भारत में ट्रांसजेंडर कल्याण | 10 Jan 2026
प्रिलिम्स के लिये: ट्रांसजेंडर, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, बेरोज़गारी, जनगणना, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय पोर्टल, संसद, उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, मूल अधिकार, निजता का अधिकार, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद (NCTP), निर्वाचन आयोग, स्माइल योजना, आयुष्मान भारत
मेन्स के लिये: भारत में ट्रांसजेंडरों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिये उठाए गए कदम, भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के समक्ष आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ और भारत में ट्रांसजेंडरों के सशक्तीकरण के लिये आवश्यक उपाय।
चर्चा में क्यों?
हालिया रिपोर्टों से यह सामने आया है कि जन्म के समय महिला के रूप में चिह्नित ट्रांस पुरुषों (AFAB) और जेंडर-विविध व्यक्तियों को आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में प्रणालीगत भेदभाव, चिकित्सकीय अज्ञानता और संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
इस स्थिति ने भारत में ट्रांसजेंडर कल्याण से जुड़े सकारात्मक, नैतिक और साक्ष्य-आधारित फ्रेमवर्क में मौजूद खामियों की ओर पुनः ध्यान आकर्षित किया है।
सारांश
- भारत में उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 जैसे ऐतिहासिक कानून लागू होने के बावजूद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और अर्थव्यवस्था में प्रणालीगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
- प्रगतिशील न्यायिक निर्णय और कल्याणकारी योजनाएँ मौजूद हैं, लेकिन इनके कार्यान्वयन में कमियाँ और सामाजिक पूर्वाग्रह प्रमुख बाधाएँ बनी हुई हैं।
- सशक्तीकरण के लिये कानून के प्रवर्तन, सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक नीतियों और राष्ट्रव्यापी जागरूकता में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है।
भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय को किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
- स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और चिकित्सा भेदभाव: लगभग 27% ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने बताया कि उनकी लैंगिक पहचान के कारण उन्हें चिकित्सा सेवाओं से वंचित किया गया। यहाँ तक कि मूलभूत उपचार भी अक्सर पूर्वाग्रही व्यवहार, गलत लैंगिक संबोधन तथा अनादरपूर्ण दृष्टिकोण के कारण बाधित हो जाता है।
- स्वास्थ्य सेवाओं में ट्रांस पुरुषों से संबंधित विशेष प्रशिक्षण का अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप लैंगिक पहचान की गलत समझ, उपचार से इनकार तथा द्विआधारी लिंग धारणाओं (लिंग को केवल दो श्रेणियों में बांधने वाली मान्यताएँ) और अदृश्यता के कारण अप्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञों पर निर्भरता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- भारत-व्यापी मानकीकृत प्रोटोकॉल और विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपलब्धता से उत्पन्न ये बाधाएँ कई मामलों में व्यक्तियों को असुरक्षित स्व-चिकित्सा के लिये मजबूर करती हैं, जिससे स्ट्रोक और गुर्दा रोग जैसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं।
- सामाजिक पूर्वाग्रह और मानसिक स्वास्थ्य संकट: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति भेदभाव परिवार से शुरू होकर सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों तक विद्यमान होता है, जिससे वे बहुत अधिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं। समाज में व्याप्त यह पूर्वाग्रह और दुर्व्यवहार आत्महत्या की भयावह दर का कारण बनता है, जिसमें 31% लोग आत्महत्या कर लेते हैं और 50% लोग 20 वर्ष की आयु से पहले आत्महत्या का प्रयास करते हैं।
- आर्थिक बहिष्कार : घोर आर्थिक बहिष्कार अभी भी बना हुआ है, जिससे 92% लोग प्रभावित हैं (NHRC, 2018 ) और बेरोज़गारी दर 48% है (ILO, 2022 )। यह स्थिति अनेक लोगों को अनौपचारिक और असुरक्षित आजीविका अपनाने के लिये विवश करती है।
- इसके अतिरिक्त, वित्तीय सेवाओं और उत्तराधिकार तक पहुँच भी सीमित बनी हुई है, क्योंकि बैंकिंग सुविधाओं की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 जैसे कानून गैर-द्विआधारी उत्तराधिकारियों को प्रभावी रूप से बाहर रखते हैं।
- शिक्षा में बाधाएँ : उत्पीड़न, गैर-समावेशी बुनियादी ढाँचे और उच्च ड्रॉपआउट दरों के कारण समुदाय की साक्षरता दर मात्र 56.1% (जनगणना 2011 के अनुसार) है, जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 74% है, जिससे साक्षरता में भारी अंतराल स्पष्ट होता है।
- विश्वविद्यालयों और शिक्षण स्टाफ में लगभग नगण्य प्रतिनिधित्व तथा देशव्यापी लिंग-संवेदनशील शैक्षिक ढाँचे के अभाव के कारण यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, जिससे बहिष्करण की प्रवृत्ति और अधिक सुदृढ़ होती है।
- अप्रभावी कानूनी कार्यान्वयन : ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय पोर्टल ने नवंबर 2020 में लॉन्च होने के बाद से केवल 277 पहचान-पत्र जारी किये हैं, जबकि राष्ट्रव्यापी कार्यक्षमता के बावजूद आवेदनों की प्रक्रिया दर मात्र 16% है। इसके साथ ही, गरिमा गृह जैसे सहायक आश्रय कार्यक्रम अपर्याप्त वित्तपोषण, जागरूकता की कमी और सीमित पहुँच के कारण अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल पा रहे हैं।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी : संसद, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय प्रशासन में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अत्यंत सीमित है, जिससे समावेशी नीतियों की प्रभाविता बाधित होती है। यद्यपि 2024 के लोकसभा चुनावों में थर्ड जेंडर के मतदाताओं का मतदान प्रतिशत बढ़कर 25% हो गया, फिर भी वृद्धावस्था देखभाल और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियाँ लिंग-विविध व्यक्तियों की बड़े पैमाने पर उपेक्षा ही करती हैं।
ट्रांसजेंडर
- परिचय: एक ट्रांसजेंडर/उभयलिंगी व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जिसकी लैंगिक पहचान (स्वयं की आंतरिक भावना) जन्म के समय निर्धारित लिंग से संगत नहीं होती है।
- यह एक व्यापक शब्द है जिसमें हिजड़ा, किन्नर, अरावाणी और जोगता जैसी विविध सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान रखने वाले लोग शामिल हैं, साथ ही वे लोग भी शामिल हैं जो खुद को ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, जेंडरक्वीर या नॉन-बाइनरी के रूप में पहचानते हैं।
- जनांकिकी एवं जनसंख्या: जनगणना-2011 के अनुसार, भारत में लगभग 4.88 लाख ट्रांसजेंडर आबादी है।
- सर्वाधिक संख्या में ट्रांसजेंडर आबादी वाले शीर्ष तीन राज्य उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र हैं।
- विधिक मान्यता: उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 भारत में ट्रांसजेंडर पहचान की मान्यता के लिये औपचारिक विधिक परिभाषा और कार्यढाँचा प्रदान करता है। यह अधिनियम स्वयं द्वारा बोधित लैंगिक पहचान के अधिकार को मान्यता देता है।
LGBTQIA+ समुदाय में स्थान: ट्रांसजेंडर व्यक्ति LGBTQIA+ समुदाय का एक मुख्य हिस्सा हैं, जिन्हें संक्षिप्त नाम में ‘T’ द्वारा दर्शाया जाता है।
भारत में ट्रांसजेंडरों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिये कौन-से कदम उठाए गए हैं?
न्यायिक हस्तक्षेप
- NALSA बनाम भारत संघ (2014) : इसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग/थर्ड जेंडर के रूप में कानूनी रूप से मान्यता दी और अनुच्छेद 14, 15, 16, 19 और 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों की पुष्टि की।
- इसने व्यक्ति द्वारा स्वयं की लैंगिक पहचान करने के अधिकार को बरकरार रखा और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के रूप में वर्गीकृत किया, जिससे वे आरक्षण हेतु पात्र हो गए।
- इस निर्णय में केंद्र और राज्य सरकारों को इस समुदाय के लिये कल्याणकारी योजनाएँ बनाने और आवश्यक सार्वजनिक सुविधाएँ प्रदान करने का निर्देश भी दिया गया।
- पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) : इसने निजता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार घोषित किया, जिसमें संविधान के भीतर यौन अभिविन्यास और लैंगिक पहचान के संरक्षण को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया।
- नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018) : इसने IPC (अब BNS 2023) की धारा 377 को निरस्त करके सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से ट्रांसजेंडर और LGBTQ+ व्यक्तियों की सामाजिक स्वीकृति और गरिमा को बढ़ावा मिला।
- सुश्री एक्स बनाम कर्नाटक राज्य (2024) मामला : कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जन्म प्रमाण-पत्रों पर अपना नाम और लिंग बदलने के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार को बरकरार रखा, जिससे उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 के कार्यान्वयन को सुदृढ़ किया गया।
विधायी ढाँचा
- उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019: यह शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, आवास और सार्वजनिक सेवाओं में भेदभाव को प्रतिबंधित करने हेतु एक विधायी ढाँचा प्रदान करता है।
- यह ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी पहचान-पत्र के माध्यम से बिना चिकित्सा परीक्षा के स्वयं की पहचान की अनुमति देता है और लैंगिक-पुष्टि की देखभाल और HIV निगरानी तक पहुँच को अनिवार्य बनाता है।
- इस अधिनियम में नीतिगत निगरानी और शिकायतों के निवारण के लिये वर्ष 2020 में गठित एक वैधानिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद (NCTP) की भी स्थापना की गई है।
- उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020: यह पहचान प्रमाणीकरण के लिये प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आवास एवं कल्याणकारी उपायों का प्रावधान करता है और अधिनियम के गैर-भेदभाव वाले आज्ञापन को क्रियान्वित करता है।
चुनावी उपाय
- निर्वाचन आयोग का निर्देश (2009): भारत के निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2009 में मतदाता पंजीकरण प्रपत्रों में “अन्य” (Others) विकल्प की शुरुआत की, जिससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पुरुष/महिला के बजाय अपनी पहचान दर्ज करने की सुविधा प्राप्त हुई।
कल्याणकारी योजनाएँ
- SMILE (Support for Marginalised Individuals for Livelihood and Enterprise) योजना: यह एक अंब्रेला योजना है, जिसके अंतर्गत आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आश्रय से संबंधित सहायता प्रदान की जाती है (यह सहायता इसकी ही उप-योजना: गरिमा गृह के अंतर्गत दी जाती है)।
- आयुष्मान भारत TG प्लस: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रति लाभार्थी प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करता है।
- ट्रांसजेंडर पेंशन योजना: यह योजना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन योजना के अंतर्गत शामिल करने का प्रावधान करती है।
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों हेतु राष्ट्रीय पोर्टल: ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण-पत्र के लिये ऑनलाइन आवेदन की सुविधा उपलब्ध कराता है तथा आवेदन की स्थिति की निगरानी में सहायक है।
प्रशासनिक उपाय
- भारतीय जेलों में मान्यता: गृह मंत्रालय ने वर्ष 2022 में राज्यों की जेलों में ट्रांसजेंडर कैदियों की निजता, सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने हेतु दिशानिर्देश जारी किये।
राज्य स्तरीय पहल
- केरल: विश्वविद्यालयों में ट्रांसजेंडर छात्रों के लिये आरक्षण प्रदान करता है और ट्रांसजेंडरों के लिये विशेष छात्रावास सुविधाएँ स्थापित की हैं।
- महाराष्ट्र: कॉलेजों में ट्रांसजेंडर कल्याण प्रकोष्ठ स्थापित किये गए हैं ताकि विद्यार्थियों की शिकायतों का समाधान किया जा सके और उन्हें सहायता प्रदान की जा सके।
- तमिलनाडु: यहाँ निशुल्क लिंग-परिवर्तन सर्जरी की शुरुआत की गई है और ट्रांसजेंडरों के लिये डेडिकेटेड हेल्थ क्लीनिक स्थापित किये गए।
भारत में ट्रांसजेंडर सशzक्तीकरण के लिये क्या उपाय किये जाने चाहिये?
- कानूनी ढाँचा: उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 को शिकायत निवारण सेल की स्थापना, आवेदनों के लिये एक केंद्रीय डिजिटल पोर्टल, ऑडिट आयोजित करके और पुलिस, स्वास्थ्य एवं शिक्षा अधिकारियों को ट्रांसजेंडर अधिकारों एवं लैंगिक संवेदनशीलता पर प्रशिक्षण देकर पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिये।
- आर्थिक सशक्तीकरण: लैंगिक-समावेशी नीतियों, विविधता-आधारित नियुक्तियों, वित्तीय योजनाओं और उद्यमिता सहायता को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। टाटा स्टील के विविधता कार्यक्रम जैसे सफल कॉरपोरेट मॉडलों का विस्तार किया जाना चाहिये।
- विश्व बैंक की एक रिपोर्ट (2021) के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कार्यबल में शामिल करने से भारत के GDP में 1.7% की वृद्धि हो सकती है।
- सामाजिक सेवाओं तक पहुँच: विद्यालयों और महाविद्यालयों में समावेशी नीतियाँ लागू की जानी चाहिये, शिक्षकों का प्रशिक्षण किया जाना चाहिये, बुलिंग और भेदभाव को रोका जाना चाहिये, परामर्श सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिये, लिंग-तटस्थ शौचालय सुनिश्चित किये जाने चाहिये तथा ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों के लिये सहपाठी एवं शिक्षक-समर्थन को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
- लिंग-पुष्टिकरण उपचारों के लिये बीमा कवरेज सुनिश्चित किया जाना चाहिये, समर्पित क्लीनिक स्थापित किये जाने चाहिये, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिये तथा स्वास्थ्य प्रदाताओं के लिये संवेदनशीलता प्रशिक्षण आयोजित किया जाना चाहिये।
- जागरूकता अभियान: लैंगिक संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिये, विविध मीडिया प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, कूवगम उत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों का समर्थन किया जाना चाहिये तथा पूर्वाग्रह को कम करने के लिये ‘आई एम ऑल्सो ह्यूमन’ जैसी मुहिमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
प्रगतिशील कानूनों और न्यायिक आदेशों के बावजूद, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था में व्यवस्थित बहिष्कार का सामना करते हैं। वास्तविक सशक्तीकरण के लिये समेकित कार्रवाई आवश्यक है कानूनी प्रावधानों का कठोर क्रियान्वयन, सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक नीतियाँ और पूरे देश में संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कार्यक्रम, ताकि संवैधानिक वादों को वास्तविक समानता में परिवर्तित किया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. प्रगतिशील कानूनों के बावजूद, भारत में ट्रांसजेंडर लोगों को अभी भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके कारणों का विश्लेषण कीजिये और सुधार के सुझाव भी दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय कानून के तहत किसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति माना जाता है?
ट्रांसजेंडर व्यक्ति वह होता है जिसकी लैंगिक की पहचान जन्म के समय दिये गये लैंगिक पहचान से अलग होती है, जैसा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत बताया गया है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के किस केस ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी?
NALSA बनाम भारत संघ (2014) ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी और उन्हें पूर्ण संवैधानिक अधिकार भी प्रदान किये।
3. भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये दो प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के नाम बताइये।
SMILE योजना (जिसमें गरिमा गृह शेल्टर शामिल हैं) आजीविका और समर्थन प्रदान करती है, और आयुष्मान भारत TG Plus योजना प्रत्येक लाभार्थी को वार्षिक 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में, विधिक सेवा प्रदान करने वाले प्राधिकरण (Legal Services Authorities) निम्नलिखित में से किस प्रकार के नागरिकों को नि:शुल्क विधिक सेवाएँ प्रदान करते हैं?
- 1,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले व्यक्ति को
- 2,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले ट्रांसजेंडर को
- 3,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले अन्य पिछडे़ वर्ग (OBC) के सदस्य को
- सभी वरिष्ठ नागरिकों को
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये-
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 4
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. भारत में महिला सशक्तीकरण के लिये जेंडर बजटिंग अनिवार्य है। भारतीय प्रसंग में जेंडर बजटिंग की क्या आवश्यकताएँ एवं स्थिति हैं? (2016)
