भारत के खाद्य सुरक्षा जाल का विस्तार | 12 Dec 2022

यह एडिटोरियल 10/12/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Expand the food safety net without any more delay” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली कवरेज से संबंधित मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

1960 के दशक के अंत में शुरू हुई हरित क्रांति (Green Revolution) एक ऐतिहासिक घटना थी जिसने भारत में खाद्य सुरक्षा (Food Security) की स्थिति को रूपांतरित कर दिया। इसने अगले तीन-चार दशकों में खाद्यान्न उत्पादन को तीन गुना कर दिया और इसके परिणामस्वरूप देश में खाद्य असुरक्षा और गरीबी दोनों स्तरों में 50% से अधिक की कमी आई। इस अवधि के दौरान जनसंख्या में वृद्धि के बावजूद यह उपलब्धि हासिल की गई।

  • कम से कम वृहद स्तर पर देश ‘खाद्य आत्मनिर्भर राष्ट्र’ बनने के सराहनीय कार्य में सफल रहा। लेकिन बढ़ते भूमि क्षरण, मृदा उर्वरता की हानि एवं जल-जमाव, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान (रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण) के साथ कृषक समुदाय को नवीन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, भूजल स्तर में गिरावट समस्या को और बढ़ा रही है।
  • इस परिदृश्य में, खाद्य स्थिरता/संवहनीयता को बनाए रखने के लिये भारत को इन मुद्दों पर समग्र रूप से विचार करने की आवश्यकता है।

खाद्य सुरक्षा क्या है?

  • खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, खाद्य सुरक्षा की स्थिति तब बनती है जब सभी लोगों के पास हर समय पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन के लिये भौतिक एवं आर्थिक पहुँच उपलब्ध होती है ताकि एक सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन के लिये उनकी आहार संबंधी आवश्यकताओं एवं खाद्य वरीयताओं की पूर्ति हो सके।
  • खाद्य सुरक्षा के तीन महत्त्वपूर्ण और निकटता से संबंधित घटक हैं: उपलब्धता (availability), अभिगम्यता (accessibility) और वहनीयता (affordability)।

भारत में खाद्य सुरक्षा के लिये वर्तमान ढाँचा

  • संवैधानिक प्रावधान:हालाँकि भारतीय संविधान में खाद्य या भोजन के अधिकार (Right To Food) के संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के मूल अधिकार की व्याख्या में मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार को निहित माना जा सकता है और इस क्रम में फिर भोजन का अधिकार एवं अन्य मौलिक आवश्यकताएँ भी इसमें शामिल होंगी।
  • बफर स्टॉक:यह भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India- FCI) का मुख्य उत्तरदायित्व है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्न की खरीद करे और विभिन्न स्थानों पर अवस्थित अपने गोदामों में इन्हें संग्रहीत रखे, जहाँ से आवश्यकतानुसार राज्य सरकारों को इसकी आपूर्ति की जा सकती है।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली:PDS के तहत वर्तमान में वितरण के लिये राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को गेहूँ, चावल, चीनी और किरासन तेल जैसी पण्य वस्तुओं का आवंटन किया जा रहा है।
    • कुछ राज्य/केंद्रशासित प्रदेश PDS आउटलेट्स के माध्यम से दाल, खाद्य तेल, आयोडीनयुक्त नमक, मसाले जैसे बड़े पैमाने पर उपयोग किये जाने वाले पण्य वस्तुओं का वितरण भी करते हैं।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA):यह खाद्य सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण में एक आमूलचूल परिवर्तन को इंगित करता है जहाँ अब यह कल्याण (welfare) के बजाय अधिकार-आधारित दृष्टिकोण (rights-based approach) में बदल गया है। NFSA निम्नलिखित माध्यमों से ग्रामीण आबादी के 75% और शहरी आबादी के 50% को दायरे में लेता है:
    • अंत्योदय अन्न योजना:इसमें निर्धनतम आबादी को दायरे में लिया गया है जो प्रति परिवार प्रति माह 35 किलोग्राम खाद्यान्न प्राप्त करने के हकदार हैं।
    • प्राथमिकता वाले परिवार (Priority Households- PHH): PHH श्रेणी के अंतर्गत शामिल परिवार प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्राप्त करने के हकदार हैं।

भारत में खाद्य सुरक्षा से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ

  • जलवायु परिवर्तन का संकट: संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन, चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ती खाद्य असुरक्षा के प्रमुख कारकों के रूप में देखा है।
    • बढ़ते तापमान, मौसम की परिवर्तनशीलता, आक्रामक फसलें एवं कीट और अधिक लगातार चरम मौसमी घटनाओं का खेती कार्यों पर हानिकारक प्रभाव पड़ा है और इसने कृषि उपज में कमी से लेकर उपज की पोषण गुणवत्ता में गिरावट और किसान आय की हानि जैसे सकल परिणाम उत्पन्न किये हैं।
  • कीट और खरपतवार के हमले: पिछले 15 वर्षों में भारत ने आक्रामक कीटों और खरपतवारों के 10 से अधिक हमलों का सामना किया है।
    • फॉल आर्मीवर्म (Fall Armyworm) कीट ने वर्ष 2018 में देश की मक्का की फसल को लगभग पूरी तरह से नष्ट कर दिया था। मक्का उत्पादन की इस क्षति के कारण भारत को वर्ष 2019 में मक्का का आयात करना पड़ा।
    • वर्ष 2020 में राजस्थान और गुजरात के कई ज़िले टिड्डियों (locust) के हमले की चपेट में आए।
  • अस्थिर बाज़ार मूल्य निर्धारण: वैश्वीकरण की अवधारणा ने कृषि वाणिज्य को अधिक खुलापन प्रदान किया है, लेकिन यह अधिक स्थिर बाज़ार मूल्य निर्धारण सुनिश्चित कर सकने में असमर्थ है।
    • अंतिम वस्तुओं के लिये लाभकारी कीमतों की कमी, संकटग्रस्त बिक्री, उच्च खेती लागत के साथ ही अनुपयुक्त बाज़ार मूल्यों का योग खाद्य सुरक्षा के मार्ग में अवरोध की तरह कार्य करता है।
  • जल-जमाव: अत्यधिक सिंचाई जल-जमाव का कारण बनती है जो प्रायः मृदा लवणता (Soil Salinity) की समस्या भी उत्पन्न करती है, क्योंकि जल-जमाव से ग्रस्त मृदा सिंचाई जल द्वारा आयातित लवणों के निक्षालन (leaching) को बाधित करती है।
    • जल-जमावग्रस्त मृदा की उपस्थिति पौधों की वृद्धि में बाधा डालती है और कृषि उत्पादकता को कम करती है।
  • खाद्य प्रबंधन नीति का अभाव: भारत में खाद्य सुरक्षा के लिये कठोर प्रबंधन नीति का अभाव है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खाद्यान्नों के लीकेज एवं डायवर्जन, समावेशन/बहिष्करण त्रुटियों, नकली एवं फर्जी राशन कार्ड और कमज़ोर शिकायत निवारण एवं सामाजिक लेखा परीक्षा तंत्र जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

जैव ईंधन की ओर ध्यान केंद्रित होना: जैव ईंधन बाज़ार के विकास ने खाद्य फसलों को उगाने के लिये उपयोग की जाने वाली भूमि की मात्रा को कम कर दिया है। इसके साथ ही, जैव ईंधन फसलों की उचित सिंचाई के साथ-साथ जैव ईंधन के निर्माण के लिये भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है, जो फिर स्थानीय एवं क्षेत्रीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाता जो खाद्य सुरक्षा का सार होता है।

खाद्य सुरक्षा से संबंधित हाल की सरकारी पहलें

आगे की राह

  • आधारभूत संरचना के विकास को प्राथमिकता देना: सरकार को गोदामों, कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं, फार्म-टू-फैक्ट्री गलियारों और प्रतिस्पर्द्धी बाज़ार सुविधाओं के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिये।
    • कृषि में पीपीपी मॉडल को बढ़ावा देने से अवसंरचना का तेज़ी से विकास होगा।
  • अधिक पारदर्शी खाद्य सुरक्षा उपाय: भारत सरकार निजी क्षेत्र में खाद्य स्टॉक विनियमन पर अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकती है। इसके लिये, निजी क्षेत्र द्वारा रखे जा सकने वाले भंडार पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है, क्योंकि वे प्रायः भविष्य में लाभ पर बिक्री के लिये खाद्य भंडार जमा करते हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, सट्टेबाजों पर ‘पोजीशन लिमिट’ निर्धारित की जा सकती हैं लेकिन इसके लिये बहुपक्षीय समझौते की आवश्यकता होगी और यह भारत की G20 अध्यक्षता में एजेंडे में शामिल किया जाना चाहिये।
  • ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना को सुदृढ़ बनाना: महामारी के चरम दिनों में प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा ने उजागर किया कि एक सार्वभौमिक PDS की कमी खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने की दिशा में एक प्रमुख बाधा है।
    • खाद्यान्न चाहने वाले व्यक्तियों को सार्वभौमिक राशन कार्ड जारी करने के माध्यम से ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना का संचालन किया जाना चाहिये ताकि देश में किसी भी भौगोलिक स्थान पर PDS तक पहुँचा जा सके।
  • सतत् कृषि की ओर: सतत् कृषि पद्धतियों, जैसे फसल चक्रण, दालों के साथ मिश्रित फसल, जैव उर्वरकों का उपयोग, कीटनाशकों के उपयोग को सीमित करना और एकीकृत कीट प्रबंधन को प्रोत्साहित और प्रचारित किया जाना चाहिये।
    • सिंचाई उद्देश्यों के लिये जल निकालने हेतु बिजली पर प्राप्त सब्सिडी को ड्रिप सिंचाई तकनीक अपनाने और सौर पैनल स्थापित करने के लिये पुनर्निर्देशित करके ड्रिप सिंचाई तथा सौर पैनलों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  • जलवायु-प्रत्यास्थी फसलों को प्रोत्साहन देना: ऐसी जलवायु-प्रत्यास्थी फसलों (Climate Resilient Crops) के विकास और वितरण के लिये निवेश की आवश्यकता है जो तापमान भिन्नता और वर्षा में उतार-चढ़ाव को झेल सकें।
    • सरकार को जल- और पोषक तत्व-कुशल फसलों (जैसे मोटे अनाज और दालें) के उत्पादन को वित्तीय प्रोत्साहन देना चाहिये और किसानों के लिये आकर्षक न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं इनपुट सब्सिडी की घोषणा करनी चाहिये।
  • कृषि कूटनीति: भारत प्रौद्योगिकी साझेदारी, सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देने हेतु संयुक्त अनुसंधान, जलवायु कुशल कृषि को बढ़ावा देने आदि के माध्यम से अफ्रीका और एशिया के अन्य विकासशील देशों को सहायता प्रदान कर सकता है, जिससे भारत ‘ग्लोबल साउथ’ के एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो सकता है।

अभ्यास प्रश्न: भारत के खाद्य सुरक्षा नेट में प्रमुख कमियों को रेखांकित करें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सार्वभौमीकरण के लिये उपाय प्रस्तावित करें।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रारंभिक परीक्षा

प्र. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का एक उद्देश्य देश के चिह्नित ज़िलों में स्थायी रूप से क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता वृद्धि के माध्यम से कुछ फसलों के उत्पादन में वृद्धि करना है।  वे फसलें कौन सी हैं?  (वर्ष 2010)

 (A) केवल चावल और गेहूँ
 (B) केवल चावल, गेहूँ और दालें
 (C) केवल चावल, गेहूँ, दालें और तिलहन
 (D) चावल, गेहूँ, दालें, तिलहन और सब्जियाँ

 उत्तर: (B)

मुख्य परीक्षा

 Q 1. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के साथ मूल्य सब्सिडी के प्रतिस्थापन से भारत में सब्सिडी का परिदृश्य कैसे बदल सकता है?  विचार-विमर्श कीजिये।  (वर्ष 2015)