भारत-यूरोपीय संघ संबंधों का सुदृढ़ीकरण | 03 Jan 2026

यह एडिटोरियल 02/01/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित “Between India and EU, a carbon gap and an FTA bridge” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारतीय निर्यातकों पर यूरोपीय संघ के कार्बन उत्सर्जन संबंधी प्रतिबद्धता (CBAM) के प्रभाव को उजागर करता है तथा इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जलवायु महत्त्वाकांक्षा को निष्पक्ष व्यापार, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और भारत के निर्यात-आधारित विकास के भविष्य के साथ संतुलित करना एक चुनौती है।

प्रिलिम्स के लिये: मुक्त व्यापार समझौते (FTAs), भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद, कार्बन उत्सर्जन संबंधी प्रतिबद्धता (CBAM), NATO, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना, भारत-यूरोप संबंध 

मेन्स के लिये: भारत-यूरोपीय संघ संबंध, मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने में प्रमुख चुनौतियाँ, मुक्त व्यापार समझौते में समस्या के समाधान 

यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAMकार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म) के वैश्विक व्यापार को नया स्वरूप देने के साथ ही, भारत-यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंध एक महत्त्वपूर्ण दौर में प्रवेश कर रहे हैं। 120 अरब यूरो से अधिक के द्विपक्षीय व्यापार के साथ, नए कार्बन-संबंधी नियम इस्पात, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे प्रमुख भारतीय निर्यातों को सीधे प्रभावित करेंगे। हालाँकि ये उपाय अल्पकालिक चुनौतियाँ पेश करते हैं, लेकिन ये भारत में स्वच्छ उत्पादन और मज़बूत कार्बन लेखांकन कार्यढाँचे की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं। भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की चल रही वार्ता इन चिंताओं को दूर करने के लिये एक उपयुक्त मंच प्रदान करती है। यदि इसका बुद्धिमत्तापूर्ण से उपयोग किया जाए, तो यह परिवर्तन अधिक समुत्थानशील, प्रतिस्पर्द्धी एवं संवहनीय भारत-यूरोपीय संघ साझेदारी को और मज़बूत कर सकता है।

European Union

समय के साथ भारत-यूरोपीय संघ के संबंध किस प्रकार विकसित हुए हैं? 

भारत–यूरोपीय संघ संबंधों का इतिहास एक साधारण क्रेता–विक्रेता संबंध से विकसित होकर एक परिष्कृत रणनीतिक साझेदारी तक परिवर्तित हो चुका है। प्रारंभ में जहाँ इसका केंद्र व्यापार था, वहीं वर्तमान में यह रक्षा, प्रौद्योगिकी तथा वैश्विक शासन जैसे व्यापक क्षेत्रों को समाहित करता है। 

  • चरण 1: आधारभूत संरचना (1960 के दशक - 1990 के दशक): प्रारंभिक वर्षों में भारत ने विकास सहायता के साथ-साथ अपनी वस्तुओं के लिये बाज़ार तक पहुँच की मांग की।
    • 1962: भारत यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले पहले देशों में से एक बन गया।
    • 1994: एक ऐतिहासिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किये गए, जिसने विशुद्ध व्यापार के दायरे को बढ़ाकर राजनीतिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी शामिल कर लिया।
  • चरण 2: रणनीतिक साझेदारी में उन्नयन (वर्ष 2000 - 2010): जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था उदारीकृत हुई, यूरोपीय संघ ने इसे एक वैश्विक अग्रणी के रूप में मान्यता दी।
    • वर्ष 2000: भारत-EU का पहला शिखर सम्मेलन लिस्बन में आयोजित किया गया, जो संबंधों को संस्थागत रूप देने में एक महत्त्वपूर्ण क्षण था।
    • वर्ष 2004: हेग शिखर सम्मेलन के दौरान संबंधों को औपचारिक रूप से ‘रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया गया, जिससे भारत को EU की दृष्टि में अमेरिका और चीन के समकक्ष स्थान प्राप्त हुआ।
    • वर्ष 2007: व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौते (BTIA)— अर्थात मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पर वार्ताएँ प्रारंभ हुईं, हालाँकि बाद में ये लगभग एक दशक तक ठहराव की स्थिति में बनी रहीं।
  • चरण 3: आधुनिक रणनीतिक पुनर्संरेखण (2016 – वर्तमान): वर्तमान युग में संबंधों का केंद्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र, हरित ऊर्जा और प्रौद्योगिकी संप्रभुता बन गया है।
    • वर्ष 2016: पेरिस समझौते के लक्ष्यों पर सहमति बनाने के लिये स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु साझेदारी की शुरुआत की गई।
    • वर्ष 2022: मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर औपचारिक रूप से पुनः वार्ताएँ प्रारंभ हुईं, जो चीन पर निर्भरता कम करने की साझा रणनीति का संकेत थीं।
    • वर्ष 2025: यूरोपीय संघ ने सितंबर, 2025 में अपना नया रणनीतिक यूरोपीय संघ-भारत एजेंडा जारी किया, जिसका उद्देश्य 5 स्तंभों— समृद्धि और संवहनीयता, प्रौद्योगिकी तथा नवोन्मेष, सुरक्षा एवं रक्षा, कनेक्टिविटी व वैश्विक मुद्दे तथा इन सभी स्तंभों में सहायक कारक के माध्यम से संबंधों को गहरा करना था। इसमें व्यापार, महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन कार्रवाई और गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित किया गया था, साथ ही वैश्विक अस्थिरता एवं बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने के लिये एक मज़बूत प्रयास किया गया था, जिसमें भारत को एक प्रमुख भागीदार के रूप में स्थापित किया गया था।

भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों में वर्तमान में क्या विकास हो रहा है? 

  • आर्थिक समुत्थानशीलता को सुदृढ़ करना: भारत और यूरोपीय संघ विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक साझेदारियों में से एक साझा करते हैं। यूरोपीय संघ भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जिसका वस्तुओं में व्यापार भारत के कुल व्यापार का 11.5% है। 
    • यूरोपीय संघ, इंजीनियरिंग वस्तुओं, औषधि उत्पादों, वस्त्रों तथा IT सेवाओं जैसे भारतीय निर्यातों के लिये एक प्रमुख गंतव्य बना हुआ है।
    • महामारी के बाद तथा भू-राजनीतिक तनावों के दौरान वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता आने के साथ, भारत और यूरोपीय संघ एक-दूसरे को विश्वसनीय दीर्घकालिक आर्थिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं।
  • भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिये नए सिरे से प्रयास: वर्षों तक निष्क्रिय रहने के बाद, भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर वार्ता वर्ष 2022 में फिर से शुरू हुई, जो पारस्परिक रणनीतिक तात्कालिकता को दर्शाती है। 
    • प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य बाज़ार अभिगम्यता को बढ़ावा देना, शुल्क कम करना, निवेश को सुगम बनाना तथा डिजिटल व्यापार, स्थिरता और आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग बढ़ाना है।
      • भारत के लिये, यह उन्नत प्रौद्योगिकी और बाज़ारों तक अभिगम्यता प्रदान करता है तथा यूरोपीय संघ के लिये, यह एक विश्वसनीय विनिर्माण एवं विकास भागीदार प्रदान करता है।
    • चीन से आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करने के लिये भू-राजनीतिक आवश्यकता के रूप में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है, हालाँकि यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म (CBAM) को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए हैं।
  • ऊर्जा परिवर्तन की ओर सामूहिक प्रगति: ऊर्जा सहयोग नीतिगत संवाद से आगे बढ़कर ठोस अवसंरचना परियोजनाओं तक पहुँच गया है, विशेष रूप से राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और यूरोपीय संघ के हाइड्रोजन बैंक के माध्यम से।
    • इसका मुख्य उद्देश्य एक ग्रीन हाइड्रोजन कॉरिडोर का निर्माण कराना है, जिसमें भारत यूरोप की डीकार्बोनाइज़ेशन आवश्यकताओं के लिये एक प्राथमिक उत्पादन केंद्र के रूप में कार्य करे।
    • यह स्वाभाविक सामंजस्य भारत की कम लागत वाली नवीकरणीय ऊर्जा की व्यापक क्षमता तथा यूरोप की प्रौद्योगिकी और पूंजी का लाभ उठाकर पारस्परिक नेट ज़ीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक है। 
    • AM ग्रीन-रोटरडैम कॉरिडोर समझौता (मई, 2025) का उद्देश्य रोटरडैम बंदरगाह के माध्यम से भारत से यूरोप को प्रतिवर्ष 1 मिलियन टन हरित अमोनिया का निर्यात करना है।
  • त्वरित प्रौद्योगिकी सहयोग: भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC), जिसे EU के लिये (अमेरिका के बाद) इस तरह के दूसरे मंच के रूप में स्थापित किया गया है, डिजिटल मानकों को संरेखित करने का प्राथमिक माध्यम बन गया है। 
    • दोनों पक्ष क्लोज्ड डिजिटल इकोसिस्टम के वैश्विक विकल्प के निर्माण के लिये मानव-केंद्रित AI और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) की अंतर-संचालनीयता पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
    • TTC तकनीकी निर्भरता के खिलाफ एक रणनीतिक ढाल के रूप में कार्य करता है, जो केवल क्रेता-विक्रेता संबंधों के बजाय 6G और सेमीकंडक्टर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में सह-विकास को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2025 में दोनों पक्षों ने हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) के लिये GANANA परियोजना शुरू की।
  • कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिये तीव्र प्रयास: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को निर्बाध बहुआयामी परिवहन और ऊर्जा संपर्क बनाने के लिये चालू किया जा रहा है। 
    • यह कॉरिडोर ‘पारंपरिक चोकपॉइंट्स’ को दरकिनार करते हुए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के एक पारदर्शी और नियम-आधारित विकल्प के रूप में उभर रहा है।
    • IMEC एक परिवहन मार्ग से विकसित होकर एक हरित और डिजिटल गलियारे में परिणत हो रहा है, जो ऊर्जा ग्रिडों को एकीकृत करते हुए यूरेशियाई लॉजिस्टिक्स की लागत को मौलिक रूप से कम करेगा।
      • अनुमानों से पता चलता है कि IMEC लॉजिस्टिक्स लागत में 30% और परिवहन समय में 40% की कमी करेगा।
  • भू-राजनीतिक और रणनीतिक अभिसरण: वर्ष 2025 के अंत में ‘नया रणनीतिक ईयू–भारत एजेंडा’ प्रारंभ होने के साथ यह साझेदारी अधिक ‘क्रियाशील और सुसंगठित’ स्वरूप ग्रहण कर रही है।
    • दोनों पक्ष दूरस्थ लोकतंत्रों के संबंधों से एक बहुध्रुवीय विश्व में अपरिहार्य साझेदारों के रूप में परिवर्तित हो गए हैं, विशेष रूप से चीन से जुड़े जोखिमों को कम करने तथा अमेरिकी व्यापार नीतियों की अनिश्चितता से निपटने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। 
    • यह अभिसरण रणनीतिक स्वायत्तता के साझा लक्ष्य से प्रेरित है, जहाँ भारत और यूरोपीय संघ, अमेरिका व चीन के बीच G2-शैली की द्विध्रुवीयता को रोकने के लिये स्थिर ध्रुवों के रूप में कार्य करते हैं।
    • हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता, समुद्री सुरक्षा एवं बहुपक्षीय सुधारों पर सहयोग, नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और प्रमुख शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता से रणनीतिक स्वायत्तता में साझा हित को दर्शाता है।
  • जन-जन और ज्ञान संबंधी साझेदारी: अर्थशास्त्र से परे, भारत-यूरोपीय संघ के संबंध शिक्षा, अनुसंधान, गतिशीलता और कौशल विकास के माध्यम से विस्तारित हो रहे हैं। 
    • होराइज़न यूरोप, इरास्मस+ और अनुसंधान सहयोग के अंतर्गत कार्यक्रम ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाते हैं तथा दीर्घकालिक सामाजिक संबंधों को मज़बूत करते हैं।
    • EV बैटरी रीसाइक्लिंग और अपशिष्ट जल प्रसंस्करण सहित अन्य क्षेत्रों में वर्ष 2026 के लिये आगे संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं की योजना बनाई गई है, जिसमें TTC से जुड़े कुल निवेश लगभग 60 मिलियन यूरो होंगे।

भारत-यूरोपीय संघ संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?

  • व्यापार और बाज़ार अभिगम्यता विवाद: मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताएँ, जो वर्ष 2022 में पुनः आरंभ हुई थीं, वर्तमान में ऑटोमोबाइल, डेयरी और ‘मोड 4’ श्रम गतिशीलता जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर मतभेदों के कारण रुकी हुई हैं।
    • यूरोपीय संघ चाहता है कि भारत ऑटोमोबाइल, वाइन, डेयरी और विलासिता की वस्तुओं पर टैरिफ में भारी कमी करे, जबकि भारत अपने औषधि, वस्त्र और IT सेवाओं के लिये अधिक बाज़ार अभिगम्यता की मांग कर रहा है।
      • भारत को आशंका है कि अचानक टैरिफ में कटौती से घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुँच सकता है, जबकि यूरोपीय संघ का तर्क है कि संतुलित साझेदारी के लिये गहन उदारीकरण की आवश्यकता है।
  • हरित संरक्षणवाद: यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) एक प्रमुख विवाद का मुद्दा बन गया है। इस्पात, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे आयात पर कार्बन लागत लगाकर, यूरोपीय संघ प्रभावी रूप से भारतीय निर्यातकों के लिये लागत बढ़ा रहा है। 
    • उदाहरण के लिये, वित्तीय वर्ष 2025 में अनुपालन संबंधी अनिश्चितता के कारण यूरोपीय संघ को भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यात में 24% की गिरावट आई।
    • इसके अतिरिक्त, यह निर्यात अनुबंधों की प्रकृति को भी  नया रूप दे रहा है, जहाँ यूरोपीय खरीदार कार्बन लागत को ग्राहकों पर डालने के लिये तेज़ी से शर्तें शामिल कर रहे हैं, संयंत्र-स्तरीय उत्सर्जन के सत्यापित आँकड़ों की माँग कर रहे हैं तथा यूरोपीय कार्बन दरों में उतार-चढ़ाव के अनुरूप कीमतों का पुनःसमायोजन कर रहे हैं।
      • कई निर्यातक अब प्रतिस्पर्द्धा में बने रहने के लिये दोहरी कीमतें उद्धृत कर रहे हैं— एक आधार मूल्य और दूसरा CBAM-समायोजित मूल्य।
      • चूँकि भारत के उद्योग अभी भी कम कार्बन उत्सर्जन वाली प्रौद्योगिकियों की ओर अग्रसर हैं, इसलिये इससे निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में कमी आने का खतरा है। 
  • मानक और नियामक बाधाएँ: शुल्क के अलावा, भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के सख्त तकनीकी, स्वच्छता और पर्यावरणीय मानकों के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। 
    • उदाहरण के लिये, बासमती चावल, डेयरी उत्पाद और रसायन जैसे भारतीय निर्यात प्रायः कीटनाशक अवशेष सीमाओं (जैसे ट्राइसाइक्लाज़ोल), संदूषण जोखिमों तथा अनुरेखण एवं प्रमाणन में खामियों के आधार पर गैर-शुल्क बाधाओं का सामना करते हैं।
      • लघु और मध्यम भारतीय उद्यमों के लिये इन आवश्यकताओं का अनुपालन महँगा और जटिल सिद्ध होता है, जिससे शुल्क रियायतों के बावजूद बाज़ार में प्रवेश कठिन हो जाता है।
  • भू-राजनीतिक मतभेद: भारत और यूरोपीय संघ वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों पर हमेशा एकमत नहीं होते। रूस के साथ भारत के ऊर्जा संबंधों, बहुपक्षीय मंचों पर मतदान के तरीकों तथा रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर मतभेद सामने आए हैं। 
    • उदाहरण के लिये, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने वर्ष 2025 के अंत में भारतीय-रूसी संयुक्त उद्यम नयारा एनर्जी पर प्रतिबंध लगाए, जो मॉस्को के साथ तीसरे पक्ष के संबंधों पर दबाव डालने के लिये यूरोपीय संघ द्वारा आर्थिक उपकरणों के उपयोग को दर्शाता है।
    • व्यापार और प्रौद्योगिकी सहयोग को भारत की विदेश नीति से जोड़ने का यूरोपीय संघ का प्रयास विश्वास की कमी उत्पन्न करता है, क्योंकि भारत ब्रुसेल्स के रुख को यूरोप-केंद्रित और एशिया की विशिष्ट सुरक्षा निर्भरताओं के प्रति असंवेदनशील मानता है।
      • इस संदर्भ में, भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि उसकी समस्याएँ विश्व की समस्याएँ हैं, लेकिन विश्व की समस्याएँ यूरोप की समस्याएँ नहीं हैं।”
    • हालाँकि दोनों पक्ष नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करते हैं, लेकिन वैश्विक संकटों और प्रतिबंधों के प्रति उनके दृष्टिकोण कभी-कभी भिन्न होते हैं, जिससे राजनीतिक विश्वास प्रभावित होता है।
  • डेटा गवर्नेंस में अंतर: डिजिटल व्यापार एक बढ़ता हुआ क्षेत्र है, लेकिन डेटा संरक्षण कानूनों में अभी भी अंतर मौजूद हैं। 
    • व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) के भीतर विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यूरोपीय संघ के GDPR (सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन) और भारत के DPDP अधिनियम, 2023 के बीच असंगति है। जहाँ यूरोपीय संघ विश्वास के साथ डेटा के मुक्त प्रवाह पर ज़ोर देता है, वहीं भारत डेटा सॉवरेनिटी पर बल देता है, जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा एवं आर्थिक विकास के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण डेटासेट को स्थानीय रूप से संग्रहीत करना आवश्यक है।
      • चूँकि भारत के पास यूरोपीय संघ की पर्याप्तता का दर्जा नहीं है, इसलिये सीमा पार डेटा प्रवाह मानक संविदात्मक खंडों जैसे जटिल कानूनी तंत्रों पर निर्भर करता है, जिससे अनुपालन लागत और बाधाएँ बढ़ जाती हैं।
      • इससे फिनटेक, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे क्षेत्रों में व्यवसायों के लिये अनिश्चितता उत्पन्न होती है, जिससे गहन डिजिटल एकीकरण धीमा हो जाता है।
  • निवेश संरक्षण के लिये भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण: जहाँ यूरोपीय संघ निवेशकों के लिये सुदृढ़ सुरक्षा की मांग करता है, वहीं भारत अत्यधिक वाद-विवाद से बचने और नीतिगत क्षेत्र की रक्षा हेतु सतर्क दृष्टिकोण अपनाता है।
    • उदाहरण के लिये, यूरोपीय संघ निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार (FET) और सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (MFN) जैसे व्यापक प्रावधानों की मांग करता है, ताकि उसके उद्यमों के साथ घरेलू या तृतीय-पक्ष उद्यमों की तुलना में भेदभाव न हो।
      • भारत परंपरागत रूप से अपने निवेश संधियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MFN) को शामिल करने के प्रति अनिच्छुक रहा है।

भारत-यूरोपीय संघ के संबंधों को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • संतुलित और समावेशी मुक्त व्यापार समझौते को तेज़ी से आगे बढ़ाना: भारत तथा यूरोपीय संघ को चरणबद्ध और लचीले मुक्त व्यापार समझौते को अपनाना चाहिये जिससे संवेदनशील क्षेत्रों को समायोजन के लिये पर्याप्त समय मिल सके।
    • विशेष सुरक्षा प्रावधान, भारतीय उद्योगों के लिये लंबी संक्रमण अवधि तथा लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये अलग व्यवहार इस समझौते को राजनीतिक और आर्थिक रूप से संधारणीय बना सकते हैं। 
      • एक मज़बूत मुक्त व्यापार समझौता (FTA) बाज़ार तक अभिगम्यता को सुगम बना सकता है, निवेश आकर्षित कर सकता है तथा व्यापार संबंधी अनिश्चितता को कम कर सकता है।
  • विकास को प्रभावित किये बिना जलवायु लक्ष्यों का समन्वय: CBAM से जुड़ी चिंताओं के समाधान हेतु भारत और यूरोपीय संघ को कार्बन लेखांकन प्रणालियों की पारस्परिक मान्यता प्रौद्योगिकी साझा करने तथा जलवायु वित्त पर सहयोग बढ़ाना चाहिये।
    • यूरोपीय संघ व्यापारिक प्रतिबंधों के बजाय रियायती हरित वित्त, प्रौद्योगिकी अंतरण और क्षमता निर्माण के माध्यम से भारत का समर्थन कर सकता है।
      • इससे यह सुनिश्चित होगा कि जलवायु संबंधी कार्रवाई न्यायसंगत और विकास के अनुकूल बनी रहे।
  • औद्योगिक और हरित प्रौद्योगिकी सहयोग को मज़बूत करना: हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और बैटरी स्टोरेज में संयुक्त पहल दोनों पक्षों को तीसरे देशों पर निर्भरता कम करने में सहायता कर सकती है।
    • संयुक्त अनुसंधान केंद्रों, नवाचार कोषों और प्रौद्योगिकी अंतरण प्लेटफॉर्मों की स्थापना से दीर्घकालिक औद्योगिक समुत्थानशक्ति में वृद्धि होगी।
  • नियामकीय अनुकूलता और मानकों में सुधार: भारत और यूरोपीय संघ को मानकों, अनुरूपता आकलन और प्रमाणन प्रणालियों की पारस्परिक मान्यता की दिशा में काम करना चाहिये। 
    • यूरोपीय संघ के तकनीकी, पर्यावरणीय और सुरक्षा मानकों को पूरा करने के लिये भारतीय लघु एवं मध्यम उद्यमों को क्षमता निर्माण संबंधी सहायता प्रदान करने से अनुपालन लागत कम हो सकती है तथा बाज़ार तक अभिगम्यता का विस्तार हो सकता है।
  • गतिशीलता, कौशल और जन-संबंधों को बढ़ावा देना: छात्रों, पेशेवरों, शोधकर्त्ताओं और कुशल श्रमिकों के लिये वीज़ा नियमों को सरल बनाने से सेवा क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग हो सकेगा।
    • योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता का विस्तार करना और अकादमिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना दीर्घकालिक सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को मज़बूत कर सकता है।
  • डिजिटल और डेटा गवर्नेंस में सहयोग को गहरा करना: भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद के माध्यम से, दोनों पक्ष विश्वसनीय डेटा-साझाकरण कार्यढाँचे, साइबर सुरक्षा सहयोग तथा ज़िम्मेदार AI गवर्नेंस की दिशा में काम कर सकते हैं।
    • डिजिटल मानकों में सामंजस्य स्थापित होने से फिनटेक, AI और डिजिटल सेवाओं में वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।
  • रणनीतिक विश्वास और नीतिगत संवाद का निर्माण: नियमित उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद, संकट संचार तंत्र और बहुपक्षीय मंचों में सहयोग भू-राजनीति, प्रतिबंधों एवं वैश्विक शासन पर मतभेदों को प्रबंधित करने में सहायता कर सकते हैं। 
    • एक पारदर्शी और परामर्शपूर्ण दृष्टिकोण विश्वास एवं दीर्घकालिक साझेदारी को मज़बूत करेगा।

निष्कर्ष: 

जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार, जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई एवं भू-राजनीति का परस्पर संबंध मज़बूत होता जा रहा है, भारत और यूरोपीय संघ को लेन-देन संबंधी संबंधों से आगे बढ़कर विश्वास, संवहनीयता तथा साझा रणनीतिक हितों पर आधारित साझेदारी की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। आर्थिक विकास को जलवायु संबंधी उत्तरदायित्व के साथ जोड़कर, तकनीकी और जन-संबंधों को मज़बूत करके तथा वैश्विक नियमों में निष्पक्षता सुनिश्चित करके, दोनों पक्ष एक समुत्थानशील एवं भविष्योन्मुखी साझेदारी का निर्माण कर सकते हैं। संतुलित और दूरदर्शी भारत-यूरोपीय संघ संबंध न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करेगा, बल्कि एक अधिक स्थिर, समावेशी एवं नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में भी योगदान देगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

प्रश्न. यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म (CBAM) जैसे जलवायु संबंधी व्यापार उपायों से भारत-यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंधों में किस प्रकार परिवर्तन हो रहे हैं, इस पर चर्चा कीजिये। अपने विकासात्मक हितों की रक्षा के लिये भारत को कौन-सी नीतिगत प्रतिक्रियाएँ अपनानी चाहिये? 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत-यूरोपीय संघ के मौजूदा संबंधों का मुख्य केंद्र बिंदु क्या है?
व्यापार, जलवायु सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करना।

प्रश्न 2. यूरोपीय संघ का CBAM भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह व्यापार को कार्बन उत्सर्जन से जोड़कर भारतीय निर्यात की लागत को बढ़ा देता है।

प्रश्न 3. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की क्या भूमिका है?
इसका उद्देश्य दोनों पक्षों के लिये व्यापार, निवेश और बाज़ार तक अभिगम्यता को बढ़ावा देना है।

प्रश्न 4. व्यापार के अतिरिक्त भारत और यूरोपीय संघ किस प्रकार सहयोग करते हैं?
प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन कार्रवाई, डिजिटल गवर्नेंस और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से।

प्रश्न 5. भारत-यूरोपीय संघ संबंधों की भविष्य की दिशा क्या है?
एक सतत, रणनीतिक और नियम-आधारित दीर्घकालिक साझेदारी की ओर संक्रमण।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यूरोपीय संघ का ‘स्थिरता एवं संवृद्धि समझौता (स्टेबिलिटी एंड ग्रोथ पैक्ट)’ ऐसी संधि है, जो— (2023)
  2. यूरोपीय संघ के देशों के बजटीय घाटे के स्तर को सीमित करती है 
  3. यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी आधारिक संरचना सुविधाओं को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
  4. यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी प्रौद्योगिकियों को आपस में बाँटना सुकर बनाती है

उपर्युक्त में से कितने कथन सही है?

(a) केवल एक 

(b) केवल दो

(c) सभी तीन 

(d) कोई भी नहीं

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न 1. 'नाटो का विस्तार एवं सुदृढीकरण और एक मज़बूत अमेरिका-यूरोप रणनीतिक साझेदारी भारत के लिये अच्छा काम करती है।' इस कथन के बारे मे आपकी क्या राय है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण और उदाहरण दीजिये। (2023)