WTO का 14वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन | 31 Mar 2026

प्रिलिम्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन, मुक्त व्यापार समझौता, सर्वोपरि राष्ट्र सिद्धांत, शुल्क और व्यापार पर सामान्य समझौता, विशेष और विभेदकारी उपचार

मेन्स के लिये: वैश्विक व्यापार में विश्व व्यापार संगठन का महत्त्व, विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता को कम करने वाली चुनौतियाँ।

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

कैमरून के याउंडे में विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) ई-कॉमर्स पर रोक (मोराटोरियम) को लेकर असहमति के कारण सर्वसम्मति के बगैर समाप्त हुआ।

  • साथ ही भारत ने WTO सदस्यों को व्यापार प्रतिशोध को सही ठहराने या विकासशील राष्ट्रों की वैध घरेलू नीतियों को चुनौती देने के लिये 'पारदर्शिता' संबंधी मानदंडों के शस्त्रीकरण के खिलाफ दृढ़ता से चेतावनी दी।
  • परिणामस्वरूप प्रमुख एजेंडा वस्तुओं पर चर्चा को जिनेवा में आगामी सामान्य परिषद (GC) की बैठक के लिये स्थगित कर दिया गया है।

सारांश

  • ई-कॉमर्स संबंधी नियमों, कृषि और पारदर्शिता मानदंडों पर विभाजन के कारण विश्व व्यापार संगठन 14वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) सर्वसम्मति के बगैर समाप्त हुआ, जो एक गहरे उत्तर-दक्षिण विभाजन को दर्शाता है।
  • ई-कॉमर्स पर रोक (स्थगन), खाद्य सुरक्षा (PSH) और विवादों के समाधान में सुधार जैसे प्रमुख मुद्दे WTO की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिये न्यायसंगत समझौते की आवश्यकता को उजागर करते हैं।

WTO के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के प्रमुख परिणाम क्या हैं?

  • ई-कॉमर्स पर रोक (स्थगन) की समाप्ति: सर्वसम्मति की कमी के कारण दशकों पुराने ई-कॉमर्स पर रोक (वर्ष 1998 से लागू) 26 वर्षों में पहली बार समाप्त हो गई है।  
    • सैद्धांतिक रूप से WTO सदस्य अब इलेक्ट्रॉनिक प्रसारणों पर कर लगाने से कानूनी रूप से प्रतिबंधित नहीं रहेंगे
  • ट्रिप्स सुरक्षा उपाय की समाप्ति: व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) समझौते के तहत गैर-उल्लंघन संबंधी शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय भी समाप्त हो गए।
    • विकासशील देश ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य में नीतियों के स्थान की रक्षा के लिये इस सुरक्षा उपाय पर निर्भर रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि अनिवार्य लाइसेंसिंग जैसे WTO-अनुपालक उपायों को आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • मत्स्य सब्सिडी: मंत्री दूरस्थ जल में मछली पकड़ने वाले बेड़े के लिये सब्सिडी कम करने पर बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए, जिसका उद्देश्य 15वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC15) में ठोस सिफारिशें करना है।
  • निवेश सुविधा के लिये विकास (IFD) का विरोध: भारत ने WTO ढाँचे में चीन के नेतृत्व वाले IFD समझौते को शामिल करने का दृढ़ता से विरोध किया और कहा कि यह WTO की कार्यात्मक सीमाओं और मूलभूत बहुपक्षीय सिद्धांतों को खतरे में डालता है।
  • ई-कॉमर्स समझौते में प्रगति: बहुपक्षीय ई-कॉमर्स कर प्रतिबंध की समाप्ति के बावजूद भाग लेने वाले देशों के गठबंधन (66 सदस्य, वैश्विक व्यापार के लगभग 70% को कवर करते हुए) ने बहुपक्षीय WTO समझौते पर इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स में प्रगति की।
    • यह समझौता डेटा प्रवाह, ऑनलाइन लेनदेन और उपभोक्ता संरक्षण सहित डिजिटल व्यापार के लिये सामान्य वैश्विक नियम स्थापित करना चाहता है।
  • कृषि: भारत और अफ्रीकी देशों ने खाद्य सुरक्षा के लिये सार्वजनिक भंडारण (PSH) पर एक स्थायी समाधान की दृढ़ता से मांग की है, जिससे WTO नियमों के अंतर्गत दंडित किये बगैर घरेलू खाद्य सब्सिडी में लचीलेपन की अनुमति मिल सके।
    • विकासशील देश बाज़ार पहुँच संबंधी बाधाओं, जलवायु आघातों और विकसित देशों में उच्च असंतुलित करने वाली सब्सिडियों के कारण होने वाली असमानताओं का सामना करना जारी रखते हैं।
    • विकसित देशों ने PSH लचीलेपन का विस्तार करने के लिये बहुत कम समर्थन दिखाया है।

ई-कॉमर्स स्थगन क्या है?

  • पृष्ठभूमि: सन् 1998 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सदस्य देशों ने इलेक्ट्रॉनिक प्रसारणों (जैसे– सॉफ्टवेयर डाउनलोड, डिजिटल संगीत, फिल्में और ई-बुक्स) पर सीमा शुल्क न लगाने पर सहमति व्यक्त की थी।
    • इस स्थगन को बाद के मंत्रिस्तरीय सम्मेलनों में समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है।
  • विभाजन:
    • विकसित देश (अमेरिका, यूरोपीय संघ): डिजिटल नवाचार को बढ़ावा देने, व्यापार लागत को कम करने और वैश्विक तकनीकी कंपनियों को स्थिरता प्रदान करने के लिये ई-कॉमर्स शुल्क पर स्थायी प्रतिबंध का समर्थन करते हैं।
    • विकासशील देश (भारत, दक्षिण अफ्रीका): यह तर्क देते हैं कि यह स्थगन संभावित सीमा शुल्क से होने वाली अरबों डॉलर की राजस्व हानि का कारण बनता है।
      • जैसे-जैसे भौतिक वस्तुएँ तेज़ी से डिजिटल रूप में परिवर्तित हो रही हैं, विकासशील देशों के पास अपने घरेलू डिजिटल उद्योगों को समर्थन देने और बहुराष्ट्रीय तकनीकी दिग्गजों के खिलाफ एक समान अवसर बनाने के लिये आवश्यक नीतिगत छूट कम होती जा रही है।

भारत ‘पारदर्शिता’ के शस्त्रीकरण को लेकर सतर्क क्यों है?

  • पारदर्शिता की अवधारणा: पारदर्शिता विश्व व्यापार संगठन (WTO) के व्यापार के तकनीकी अवरोध (TBT) समझौते की एक मुख्य घटक है।
    • इसके तहत सदस्य देशों के लिये यह अनिवार्य है कि वे अपनी व्यापार नीतियों, सब्सिडी और नियामक उपायों के बारे में नियमित और स्पष्ट रूप से जानकारी साझा करें।
  • सख्त नियमों के लिये अमेरिका का दबाव: अमेरिका और अन्य विकसित देश विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सुधार एजेंडे के हिस्से के रूप में कठोर अनिवार्य प्रकटीकरण नियमों का समर्थन कर रहे हैं।
    • उन्होंने उन देशों के लिये दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किये हैं जो समय पर WTO को घरेलू सब्सिडी, टैरिफ या नीतिगत बदलावों की सूचना देने में विफल रहते हैं।
  • भारत का रुख:
    • संस्थागत क्षमता की कमी: भारत ने यह रेखांकित किया कि कई विकासशील और अल्पविकसित देश (LDCs) वास्तव में इन कठोर तथा जटिल सूचना-प्रकटीकरण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये आवश्यक संस्थागत एवं तकनीकी क्षमता से वंचित हैं।
    • प्रतिशोध का जोखिम: दंड लगाना या अनुपालन न करने को व्यापारिक प्रतिशोध के बहाने के रूप में इस्तेमाल करना विकासशील देशों को अनुचित रूप से निशाना बनाता है।
      • भारत ने तर्क दिया कि पारदर्शिता का ‘हथियार’ बनाकर वैध घरेलू कल्याण नीतियों को चुनौती देने या बाज़ार खोलने के लिये मज़बूर करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिये।
    • दंडात्मक कार्रवाइयों के बजाय समर्थन की आवश्यकता: पारदर्शिता के दायित्वों को दंडात्मक कार्रवाइयों के बजाय सार्थक और निरंतर क्षमता-निर्माण समर्थन द्वारा समर्थित किया जाना चाहिये, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी सदस्य अपनी ज़िम्मेदारियों को निष्पक्ष रूप से पूरा कर सकें।

WTO को मज़बूत बनाने हेतु कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं?

  • विशेष और विभेदक व्यवहार (S&DT) की सुरक्षा: S&DT को एक संधि-आधारित अधिकार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिये, न कि राजनीति से प्रेरित ‘वस्तुनिष्ठ मानदंडों’ के माध्यम से इसे कमज़ोर किया जाना चाहिये।
    • पात्रता को अधिक सटीक और व्यावहारिक बनाया जाना चाहिये, ताकि वास्तविक विकासशील देशों को लाभ मिल सके, न कि आर्थिक रूप से शक्तिशाली देशों को।
  • कृषि गतिरोध का समाधान: सार्वजनिक खाद्य भंडारण (PSH) पर एक स्थायी समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिये, जिससे विकासशील देशों को खाद्य सब्सिडी पर आवश्यक लचीलापन (Flexibility) मिल सके।
    • विकसित देशों को अपने व्यापार-विकृत करने वाले सब्सिडी को कम करना चाहिये, ताकि गरीब देशों के किसानों के लिये समान प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बनाया जा सके।
  • समावेशी डिजिटल व्यापार ढाँचा: ई-कॉमर्स स्थगन को विकासशील देशों पर इसके दीर्घकालिक राजस्व प्रभावों का आकलन किये बिना स्थायी नहीं बनाया जाना चाहिये।
    • डिजिटल अर्थव्यवस्था में सार्थक रूप से भाग लेने के लिये विकासशील देशों को क्षमता-निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की अत्यंत आवश्यकता है।
  • विवाद निपटान की बहाली: अपीलीय निकाय (व्यापार विवादों का अंतिम न्यायालय), जो कभी WTO की विश्वसनीयता का आधार था, वर्ष 2019 से निष्क्रिय है क्योंकि अमेरिका ने नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को अवरुद्ध कर दिया है।
    • इसे फिर से सक्रिय किया जाना आवश्यक है, ताकि WTO एक प्रभावी नियम लागू करने वाली संस्था के रूप में अपनी भूमिका पुनः स्थापित कर सके। जब तक स्थायी समाधान नहीं मिल जाता, तब तक MPIA जैसे अस्थायी तंत्रों को और व्यापक बनाया जाना चाहिये।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति का निर्माण: सदस्यों को साझा समस्याओं को संकीर्ण राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने से बचना चाहिये, जैसा कि 14वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में दक्षिण कोरिया ने चेतावनी दी थी।
    • विकसित देशों को यह स्वीकार करना चाहिये कि एक संतुलित और न्यायपूर्ण WTO उनके दीर्घकालिक हितों के अनुकूल है और विभाजित व्यापार व्यवस्था अंततः सभी के लिये हानिकारक साबित होती है।

विश्व व्यापार संगठन

  • परिचय: विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना वर्ष 1995 में मारकेश समझौते (1994) के तहत की गई थी। यह उरुग्वे दौर की वार्त्ताओं (1986-94) का परिणाम था और इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्ज़रलैंड में स्थित है।
    • विश्व व्यापार संगठन (WTO) व्यापार के उदारीकरण के लिये एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठन है और यह सदस्य सरकारों हेतु व्यापार समझौतों पर बातचीत करने हेतु एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है। इसने GATT का स्थान लिया, जो वर्ष 1948 से वैश्विक व्यापार को विनियमित कर रहा था। 
      • जहाँ GATT का मुख्य फोकस केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित था, वहीं WTO के दायरे में वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं का व्यापार और बौद्धिक संपदा भी शामिल हैं, जिनमें रचनात्मक कार्य, डिज़ाइन तथा आविष्कार सम्मिलित होते हैं।
  • सदस्य: WTO के 166 सदस्य हैं, जो विश्व व्यापार के 98% का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत वर्ष 1995 से इसका सदस्य है और वर्ष 1948 से GATT का हिस्सा रहा है।
    • सदस्यता वार्त्ताओं के आधार पर निर्धारित होती है, जिससे सभी सदस्यों के अधिकारों और दायित्वों के बीच संतुलन सुनिश्चित होता है। 
  • मंत्रिस्तरीय सम्मेलन: यह विश्व व्यापार संगठन का सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय है, जहाँ सदस्य देश समझौतों पर वार्त्ता करते हैं, विवादों का निपटारा करते हैं और वैश्विक व्यापार की दिशा निर्धारित करते हैं।
  • प्रमुख WTO समझौते: TRIMS (व्यापार-संबंधित निवेश उपाय), TRIPS (बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधित पहलू) और AoA (कृषि पर समझौता)
  • मुख्य रिपोर्टें: विश्व व्यापार रिपोर्ट, वैश्विक व्यापार परिदृश्य और सांख्यिकी, व्यापार के लिये  सहायता कार्यरूप में।

निष्कर्ष

MC14 ने केवल एक संस्थागत संकट ही नहीं, बल्कि WTO के भीतर दृष्टि के संकट को भी उजागर किया है। जहाँ विकसित देश त्वरित, डिजिटल-प्रथम व्यापार नियमों को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं विकासशील देश अभी भी खाद्य सुरक्षा और अपनी गति से विकास करने के अधिकार के लिये संघर्ष कर रहे हैं। वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायसंगत समझौते के अभाव में WTO स्वयं उन असमानताओं का शिकार बन सकता है, जिन्हें समाप्त करने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न: ‘विश्व व्यापार संगठन (WTO) बढ़ते उत्तर-दक्षिण विभाजन के कारण प्रासंगिकता के संकट का सामना कर रहा है।’ विवेचना कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. WTO ई-कॉमर्स स्थगन क्या है?
यह 1998 का एक समझौता है, जो सदस्य देशों को सॉफ्टवेयर और डिजिटल सामग्री जैसे इलेक्ट्रॉनिक प्रसारणों पर सीमा शुल्क लगाने से रोकता है।

2. विकासशील देश स्थगन के विस्तार का विरोध क्यों करते हैं?
इससे राजस्व में हानि होती है और घरेलू डिजिटल उद्योगों को समर्थन प्रदान करने हेतु नीतिगत लचीलापन सीमित हो जाता है।

3. WTO के संदर्भ में सार्वजनिक भंडारण (PSH) क्या है?
यह सरकारों को खाद्य सुरक्षा हेतु अनाज की खरीद और भंडारण की अनुमति देता है, जिसे अक्सर सब्सिडी नियमों के तहत विवादित माना जाता है।

4. WTO के पारदर्शिता मानकों से संबंधी समस्या क्या है?
सख्त प्रकटीकरण (डिस्क्लोज़र) मानदंड विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकते हैं और व्यापारिक प्रतिशोध के लिये उपयोग किये जा सकते हैं।

5. वर्तमान में WTO की विवाद निपटान प्रणाली अप्रभावी क्यों है?
वर्ष 2019 से अपीलीय निकाय (Appellate Body) न्यायाधीशों की नियुक्ति अवरुद्ध होने के कारण निष्क्रिय है, जिससे प्रवर्तन क्षमता कम हो गई है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. 'ऐग्रीमेंट ऑन ऐग्रीकल्चर’ (Agreement on Agriculture), 'ऐग्रीमेंट ऑन दि एप्लीकेशन ऑफ सैनिटरी एंड फाइटोसैनिटरी मेजर्स' (Agreement on the Application of Sanitary and Phytosanitary Measures) और 'पीस क्लॉज़'  (Peace Clause) शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं?  (2015) 

(a) खाद्य और कृषि संगठन

(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन

(c) विश्व व्यापार संगठन

(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

उत्तर: (C) 


प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में कभी-कभी समाचारों में 'ऐंबर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016) 

(a) WTO मामला

(b) SAARC मामला

(c) UNFCCC मामला

(d) FTA पर भारत-EU वार्त्ता 

उत्तर: (a)


मेन्स:

प्रश्न 1. यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन को जिंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)

प्रश्न 2. “विश्व व्यापार संगठन के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन एवं प्रोन्नति करना है। लेकिन वार्त्ताओं की दोहा परिधि मृत्योन्मुखी प्रतीत होती है, जिसका कारण विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)