कुपोषण से निपटने हेतु आवश्यक हस्तक्षेप | 09 Nov 2020

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में भारत में कुपोषण की चुनौती और इससे निपटने में कृषि सुधारों की भूमिका व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने ‘खाद्य और कृषि संगठन’ (Food and Agriculture Organization -FAO) की स्थापना की 75वीं वर्षगाँठ पर आयोजित एक समारोह में देश को 8 फसलों की 17 बायो-फोर्टिफाइड (Bio-Fortified) प्रजातियाँ समर्पित कीं। गौरतलब है कि 16 अक्तूबर, 1944 को रोम (इटली) में विश्व के 44 देशों के प्रतिनिधियों ने मिलकर FAO की स्थापना की और इस बैठक के दौरान विश्व में पोषण के स्तर को बढ़ाने, खाद्य तथा कृषि उत्पादों के उत्पादन एवं वितरण में सुधार करने की बात कही गई। पिछले कुछ दशकों में भारत में संवर्द्धित बीजों और नवीन तकनीकों तक किसानों की पहुँच में सुधार के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली है। हालाँकि कृषि उत्पादकता को बढ़ाने की इस होड़ के दौरान देश में खाद्य पदार्थों में पोषक तत्त्वों के स्तर में सुधार के मुद्दे पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान नहीं दिया जा सका है। 21वीं शताब्दी में भी विश्व के विभिन्न हिस्सों के साथ भारत में एक बड़ी आबादी के बीच पोषक तत्त्वों की कमी आज भी गंभीर समस्या बनी हुई है।     

पोषक तत्त्वों की कमी का संकट: 

  • वर्तमान में विश्व के निम्न और मध्यम आय वर्ग के देशों (Low and Middle-Income Countries- LMICs) में लगभग 2 बिलियन महिलाओं और बच्चों में विटामिन ए, आयरन और जिंक की भारी कमी देखी गई जो एक बड़े संकट की ओर संकेत करता है।   
  • वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2020 के तहत भारत को विश्व के उन 88 देशों की सूची में रखा गया था, जिनके वर्ष 2025 तक ‘वैश्विक पोषण लक्ष्यों’ (Global Nutrition Targets) को प्राप्त करने  की संभावनाएं बहुत ही कम हैं।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 37.9% बच्चों में वृद्धिरोध या बौनापन और 20.8% में दुबलेपन के मामले देखे गए हैं, जबकि एशिया में यह औसत क्रमशः 22.7% और 9.4% है।
  • इस रिपोर्ट में भारत को नाइजीरिया और इंडोनेशिया के साथ उन तीन सबसे खराब देशों की सूची में रखा गया है, जहाँ वृद्धिरोध के मामलों में सबसे अधिक असमानता देखी गई, इन देशों में विभिन्न समुदायों के बीच वृद्धिरोध के स्तर का अंतर लगभग चार गुना था।
  • वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2020 [Global Hunger Index (GHI), 2020] में भारत को विश्व के 107 देशों में 97वें स्थान पर रखा गया है। इस सूचकांक में भारत क्षेत्र के अन्य देशों जैसे- श्रीलंका (64वें), नेपाल (73वें), पाकिस्तान (88वें), बांग्लादेश (75वें), इंडोनेशिया (70वें) आदि से भी पीछे है।
    • गौरतलब है कि वर्ष 2019 में इस सूचकांक में भारत 117 देशों में 102वें स्थान पर रहा था, जबकि वर्ष 2018 में भारत को 103वें स्थान पर रखा गया था।   
  • इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14 प्रतिशत आबादी ‘अल्पपोषित’ (Undernourishment) है और देश में ‘बाल मृत्यु’ (Child Mortality) दर को 3.7% बताया गया है।

खाद्य और कृषि संगठन

(Food and Agriculture Organization- FAO):

  • खाद्य और कृषि संगठन, संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी विशेषज्ञता प्राप्त एजेंसियों में से एक है।
  • इसकी स्थापना 16 अक्तूबर, 1945 को की गई थी।
  • FAO की स्थापना का उद्देश्य ग्रामीण आबादी के जीवन निर्वाह की स्थिति में सुधार करते हुए पोषण और जीवन स्तर को उन्नत बनाने तथा  कृषि उत्पादकता में सुधार करना था। 
  • इसका मुख्यालय रोम (Rome), इटली में स्थित है।
  • वर्तमान में भारत सहित विश्व के 194 देश इस संगठन के सक्रिय सदस्य हैं।

प्रभाव:

  • पोषक तत्त्वों से युक्त भोजन की कमी लोगों को गंभीर बीमारियों के प्रति सुभेद्य बनाती है,  इसके कारण मृत्यु दर के आँकड़ों में भी वृद्धि होती है।
  • शरीर में पोषक तत्त्वों का अभाव संज्ञानात्मक क्षमता में कमी को बढ़ाता है।
  • किसी भी देश में स्वस्थ, शिक्षित और  कुशल आबादी मानव संसाधन के रूप में उस देश के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है परंतु देश में अस्वस्थ और कुपोषित लोगों की आबादी उस पर एक भार बन जाती है तथा इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट के रूप में देखने को  मिलता है।
  • देश में महिलाओं में कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भविष्य की पीढ़ियों को भी प्रभावित करती हैं।  एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में प्रच्छन्न भुखमरी (Hidden Hunger) से प्रभावित सबसे अधिक महिलाएँ और बच्चे दक्षिण एशिया (विशेषकर भारत) में रहते हैं। 
    • प्रच्छन्न भुखमरी से आशय विटामिन और खनिजों की कमी से है। प्रच्छन्न भुखमरी तब होती है जब लोगों द्वारा सेवन किये जाने वाले आहार की गुणवत्ता उनकी पोषक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती है, अर्थात् भोजन में उन सूक्ष्म पोषक तत्त्वों जैसे-विटामिन और खनिजों की कमी पी जाती है जो कि उनकी वृद्धि और विकास के लिये आवश्यक हैं। 

कारण:

  • गुणवत्तापूर्ण आहार की कमी:  देश की एक बड़ी आबादी में विटामिन और अन्य महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों की कमी का सबसे प्रमुख कारण गुणवत्तापूर्ण आहार का अभाव है। देश में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों को  उनकी आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में सब्जियाँ, फल, दालें और पशु उत्पाद उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। 
  • महँगाई: गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से देश में प्रचलित प्रमुख आहार जैसे-गेहूँ, चावल और मकई आदि की तुलना में सब्जी, फल, दाल तथा पशु उत्पादों के मूल्य में भारी वृद्धि हुई है जिसके कारण सभी लोगों के लिये नियमित रूप से इनका सेवन करना संभव नहीं हो पाता है। 
  • कृषि क्षेत्र में विविधता का अभाव: स्वतंत्रता के बाद से देश में कृषि उत्पादन में लगभग पाँच गुना वृद्धि (वर्ष 2018-19 में 281 मिलियन टन) हुई है, हालाँकि इस दौरान पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है। 
  • इसका एक मुख्य कारण यह है कि भारत में गेहूँ और चावल जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में वृद्धि पर ही विशेष ध्यान दिया गया है। जिसकी वजह से अन्य पारंपरिक फसलों, फल व सब्जियों के उत्पादन और खपत में भारी गिरावट आई है। 
  • गौरतलब है कि 75 वर्ष पहले FAO की स्थापना के समय भी नीति निर्धारकों द्वारा कृषि उत्पादकता में सुधार से पहले मानव पोषण में सुधार के मुद्दे को अधिक प्राथमिकता दी गई। हालाँकि भारत में इस दिशा में अधिक प्रगति नहीं हुई। 
  • पलायन : भारत में जनसंख्या में हुई तीव्र वृद्धि के बीच कई राज्यों में जनसंख्या की तुलना में आवश्यक संसाधनों का विकास नहीं हो पाया है जिसके कारण ऐसे राज्यों की एक बड़ी आबादी को अपनी आजीविका के लिये देश के दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। रोज़गार की अनिश्चितता और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लोगों के लिये पोषक तत्त्वों की कमी के मामलों में वृद्धि होती है और इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर देखने को मिलता है।
  • शिक्षा और जागरूकता: भारत के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में (विशेषकर महिलाओं में) खाद्य पदार्थों में पोषक तत्त्वों की भूमिका और स्वास्थ्य पर इनके प्रभावों के प्रति जागरूकता का अभाव इस संकट का एक प्रमुख कारण है। 
  • ‘वैश्विक पोषण रिपोर्ट-2020' के अनुसार भारत में प्रजनन योग्य आयु की दो में से एक महिला में एनीमिया के मामले देखे गए हैं। कुपोषित महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चों को कुपोषण के साथ-साथ कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
  • योजनाओं का क्रियान्वयन: भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही देश में खाद्य सुरक्षा और कुपोषण जैसी समस्याओं से निपटने के लिये कई महत्त्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की गई, हालाँकि वर्तमान में भी देश में इन समस्याओं से जुड़े मामलों के आँकड़े योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी कमी की ओर संकेत करते हैं।

समाधान:  

पोषक तत्त्वों के घनत्व में सुधार: 

  • देश में भोजन में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख अनाज (जैसे-गेहूँ, चावल आदि) या फूड स्टेपल्स (Food Staples) आवश्यक खनिज या विटामिन का घनत्त्व बहुत अधिक नहीं होता है,  ऐसे में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध इन खाद्य पदार्थों में पौष्टिक घटकों के घनत्व को बढ़ाने और अवांछनीय यौगिकों के घनत्व को कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये। 
  • इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये फूड फोर्टिफिकेशन की प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है, इस मामले में प्रधानमंत्री द्वारा आठ बायो-फोर्टीफाइड फसलों को बढ़ावा देने की पहल सराहनीय है।

फूड फोर्टिफिकेशन:  फूड फोर्टिफिकेशन,  खाद्य पदार्थों में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने हेतु प्रयोग की जाने वाली एक लागत प्रभावी, टिकाऊ और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित  खाद्य प्रसंस्करण की प्रक्रिया है। इसके तहत चावल, दूध, नमक, आटा आदि खाद्य पदार्थों में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने के लिये इनमें पहले से उपलब्ध पोषक तत्त्वों (लौह, आयोडीन, जिंक, विटामिन A एवं D जैसे प्रमुख खनिज पदार्थ एवं विटामिन) के स्तर में वृद्धि की जाती है।

  • इन फसलों को खाद्य-आधारित कल्याण कार्यक्रमों [जैसे- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्याह्न भोजन, आँगनवाड़ियों और राष्ट्रीय पोषण मिशन (पोषण अभियान) आदि] से जोड़ा जाना चाहिये, जिससे एक बड़ी आबादी तक इनकी पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
    • गौरतलब है कि विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Program- WFP) भारत सरकार द्वारा देश में ‘फोर्टिफाइड चावल' के उत्पादन पर कार्य किया जा रहा है।
    • इस पहल के तहत दिसंबर 2018 से  4,145 टन ‘फोर्टिफाइड चावल' का उत्पादन किया गया है और इसे वाराणसी में एक पायलट योजना के तहत 3 लाख स्कूली बच्चों में वितरित किया गया। 
    • राष्ट्रीय पोषण अभियान के तहत देश को वर्ष 2022 तक कुपोषण से मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया।

उर्वरक का चुनाव:

  • नाइट्रोजन युक्त उर्वरक प्रधान खाद्य पदार्थों में प्रोटीन, खनिज और विटामिन के घनत्व को बढ़ाते हैं, उर्वरकों में जिंक और आयोडीन के उचित मिश्रण से अनाज में भी जिंक और आयोडीन के घनत्व  में वृद्धि की जा सकती है।

खाद्य विविधता: 

  • लोगों के लिये आवश्यक पोषक तत्त्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये उनके दैनिक भोजन में शामिल खाद्य पदार्थों में विविधता लाना और इसे वहनीय बनाना बहुत ही आवश्यक है।
  • गौरतलब है कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा वर्ष 1970 में ‘ऑपरेशन फ्लड’  की शुरुआत के बाद देश में दुग्ध उत्पादन और इसकी खपत में भारी वृद्धि देखी गई थी।
  • वर्तमान समय में देश में सब्जियों, दालों और फलों के उत्पादन तथा खपत को बढ़ाने के लिये इसी प्रकार की एक पहल को शुरू किया जाना बहुत आवश्यक है।
  • हाल ही में सरकार द्वारा कृषि अधिनियमों में किये गए सुधार इस क्षेत्र में एक मज़बूत आपूर्ति शृंखला के विकास का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।    

आगे की राह: 

  • देश की स्वतंत्रता के बाद से ही कृषि क्षेत्र की अधिकांश नीतियाँ मुख्य रूप से कृषि उपज में वृद्धि करने पर केंद्रित रही हैं परंतु कृषि के माध्यम से पोषण में सुधार के प्रयासों के  बड़े आर्थिक और दूरगामी लाभ हो सकते हैं।   
  • सरकार को कुपोषण की चुनौती से निपटने के लिये बहु-पक्षीय प्रयासों को बढ़ावा देना होगा जिसमें खाद्य विविधता, उपज की गुणवत्ता में सुधार, कृषि उपज के विपणन और खाद्य पदार्थों के वितरण हेतु मज़बूत आपूर्ति शृंखला की स्थापना, शिशु और मातृत्व कल्याण योजनाओं का विकास आदि शामिल हैं।  
  • इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसरों के विकास, योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु पंचायतों की भूमिका में सुधार, स्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रति जागरूकता, कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि आदि पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

अभ्यास प्रश्न: भारत में कृषि उत्पादकता में वृद्धि के कई सफल प्रयासों के बावज़ूद आज भी कुपोषण एक गंभीर समस्या बनी हुई है। देश में कुपोषण के मामलों में वृद्धि के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालते हुए इसके समाधान के विकल्पों का उल्लेख कीजिये।