैटेरियल जीवाश्म-आधारित आयातों को कम कर सकते हैं, कृषि अवशेषों से अतिरिक्त मूल्य सृजित कर सकते हैं, जलवायु एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों को समर्थन प्रदान कर सकते हैं तथा भारतीय निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ा सकते हैं।
    • भारत में बायोमैटेरियल क्षेत्र एक रणनीतिक सततता और औद्योगिक अवसर के रूप में तेज़ी से विकसित हो रहा है। इसका आकलन केवल बायोप्लास्टिक के बाज़ार से ही लगाया जा सकता है, जिसका मूल्य वर्ष 2024 में लगभग 500 मिलियन डॉलर आँका गया था और इसमें आगामी वर्षों में प्रबल वृद्धि की अपेक्षा की जा रही है।
    • उत्तर प्रदेश में बलरामपुर चीनी मिल्स के PLA संयंत्र जैसे बड़े निवेश और Phool.co तथा प्राज इंडस्ट्रीज़ जैसे स्टार्टअप्स के नवाचार, घरेलू प्रगति को उजागर करते हैं।
  • बायोमैटेरियल्स को अपनाने के अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण: यूरोपीय यूनियन अपने पैकेजिंग और पैकेजिंग अपशिष्ट विनियमन के तहत कंपोस्टेबल पैकेजिंग को मान्यता प्रदान करता है।
    • संयुक्त अरब अमीरात बायोटेक के माध्यम से विश्व की सबसे बड़ी PLA सुविधा विकसित कर रहा है और संयुक्त राज्य अमेरिका USDA बायोप्रिफर्ड कार्यक्रम के माध्यम से बायोमैटेरियल्स को बढ़ावा देता है।

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