भारत-यूएई रणनीतिक पथ | 21 Jan 2026

यह लेख 20/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “India, ' deepen ties with mega defence plan, LNG deal” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत–यूएई संबंधों के क्रमिक विकास का विश्लेषण करता है, जिसमें सांस्कृतिक व्यापारिक संबंधों से लेकर एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक की यात्रा को रेखांकित किया गया है। इसमें उपलब्धियों, चुनौतियों और परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला गया है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत-यूएई CEPA, IMEC, I2U2., इस्लामिक सहयोग संगठन, भारत मार्ट, परमाणु ऊर्जा का सतत दोहन और विकास, लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR)

मेन्स के लिये: भारत-यूएई संबंधों में नवीनतम घटनाक्रम, प्रमुख मुद्दे और संबंधों को सुदृढ़ करने के उपाय।

भारत-यूएई संबंध एक प्रमुख रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हो चुके हैं। भारत-यूएई CEPA के तहत वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया है और वर्ष 2032 तक इसे 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का नया लक्ष्य रखा गया है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का एक प्रमुख स्रोत बनकर उभरा है। साझेदारी का सहयोग तेल क्षेत्र से आगे बढ़कर 10 वर्षीय LNG समझौते, फिनटेक (UPI–AANI & RuPay–JAYWAN), तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे नए क्षेत्रों में विस्तारित हुआ है। हाल ही में रक्षा औद्योगिक सहयोग और अंतर-संचालनीयता सहित रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर हुई वार्ताओं ने इसे और मज़बूत किया है। 35 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी समुदाय पर आधारित यह साझेदारी आर्थिक परस्पर निर्भरता को स्थायी भू-राजनीतिक अभिसरण में परिवर्तित कर रही है।

समयानुसार भारत-यूएई संबंध किस प्रकार परिवर्तित हुए हैं? 

  • चरण I: वाणिज्यिक और सांस्कृतिक युग (1971 से पूर्व):
    • यह चरण औपचारिक कूटनीति के बजाय भूगोल-आधारित संबंधों द्वारा आकारित था, जिसमें अरब सागर ने एक सीमाहीन समुद्री अर्थव्यवस्था को सक्षम बनाया।
    • भारत इन संबंधों का आर्थिक प्रस्तुतकर्त्ता था और भारतीय रुपया वर्ष 1966 तक ट्रूसियल स्टेट्स में वास्तविक मुद्रा के रूप में प्रयुक्त होता रहा।
    • सांस्कृतिक संबंध पारंपरिक पोत (एक प्राचीन समुद्री नेटवर्क जो 2,000 वर्षों से अरब प्रायद्वीप, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण एशिया को जोड़ता रहा है) आधारित व्यापार के माध्यम से स्थापित रहे, जहाँ भारतीय व्यापारी खाड़ी समाज का अभिन्न अंग थे, न कि प्रवासी।
    • यह चरण दर्शाता है कि भारत–यूएई संबंध सांस्कृतिक हैं और तेल उभार से पूर्व के हैं, जिससे आज की साझेदारी ऐतिहासिक निरंतरता की पुनरावृत्ति है।
      • वर्ष 1966 में भारतीय रुपये के अवमूल्यन ने पहली बार एक बड़ा आर्थिक पृथक्करण स्थापित किया, जिसने खाड़ी देशों को स्वतंत्र मुद्राओं और संप्रभुता की ओर धकेल दिया।
  • चरण II: ‘लेन-देन’ युग (1971-2000) : 
    • यूएई के गठन के बाद, संबंध पूरी तरह लेन-देन आधारित हो गए, जो तेल निर्यात और भारतीय प्रवासी श्रम पर केंद्रित थे।
    • भू-राजनीतिक रूप से शीत युद्ध के दौरान बने गठबंधनों ने दूरी उत्पन्न की, क्योंकि यूएई अमेरिका-सऊदी गुट की ओर झुका और भारत की सोवियत निकटता के कारण पाकिस्तान के दृष्टिकोण से देखा गया।
    • सुरक्षा संबंध निम्नतम स्तर पर पहुँच गए, क्योंकि दुबई तस्करी और भारत विरोधी तत्त्वों के केंद्र के रूप में उभरा, जिससे नई दिल्ली में अविश्वास और बढ़ गया।
    • भारतीय कामगारों ने ‘गल्फ ड्रीम’ के दौरान यूएई के विकास को गति दी, लेकिन उन्हें केवल आर्थिक संसाधन के रूप में देखा गया, न कि सॉफ्ट पावर के स्रोत के रूप में।
    • यह चरण रणनीतिक अदूरदर्शिता को दर्शाता है, जिसका उदाहरण इस्लामिक सहयोग संगठन जैसे मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के लिये यूएई का समर्थन।
  • चरण III: आर्थिक जागरण और ‘सौम्य उपेक्षा’ (2000-2014): 
    • इस अवधि में व्यापार में वृद्धि आई लेकिन भारत और यूएई के बीच राजनीतिक संलग्नता स्थिर रही।
    • राजनीतिक रूप से, ‘उच्च व्यापार, कम राजनीति’ का विरोधाभास विद्यमान था, जहाँ मज़बूत वाणिज्यिक संबंध थे लेकिन उच्च-स्तरीय कूटनीतिक पहुँच न्यूनतम थी।
    • ऊर्जा संबंध लेन-देन आधारित रहे, केवल क्रेता-विक्रेता तक सीमित, जिसमें संयुक्त भंडार या डाउनस्ट्रीम निवेश जैसी रणनीतिक गहराई नहीं थी।
    • वर्ष 2002 में आफताब अंसारी का निर्वासन एक शांत बदलाव का संकेत था, जिससे यूएई ने आतंकवाद के सुरक्षित स्थल से दूरी बनाई और भारत के साथ गुप्त सुरक्षा सहयोग की शुरुआत हुई।
  • चरण IV: रणनीतिक पुनर्गठन और ‘स्वर्ण युग’ (2015-वर्तमान): 
    • यह चरण लेन-देन संबंधों से व्यापक रणनीतिक साझेदारी की ओर निर्णायक बदलाव को दर्शाता है, जो पोस्ट-अमेरिका के मध्य पूर्व में साझा यथार्थवादी हितों द्वारा प्रेरित है।
    • प्रधानमंत्री की वर्ष 2015 में यूएई यात्रा ने 34 साल के अंतराल को समाप्त किया, राज्य प्रायोजित आतंकवाद की निंदा की और IMEC और I2U2 के माध्यम से यूएई को भारत के वैश्विक संपर्क केंद्र के रूप में पुनः स्थापित किया
    • भू-राजनीतिक रूप से संयुक्त अरब अमीरात ने भारत को पाकिस्तान से अलग कर दिया है, जिसका प्रमाण पाकिस्तान के बहिष्कार के बावजूद वर्ष 2019 में भारत को इस्लामिक सहयोग संगठन में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित करना है।
    • व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर वर्ष 2022 में रिकॉर्ड समय (88 दिनों की वार्ता) में हस्ताक्षर किये गए थे।
    • जनवरी 2026 में दोनों देशों ने एक औपचारिक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिये आशय-पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर किये।

भारत–यूएई संबंधों में वर्तमान विकास के क्षेत्र कौन-से हैं?

  • उन्नत आर्थिक साझेदारी: द्विपक्षीय आर्थिक संबंध अब केवल वस्तु विनिमय तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि गहन संस्थागत एकीकरण की ओर अग्रसर हैं, जिसका उद्देश्य दोनों अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक अस्थिरता से सुरक्षित रखना है। इसका श्रेय व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) को जाता है।
  • जनवरी 2026 में दोनों देशों ने वित्त वर्ष 2024-25 में प्राप्त की गई 100 अरब डॉलर की उपलब्धि के आधार पर, वर्ष 2032 तक वार्षिक व्यापार को 200 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया।
    • इस व्यापार लक्ष्य को दोगुना करके दोनों देश वैश्विक दक्षिण में एक ऐसा आर्थिक गलियारा स्थापित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त कर रहे हैं जो पारंपरिक पश्चिमी व्यापार निर्भरताओं को दरकिनार करता है।
  • जेबेल अली फ्री ज़ोन (JAFZA) में 'भारत मार्ट' और 'भारत-अफ्रीका सेतु' जैसी पहलों को यूएई के वैश्विक पुनर्निर्यात नेटवर्क में भारतीय लघु एवं मध्यम उद्यमों को एकीकृत करने के लिये तेज़ी से एकीकृत किया जा रहा है।
  • सामरिक रक्षा धुरी: भारत और यूएई औपचारिक सुरक्षा संरचना की ओर अग्रसर हैं, जो साझा सामरिक स्वायत्तता और सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध सामूहिक दृष्टिकोण को दर्शाती है।यह बदलाव दर्शाता है कि यूएई अब हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा और रक्षा औद्योगिक नवाचार के लिये पारंपरिक क्षेत्रीय सहयोगियों के बजाय भारत को प्राथमिक भागीदार मानता है।
    • उदाहरण के लिये, जनवरी 2026 में एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिये आशय-पत्र (LOI) पर हस्ताक्षर किये गए थे, जिसमें रक्षा औद्योगिक सहयोग और अंतरसंचालनीयता शामिल हैं।
    • डेजर्ट साइक्लोन और डेज़र्ट फ्लैग जैसे संयुक्त अभ्यासों में अब बहु-क्षेत्रीय संचालन, वास्तविक समय की अंतरसंचालनीयता और उच्च-तीव्रता वाले हवाई-भूमि समन्वय से जुड़े जटिल युद्ध परिदृश्य शामिल हैं, जो प्रतीकात्मक अभ्यासों से हटकर वास्तविक युद्ध-लड़ने की तैयारी की ओर एक परिवर्तन को दर्शाते हैं।
  • कच्चे तेल से स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी तक: ऊर्जा संबंध अब ‘लेन-देन संबंधी कच्चे तेल’ के चरण से आगे बढ़कर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और ‘SHANTI’ (परमाणु ऊर्जा का सतत दोहन और विकास) ढाँचे को अपना चुका है। 
    • नागरिक परमाणु सहयोग और लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के क्षेत्र में कदम रखकर संयुक्त अरब अमीरात भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण में एक प्रमुख वित्तपोषक और भागीदार के रूप में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है।
      • उदाहरण के लिये, HPCL ने वर्ष 2026 में ADNOC के साथ 10 वर्ष का LNG आपूर्ति समझौता किया, जिसके तहत वर्ष 2028 से प्रति वर्ष 0.5 मिलियन मीट्रिक टन LNG की आपूर्ति की जाएगी।
      • साथ ही दोनों देश भारत की नई परमाणु नीतियों और संयुक्त अरब अमीरात की बरकाह परमाणु विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिये लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) पर सहयोग कर रहे हैं।
    • इस बदलाव के पूरक के रूप में भारत और यूएई अपनी जलवायु रणनीतियों को संरेखित कर रहे हैं ताकि एक हरित हाइड्रोजन मूल्य शृंखला का सह-विकास किया जा सके, जिसमें भारत के विनिर्माण स्तर को यूएई की पूंजी के साथ मिलाकर ग्लोबल साउथ के लिये एक स्थायी ‘हरित गलियारा’ बनाया जा सके।
  • फिनटेक और डिजिटल गठबंधन: वित्तीय और डिजिटल कनेक्टिविटी अब ‘नया तेल’ बन गई है और दोनों राष्ट्र एक संप्रभु डिजिटल भुगतान कॉरिडोर बनाने का लक्ष्य रखते हैं जो पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों के वर्चस्व को चुनौती देता है। 
    • ‘डिजिटल दूतावासों’ और सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टरों की स्थापना उच्च स्तरीय तकनीकी परस्पर निर्भरता की ओर एक संक्रमण को उजागर करती है।
    • भारत के रुपे कार्ड का यूएई के जयवान कार्ड सिस्टम के साथ एकीकरण ने 35 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों के लिये धन प्रेषण में क्रांति ला दी है। 
    • इसके अतिरिक्त, दोनों पक्ष अब C-DAC (भारत) और G42 (यूएई) के बीच सहयोग के माध्यम से भारत में एक सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर स्थापित करने के लिये सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए हैं। 
      • एआई इंडिया मिशन के साथ एकीकृत यह सुविधा सार्वजनिक और निजी अनुसंधान, अनुप्रयोग विकास और वाणिज्यिक नवाचार को समर्थन प्रदान करेगी।
  • अवसंरचना सहयोग- 'ग्रीनफील्ड' परिसंपत्ति स्थानांतरण: निवेश रणनीति अब निष्क्रिय पोर्टफोलियो होल्डिंग्स से सक्रिय 'ग्रीनफील्ड संपत्ति निर्माण' की ओर विकसित हुई है।
    • इस बदलाव का उद्देश्य भारतीय विनिर्माण क्षेत्रों (जैसे गुजरात) को जेबेल अली ट्रांसशिपमेंट हब के साथ भौतिक रूप से एकीकृत करना है, जिससे वैश्विक अवरोधों को दरकिनार करते हुए लॉजिस्टिक्स शृंखला को प्रारंभ से अंत तक अपने नियंत्रण में लेकर IMEC कॉरिडोर को प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सके।
      • उदाहरण के लिये, संयुक्त अरब अमीरात ने धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (गुजरात) के विकास के लिये प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें एक नया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा और ग्रीनफील्ड बंदरगाह शामिल है। साथ ही, डीपी वर्ल्ड ने भारत के बंदरगाह लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को उन्नत करने के लिये अतिरिक्त 5 अरब डॉलर देने का वादा किया है।
  • अंतरिक्ष सहयोग- 'लॉन्च क्लाइंट' से 'सह-विकासकर्त्ता' तक: अंतरिक्ष सहयोग अब केवल लेन-देन आधारित 'क्रेता–विक्रेता' मॉडल (यूएई द्वारा लॉन्च का भुगतान) से आगे बढ़कर 'सह-विकास' साझेदारी में परिवर्तित हो गया है, जिसका लक्ष्य वैश्विक वाणिज्यिक पेलोड बाज़ार को कैप्चर करना है।
    • दोनों राष्ट्र ISRO की लागत-कुशल इंजीनियरिंग और यूएई की पूंजी को मिलाकर साझा औद्योगिक आधार का निर्माण कर रहे हैं, राज्य स्तर के विज्ञान मिशनों से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र एकीकरण और मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
      • उदाहरण के लिये, जनवरी 2026 में, IN-SPACe और यूएई अंतरिक्ष एजेंसी ने संयुक्त रूप से वाणिज्यिक प्रक्षेपण सुविधाओं को विकसित करने के लिये एक ऐतिहासिक आशय-पत्र (LoI) पर हस्ताक्षर किये।
  • 'ज्ञान कॉरिडोर' और कौशल गतिशीलता: यह संबंध 'श्रम-निर्यात' मॉडल से हटकर एक उच्च स्तरीय ‘ज्ञान साझेदारी' में परिवर्तित हो गया है, जिसका उद्देश्य अकादमिक उत्कृष्टता और व्यावसायिक प्रमाणन के लिये एक निर्बाध पारितंत्र बनाना है। 
    • यह परिवर्तन सुनिश्चित करता है कि यूएई में भारतीय प्रवासी अब केवल एक कार्यबल नहीं हैं, बल्कि यूएई के पोस्ट-ऑयल, नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के प्राथमिक चालक हैं।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 में IIT दिल्ली-अबू धाबी के उद्घाटन के बाद, इस परिसर में वर्ष 2026 के अंत तक छात्र संख्या 400 तक बढ़ाई जाएगी और AI में विशेष मास्टर्स प्रोग्राम भी शुरू किये जाएंगे। 
    • योग्यता की पारस्परिक मान्यता पर वर्ष 2025 के समझौता ज्ञापन द्वारा इसका समर्थन किया गया है, जो 35 लाख से अधिक भारतीय समुदाय में पेशेवरों की गतिशीलता को सक्षम बनाता है।
  • सांस्कृतिक एवं खेल कूटनीति: यह संबंध लेन-देन संबंधी कूटनीति से आगे बढ़कर अब एक सांस्कृतिक साझेदारी में परिवर्तित हो गया है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात भारत के सांस्कृतिक विस्तार के रूप में उभरा है। यह दृष्टिकोण दोहरी रणनीति का अनुसरण करता है: 
    • अभूतपूर्व धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता के माध्यम से भारतीय प्रवासी समुदाय की दीर्घकालिक संबद्धता सुनिश्चित करना और ‘अस्थायी कार्यबल’ की धारणा से आगे बढ़ना।
    • भारत-पाकिस्तान के बीच संवेदनशील क्षेत्रीय संबंधों के प्रबंधन के लिये एक तटस्थ और विश्वसनीय मंच प्रदान करना।
    • उदाहरण के लिये, यूएई के राष्ट्रपति द्वारा दान की गई 27 एकड़ भूमि पर निर्मित BAPS हिंदू मंदिर का उद्घाटन फरवरी 2024 में किया गया था। साथ ही यूएई ने भारत-पाकिस्तान के बीच संवेदनशील खेल आयोजनों के लिये स्थिर तटस्थ स्थल के रूप में अपनी स्थिति मज़बूत की है।

भारत-यूएई संबंधों में मतभेदों के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?

  • संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और CEPA अनुपयोगिता: व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) द्वारा शून्य-शुल्क पहुँच को लागू करने के बावजूद, भारत अभी भी कम मूल्य वर्द्धित क्षेत्रों जैसे रत्न और आभूषण से परे निर्यात विविधीकरण में चुनौती का सामना कर रहा है, ताकि भारी ऊर्जा आयात बिल को संतुलित किया जा सके।
    • यह संरचनात्मक असमानता भारत को लगातार गैर-शुल्क बाधाओं और मूल नियमों पर वार्ता करने के लिये मज़बूर करती है ताकि तृतीय-पक्ष वस्तुओं का “पास-थ्रू” रोका जा सके, जबकि यूएई का व्यापार अधिशेष स्थानीय मुद्रा निपटान तंत्र को पूरी तरह अपनाने में जटिलता उत्पन्न करता है।
      • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में, जहाँ द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया, वहीं भारत का व्यापार घाटा मुख्य रूप से तेल आयात के कारण लगभग 26 अरब डॉलर बना रहा।
    • इसके अलावा, भारत को यह आशंका है कि यूएई तीसरे पक्ष के सामानों (जैसे सोना/चाँदी) के लिये एक माध्यम बन रहा है, जिससे शुल्क से बचा जा सकता है और इस प्रकार भारत को अपनी जाँच को और सख्त करने के लिये मज़बूर होना पड़ रहा है, जिससे व्यापार में बाधा उत्पन्न हो रही है।
  • IMEC कॉरिडोर की भू-राजनीतिक संवेदनशीलता: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) में रुकावट से पश्चिम एशियाई अस्थिरता, विशेषकर इज़रायल-गाज़ा संघर्ष, के प्रति भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति की संवेदनशीलता उजागर होती है। 
    • इससे यूएई-इज़रायल चरण के भौतिक एकीकरण में बाधा आई और भारत का ‘यूरोप का प्रवेश द्वार’ क्षेत्रीय असुरक्षा का बंधक बन गया। परिणामस्वरूप नई दिल्ली को लंबे और महंगे समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ा, साथ ही ईरान और अरब जगत के साथ राजनयिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक हो गया।
  • 'हाइड्रोकार्बन-नवीकरणीय' ऊर्जा विरोधाभास: भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था को ऊर्जा प्रदान करने के लिये जीवाश्म ईंधन की तत्काल आपूर्ति सुरक्षित करने के दोहरे दबाव का सामना करना पड़ रहा है, साथ ही साथ हरित हाइड्रोजन पर संयुक्त अरब अमीरात के साथ साझेदारी भी करनी है, जिससे एक नीतिगत टकराव उत्पन्न हो रहा है जहाँ दीर्घकालिक डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्य अल्पकालिक ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ प्रतिस्पर्द्धा करते हैं। 
    • यह संबंध एक संक्रमणकालीन चरण में फँसा हुआ है जहाँ भारत को यूएई के तेल और LNG अधोसंरचना पर अपनी निर्भरता को और गहरा करना होगा, साथ ही साथ वैश्विक हरित हाइड्रोजन निर्यात केंद्र के रूप में यूएई के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने की कोशिश करनी होगी। 
      • उदाहरण के लिये, भारतीय संस्थाओं ने ADNOC के साथ 10 वर्ष का LNG आपूर्ति समझौता (1.2 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष) किया, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और मज़बूत हो गई, जबकि दोनों देश परस्पर विरोधी नेट ज़ीरो 2070/2050 लक्ष्यों का अनुसरण कर रहे हैं।
  • वित्तीय अंतरसंचालनीयता और रुपये संचय के जोखिम: स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली (LCSS) को तरलता संबंधी बाधा का सामना करना पड़ता है, जहाँ यूएई के निर्यातक अपने व्यापार अधिशेष से भारतीय रुपये (INR) जमा करते हैं, लेकिन उनके पास भारत के बॉण्ड या इक्विटी बाज़ारों में बड़े पैमाने पर पुनर्निवेश करने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। 
    • यह 'फँसी हुई तरलता' यूएई के बैंकों के बीच डॉलर पेग को पूरी तरह से समाप्त करने में संकोच उत्पन्न करती है, जिससे यह तंत्र प्रमुख व्यापार निपटान मानक बनने के बजाय केवल प्रतीकात्मक लेन-देन तक ही सीमित रह जाता है।
  • श्रम बाज़ार का राष्ट्रीयकरण बनाम प्रवासी निर्भरता: संयुक्त अरब अमीरात का अमीरातीकरण अभियान 35 लाख भारतीय कार्यबल के लिये एक संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करता है, विशेष रूप से उन सफेदपोश क्षेत्रों में, जो भारत के अरबों डॉलर के वार्षिक प्रेषण प्रवाह को बनाए रखते हैं। 
    • बड़ी कंपनियों को वर्ष 2025 के अंत तक 8% अमीरातीकरण प्राप्त करना अनिवार्य था, जिसका पालन न करने पर अब वार्षिक वित्तीय दंड लगता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय कार्यबल को हानि पहुँचाता है क्योंकि इससे भर्ती में लचीलापन सीमित होता है और राष्ट्रीय रोज़गार को प्राथमिकता मिलती है।
    • हालाँकि ब्लू-कॉलर रोज़गार अपेक्षाकृत सुरक्षित बना हुआ है, लेकिन पेशेवर अवसरों में कमी भारत के प्रेषण-आधारित विदेशी मुद्रा भंडार पर दीर्घकालिक दबाव का संकेत देती है।
  • 'कागज़ी कार्रवाई से परियोजना में परिणति' निवेश विलंब: एक आवर्ती बाधा संयुक्त अरब अमीरात की विशाल संप्रभु प्रतिज्ञाओं (ADIA/मुबादाला) और वास्तविक पूँजी परिनियोजन की धीमी गति के बीच का निष्पादन अंतर है। यह अंतर प्रायः भारत में प्रतिगामी कराधान की आशंकाओं तथा लंबी विवाद-निपटान प्रक्रियाओं के कारण उत्पन्न बाधाओं से और गहरा हो जाता है, जो तीव्र पश्चिमी बाज़ारों की तुलना में दीर्घकालिक अवसंरचना निवेश को हतोत्साहित करती हैं।
    • निर्धारित 75 अरब डॉलर के निवेश लक्ष्य में से, वास्तविक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) केवल लगभग 22 अरब डॉलर (मार्च 2025 तक) है और द्विपक्षीय निवेश संधि की समीक्षा पर हालिया वार्ता में विशेष रूप से शेष पूंजी प्रवाह को गति देने के लिये 'स्थानीय उपायों की समाप्ति' खंड को दरकिनार करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
    • उदाहरण के लिये, एडीएनओसी द्वारा पूंजी निवेश करने के बावजूद, भूमि विवादों के कारण रत्नागिरी रिफाइनरी का काम रुका हुआ है।
  • रक्षा रणनीतिक विचलन—सैन्य बनाम कूटनीतिक रुख: समुद्री सहयोग के बढ़ने के बावजूद एक रणनीतिक असंगति बनी हुई है। लाल सागर में भारत की प्रत्यक्ष नौसैनिक दृढ़ता (Naval assertiveness) के विपरीत यूएई क्षेत्रीय प्रॉक्सी शक्तियों को साधने के लिये सावधान, गैर-पक्षपाती कूटनीति को प्राथमिकता देता है। इस भिन्नता के कारण साझा खतरों के होते हुए भी संयुक्त सैन्य अभियानों (Joint kinetic operations) का दायरा सीमित रहता है।
    • उदाहरण के लिये, हाल की वार्ताओं में रक्षा संबंधी परिणाम संयुक्त गश्त के बजाय रक्षा औद्योगिक विनिर्माण (ड्रोन/एआई) तक ही सीमित रहे।
      • लाल सागर में भारत के 40 युद्धपोतों की तैनाती संयुक्त अरब अमीरात की नौसैनिक संपत्तियों से स्वतंत्र रूप से काम करना जारी रखती है, जो 'एकीकरण के बिना समन्वय' की वास्तविकता को उजागर करती है।
  • चीन का प्रभाव और रणनीतिक बचाव: संयुक्त अरब अमीरात द्वारा चीन के साथ तकनीकी और सैन्य संबंधों में जुड़ाव (हुआवेई 5G, बंदरगाह अवसंरचना) भारत के लिये एक गंभीर सुरक्षा दुविधा उत्पन्न करता है। इससे अंतर्राष्ट्रीय, अमेरिकी एवं अंतर्राष्ट्रीय (I2U2) ढाँचा तथा संवेदनशील प्रौद्योगिकी अंतरण जटिल हो जाते हैं। 
    • उदाहरण के लिये, कई चीनी कंपनियों ने विरुद्ध आर्थिक क्षेत्र अबू धाबी समूह के भीतर विनिर्माण और व्यापारिक इकाइयों में भी निवेश किया है।

भारत-यूएई संबंधों को मज़बूत करने के लिये क्या उपाय किये जा सकते हैं?

  •  एक 'संप्रभु त्वरित-ट्रैक' मध्यस्थता तंत्र को संस्थागत रूप देना: 'निवेश विलंब' के मुद्दे को हल करने के लिये, भारत को GIFT सिटी के भीतर विशेष रूप से यूएई संप्रभु धन कोषों के लिये एक विशिष्ट विवाद समाधान गलियारा स्थापित करना चाहिये (ADIA, मुबादाला)। 
    • इससे भारत की निचली अदालतों में होने वाली लंबे विलंब को दरकिनार करते हुए द्विपक्षीय निवेश संधि की भावना को क्रियान्वित किया जा सकेगा, जिससे अनिच्छुक पूंजी को सक्रिय, दीर्घकालिक 'ग्रीनफील्ड' अवसंरचना संपत्तियों में परिवर्तित किया जा सकेगा।
  • 'रुपये-दिरहम कॉर्पोरेट बॉण्ड' बाज़ार निर्माण: LCSS की तरलता-संबंधी बाधा को दूर करने के लिये नीति नियामकों को अबू धाबी ग्लोबल मार्केट (ADGM) में उच्च प्रतिफल वाले भारतीय ‘मसाला बॉण्ड’ अथवा हरित अवसंरचना बॉण्ड के सूचीकरण की सुविधा प्रदान करनी चाहिये।
    • इस वित्तीय नवाचार से यूएई के बैंकों को अपने संचित अधिशेष रुपयों को डॉलर में परिवर्तित करने के बजाय लाभ उत्पन्न करने वाली भारतीय संपत्तियों में पुनर्निवेश करने में सहायता मिलेगी, जिससे स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली एक प्रतीकात्मक व्यापार साधन से एक मज़बूत, चक्रीय निवेश साधन में परिवर्तित हो जाएगी।
  • प्रतिबंध-छूट सहित एक 'रणनीतिक खाद्य सुरक्षा संधि' को लागू करना: भारत को सामान्य आश्वासनों से आगे बढ़कर एक बाध्यकारी संधि पर हस्ताक्षर करने चाहिये जो यूएई को तदर्थ कृषि निर्यात प्रतिबंधों (चावल/गेहूँ/चीनी) से विशिष्ट, कोटा-आधारित छूट प्रदान करती है।
    • इस 'आपूर्ति शृंखला प्रतिरक्षा' के बदले में, यूएई संविदात्मक रूप से रुके हुए I2U2 खाद्य पार्कों में पूर्ण पूंजी लगाने के लिये बाध्य होगा, जिससे एक बंद 'खेत से बंदरगाह तक' गलियारा बनेगा जो भारतीय किसानों के लिये मूल्य स्थिरता तथा अमीरात के लिये खाद्य संप्रभुता की गारंटी देता है।
  • रक्षा औद्योगिक आधार के 'सह-उत्पादन' की ओर संक्रमण को गति देना: रक्षा साझेदारी को 'खरीदार-विक्रेता' की गतिशीलता से हटकर 'संयुक्त बौद्धिक संपदा' मॉडल की ओर मुड़ने की आवश्यकता है, विशेष रूप से ड्रोन युद्ध, AI-निगरानी और रेगिस्तानी युद्ध इलेक्ट्रॉनिक्स को लक्षित करते हुए। रक्षा साझेदारी को ‘खरीदार–विक्रेता’ कार्यढाँचे से आगे बढ़कर ‘संयुक्त बौद्धिक संपदा’ मॉडल की ओर उन्मुख होना चाहिये, विशेषतः ड्रोन युद्ध, AI-आधारित निगरानी एवं डेज़र्ट वॉरफेयर इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्रों में।
    • भारत की मितव्ययी इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर दक्षता को संयुक्त अरब अमीरात के उन्नत घटक खरीद नेटवर्क के साथ मिलाकर, दोनों देश एक 'साझा रणनीतिक स्वायत्तता' का निर्माण कर सकते हैं जो हिंद महासागर क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुरक्षा आवश्यकताओं के लिये पश्चिमी या चीनी OEM पर निर्भरता को कम करता है।
  • 'अंतर्राष्ट्रीय कौशल सामंजस्य' प्रोटोकॉल स्थापित करना: अमीरातीकरण के जोखिमों का मुकाबला करने के लिये, भारत को एक 'कौशल पासपोर्ट' प्रणाली का सह-निर्माण करना चाहिये जहाँ भारतीय व्यावसायिक प्रमाणपत्रों को यूएई राष्ट्रीय योग्यता प्राधिकरण द्वारा पूर्व-मान्य किया जाता है। 
    • इस उपाय से भारतीय ब्लू-कॉलर कार्यबल को सक्रिय रूप से 'ग्रे-कॉलर' तकनीशियनों (ऑटोमेशन, HVAC, स्वच्छ ऊर्जा) में उन्नत बनाया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि वे यूएई की तेल-पश्चात 'ज्ञान अर्थव्यवस्था' के लिये अपरिहार्य बने रहें, साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये उच्च मूल्य के प्रेषण को सुरक्षित किया जा सके। यह उपाय भारतीय ब्लू-कॉलर कार्यबल को सक्रिय रूप से ‘ग्रे-कॉलर’ तकनीशियनों (स्वचालन, HVAC, स्वच्छ ऊर्जा) में उन्नत करेगा, जिससे वे यूएई की उत्तर-तेल ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था’ में अपरिहार्य बने रहेंगे तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये उच्च-मूल्य प्रेषण सुनिश्चित होंगे।
  • एक 'हरित समुद्री पुल' का निर्माण: रेल नेटवर्क के भू-राजनीतिक अवरोध को देखते हुए, भारत और यूएई को JNPT/मुंद्रा और जेबेल अली के बीच सीधे समुद्री मार्ग को सक्रिय रूप से डिजिटाइज़ तथा डीकार्बोनाइज़ करना चाहिये। 
    • ई-बिल ऑफ लैडिंग, सामंजस्यपूर्ण सीमा शुल्क एकीकरण और हरित ईंधन वाले जहाज़ों के लिये तरजीही डॉकिंग के साथ 'ग्रीन कॉरिडोर' को लागू करने से लॉजिस्टिक्स लागत में भारी कमी आएगी तथा द्विपक्षीय व्यापार मार्ग सुरक्षित होगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि पश्चिम एशियाई अस्थिरता के कारण व्यापक IMEC क्षेत्रीय एकीकरण ठप रहने पर भी कनेक्टिविटी विकसित होगी।
  • भुगतान से परे डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का अंतर्संयोजन: UPI-AANI लिंकेज से आगे बढ़ते हुए, दोनों देशों को एक 'सीमा-पार डिजिटल कॉमन' बनाने के लिये अपने व्यापक डिजिटल स्टैक्स को एकीकृत करना चाहिये। 
    • इसमें डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये पोर्टेबल क्रेडिट हिस्ट्री और सत्यापित शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की पारस्परिक मान्यता शामिल है, जिससे भारतीय प्रवासी समुदाय के लिये अनुपालन संबंधी बाधाओं में काफी कमी आती है तथा दुबई–मुंबई कॉरिडोर में व्यवसायों के लिये निर्बाध, कागज़-रहित गतिशीलता संभव होगी।
  • 'ग्रीन हाइड्रोजन ग्रिड' साझेदारी विकसित करना: ऊर्जा संक्रमण के विरोधाभास को दूर करने के लिये, साझेदारी को एक 'वर्चुअल पावर प्लांट' मॉडल में विकसित होना चाहिये, जहाँ भारत अपनी कम लागत वाली नवीकरणीय भौगोलिक स्थिति का उपयोग करके ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करे तथा यूएई क्रायोजेनिक शिपिंग अधोसंरचना में निवेश करे। 
    • यह व्यवस्था संबंधों को केवल हाइड्रोकार्बन निर्भरता से अलग करती है तथा यूएई की लॉजिस्टिक्स प्रभुत्व का लाभ उठाते हुए भारत–यूएई धुरी को यूरोप के लिये प्रमुख ‘ग्रीन ऊर्जा निर्यातक’ के रूप में स्थापित करती है।

निष्कर्ष: 

भारत–यूएई संबंध लेन-देन आधारित व्यावहारिकता से आगे बढ़कर विश्वास, प्रौद्योगिकी तथा साझा भू-राजनीतिक यथार्थवाद पर आधारित एक परिपक्व रणनीतिक साझेदारी के रूप में उभर चुके हैं। दोनों देशों के लिये अस्थिर पश्चिम एशियाई परिदृश्य में आगे बढ़ना चुनौतीपूर्ण है; ऐसे में कनेक्टिविटी, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर उनकी बढ़ती सहमति निर्भरता से सह-निर्माण की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। वास्तविक चुनौती इस बात में निहित है कि दूरदर्शी ढाँचों को ऐसे क्रियान्वयन योग्य परियोजनाओं में किस प्रकार रूपांतरित किया जाए जो परस्पर रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित कर सकें। यदि यह साझेदारी निरंतर और सुदृढ़ बनी रहती है तो यह दक्षिण-पश्चिम एशिया के एकीकरण को पुनर्परिभाषित कर सकती है तथा बहुध्रुवीय विश्व में अनुकूल सहयोग के एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर

दृष्टि मेन्स प्रश्न

“भारत-यूएई संबंध सांस्कृतिक संपर्क से विकसित होकर एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं।” वर्ष 2015 के बाद के कालखंड में भू-राजनीतिक पुनर्गठन, आर्थिक एकीकरण और सुरक्षा सहयोग के संदर्भ में इस परिवर्तन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. वर्तमान में भारत-यूएई साझेदारी को रणनीतिक क्यों माना जाता है?
क्योंकि इसमें व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे बहुआयामी क्षेत्र शामिल हैं, जो तेल एवं श्रम आधारित पारंपरिक संबंधों से आगे विस्तारित हो चुकी है।

प्रश्न 2. भारत-यूएई संबंधों में CEPA की क्या भूमिका है?
इसने व्यापार को संस्थागत रूप प्रदान किया है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुँच गया है और वर्ष 2032 तक इसे 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रश्न 3. संयुक्त अरब अमीरात के लिये भारतीय प्रवासी समुदाय क्यों महत्त्वपूर्ण है?
क्योंकि लगभग 35 लाख की यह जनसंख्या विकास, धन प्रेषण तथा कौशल अंतरण के माध्यम से दोनों देशों के बीच एक सक्रिय सेतु के रूप में कार्य करती है।

प्रश्न 4. भारत के लिये IMEC का क्या महत्त्व है?
यह संयुक्त अरब अमीरात को यूरोप के लिये भारत के प्रवेशद्वार के रूप में स्थापित करता है, जिससे पारंपरिक समुद्री मार्गों से परे कनेक्टिविटी में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5. भारत-यूएई संबंधों में भावी प्रमुख चुनौती क्या है?
विशाल रणनीतिक प्रतिबद्धताओं और निवेश प्रतिज्ञाओं को समयबद्ध, धरातलीय क्रियान्वयन में रूपांतरित करना।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन 'खाड़ी सहयोग परिषद' का सदस्य नहीं है? (2016)

(a) ईरान
(b) ओमान
(c) सऊदी अरब
(d) कुवैत

उत्तर: (a)

प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2008)

  1. अजमान UAE के सात अमीरातों में से एक है।
  2. रास अल-खैमाह UAE में शामिल होने वाला अंतिम शेख-राज्य था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न 1. भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न भारत की आर्थिक प्रगति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के ऊर्जा नीति सहयोग का विश्लेषण कीजिये। (2017)