सौर ऊर्जा क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता | 25 Mar 2026
यह संपादकीय 23/03/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित “Realising solar power’s potential for energy security” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत के उपभोग-आधारित सौर ऊर्जा मॉडल की ओर संक्रमण का विश्लेषण करता है, जिसमें रिकॉर्ड तोड़ क्षमता वृद्धि और भंडारण तथा ग्रिड आधुनिकीकरण की तत्काल आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित किया गया है। यह विश्लेषण करता है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आए झटकों के बीच डिस्कॉम और अपस्ट्रीम विनिर्माण में संरचनात्मक सुधार किस प्रकार भारत के ऊर्जा भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।
प्रिलिम्स के लिये: PM सूर्य घर योजना, PM-KUSUM, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), PLI योजना
मेन्स के लिये: भारत में सौर ऊर्जा का विकास, प्रमुख चुनौतियाँ और आवश्यक उपाय।
तेल आपूर्ति शृंखलाओं पर बार-बार पड़ने वाले भू-राजनीतिक आघातों के बीच, भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में प्रयास क्रमशः सौर ऊर्जा पर आधारित होते जा रहे हैं। एक दशक में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता बढ़कर लगभग 143 गीगावॉट हो जाने के साथ, भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेज़ी से बढ़ते सौर ऊर्जा बाज़ारों में से एक बनकर उभरा है। फिर भी, इस व्यापकता के बावजूद, ग्रिड एकीकरण, पारेषण संबंधी बाधाएँ और मांग-आपूर्ति असंतुलन (डक कर्व) जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। भारत के सौर ऊर्जा परिवर्तन का अगला चरण विकेंद्रीकृत, खपत-आधारित मॉडलों में निहित है, जिसमें छत पर लगे सौर पैनल को इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग और भंडारण समाधानों के साथ एकीकृत किया जाएगा।
भारत में सौर ऊर्जा विकास की वर्तमान स्थिति क्या है?
- ऐतिहासिक क्षमता विस्तार और ऊर्जा सुरक्षा: भारत में सौर ऊर्जा के तेज़ी से विकास ने राष्ट्रीय ऊर्जा परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है, जिससे न्यून कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादन की ओर एक ऐतिहासिक परिवर्तन हो रहा है और वैश्विक जलवायु नेतृत्व को मज़बूती मिल रही है।
- क्षमता में यह तीव्र विस्तार आयातित जीवाश्म ईंधन की अस्थिर कीमतों के प्रति व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावी ढंग से सुरक्षित रखता है, साथ ही मज़बूत, दीर्घकालिक ग्रिड संसाधन पर्याप्तता सुनिश्चित करता है।
- फरवरी 2026 तक, संचयी स्थापित सौर क्षमता 143.6 गीगावाट को पार कर गई, जिससे देश की कुल गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 50% के ऐतिहासिक आँकड़े को पार कर गई।
- वर्ष 2025 में 36.6 गीगावाट की रिकॉर्ड तोड़ वार्षिक वृद्धि ने आधिकारिक तौर पर भारत को विश्व के तीसरे सबसे बड़े सौर ऊर्जा उत्पादक के रूप में स्थापित कर दिया है।
- विकेंद्रीकृत रूफटॉप सोलर के माध्यम से राजकोषीय समेकन: विकेंद्रीकृत आवासीय सौर ऊर्जा उत्पादन वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर लगातार पड़ने वाले क्रॉस-सब्सिडी के बोझ को काफी हद तक कम करके राज्य के राजकोषीय समेकन के लिये एक शक्तिशाली साधन के रूप में कार्य करता है।
- परिवारों को स्व-उत्पादित विद्युत के लिये सक्षम बनाना, प्रणालीगत उपयोगिता हानियों को कम करता है तथा राज्य की पूँजी को अधिक उत्पादक सार्वजनिक अवसंरचना निवेशों की ओर पुनर्निर्देशित करता है।
- PM सूर्य घर योजना के तहत दिसंबर 2025 तक 26 लाख से अधिक घरों में सूर्यघर स्थापित किये गए, जिसके लिये केंद्र सरकार की ओर से 14,771 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता वितरित की गई।
- इस विशेष पहल से अकेले वर्ष 2025 में 7.1 गीगावाट की रूफटॉप क्षमता जुड़ गई, जिससे संभावित रूप से 25 वर्षों में कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य उत्सर्जन में 720 मिलियन टन की कमी आएगी।
- घरेलू विनिर्माण में डीपटेक अपग्रेडेशन: घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बुनियादी मॉड्यूल असेंबली से डीपटेक, उच्च-दक्षता वाले आर्किटेक्चर की ओर सक्रिय रूप से परिवर्तित हो रहा है, जिससे अप्रचलित आयात पर निर्भरता रणनीतिक रूप से कम हो रही है।
- उन्नत सेल प्रौद्योगिकियों की ओर यह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उच्च तापमान वाले वातावरण में उत्पादन क्षमता को बढ़ाता है, जिससे उपयोगिता-स्तरीय परियोजनाओं के लिये भूमि उपयोग को अनुकूलित किया जा सकता है।
- वर्ष 2025 के दौरान, उद्योग ने निर्णायक रूप से उच्च दक्षता वाले एन-टाइप TOPCon (टनल ऑक्साइड पैसिवेटेड कॉन्टैक्ट) और HJT सेल की ओर रुख किया, जिसमें TOPCon नई क्षमता वृद्धि के 90% से अधिक (मर्कम इंडिया रिसर्च, 2025) के लिये जिम्मेदार है।
- 24,000 करोड़ रुपये की PLI योजना के समर्थन से, घरेलू मॉड्यूल उत्पादन क्षमता प्रभावशाली रूप से बढ़कर 173.4 गीगावाट हो गई, जबकि मूलभूत सेल क्षमता वर्ष 2026 की शुरुआत तक 29.3 गीगावाट तक पहुँच गई।
- जलवायु-अनुकूल कृषि और पारिस्थितिक तालमेल: कृषि अर्थव्यवस्था के भीतर विकेंद्रीकृत सौर अवसंरचना को एकीकृत करने से विश्वसनीय सिंचाई सुनिश्चित करते हुए डीज़ल-प्रेरित पारिस्थितिक क्षरण पर सख्ती से अंकुश लगाकर जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलता है।
- यह दोहरे उपयोग वाली नीति विशाल सौर पार्कों के प्रभाव को कम करती है, सुभेद्य आवासों की रक्षा करती है और आर्द्रभूमि संरक्षण लक्ष्यों के अनुरूप सतत भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है।
- PM-KUSUM योजना ने वर्ष 2025 के अंत तक 9.2 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सौर पंपों की स्थापना को सफलतापूर्वक सुगम बनाया, जिससे कृषि में स्वच्छ, ऑफ-ग्रिड ऊर्जा के उपयोग को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिला।
- इसके अतिरिक्त, 3.5 गीगावाट सौर-पवन संकर तथा फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं का विस्तार भूमि उपयोग संघर्षों और पारिस्थितिक दबाव को न्यूनतम करता है।
- सामरिक स्वायत्तता और द्विपक्षीय जलवायु कूटनीति: भारत अपनी तेज़ी से बढ़ती सौर विनिर्माण क्षमता का सक्रिय रूप से लाभ उठाकर ग्लोबल साउथ कूटनीति को मज़बूत करता है तथा द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारियों को गहरा करता है, जिससे वह अपनी विकासात्मक संप्रभुता का दावा करता है।
- बहुपक्षीय संस्थानों का समर्थन करके, नई दिल्ली जलवायु नियमों का पालन करने वाले देश से नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों और संस्थागत शासन ढाँचे के एक महत्त्वपूर्ण निर्यातक देश के रूप में प्रभावी रूप से परिवर्तित हो रही है।
- फरवरी 2026 में भारत-फ्राँस संबंधों को 'विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा दिये जाने से संयुक्त ऊर्जा पहलों को मज़बूती मिली, जिसमें पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के यूरोपीय कार्यालय को आगे बढ़ाना भी शामिल है।
- इसके अलावा, भारतीय सौर मॉड्यूल निर्यात में साल-दर-साल 65% से अधिक की वृद्धि हुई और यह वर्ष 2025 की तीसरी तिमाही में 344 मिलियन डॉलर से अधिक हो गया, जिससे वैश्विक स्तर पर रणनीतिक व्यापार संबंधों को काफी मज़बूती मिली।
- AI-संचालित ग्रिड एकीकरण और उपग्रह निगरानी: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत स्थानिक प्रौद्योगिकियों की तैनाती सौर परिसंपत्ति प्रबंधन, पूर्वानुमानित मौसम पूर्वानुमान और वास्तविक समय ग्रिड संतुलन में क्रांति ला रही है।
- द्विपक्षीय तकनीकी सहयोग का लाभ उठाने से जलवायु-प्रेरित विसंगतियों के विरुद्ध सौर अवसंरचना की परिचालन समुत्थानशीलता बढ़ती है तथा गहन स्तर के संसाधन मानचित्रण को अनुकूलित किया जाता है।
- भारत और फ्राँस का संयुक्त TRISHNA उपग्रह मिशन, सौर पार्क के सटीक स्थान निर्धारण के लिये प्राकृतिक संसाधन मूल्यांकन को अनुकूलित करने हेतु उच्च-रिज़ॉल्यूशन थर्मल इमेजिंग का सक्रिय रूप से उपयोग करता है।
- साथ ही, भारत के विस्तारित विकेंद्रीकृत उत्पादन आधार से उत्पन्न होने वाले जटिल द्वि-पक्षीय बिजली प्रवाह को सुचारू रूप से प्रबंधित करने के लिये AI-संचालित डिजिटल विज्ञान नेटवर्क का उपयोग तेज़ी से किया जा रहा है।
- निजी पूंजी का प्रवाह और खुली पहुँच का लोकतंत्रीकरण: अनुकूल नियामक ढाँचे और निरंतर नीतिगत स्थिरता ने वाणिज्यिक ऊर्जा तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण किया है, जिससे नवीकरणीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी पूंजी का प्रवाह हुआ है।
- कैप्टिव सौर ऊर्जा उत्पादन की ओर कंपनियों का यह संक्रमण औद्योगिक परिचालन लागत को काफी कम करता है, जिससे भारतीय विनिर्माण की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता और लागत-दक्षता में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि होती है।
- दिसंबर 2025 तक भारत की कुल स्थापित सौर ऊर्जा ओपन-एक्सेस क्षमता रिकॉर्ड 30 गीगावाट से अधिक हो गई, जिसका मुख्य कारण वाणिज्यिक उद्यमों द्वारा डिस्कॉम से स्वतंत्र रूप से सस्ती एवं पर्यावरण के अनुकूल बिजली की तलाश करना था।
- इसके अलावा, नवीकरणीय ऊर्जा के लिये केंद्रीय बजट 2025-26 में आवंटित 26,549 करोड़ रुपये की राशि मज़बूत सरकारी समर्थन का संकेत देती है, जो पर्याप्त विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को सक्रिय रूप से आकर्षित कर रही है।
- रेलवे और परिवहन में सौर ऊर्जा का विस्तार: भारी अवसंरचना नेटवर्क, विशेष रूप से राष्ट्रीय परिवहन और रेल ग्रिड में सौर ऊर्जा उत्पादन का व्यवस्थित एकीकरण, सार्वजनिक गतिशीलता के लक्षित डीकार्बोनाइज़ेशन को गति देता है।
- यह अवसंरचनात्मक तालमेल न केवल परिचालन संबंधी कार्बन उत्सर्जन को बहुत हद तक कम करता है, बल्कि निष्क्रिय भूमि संपत्तियों को कुशलतापूर्वक उच्च राजस्व उत्पन्न करने वाले बिजली केंद्रों में परिवर्तित करता है।
- रेलवे की खाली पड़ी ज़मीनों और सुविधाओं की छतों का उपयोग करके सौर ऊर्जा का उत्पादन करना, वर्ष 2030 तक भारतीय रेलवे के नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जक बनने के व्यापक मिशन में काफी सहायता करता है।
- साथ ही, स्थानीय सौर सूक्ष्म-ग्रिड को राजमार्गों पर विस्तारित विद्युत वाहन चार्जिंग नेटवर्क के साथ जोड़ा जा रहा है, जिससे दिन के समय उत्पन्न अतिरिक्त ऊर्जा का प्रभावी उपयोग संभव हो रहा है।
भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार को प्रभावित करने वाली प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
- एकीकरण में बाधाएँ और ग्रिड की अवशोषण क्षमता: परिवर्तनशील सौर ऊर्जा का तीव्र प्रवाह पुराने राष्ट्रीय ग्रिड की भौतिक और डिजिटल क्षमताओं से कहीं अधिक है, जिससे बिजली कटौती एवं आवृत्ति अस्थिरता बढ़ रही है।
- संध्याकालीन उच्च मांग के समय सौर उत्पादन में तीव्र गिरावट आती है, जबकि आधार-भार स्रोतों से लचीली ‘रैम्पिंग’ प्रतिक्रिया के अभाव में आपूर्ति और मांग के बीच प्रणालीगत असंतुलन बढ़ता जा रहा है।
- वर्ष 2026 तक, नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता के 50% से अधिक हिस्से के लिये जिम्मेदार है, लेकिन वास्तविक उत्पादन में यह केवल 22.2% (सत्र 2024-25) से लगभग 26% (जनवरी तक 2025-26) तक है, जो उपयोग में एक महत्त्वपूर्ण अंतर को उजागर करता है।
- वर्ष 2025 के अंत तक ट्रांसमिशन सबस्टेशन क्षमता वृद्धि लक्ष्य से 42% पीछे रह गई, जिससे क्षेत्रीय ग्रिड जाम की समस्या और बढ़ गई।
- अपस्ट्रीम वैल्यू चेन और प्रौद्योगिकी असंगतता: मॉड्यूल असेंबली का विस्तार होने के बावजूद, भारत आयातित वेफर्स और पॉलीसिलिकॉन पर गंभीर रूप से निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र वैश्विक आपूर्ति झटकों और तकनीकी अप्रचलन के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
- नवीनतम उच्च-उत्पादन सरकारी निविदाओं में निर्धारित TOPCon और HJT जैसे उन्नत दक्षता मानकों के साथ संतुलन स्थापित करने में घरेलू निर्माताओं को प्रायः चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- वर्ष 2026 की शुरुआत तक भारत की मॉड्यूल क्षमता लगभग 162 गीगावाट तक पहुँच गई, फिर भी सेल क्षमता केवल 29.3 गीगावाट के निम्न स्तर पर बनी हुई है, जिससे आंतरिक आपूर्ति में संरचनात्मक अंतर उत्पन्न हो रहा है। अपस्ट्रीम इनगॉट-वेफर विनिर्माण अभी भी नगण्य है, जिसके कारण इन मूलभूत घटकों के लिये 90% से अधिक आयात पर निर्भरता आवश्यक हो जाती है।
- वितरण क्षेत्र (डिस्कॉम) की वित्तीय अस्थिरता: राज्य के स्वामित्व वाली डिस्कॉम की लगातार वित्तीय कठिनाई एक 'भुगतान जोखिम' उत्पन्न करती है जो निजी निवेश को हतोत्साहित करती है और बिजली खरीद समझौतों (PPA) पर हस्ताक्षर करने में विलंब करती है।
- उच्च अंतर-सब्सिडी भार और लागत-अनुरूप न होने वाले टैरिफ इन उपयोगिताओं को विकेंद्रीकृत रूफटॉप सौर ऊर्जा के लिये आवश्यक अंतिम-बिंदु अवसंरचना को उन्नत करने से रोकते हैं।
- मार्च 2024 तक डिस्कॉम का संचित घाटा ₹6.92 ट्रिलियन था, जिसमें जून 2025 तक जनरेटरों को देय बकाया राशि 6.8 बिलियन डॉलर से अधिक हो गई थी।
- सुधारों के बावजूद, वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिये वार्षिक सब्सिडी निर्भरता ₹2.20 ट्रिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
- भंडारण की कमी और पीक-लोड शिफ्टिंग: सौर ऊर्जा का विस्तार मूलतः बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) की धीमी तैनाती से बाधित है, जो दिन के अधिशेष उत्पादन को शाम के समय स्थानांतरित करने के लिये आवश्यक हैं।
- उच्च प्रारंभिक लागत और स्वदेशी लिथियम-सेल निर्माण की कमी के कारण 'चौबीसों घंटे' (RTC) सौर ऊर्जा की दरें स्टैंड अलोन सौर ऊर्जा की तुलना में काफी अधिक बनी हुई हैं।
- वर्तमान भंडारण क्षमता लगभग 43.2 गीगावाट घंटा है, जो कि CEA द्वारा सत्र 2026-27 के लिये अनुमानित 82.37 गीगावाट घंटा की आवश्यकता से काफी कम है।
- यद्यपि वर्ष 2026 में BESS क्षमता में दस गुना वृद्धि होने की उम्मीद है, बाज़ार को अभी भी महत्त्वपूर्ण उच्च-वोल्टेज भंडारण उपकरणों के लिये 18-24 महीने की लीड टाइम का सामना करना पड़ता है (भारत में उपयोगिता-पैमाने पर BESS परियोजनाओं के लिये विशिष्ट विकास समयसीमा वर्तमान में 18 से 24 महीने तक होती है)।
- 'ओपन एक्सेस' और बैंकिंग में विनियामक अवरोध: राज्य-स्तरीय विनियामक बाधाएँ, जैसे कि प्रतिबंधात्मक 'बैंकिंग' प्रावधान और उच्च व्हीलिंग शुल्क, उच्च क्षमता वाले वाणिज्यिक एवं औद्योगिक (C&I) सौर क्षेत्र के विकास को बाधित कर रहे हैं।
- हाल ही में कई राज्यों ने डिस्कॉम के राजस्व की रक्षा के लिये नेट-मीटरिंग लाभों को सीमित करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट सौर ऊर्जा के अंगीकरण को प्रभावी रूप से हतोत्साहित किया जा रहा है।
- वर्ष 2025 में, केरल में 3 किलोवाट से कम की परियोजनाओं तक नेट-मीटरिंग को सीमित करने के प्रस्तावों के बाद इंस्टॉलेशन में भारी गिरावट देखी गई।
- महाराष्ट्र और अन्य अग्रणी राज्यों ने 'एनर्जी बैंकिंग' की सीमाएँ सख्त कर दी हैं, जिससे शहरी और औद्योगिक उपभोक्ताओं को सौर ऊर्जा में अपने निवेश को कम करने के लिये विवश होना पड़ा है।
- भूमि अधिग्रहण और पारिस्थितिक सुभेद्यता: खंडित भूमि स्वामित्व, बढ़ती अधिग्रहण लागत और पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण 'बंजर भूमि' की रक्षा करने की आवश्यकता के कारण 'सौर पार्क' मॉडल को बढ़ते प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।
- बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा के उपयोग और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों के आवासों के बीच संघर्ष के कारण कानूनी एवं क्रियान्वयन में लंबी देरी हुई है।
- परियोजना विकासकर्त्ताओं के अनुसार भूमि अधिग्रहण और वैधानिक स्वीकृतियाँ अब परियोजना जीवनचक्र में सबसे अधिक समय लेने वाले चरण बन गये हैं।
- वर्ष 2025 में, सोलर पार्क योजना के तहत चालू होने वाली बिजली की क्षमता केवल लगभग 3,084 मेगावाट तक ही पहुँच पाई क्योंकि डेवलपर्स को राइट-ऑफ-वे (ROW) और पर्यावरणीय स्वीकृतियों के लिये संघर्ष करना पड़ा।
- नीतिगत अनिश्चितता और 'ALMM' जनादेश: अनुमोदित मॉडल और निर्माताओं की सूची (ALMM) का अनिवार्य प्रवर्तन सस्ते, उच्च दक्षता वाले अंतर्राष्ट्रीय आयात को प्रतिबंधित करके अल्पकालिक आपूर्ति की कमी और लागत मुद्रास्फीति को जन्म देता है।
- शुल्क संरचनाओं में बार-बार होने वाले संक्रमण और अंतर-राज्यीय संचरण (ISTS) शुल्क छूटों की चरणबद्ध वापसी ने दीर्घकालिक परियोजना बोली प्रक्रिया में 'नियामक बाधा' उत्पन्न कर दी है।
- जून 2026 से प्रभावी होने वाले सौर सेल के लिये ALMM के जनादेश के कारण घरेलू आपूर्ति में कमी के चलते मॉड्यूल की कीमतों में पहले ही 10-15% की वृद्धि हो चुकी है।
- जून 2025 तक 100% ISTS छूट को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने से 'त्वरित क्रियान्वयन' की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप कई परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित हुई।
- दीर्घकालिक 'धैर्यपूर्ण' पूंजी की कमी: विशाल लक्ष्यों के बावजूद, सौर क्षेत्र को अपस्ट्रीम विनिर्माण और लंबी अवधि के भंडारण परियोजनाओं के लिये 'वित्तपोषण अंतर' का सामना करना पड़ता है, जिनके लिये अधिक समय और कम ब्याज दरों की आवश्यकता होती है।
- परंपरागत बैंक गैर-एकीकृत कंपनियों या कम ब्याज दरों वाली परियोजनाओं को वित्त पोषित करने में संकोच करते हैं, जिससे कुछ बड़े समूहों के बीच परिसंपत्तियों का केंद्रीकरण हो जाता है।
- वर्ष 2030 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये कुल निवेश की आवश्यकता 400 अरब डॉलर से अधिक है, फिर भी स्टैंड-अलोन सेल और वेफर इकाइयों के प्रति ऋण देने में सतर्कता बनी हुई है।
- वर्ष 2026 तक नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) को वित्तीय संस्थानों से बाज़ार की वास्तविकताओं के अनुरूप ऋण नीतियों को समायोजित करने का आग्रह करना पड़ा, ताकि केवल मॉड्यूल-आधारित विनिर्माण में ‘अवास्तविक/असंतुलित वृद्धि’ को रोका जा सके।
भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार को गति देने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
- आपूर्ति शृंखला का गहन स्तर का पश्चगामी एकीकरण: रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने के लिये, भारत को साधारण मॉड्यूल असेंबली से हटकर लक्षित पूंजी सब्सिडी के माध्यम से उच्च शुद्धता वाले पॉलीसिलिकॉन, इंगट और वेफर के घरेलू निर्माण की दिशा में अग्रसर होना चाहिये।
- ‘मेक इन इंडिया’ पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये अनुमोदित सूची ढाँचे तथा उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार करते हुए ऊपरी स्तर की सूक्ष्म मशीनरी और विशेष सौर-ग्रेड रसायनों को भी सम्मिलित करना आवश्यक है।
- यह ऊर्ध्वाधर एकीकरण घरेलू बाज़ार को वैश्विक वस्तु-अस्थिरता से सुरक्षित रखेगा और एक सुदृढ़, संपूर्ण सौर विनिर्माण मूल्य शृंखला सुनिश्चित करेगा।
- बैटरी ऊर्जा भंडारण की त्वरित तैनाती (BESS): सौर ऊर्जा को अनियमित स्रोत से स्थिर और नियंत्रित आपूर्ति में परिवर्तित करने के लिये उन्नत ‘व्यवहार्यता अंतर निधि (VGF)’ के माध्यम से उपयोगिता-स्तरीय बैटरी भंडारण का तीव्र विस्तार आवश्यक है।
- ‘चौबीसों घंटे’ नवीकरणीय निविदाओं और शिखर-भार स्थानांतरण अनिवार्यताओं के कार्यान्वयन से डेवलपर्स को भंडारण के साथ सौर ऊर्जा को संयोजित करने के लिये प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे ग्रिड की स्थिरता सुनिश्चित होगी।
- यह उपाय सायंकालीन शिखर मांग के दौरान दिन के अधिशेष उत्पादन के प्रभावी उपयोग को संभव बनाता है और राष्ट्रीय लोड प्रबंधन की ‘डक कर्व’ चुनौती का मूलतः समाधान करता है।
- वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का मौलिक वित्तीय सुधार: भुगतान अनुशासन लागू करने और सतत उपयोगिता स्वास्थ्य के लिये लागत-अनुरूप, बाज़ार-लिंक्ड टैरिफ की ओर संक्रमण के लिये विद्युत (संशोधन) विधेयक 2026 का संचालन महत्त्वपूर्ण है।
- अंतर-सब्सिडी का युक्तिकरण तथा एक सुदृढ़ ‘अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष’ की स्थापना निजी निवेशकों के जोखिम को घटाएगी और विद्युत क्रय समझौतों (PPA) के समयबद्ध निष्पादन को सुनिश्चित करेगी।
- उच्च-प्रवेश क्षमता वाले नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिडों के लिये आवश्यक व्यापक अंतिम-बिंदु अवसंरचना के उन्नयन के लिये वितरण कंपनियों की बैलेंस शीट को मज़बूत करना एक पूर्व शर्त है।
- वर्चुअल और ग्रुप नेट-मीटरिंग के माध्यम से लोकतंत्रीकरण: शहरी छतों की क्षमता को अनलॉक करने के लिये, नियामकों को वर्चुअल नेट-मीटरिंग (VNM) ढाँचे को अपनाने की आवश्यकता है, जो ऊँची इमारतों या सीमित स्थान वाले संस्थानों में रहने वाले निवासियों को ऑफ-साइट सौर संयंत्रों में शेयर रखने की अनुमति देता है।
- यह 'कम्युनिटी सोलर' मॉडल छत पर लगने वाली भौतिक सीमाओं को दरकिनार करता है तथा विभिन्न प्रकार के उपभोक्ताओं को कहीं और उत्पन्न हरित ऊर्जा के लिये अपने बिजली बिलों पर सीधे क्रेडिट प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।
- प्रतिबंधात्मक व्यक्तिगत मीटरों से एकत्रित आभासी प्लेटफॉर्मों में परिवर्तन से रूफटॉप क्रांति की समावेशिता और पैमाने में तेज़ी से वृद्धि होगी।
- डिजिटलीकृत स्मार्ट ग्रिड और स्वचालित उत्पादन नियंत्रण: राष्ट्रीय ग्रिड के आधुनिकीकरण के लिये वास्तविक समय में आवृत्ति विचलन और द्विदिशीय बिजली प्रवाह को प्रबंधित करने के लिये स्मार्ट मीटरिंग एवं AI-संचालित स्वचालित उत्पादन नियंत्रण (AGC) का सार्वभौमिक रूप से कार्यान्वयन आवश्यक है।
- उन्नत मौसम संबंधी पूर्वानुमान को SCADA-सक्षम वितरण नेटवर्क के साथ एकीकृत करने से बिजली कंपनियों को सौर ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि का पूर्वानुमान लगाने और वास्तविक काल में ग्रिड-संतुलन को अनुकूलित करने में सहायता मिलेगी।
- बिजली उत्पादन के प्राथमिक स्रोत के रूप में परिवर्तनशील सौर ऊर्जा के आने के साथ, कटौती को कम करने और सिस्टम की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये यह डिजिटल आधार आवश्यक है।
- सौर ऊर्जा और विद्युत गतिशीलता का समन्वित एकीकरण: हरित परिवहन को गति देने के लिये ‘सौर ऊर्जा संचालित विद्युत वाहन गलियारों’ का निर्माण आवश्यक है, जहाँ फास्ट-चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को ऑन-साइट सौर और माइक्रो-स्टोरेज के साथ सीधे एकीकृत किया जाता है।
- ऐसे समय-आधारित शुल्क लागू करना, जिनमें सौर शिखर समय के दौरान सस्ती दरें उपलब्ध हों, ‘स्मार्ट चार्जिंग’ को प्रोत्साहित करेगा और विद्युत वाहनों की बैटरियों को वितरित ग्रिड संतुलन साधन के रूप में उपयोग में लायेगा।
- यह क्षेत्रीय समन्वय मौजूदा वितरण परिसंपत्तियों का अनुकूलन करता है और एक स्व-स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित करता है, जहाँ स्वच्छ ऊर्जा सीधे शून्य-उत्सर्जन परिवहन को संचालित करती है।
- भू-स्थानिक भूमि शासन और कृषि-सौर ऊर्जा का विस्तार: भूमि उपयोग संबंधी विवादों को हल करने के लिये, सरकार को 'कृषि-सौर ऊर्जा' (एग्री-PV) और फ्लोटिंग सोलर को प्राथमिकता देनी चाहिये, जिससे भूमि की दोहरी उपयोगिता सुनिश्चित हो सके और जल वाष्पीकरण कम हो सके।
- 'भूमि-तटस्थ' सौर ऊर्जा संयंत्रों के स्थान निर्धारण के लिये एक राष्ट्रीय भू-स्थानिक एटलस विकसित करने से डेवलपर्स को खराब हो चुकी भूमि तथा नहर के शीर्ष पर स्थित परियोजनाओं की ओर मार्गदर्शन मिलेगा, जिससे उपजाऊ कृषि क्षेत्रों और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील जैव विविधता हॉटस्पॉट की रक्षा होगी।
- भूमि प्रबंधन के प्रति यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि सौर ऊर्जा का विस्तार खाद्य सुरक्षा या पारिस्थितिक अखंडता की कीमत पर न हो।
- विविधीकृत हरित वित्तपोषण और 'धैर्यपूर्ण' पूंजी साधन: विशाल निवेश अंतर को समाप्त करने के लिये विशेषीकृत ग्रीन बॉण्ड, इन्वेंटरी इनटेक (इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट) और लंबी अवधि की परियोजनाओं के लिये तैयार किये गए कम ब्याज वाले 'जलवायु ऋण' की शुरुआत की आवश्यकता है।
- घरेलू संस्थागत निवेशकों और पेंशन फंडों को 'ग्रीन क्रेडिट' जनादेश के माध्यम से नवीकरणीय क्षेत्र में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करने से उच्च-तकनीकी विनिर्माण के लिये आवश्यक धैर्यपूर्ण पूंजी उपलब्ध होगी।
- एक समर्पित 'नवीकरणीय ऊर्जा पुनर्वित्त एजेंसी' की स्थापना से ऋण की लागत और कम हो जाएगी, जिससे कम टैरिफ वाली सौर परियोजनाएँ अपने 25 वर्ष के जीवनचक्र में आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाएंगी।
निष्कर्ष:
भारत की सौर ऊर्जा यात्रा को अब केवल क्षमता-वृद्धि तक सीमित न रहकर दीर्घावधि भंडारण और स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों के एकीकरण के माध्यम से प्रणालीगत सुदृढ़ता की ओर उन्मुख होना चाहिये।
वितरण कंपनियों की वित्तीय व्यवहार्यता सुनिश्चित करना तथा उन्नत प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण के माध्यम से आपूर्ति शृंखला के प्रारंभिक चरणों को सुरक्षित करना रणनीतिक आत्मनिर्भरता के प्रमुख आधार सिद्ध होंगे।
विकेंद्रीकृत उत्पादन को विद्युत वाहन चार्जिंग जैसे स्थानीय उपभोग के साथ संतुलित करके भारत प्रभावी रूप से 'डक कर्व' और ग्रिड अस्थिरता को कम कर सकता है।
अंततः, भूमि-तटस्थ और पूंजी-कुशल दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करेगा कि सौर ऊर्जा सौर ऊर्जा भारत की नेट ज़ीरो- 2070 प्रतिबद्धता की आधारशिला बनी रहे।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न “केंद्रीकृत ग्रिड से विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा प्रणाली की ओर संक्रमण भारत के लिये तकनीकी चुनौती और वित्तीय अवसर दोनों प्रस्तुत करता है।” प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और वितरण आयोग सुधारों के संदर्भ में इस पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. सौर ऊर्जा में 'डक कर्व' क्या है?
यह एक ग्राफिक असंतुलन को दर्शाता है, जिसमें दोपहर के समय सौर आपूर्ति उच्चतम स्तर पर होती है (जब मांग कम होती है) और सूर्यास्त के समय आपूर्ति घट जाती है, ठीक उसी समय जब आवासीय मांग तेज़ी से बढ़ती है।
2. 'ALMM' अनिवार्यता का सौर विकासकर्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?
यह सरकारी स्वीकृत घरेलू मॉडलों के उपयोग को अनिवार्य बनाती है, जिससे स्थानीय उद्योग को प्रोत्साहन मिलता है, परंतु अल्पकाल में मूल्य वृद्धि और आपूर्ति की कमी की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
3. 'वर्चुअल नेट-मीटरिंग' क्या है?
यह एक ऐसी प्रणाली है, जो बिना छत-स्थल वाले उपभोक्ताओं को दूरस्थ सौर परियोजना में हिस्सेदारी प्राप्त करने तथा अपनी विद्युत बिलों में उसका समायोजन कराने की सुविधा देती है।
4. 'सेल' निर्माण 'मॉड्यूल' संयोजन की तुलना में अधिक कठिन क्यों है?
सेल निर्माण एक उन्नत प्रौद्योगिकी आधारित, पूंजी-गहन रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें उच्च शुद्धता वाले सिलिकॉन की आवश्यकता होती है, जबकि मॉड्यूल संयोजन मुख्यतः यांत्रिक प्रक्रिया है।
5. 'TRISHNA मिशन' का महत्त्व क्या है?
यह एक संयुक्त भारत-फ्रांस उपग्रह मिशन है, जो तापीय चित्रण के माध्यम से भूमि उपयोग की निगरानी करता है और सौर संयंत्रों के उपयुक्त स्थान निर्धारण में सहायक होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) को 2015 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में प्रारंभ किया गया था।
- इस गठबंधन में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश सम्मिलित हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न 1. भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुर संभावनाएँ हैं, हालाँकि इसके विकास में क्षेत्रीय भिन्नताएँ हैं। विस्तृत वर्णन कीजिये। (2020)