G20 का वैश्विक स्वरूप: वैश्विक नेतृत्व पुनर्निर्माण के अवसर | 29 Nov 2025

यह एडिटोरियल 28/11/2025 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित “Without great powers on board, G20 is adrift” लेख पर आधारित है। लेख में तर्क दिया गया है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त बनाने के लिये गठित G20, प्रमुख शक्तियों के अलग होने और प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर विफलता के कारण अपना महत्त्व खो चुका है, जिसके कारण भारत को अपना ध्यान क्वाड और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन जैसे मंचों पर केंद्रित करना पड़ रहा है।

प्रिलिम्स के लिये: G20, LiFE (पर्यावरण के लिये जीवनशैली), भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), मिशन 300 पहल, ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव, उबुंटू का अफ्रीकी दर्शन, ग्लोबल साउथ, WTO

मेन्स के लिये: वर्तमान वैश्विक शासन परिदृश्य में G20 द्वारा निभाई गई भूमिका, जोहांसबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2025 G20 शिखर सम्मेलन की मुख्य विशेषताएं, आज की वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में G20 की क्षमता को कमज़ोर करने वाले मुख्य कारक

G20 का गठन वर्ष 2008 की वित्तीय संकट अवधि में एक महत्त्वपूर्ण मंच के रूप में किया गया था जिसमें भारत और चीन जैसे स्थापित तथा उभरती अर्थव्यवस्थाएँ दोनों शामिल थीं। हाल ही में वर्ष 2025 में जोहांसबर्ग शिखर सम्मेलन में अमेरिका, चीन और रूस जैसे प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति ने इस मंच को केवल मध्य-शक्ति वाले देशों के समूह तक सीमित कर दिया है जिससे इसकी घटती प्रभावशीलता उजागर होती है।

वर्तमान में G20 क्लाइमेट फाइनेंस, संप्रभु ऋण, व्यापार संघर्ष तथा प्रवासन से संबद्ध महत्त्वपूर्ण वैश्विक समस्याओं के समाधान में संघर्ष कर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, सहभागिता की कमी तथा धीमी निर्णय-प्रक्रिया ऐसे प्रमुख अवरोध हैं जो इसकी भविष्यगत प्रासंगिकता एवं प्रभावशीलता को चुनौती देते हैं। वैश्विक शासन में इसकी भूमिका को पुनर्स्थापित करने हेतु तात्कालिक सुधारों की आवश्यकता है।

वर्तमान वैश्विक शासन परिदृश्य में G20 की क्या भूमिका है?

  • प्रमुख आर्थिक समन्वय मंच: G20 वैश्विक शासन को आकार देने वाले सबसे प्रभावशाली मंचों में से एक बन गया है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 85%, वैश्विक व्यापार का 75% और मानवता के दो-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। 
    • प्रारंभ में वित्तीय संकटों से निपटने के लिये समन्वय स्थापित करने हेतु गठित यह मंच अब आर्थिक स्थिरता, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, डिजिटल परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनावों से निपटने वाले एक व्यापक मंच के रूप में विकसित हो चुका है। 
      • वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान, G20 ने सामूहिक रूप से 5 ट्रिलियन डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज दिये, जिससे एक गहन वैश्विक मंदी को रोका जा सका।
    • खंडित और बहुध्रुवीय विश्व में, G20 उन्नत व उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद के लिये आवश्यक मंच प्रदान करता है, जिससे यह उन समस्याओं को सुलझाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है, जिनका समाधान कोई भी देश अकेले नहीं कर सकता।
  • वैश्विक ऋण का समाधान और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना: 60 से अधिक निम्न आय वाले देशों में ऋण संकट का उच्च जोखिम (विश्व बैंक) होने के कारण, वैश्विक ऋण प्रबंधन एक प्रमुख शासन चिंता का विषय बन गया है। 
    • ऋण निपटान के लिये G20 का सामान्य कार्यढाँचा वर्तमान में एकमात्र संरचित मंच है जो पारंपरिक ऋणदाताओं (पेरिस क्लब राष्ट्रों) और चीन तथा खाड़ी देशों जैसे नए ऋणदाताओं को एक साथ लाता है। 
    • ऋण पारदर्शिता, संवहनीय पुनर्भुगतान योजनाओं और ऋणदाता समन्वय को प्रोत्साहित करके, G20 उन त्रुटियों को रोकता है जो पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती हैं। 
    • इसी प्रकार, वित्तीय स्थिरता बोर्ड (FSB) के माध्यम से, G20 क्रिप्टोकरेंसी विनियमन, शैडो बैंकिंग और सीमा पार वित्तीय प्रवाह पर वैश्विक नियमों को सुदृढ़ करता है।
  • वैश्विक जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई और ऊर्जा परिवर्तन का नेतृत्व: वैश्विक जलवायु प्रगति के लिये G20 अपरिहार्य है, क्योंकि यह वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के लगभग 80% के लिये जिम्मेदार है। 
    • इसलिये, इसका नेतृत्व सीधे तौर पर यह निर्धारित करता है कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को पूरा किया जा सकता है या नहीं। हाल ही में G20 की घोषणाओं में वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने, क्लाइमेट फाइनेंस पोषण बढ़ाने और न्यायसंगत ऊर्जा परिवर्तनों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया है। 
    • भारत की G20 अध्यक्षता के अंतर्गत, हरित विकास संधि, LiFE (पर्यावरण के लिये जीवनशैली) और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन जैसी पहलों ने जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई के लिये नई रूपरेखा तैयार की है।
    • ये प्रतिबद्धताएँ UNFCCC के अंतर्गत वैश्विक वार्ताओं को प्रभावित करती हैं और हरित निवेश को प्रोत्साहित करती हैं।
  • बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार: वैश्विक शक्ति का उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर स्थानांतरण होने के कारण IMF, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र में सुधार आवश्यक हो गए हैं।
    • G20 अब इन सुधारों की अनुशंसा करने वाला अग्रणी मंच है।
      • विश्व बैंक की विकास वित्त में अतिरिक्त 100 बिलियन डॉलर संग्रहण की चल रही योजना, G20 की अनुशंसाओं का प्रत्यक्ष परिणाम है।
    • वर्ष 2023 में अफ्रीकी संघ को G20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने के लिये भारत का सफल प्रयास, वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाने तथा ग्लोबल साउथ को एक प्रबल समर्थन देने की दिशा में एक बड़ा कदम दर्शाता है।
  • डिजिटल गवर्नेंस और प्रौद्योगिकी मानकों को आकार देना: जैसे-जैसे डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ अर्थव्यवस्थाओं को बदल रही हैं, G20 AI एथिक्स, सीमा-पार डेटा फ्लो, साइबर सुरक्षा और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) पर वैश्विक मानक निर्धारित करने में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है। 
    • G20 ने आधार, UPI और डिजीलॉकर पर आधारित भारत के DPI मॉडल की सराहना की, जिसे विकासशील देशों के लिये अनुकरणीय, कम लागत वाला कार्यढाँचा बताया गया, जो डिजिटल गवर्नेंस में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। 
    • अंतर-संचालनीय डिजिटल प्लेटफॉर्मों को प्रोत्साहित करके, G20 वित्तीय समावेशन को मज़बूत करता है और महाद्वीपों में डिजिटल सेवाओं तक अभिगम्यता का विस्तार करता है।
  • वैश्विक स्वास्थ्य संरचना को मज़बूत करना: कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों की गंभीर कमज़ोरियों को उजागर किया, जिससे G20 को अपने स्वास्थ्य एजेंडे का विस्तार करने के लिये प्रेरित किया गया।
    • 2 बिलियन डॉलर की प्रारंभिक प्रतिबद्धताओं के साथ महामारी कोष का निर्माण, विकासशील देशों में पूर्व चेतावनी प्रणालियों, स्वास्थ्य सेवा बुनियादी कार्यढाँचे और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र का समर्थन करता है। 
    • G20 का समान वैक्सीन वितरण, निगरानी प्रणाली और फार्मास्यूटिकल्स के लिये सतत आपूर्ति शृंखला पर ध्यान केंद्रित करना वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में इसके व्यापक बदलाव को दर्शाता है।
  • खाद्य, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखला सुरक्षा सुनिश्चित करना: विश्व भू-राजनीतिक तनावों, प्राकृतिक आपदाओं और संघर्षों के कारण बार-बार व्यवधानों का सामना कर रहा है। 
    • G20 विविधीकरण, लचीले लॉजिस्टिक्स और पारदर्शी व्यापार तंत्र को बढ़ावा देकर आपूर्ति शृंखलाओं को स्थिर करने के लिये काम करता है। 
    • उदाहरण के लिये, ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव (काला सागर अनाज पहल) पर G20 वार्ता ने अफ्रीका और एशिया के सुभेद्य क्षेत्रों के लिये वैश्विक खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित रखने में सहायता की। 
    • वर्ष 2023 में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) की घोषणा वैश्विक आर्थिक अनुकूलनशीलता बढ़ाने के लिये वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों को आकार देने में G20 की भूमिका पर प्रकाश डालती है।
  • ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाना: G20 तेज़ी से विकासशील देशों की आवाज बनता जा रहा है।
    • भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रभाव के कारण क्लाइमेट जस्टिस, रियायती वित्त, प्रौद्योगिकी साझाकरण एवं विकास पथ जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया गया है। 
    • भारत की G20 अध्यक्षता- 2023— 60 शहरों में 200 से अधिक बैठकों की मेज़बानी ने अभूतपूर्व समावेशिता का प्रदर्शन किया तथा ऋण, खाद्य सुरक्षा और क्लाइमेट फाइनेंस पर ग्लोबल साउथ की चिंताओं को उजागर किया।

दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में आयोजित  G20 समिट- 2025 की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?

  • G20 जोहांसबर्ग नेताओं की घोषणा: अमेरिकी बहिष्कार के बावजूद, शिखर सम्मेलन ने एकजुटता, समानता और स्थिरता पर केंद्रित एक व्यापक घोषणा को अपनाया, जो उबुंटू के अफ्रीकी दार्शनिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है। 
    • इसने बहुपक्षीय सुधारों, जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई, न्यायसंगत आर्थिक प्रशासन और ग्लोबल साउथ में अधिक प्रतिनिधित्व के प्रति प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ किया।
    • महत्त्वपूर्ण अनुपस्थितियों के बावजूद शिखर सम्मेलन में शांति के लिये एक संयुक्त अपील जारी की गई जिसमें 'युद्ध का नहीं बल्कि शांति का युग' का आह्वान कर यूक्रेन, फिलिस्तीन, सूडान एवं DRC में अस्थिरता से संबद्ध मुद्दों को उठाया गया तथा व्यापारिक अलगाववाद के विरोध और बहुपक्षीय सहयोग के समर्थन की पुष्टि की गयी।
  • क्लाइमेट फाइनेंस और न्यायसंगत ऊर्जा परिवर्तन: सदस्यों राष्ट्रों ने क्लाइमेट फाइनेंस को बढ़ाने, पेरिस समझौते के अनुरूप न्यायसंगत परिवर्तन मार्गों को क्रियान्वित करने तथा कमज़ोर राष्ट्रों के लिये लॉस एंड डैमेज फंड की स्थापना करने का संकल्प लिया।
    • शिखर सम्मेलन ने वर्ष 2030 तक स्वच्छ ऊर्जा तक अभिगम्यता बढ़ाने पर केंद्रित मिशन 300 पहल का स्वागत किया।
  • ऋण स्थिरता सुधार: वैश्विक क्रेडिट रेटिंग कार्यढाँचों में सुधार तथा अफ्रीकी देशों पर लगने वाले असंगत ‘रिस्क प्रीमियम’ से निपटने के लिये एक नयी 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल कमीशन' की स्थापना की गयी है।
    • जलवायु के लिये ऋण और विकास के लिये ऋण स्वैप तथा बेहतर ऋणदाता समन्वय जैसे साधनों ने बढ़ते ग्लोबल साउथ ऋण संकट का समाधान किया।
  • युवा तथा लैंगिक सशक्तीकरण: शिखर सम्मेलन में युवाओं में 'नीट (NEET)' दर को घटाने के लिये 'नेल्सन मंडेला बे लक्ष्य' को अपनाया गया तथा महिलाओं की श्रम–भागीदारी बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया। 
    • महिलाओं को शांति की रक्षकों के रूप में मान्यता दी गई तथा संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने का आह्वान किया गया।
  • खाद्य सुरक्षा और असमानता: घोषणापत्र में खाद्य–मूल्यों को स्थिर करने, लघु कृषकों को समर्थन देने तथा पोषण–सुरक्षा को मज़बूत करने हेतु उबंटू–आधारित दृष्टिकोणों का समर्थन किया गया।
    • इसमें बाज़ार–अस्थिरता पर चिंता व्यक्त की गई तथा विशेषकर ग्लोबल साउथ में असमानता को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया।
  • डिजिटल और AI गवर्नेंस: नेताओं ने सुरक्षा, पारदर्शिता और मानवाधिकारों पर ज़ोर देते हुए एक वैश्विक AI शासन कार्यढाँचे पर सहमति व्यक्त की। 
    • शिखर सम्मेलन में डिजिटल डिवाइड को न्यूनतम करने, डिजिटल कौशल को बढ़ाने, डेटा गवर्नेंस मानदंडों की स्थापना और साइबर सुरक्षा में सुधार को प्राथमिकता दी गई।

G20 शिखर सम्मेलन- 2025 में भारत की ओर से प्रमुख नीति प्रस्ताव क्या हैं? 

  • भारत की G20 अध्यक्षता- 2023 से निरंतरता: पिछले मेज़बान के रूप में, भारत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य) विषय के तहत एक मज़बूत एजेंडा निर्धारित किया और यह सुनिश्चित किया कि जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई, सतत् विकास, डिजिटल अवसंरचना और ग्लोबल साउथ की पक्षधरता जैसी उसकी अनेक प्राथमिकताएँ आगामी अध्यक्षताओं में भी केंद्र में बनी रहें।
    • भारत के नेतृत्व में शुरू की गई नवीकरणीय ऊर्जा, सतत खाद्य सुरक्षा, पोषण मानकों और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के लिये वैश्विक प्रयास, G20 के परिणामों को प्रभावित कर रहे हैं।
  • शिखर सम्मेलन- 2025 हेतु भारत के प्रस्ताव (छह वैश्विक पहल):
    • वैश्विक पारंपरिक ज्ञान भंडार: एक डिजिटल मंच जिसका उद्देश्य सभ्यताओं के पारंपरिक ज्ञान (चिकित्सा, कृषि, संधारणीयता) को संरक्षित और साझा करना है ताकि प्राचीन ज्ञान वैश्विक स्तर पर सुलभ हो सके। 
    • अफ्रीका कौशल गुणक पहल: ‘ट्रेन-द-ट्रेनर’ मॉडल, जिसका लक्ष्य अगले दस वर्षों में अफ्रीका में एक मिलियन प्रशिक्षकों को प्रमाणित करना है ताकि महाद्वीप में मानव पूँजी का स्थायी विकास हो और समावेशी वृद्धि को बढ़ावा मिले। 
    • वैश्विक स्वास्थ्य सेवा प्रतिक्रिया दल: एक ऐसा प्रस्ताव जिसका उद्देश्य वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग, तैयारी और स्वास्थ्य सेवाओं तक समतामूलक अभिगम्यता को सुदृढ़ करना है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा वैश्विक कल्याण पर भारत के विशेष बल को परिलक्षित करता है।   
    • ओपन सैटेलाइट डेटा पार्टनरशिप: जलवायु, आपदा अनुकूलन, कृषि, और विकास संबंधी उपयोगों के लिये देशों के बीच उपग्रह डेटा के साझाकरण को प्रोत्साहित करना, जिससे वैश्विक निगरानी तथा सतत विकास प्रयासों को समर्थन मिले। 
    • महत्त्वपूर्ण खनिज चक्रीय अर्थव्यवस्था पहल: महत्त्वपूर्ण खनिजों (नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी, हरित तकनीक के लिये आवश्यक) के लिये संधारणीय उपयोग, पुनर्चक्रण और चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल को बढ़ावा देना, जो संसाधन सुरक्षा एवं हरित संक्रमण की दिशा में एक कदम है।
    • मादक पदार्थ-आतंकवाद गठजोड़ का मुकाबला करने की पहल: मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद के बीच संबंध को ध्यान में रखते हुए वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करना तथा इस कड़ी को तोड़ने हेतु समन्वित बहुपक्षीय कार्रवाई की अनुशंसा करना।

आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने में G20 की क्षमता को कमज़ोर करने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?

  • भू-राजनीतिक विभाजन खंड सहमति: प्रमुख शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक तनाव G20 एकता को गंभीर रूप से कमज़ोर करता है। 
    • अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व संघर्ष असंगत स्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। 
    • वर्ष 2025 के जोहांसबर्ग शिखर सम्मेलन में, अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने दक्षिण अफ्रीका के साथ एजेंडा विवादों के कारण भाग नहीं लिया जबकि चीन के शी जिनपिंग तथा रूस के व्लादिमीर पुतिन भी उपस्थित नहीं हुए जिससे केवल 17 नेता ही शामिल हुए और यह शिखर सम्मेलन एक प्रकार से ‘मिडिल पॉवर्स’ मंच बनकर रह गया।
    • रूस तथा चीन यूक्रेन पर स्पष्ट निंदा वाले वक्तव्यों को लगातार अवरुद्ध करते हैं तथा अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं, जिससे क्रियात्मक परिणामों का क्षरण होता है।
  • आम सहमति पर आधारित निर्णय लेने से उत्पन्न होने वाला गतिरोध: G20 को अपने विविध सदस्यों के बीच सर्वसम्मति की आवश्यकता होती है, जिसके परिणामस्वरूप न्यूनतम समान तत्त्वों पर आधारित समझौते ही बन पाते हैं।
    • वर्ष 2022 के बाली शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेन संदर्भों को रूस को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक नरम किया गया। हालाँकि वर्ष 2023 के नई दिल्ली सम्मलेन में इस मुद्दे से पूरी तरह परहेज़ किया गया।
    • अमेरिका व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है, जबकि ब्राज़ील और भारत सतत विकास लक्ष्यों (SDG) एवं क्लाइमेट जस्टिस पर ज़ोर देते हैं। बहुमत-आधारित मतदान या प्रवर्तन तंत्र के अभाव में घोषणाएँ केवल गैर-बंधनकारी सिफारिशों तक सीमित रह जाती हैं।
  • क्रियान्वयन तथा उपलब्धि के स्थायी अंतराल: G20 संकल्प प्रायः वास्तविक क्रिया-व्यवहार में परिणत नहीं हो पाते। विकासशील देशों के लिये क्लाइमेट फाइनेंस की प्रतिबद्धता विलंब से पूरी हुई। 
    • ऋण पुनर्संरचना के लिये कॉमन फ्रेमवर्क ने केवल कुछ ही निम्न-आय वाले देशों की सहायता की जबकि अनेक देश गंभीर संप्रभु ऋण संकट का सामना कर रहे हैं।
    • जीवाश्म ईंधन सब्सिडियाँ चरणबद्ध समाप्ति की प्रतिबद्धताओं के बावजूद उच्च स्तर पर बनी रहीं। 
    • डेब्ट सर्विस सस्पेंशन इनिशिएटिव ने अस्थायी राहत दी परंतु इसे स्थायी रूप से नवीनीकृत नहीं किया गया।  
  • एकपक्षीयता तथा संरक्षणवादी नीतियों में वृद्धि: बढ़ते एकतरफा कदम बहुपक्षीय भरोसे को क्षीण करते हैं। ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित शुल्क एवं चीन के साथ G2 व्यवस्था का विचार G20 प्रक्रियाओं को दरकिनार कर देते हैं। 
    • मज़बूत अमेरिकी डॉलर ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ऋण बोझ को बढ़ाया है। अमेरिकी ‘इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट’ के कारण यूरोपीय संघ ने भेदभावपूर्ण सब्सिडियों की शिकायत की जबकि संरक्षणवाद ने WTO प्रतिबद्धताओं को कमज़ोर किया जिनका समर्थन G20 सदस्य करते हैं।
  • उत्तर-दक्षिण समानता और समावेशिता के बीच गहराता अंतर: G20 की धनी-प्रधान सदस्यता वैश्विक विषमताओं को और गहरा करती है।
    • कोविड के बाद समृद्ध देशों द्वारा ‘आधिकारिक विकास सहायता’ (ODA) में कमी आयी। विकासशील क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले व्यापक डिजिटल डिवाइड के बीच, ग्लोबल साउथ जलवायु-ऋण विनिमय तथा जलवायु न्याय की माँग कर रहा है।
    • अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका में युवाओं के NEET (Not in Employment Education or Training) दरें जोहांसबर्ग लक्ष्यों के बावजूद उच्च बनी हुई हैं। 
    • अफ्रीकी उबंटू थीम ने इन अंतरालों को प्रतीकात्मक रूप से उजागर तो किया परंतु नये कोष उपलब्ध नहीं कराये गये क्योंकि ODA में कटौती से गरीब देशों की आवाज़ और हाशिये पर चली गयी।
  • औपचारिक संस्थागत कार्यढाँचे का अभाव: स्थायी सचिवालय बजट या स्टाफ न होने के कारण G20 रोटेशन-आधारित अध्यक्षता पर निर्भर रहता है जिससे असंगति उत्पन्न होती है। 
    • दक्षिण अफ्रीका का वर्ष 2025 कार्यकाल समन्वय समस्याओं से घिरा रहा; आगामी वर्ष 2026 की अमेरिकी अध्यक्षता की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
      • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि वर्ष 2026 के G20 शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका को आमंत्रित नहीं किया जायेगा जो इस मंच के इतिहास में पहली बार है कि किसी सदस्य राष्ट्र को बाहर रखा गया है।
    • डेटा गैप्स इनिशिएटिव (DGI-3) की प्रगति असमान है तथा केवल कुछ G20 अर्थव्यवस्थाएँ ही ऊर्जा खातों को संकलित कर रही हैं।
  • फोकस को कमज़ोर करने में एजेंडा ओवरलोड और मिशन क्रीप की भूमिका: मूल रूप से वित्तीय संकटों पर केंद्रित G20 के कार्यक्षेत्र का विस्तार अब AI प्रशासन स्वास्थ्य महामारी प्रवासन तथा असमानता जैसी बहुविध चुनौतियों तक हो चुका है जिससे संसाधन बिखर गये हैं।
    • यह ऐसे समय में हो रहा है जब WTO का अपीलीय निकाय ध्वस्त स्थिति में है तथा पुनर्जीवन हेतु कोई विश्वसनीय रोडमैप नहीं है जिससे नियम-आधारित व्यापार प्रणाली कमज़ोर होती जा रही है। BEPS वैश्विक न्यूनतम कर सुधार बार-बार विलंबित हो रहे हैं जिससे बड़े देशों के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं और समन्वित कर शासन की गति धीमी पड़ रही है।
    • लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धताओं के बावजूद जीवाश्म ईंधन सब्सिडियाँ बनी हुई हैं जो दर्शाता है कि मंच का कार्यक्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो चुका है।

वैश्विक शासन में G20 की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिये कौन-से प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है?

  • स्थायी सचिवालय की स्थापना: G20 के पास कोई औपचारिक सचिवालय नहीं है जिससे समन्वय तथा अनुवर्ती कार्रवाइयों में असंगति उत्पन्न होती है। 
    • सदस्य देशों को जेनेवा या सिंगापुर जैसे किसी तटस्थ स्थान पर लगभग 200 पेशेवरों से युक्त एक स्थायी सचिवालय स्थापित करना चाहिये जिसका वित्तपोषण सदस्य-योगदानों से हो।
    • यह संस्था प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन की निगरानी, संस्थागत स्मृति का संरक्षण तथा प्रतिज्ञाओं पर पारदर्शी प्रगति-प्रतिवेदन प्रकाशित करेगी। 
    • ऐसी संरचना के अभाव ने ऋण-राहत हेतु कॉमन फ्रेमवर्क जैसे क्षेत्रों में निम्न सफलता-स्तरों में योगदान दिया है जहाँ अब तक उच्च-जोखिम ऋण का केवल 7% ही कम किया जा सका है।
  • योग्यतापूर्ण बहुमत-मतदान की शुरुआत: वर्तमान सर्वसम्मति की आवश्यकता विलंब का कारण बनती है और नीतिगत निर्णयों को कमज़ोर बनाती है।
    • यदि गैर-सुरक्षा मुद्दों पर 75% अनुमोदन जैसे योग्यतापूर्ण बहुमत-मतदान तंत्र को लागू किया जाये तो G20 अधिक दक्षता से निर्णय ले सकेगा और उन शिथिल समझौतों से बच सकेगा जो हालिया शिखर सम्मेलनों में देखे गये।
    • इससेक्लाइमेट फाइनेंस, डिजिटल गवर्नेंस तथा ऋण-पुनर्गठन जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई संभव होगी।  
  • ऋण राहत तंत्र में सुधार: ऋण-राहत हेतु G20 का कॉमन फ्रेमवर्क जटिल प्रक्रियाओं और अकार्यक्षमता के कारण बाधित रहा है जिससे निम्न-आय वाले देशों में बढ़ते ऋण-संकट के बावजूद सीमित राहत मिल पाई। 
    • G20 सदस्यों को वार्ता-समयसीमाओं को सुव्यवस्थित करना चाहिये, ऋण-राहत प्रस्तावों का विस्तार करना चाहिये तथा समन्वित ऋण-पुनर्गठन सुनिश्चित करने हेतु निजी ऋणदाताओं की अनिवार्य भागीदारी का प्रावधान करना चाहिये। 
    • वर्ष 2025 के उत्तरार्द्ध तक केवल घाना और ज़ाम्बिया जैसे कुछ ही देशों को इस तंत्र का प्रभावी लाभ मिल सका और राहत-राशि उनके कुल ऋण-भार की तुलना में अपर्याप्त रही।
  • क्लाइमेट फाइनेंस की समयबद्ध उपलब्धता सुनिश्चित करना: यद्यपि G20 ने विकासशील देशों के जलवायु-उद्यमों को समर्थन देने हेतु प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर प्रदान करने का संकल्प किया था परंतु इस लक्ष्य की पूर्ति उल्लेखनीय विलंब से हो सकी।
    • G20 को वितरण-समय-सारिणी को औपचारिक रूप देना चाहिये तथा वित्त-संवितरण को सत्यापित जलवायु-प्रगति से जोड़ना चाहिये। 
    • लॉस ऐंड डैमेज फंड के पूर्ण क्रियाकरण तथा स्वच्छ ऊर्जा सुलभता-विस्तार पहलों को बढ़ाना वैश्विक जलवायु-लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये अनिवार्य है।
  • समावेशिता और प्रतिनिधित्व का विस्तार: G20 की वर्तमान सदस्यता में केवल प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं, लेकिन इसमें कई उभरते और विकासशील देशों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।
    • समूह को नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख देशों को शामिल करने के लिये विस्तार करना चाहिये तथा वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधारों पर ज़ोर देना चाहिये ताकि ग्लोबल साउथ देशों को अधिक मतदान शक्ति प्रदान की जा सके।
    • इस बढ़ी हुई समावेशिता से वैधता बढ़ेगी और यह सुनिश्चित होगा कि विविध विकासात्मक परिप्रेक्ष्य G20 नीतियों का मार्गदर्शन करेंगे।  
  • G20 एजेंडा और उत्तरदायित्व-तंत्र को सुव्यवस्थित करना: G20 के एजेंडा का लगातार विस्तार उसके ध्यान तथा संसाधनों को विभाजित कर रहा है।
    • समूह को वित्त, जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई, वैश्विक व्यापार एवं सामाजिक समावेशन जैसे मुख्य विषयों को प्राथमिकता देनी चाहिये और स्पष्ट उत्तरदायित्व-ढाँचे, अति-विलंबित पहलों के लिये सनसेट क्लॉज़ तथा नागरिक समाज व स्वतंत्र विशेषज्ञों की भागीदारी से मध्यावधि प्रगति-समीक्षाएँ सुनिश्चित करनी चाहिये। 
    • विश्व व्यापार संगठन (WTO) तंत्रों के पुनर्गठन तथा जीवाश्म ईंधन सब्सिडियों को चरणबद्ध समाप्त करना ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर शीघ्र ध्यान आवश्यक है।
  • डिजिटल और AI प्रौद्योगिकियों हेतु शासन-विकास: तेज़ी से हो रही डिजिटलाइज़ेशन तथा AI प्रगति के कारण नैतिक उपयोग, डेटा-प्राइवेसी और डिजिटल-डिवाइड को न्यूनतम करने हेतु एक सहयोगात्मक कार्यढाँचा आवश्यक है।
    • G20 को निष्पक्षता और समावेशन को बढ़ावा देने वाली डिजिटल गवर्नेंस-संधि पर वार्ता करनी चाहिये तथा उन जनसंख्याओं को जोड़ने हेतु अवसंरचनात्मक विकास के लिये वित्त-पोषण को प्रोत्साहित करना चाहिये जिनके पास अभी भी अभिगम्यता का अभाव है विशेषकर ग्लोबल साउथ में।

निष्कर्ष:

एक अधिक सुदृढ़ तथा अधिक उत्तरदायी G20 बहुपक्षवाद में भरोसा पुनर्निर्मित करने तथा क्लाइमेट फाइनेंस, संप्रभु ऋण संकट और डिजिटल गवर्नेंस जैसे वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी समाधान करने के लिये अत्यंत आवश्यक है। जैसा कि विदेश नीति विशेषज्ञ आगाह करते हैं, “विश्व की समस्याओं का समाधान सहमत नियमों पर आधारित वैश्विक सहयोग से ही संभव है; विकल्प 'जंगल के नियम' का है जहाँ समस्याओं का समाधान नहीं होता।” 

यह इस बात को रेखांकित करता है कि स्थिर वैश्विक भविष्य का निर्माण करने में सक्षम, अधिक उत्तरदायी, समावेशी तथा कार्यान्वयन-उन्मुख संस्था के रूप में G20 का रूपांतरण अब अत्यावश्यक हो गया है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न: 

प्रश्न. वैश्विक शासन में G20 की भूमिका को कमज़ोर करने वाली समकालीन भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा कीजिये। इसकी प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने के लिये किन मूलभूत सुधारों की आवश्यकता है?

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1. G20 की वैश्विक शासन में मूलभूत भूमिका क्या है?
G20 वैश्विक शासन को आकार देने वाला प्रमुख आर्थिक समन्वय मंच है जो वित्तीय स्थिरता, जलवायु परिवर्तन कार्रवाई, सतत् विकास और डिजिटल रूपांतरण जैसे क्षेत्रों में दिशा प्रदान करता है।

प्रश्न 2. G20 वर्तमान वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में संघर्ष क्यों कर रहा है?
इसके कार्यनिष्पादन में भू-राजनीतिक विभाजनों, सर्वसम्मति आधारित निर्णय-प्रक्रिया, क्रियान्वयन की कमियों, एकतरफावाद और औपचारिक संस्थागत ढाँचे के अभाव जैसी बाधाएँ मौजूद हैं।

प्रश्न 3. वर्ष 2025 के जोहांसबर्ग G20 शिखर सम्मेलन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
शिखर सम्मेलन में उबुंटू-आधारित एकजुटता, क्लाइमेट फाइनेंस, ऋण सुधार, AI गवर्नेंस, खाद्य-सुरक्षा तथा ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर बल दिया गया, जिससे भारत की क्षमता-वृद्धि पहलों को भी प्रमुखता मिली।

प्रश्न 4. G20 की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिये किन संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है?
महत्त्वपूर्ण सुधारों में स्थायी सचिवालय की स्थापना, योग्य बहुमत मतदान प्रणाली का प्रावधान, ऋण-राहत तंत्रों को मज़बूत बनाना, समावेशन का विस्तार और डिजिटल गवर्नेंस-कार्यढाँचा विकसित करना शामिल है।

प्रश्न 5. G20 वैश्विक जलवायु तथा विकास-परिणामों में किस प्रकार सुधार ला सकता है?
G20 समयबद्ध क्लाइमेट फाइनेंस उपलब्ध कराकर, न्यायसंगत ऊर्जा-रूपांतरण को समर्थन देकर, लॉस-एंड-डैमेज तंत्र को प्रभावी बनाकर और ग्लोबल साउथ की विकासात्मक आवश्यकताओं को प्राथमिकता देकर वैश्विक जलवायु तथा विकास-परिणामों में सुधार ला सकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1.‘‘G20 कॉमन प्रेमवर्क’’ के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह G20 और उसके साथ पेरिस क्लब द्वारा समर्थित पहल है।
  2. यह अधारणीय ऋण वाले निम्न आय देशों को सहायता देने की पहल है। (2022) 

उपर्युक्त कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)


प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किस समूह के सभी चारों देश G20 के सदस्य हैं?  (2020)

(a) अर्जेंटीना, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका एवं तुर्की

(b) ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया एवं न्यूज़ीलैंड

(c) ब्राज़ील, ईरान, सऊदी अरब एवं वियतनाम

(d) इंडोनेशिया, जापान, सिंगापुर एवं दक्षिण कोरिया

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न 1. यदि 'व्यापार यद्ध के वर्तमान परिश्य में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्य.टी.ओ.) को जिंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं,विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)