लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग | 17 Mar 2026
प्रिलिम्स के लिये: छठी अनुसूची, लोक सेवा आयोग (PSC), केंद्रशासित प्रदेश (UT), अनुच्छेद 370, स्वायत्त ज़िला परिषदें (ADC), अनुच्छेद 244(2), राज्यपाल, संवैधानिक संशोधन, लद्दाख आरक्षण (संशोधन) विनियमन, 2025, अनुच्छेद 371।
मेन्स के लिये: लद्दाख को राज्य का दर्जा प्रदान करने और उसे छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की मांग के पीछे का तर्क और उससे जुड़ी चिंताएँ, भारतीय संविधान की छठी अनुसूची से संबंधित प्रमुख तथ्य, लद्दाख की शासन संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये आवश्यक उपाय।
चर्चा में क्यों?
लेह और कारगिल में स्थानीय लोगों ने लद्दाख के लिये पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जा, एक समर्पित लोक सेवा आयोग (PSC) और 2 संसदीय सीटों की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।
- स्थानीय भूमि और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिये लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) द्वारा संयुक्त रूप से विरोध प्रदर्शन किये गए थे।
सारांश:
- लद्दाख राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की मांग कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य "प्रतिनिधित्व की कमी" को दूर करना और अपनी 97% जनजातीय आबादी के हितों के साथ-साथ संवेदनशील पारिस्थितिकी की सुरक्षा करना है।
- हालाँकि सरकार रणनीतिक सुरक्षा और संवैधानिक बाधाओं को लेकर चिंतित है, फिर भी स्थानीय स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDCs) को सशक्त बनाना और अधिवास (डोमिसाइल) के आधार पर भर्ती सुनिश्चित करना जैसे कदम उठाना आवश्यक है।
- क्षेत्रीय स्थिरता के लिये एक संतुलित और चरणबद्ध दृष्टिकोण आवश्यक है।
लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की मांग के पीछे क्या तर्क है?
- लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अभाव: वर्ष 2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत लद्दाख को विधायिका रहित केंद्रशासित प्रदेश (UT) बनाए जाने से यहाँ प्रतिनिधित्व की कमी उत्पन्न हो गई है। पुनर्गठन से पहले लद्दाख के पास जम्मू और कश्मीर विधानसभा में 4 विधायक थे। अब निर्णय लेने की शक्ति निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों के बजाय गैर-निर्वाचित नौकरशाहों को हस्तांतरित हो गई है।
- हालाँकि लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें (LAHDC) कार्यरत हैं, लेकिन उनके पास राज्य विधानसभा के समान विधायी अधिकार नहीं हैं। स्थानीय नेताओं का मानना है कि इन परिषदों को महत्त्व नहीं दिया गया है, जिसके कारण लद्दाख के भविष्य से जुड़े निर्णय लेने का दायित्व ‘बाहरी व्यक्तियों’ को सौंप दिया गया है।
- लद्दाख प्रमुख रूप से एक जनजातीय क्षेत्र है, जहाँ 97% से अधिक आबादी जनजातीय समुदायों से संबंधित है। पूर्व में, अनुच्छेद 370 के तहत प्राप्त "विशेष दर्जा" लद्दाख की भूमि और रोज़गार की सुरक्षा करता था। हालाँकि, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने से यह ऐतिहासिक सुरक्षा समाप्त हो गई है, जिससे जनजातीय पहचान और संसाधन संप्रभुता के संरक्षण को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
- स्वायत्त ज़िला परिषदों (ADC) की कमी के कारण लद्दाख के पास अपने आदिवासी रीति-रिवाज़ों और अनूठे ‘शीतकालीन रेगिस्तानी’ पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के लिये विधायी शक्ति का अभाव है। यह स्थिति लद्दाख को अनियंत्रित विशाल परियोजनाओं, औद्योगिक विस्तार और संभावित पर्यावरणीय आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। ये गतिविधियाँ क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण ग्लेशियरों और जल संसाधनों के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।
- आर्थिक स्वायत्तता: लोक सेवा आयोग (PSC) के अभाव का अर्थ है कि उच्च स्तरीय नौकरियों की भर्ती के लिये कोई स्थानीय तंत्र मौजूद नहीं है। स्नातक बेरोज़गारी दर 26.5% (राष्ट्रीय औसत से दोगुनी) होने के कारण स्थानीय लोग निवास स्थान आधारित आरक्षण की मांग कर रहे हैं।
- उनका यह मानना है कि राज्य का दर्जा प्राप्त होने पर वे एक ऐसी रोज़गार नीति लागू कर सकेंगे जिसमें “बाहरी लोगों” के बजाय लद्दाखवासियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
- स्थानीय विश्वास के माध्यम से रणनीतिक सुरक्षा: चीन-पाकिस्तान गठबंधन के संदर्भ में समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा तब सबसे मज़बूत होती है जब स्थानीय आबादी सशक्त और एकीकृत महसूस करती है। छठी अनुसूची का दर्जा देकर सरकार सैन्य रसद का प्रबंधन कर सकती है जबकि स्थानीय लोग अपने आंतरिक मामलों का प्रबंधन कर सकते हैं, जिससे सीमा सुरक्षा के ‘साझेदारी’ मॉडल को बढ़ावा मिलेगा।
छठी अनुसूची
- परिचय: संविधान के अनुच्छेद 244(2) के तहत छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के चार पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के लिये एक अद्वितीय स्वायत्त प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करती है, जिसका उद्देश्य उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करना है।
- मुख्य विशेषताएँ:
- स्वायत्त ज़िला समितियाँ (ADC): जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों में संगठित किया जाता है। राज्यपाल को इन ज़िलों की सीमाओं को बदलने और उन्हें स्वायत्त क्षेत्रों में विभाजित करने की शक्ति प्राप्त है, विशेष रूप से जहाँ एकाधिक जनजातियाँ सह-अस्तित्व में रहती हैं।
- ADC में 30 सदस्य होते हैं, जिनमें से 26 वयस्क मताधिकार से निर्वाचित तथा 4 राज्यपाल द्वारा नामित होते हैं। इन समितियों की संख्या वर्तमान में चार राज्यों में कुल 10 है और इनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- विधायी अधिकार: ADC को महत्त्वपूर्ण विधायी शक्तियाँ प्राप्त हैं, जो उन्हें भूमि, वन, जल, झूम कृषि, ग्राम प्रशासन, विवाह, उत्तराधिकार तथा सामाजिक रीति-रिवाज़ों जैसे प्रमुख विषयों पर कानून बनाने की अनुमति देती हैं। हालाँकि सभी ऐसे कानूनों को राज्यपाल की स्वीकृति की आवश्यकता होती है।
- न्यायिक शक्तियाँ: समितियों को जनजातीय विवादों का निपटारा करने हेतु ग्राम न्यायालयों का गठन करने का अधिकार है, जिसमें उच्च न्यायालय की क्षेत्राधिकार सीमा को राज्यपाल द्वारा परिभाषित किया जाता है।
- प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वायत्तता: समितियाँ प्राथमिक विद्यालयों और औषधालयों जैसे स्थानीय संस्थानों का प्रबंधन कर सकती हैं, बाज़ारों एवं सड़कों का नियमन कर सकती हैं तथा गैर-जनजातियों द्वारा धन उधार देने और व्यापार पर नियंत्रण रख सकती हैं। उन्हें भूमि राजस्व एकत्र करने और कर लगाने का भी अधिकार प्राप्त है।
- सामान्य विधान से प्रतिरक्षा: एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम इन क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते या केवल विशिष्ट संशोधनों के साथ ही लागू हो सकते हैं, जो मानक विधायी ढाँचों से स्वायत्तता सुनिश्चित करता है।
- स्वायत्त ज़िला समितियाँ (ADC): जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों में संगठित किया जाता है। राज्यपाल को इन ज़िलों की सीमाओं को बदलने और उन्हें स्वायत्त क्षेत्रों में विभाजित करने की शक्ति प्राप्त है, विशेष रूप से जहाँ एकाधिक जनजातियाँ सह-अस्तित्व में रहती हैं।
लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में लाने की मांग से संबंधित क्या चिंताएँ हैं?
- रणनीतिक और सुरक्षा जोखिम: लद्दाख एक महत्त्वपूर्ण "बफर ज़ोन" है जो चीन (LAC) और पाकिस्तान (LoC) दोनों के साथ विवादित सीमाएँ साझा करता है। प्रत्यक्ष केंद्रशासित प्रदेश (UT) का दर्जा एक स्पष्ट शृंखला सुनिश्चित करता है, जो तीव्र सैन्य-नागरिक समन्वय की अनुमति देता है।
- आलोचकों का तर्क है कि राज्य का दर्जा राजनीतिक मतभेद उत्पन्न कर सकता है, जो सीमा गतिरोधों के दौरान भारत की राजनयिक मुद्रा और सामरिक नियंत्रण को जटिल बना सकता है।
- संवैधानिक और कानूनी बाधाएँ: छठी अनुसूची स्पष्ट रूप से पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों के लिये डिज़ाइन की गई थी। इसे लद्दाख तक विस्तारित करने के लिये एक प्रमुख संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी। यह संपूर्ण भारत में अन्य जनजातीय क्षेत्रों (जैसे- गोरखालैंड या बोडोलैंड) से समान मांगों को भी ट्रिगर कर सकता है, संभावित रूप से वर्तमान संघीय संतुलन को अस्थिर कर सकता है।
- प्रशासनिक जटिलता: छोटी आबादी (लगभग 3 लाख) के साथ एक पूर्ण राज्य तंत्र (उच्च न्यायालय, लोक सेवा आयोग और विशाल नौकरशाही) की स्थापना आर्थिक रूप से अव्यावहारिक और प्रशासनिक रूप से अक्षम होगी।
- अंतर-क्षेत्रीय विविधता: लद्दाख के दो ज़िलों (अर्थात् लेह और कारगिल) में ऐतिहासिक रूप से भिन्न धार्मिक और राजनीतिक आकांक्षाएँ हैं। ऐसी चिंताएँ हैं कि पूर्ण राज्य का दर्जा बौद्ध-बहुल लेह और मुस्लिम-बहुल कारगिल के बीच पहचान की राजनीति को तेज़ कर सकता है, जिससे शासन में गतिरोध उत्पन्न हो सकता है।
- मौज़ूदा सुरक्षा उपाय: लद्दाख आरक्षण (संशोधन) विनियमन, 2025 ने सरकारी नौकरियों में स्थानीय निवासियों के लिये 85% आरक्षण प्रदान किया है और 15-वर्षीय निवास सहित विशिष्ट निवासी मानदंड परिभाषित किये हैं।
- इसके अतिरिक्त, इसने अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, भोटी और पुरगी को आधिकारिक भाषाओं के रूप में अधिसूचित किया और लेह एवं कारगिल के LAHDC में महिलाओं के लिये एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य किया।
लद्दाख की शासन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
- मौजूदा संस्थाओं को सशक्त बनाना: लद्दाख की स्थानीय स्वशासन परिषदों (LAHDC) को भूमि, जल और संस्कृति के मामलों में विस्तारित विधायी, कार्यकारी और न्यायिक अधिकार प्रदान करना। यह तत्काल संवैधानिक संघर्षों से बचते हुए ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र को प्रोत्साहित करता है।
- अनुकूलित संवैधानिक ढाँचा: यदि पूर्ण छठी अनुसूची का समावेशन संभव न हो, तो संसद एक विशेष ढाँचा (अनुच्छेद 371 के समान) लागू कर सकती है, जो जनसांख्यिकीय पहचान की सुरक्षा करे और निर्वाचित संस्थाओं को सशक्त बनाए।
- सख्त भूमि और पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय: उच्च-तुंगता वाले ‘शीत रेगिस्तान’ पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के लिये स्थानीय निवासियों तक ही भूमि स्वामित्व सीमित करने वाला विशेष भूमि नियमन कानून बनाना और वहन क्षमता सीमा लागू करना।
- संस्थागत संवाद मंच: विश्वास निर्माण और विवाद समाधान के लिये लेह एपेक्स बॉडी (LAB), कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) और केंद्रीय एजेंसियों को शामिल करते हुए एक स्थायी परामर्श फोरम का गठन।
- क्रमिक क्रियान्वयन और पायलट परियोजनाएँ: नए शासन मॉडल का परीक्षण करने के लिये चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाना, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह लेह और कारगिल दोनों ज़िलों की बदलती आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी हो।
निष्कर्ष
लद्दाख आंदोलन लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और रणनीतिक सुरक्षा के एक महत्त्वपूर्ण संगम का प्रतिनिधित्व करता है। जहाँ राज्यत्व और छठी अनुसूची की मांग ‘प्रतिनिधित्व की कमी’ को दूर करने और संवेदनशील ईकोसिस्टम की रक्षा करने का प्रयास करती है, वहीं इसे राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं और प्रशासनिक व्यवहार्यता के साथ संतुलित करना आवश्यक है। सहमति-आधारित, अनुकूलित संवैधानिक ढाँचा अत्यधिक सतत मार्ग बना हुआ है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: राष्ट्रीय सुरक्षा और संघीय शासन के संदर्भ में लद्दाख को राज्यत्व प्रदान करने के निहितार्थों पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. लेह और कारगिल में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
प्रदर्शन में पूर्ण राज्यत्व, छठी अनुसूची का दर्जा, लोक सेवा आयोग और लद्दाख में भूमि, नौकरियों और जनजातीय पहचान की रक्षा के लिये दो संसदीय सीटों की मांग की जा रही है।
2. संविधान की छठी अनुसूची क्या है?
अनुच्छेद 244(2) के तहत छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त ज़िला परिषदों (ADC) को विधायी, प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियाँ प्रदान करती है।
3. लद्दाख में रोज़गार संबंधी हाल ही में कौन-सा प्रशासनिक उपाय किया गया है?
लद्दाख आरक्षण (संशोधन) नियम, 2025, जिसने कुल आरक्षण सीमा को 85% तक बढ़ाया और भर्ती के लिये सख्त आवासीय मानदंड (15 वर्ष का निवास) निर्धारित किये।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत के संविधान की किस अनुसूची के अधीन जनजातीय भूमि का, खनन के लिये, निजी पक्षकारों को अंतरण अकृत और शून्य घोषित किया जा सकता है? (2019)
(a) तीसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) नौवीं अनुसूची
(d) बारहवीं अनुसूची
उत्तर: (b)
प्रश्न. सरकार ने अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार (PESA) अधिनियम को 1996 में अधिनियमित किया। निम्नलिखित में से कौन-सा एक उसके उद्देश्य के रूप में अभिज्ञात नहीं है? (2013)
(a) स्वशासन प्रदान करना
(b) पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना
(c) जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त क्षेत्रों का निर्माण करना
(d) जनजातीय लोगों को शोषण से मुक्त कराना
उत्तर: (c)
प्रश्न. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से प्रावधान शिक्षा पर प्रभाव डालते हैं? (2012)
- राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व
- ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
- पाँचवीं अनुसूची
- छठी अनुसूची
- सातवीं अनुसूची
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3, 4 और 5
(c) केवल 1, 2 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370, जिसके साथ हाशिया नोट ‘जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध’ लगा हुआ है, किस सीमा तक अस्थायी है? भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में इस उपबंध की भावी संभावनाओं पर चर्चा कीजिये। (2016)
प्रश्न. क्या कारण है कि भारत में जनजातियों को ‘अनुसूचित जनजातियाँ’ कहा जाता है? भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित उनके उत्थान के लिये प्रमुख प्रावधानों को सूचित कीजिये। (2016)