भारत के R&D इकोसिस्टम में सुधार | 15 Apr 2026
प्रिलिम्स के लिये: नीति आयोग, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंड, वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII), अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन
मेन्स के लिये: आर्थिक वृद्धि और प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता में R&D की भूमिका विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में सरकारी नीतियाँ और संस्थागत सुधार R&D में सार्वजनिक बनाम निजी निवेश
चर्चा में क्यों?
नीति आयोग ने ‘भारत में अनुसंधान एवं विकास करने में सुगमता’ तथा ‘भारत में R&D करने में सुगमता पर सर्वेक्षण रिपोर्ट’ शीर्षक से दो महत्त्वपूर्ण रिपोर्टें जारी की हैं, जिनका उद्देश्य देश में अधिक कुशल, सहायक और नवाचार-प्रधान अनुसंधान इकोसिस्टम का निर्माण करना है।
सारांश
- नीति आयोग की रिपोर्टें ROPE फ्रेमवर्क के माध्यम से भारत के R&D इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने पर केंद्रित हैं। इनमें लैब-टू-मार्केट नवाचार को बढ़ावा देना, निजी और CSR फंडिंग को प्रोत्साहित करना, नौकरशाही बाधाओं को कम करना तथा एक विश्वास-आधारित अनुसंधान वातावरण विकसित करना प्रमुख रूप से शामिल है।
- भारत का R&D परिदृश्य प्रगति दर्शाता है (GII रैंक 38, पेटेंट में वृद्धि), किंतु कम निवेश (लगभग 0.7% GDP) जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF), अटल इनोवेशन मिशन और स्टार्टअप इंडिया जैसी विभिन्न पहलें नवाचार, उद्योग-संबंध और अनुसंधान परिणामों को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रही हैं।
भारत में अनुसंधान और विकास को सुगम बनाने के संदर्भ में नीति आयोग की रिपोर्ट्स के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- ROPE फ्रेमवर्क: रिपोर्टों की मुख्य रणनीति ROPE (Removing Obstacles and Promoting Enablers अर्थात अवरोधों को हटाना और समर्थकों को बढ़ावा देना) अवधारणा पर आधारित है, जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक इकोसिस्टम में प्रशासनिक और नियामकीय बाधाओं को दूर करना है।
- ‘लैब-टू-मार्केट’ रूपांतरण: रिपोर्टों में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत को केवल बुनियादी ज्ञान सृजन से आगे बढ़ना होगा। मूल अनुसंधान को ठोस, व्यावसायिक प्रौद्योगिकियों और व्यावहारिक अनुप्रयोगों में बदलने के लिये ‘मिशन-मोड R&D’ की तत्काल आवश्यकता है।
- निजी क्षेत्र और CSR फंडिंग को बढ़ावा देना: एक प्रमुख विशेषता यह है कि अनुसंधान वित्तपोषण को लोकतांत्रिक बनाने का आह्वान किया गया है।
- सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना चाहती है, विशेष रूप से कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंड का उपयोग करके स्टार्टअप्स और उभरती प्रौद्योगिकियों को समर्थन देने के माध्यम से।
- सख्त नौकरशाही को समाप्त करना: निष्कर्षों में यह रेखांकित किया गया है कि पुरानी खरीद नियमावली, विखंडित वित्तपोषण तथा सख्त संस्थागत संरचनाएँ नवाचार को बाधित कर रही हैं। रिपोर्टों में अत्यधिक अनुकूलनशील और उत्तरदायी प्रशासनिक ढाँचों का समर्थन किया गया है।
- विश्वास-आधारित इकोसिस्टम: शीर्ष प्रतिभाओं को बनाए रखने और प्रारंभिक स्तर के वैज्ञानिकों को सशक्त बनाने के लिये रिपोर्टें प्रशासनिक अति-हस्तक्षेप से हटकर एक विश्वास-आधारित, परिणामोन्मुख इकोसिस्टम की ओर अग्रसर होने की अनुशंसा करती हैं, जो शोधकर्त्ताओं को अधिक संचालनात्मक स्वायत्तता प्रदान करता है।
भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) की स्थिति क्या है?
- अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD): स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने कृषि तथा सार्वजनिक क्षेत्र-आधारित औद्योगीकरण पर ध्यान केंद्रित किया, किंतु GDP में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में निवेश अभी भी निम्न स्तर पर बना हुआ है, जो कि GDP का लगभग 0.64–0.7% है। साथ ही, निजी क्षेत्र की भागीदारी भी सीमित है।
- वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII): भारत ने विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) द्वारा प्रकाशित वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII), 2025 में 139 अर्थव्यवस्थाओं में से 38वाँ स्थान प्राप्त किया है।
- यह वर्ष 2020 में प्राप्त 48वें स्थान की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण सुधार को परिलक्षित करता है। भारत निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष स्थान बनाए हुए है तथा मध्य एवं दक्षिण एशिया क्षेत्र में भी प्रथम स्थान पर स्थित है।
- पेटेंट फाइलिंग: WIPO की वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी इंडिकेटर्स (WIPI), 2024 के अनुसार, भारत पेटेंट आवेदनों के मामले में वैश्विक स्तर पर छठे स्थान पर है।
- भारत का पेटेंट-से-GDP अनुपात (पेटेंट गतिविधि के आर्थिक प्रभाव का एक मानक) वर्ष 2013 के 144 से बढ़कर वर्ष 2023 में 381 हो गया, जो उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है।
- देश पेटेंट, ट्रेडमार्क एवं औद्योगिक डिज़ाइन में वैश्विक शीर्ष 10 में सम्मिलित है तथा ट्रेडमार्क फाइलिंग में विश्व में चौथे स्थान पर है।
भारत की अनुसंधान एवं विकास इकोसिस्टम को प्रोत्साहित करने वाली पहलें
भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) इकोसिस्टम को बाधित करने वाली प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- वित्तपोषण एवं निवेश की कमी: भारत का अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD) अमेरिका (~3.5%), चीन (~2.4%) या दक्षिण कोरिया (~4.8%) जैसे वैश्विक नवाचार नेतृत्वकर्त्ताओं की तुलना में अपर्याप्त है।
- सुदृढ़ वैश्विक अनुसंधान एवं विकास प्रणालियों में निजी क्षेत्र अनुसंधान हेतु वित्तपोषण का लगभग 70% हिस्सा वहन करता है। भारत में यह संरचना उलट है; सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ प्रमुख भार (60% से अधिक) वहन करती हैं, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान असमान रूप से कम रहता है।
- अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) योजना के शुभारंभ के बावजूद इसने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिक तंत्र को बढ़ावा देने में वांछित परिणाम नहीं दिये हैं।
- विखंडित वित्तीय तंत्र: वित्तपोषण की संरचना प्रायः असंगठित एवं विखंडित है। उच्च प्रभाव वाले परिणामोन्मुख अनुसंधान को निरंतर प्रोत्साहित करने हेतु प्रदर्शन-आधारित वित्तपोषण मॉडल का स्पष्ट अभाव दृष्टिगोचर होता है।
- प्रशासकीय एवं विनियामक अवरोध: पुराने, कठोर तथा अत्यधिक नौकरशाही-प्रधान क्रय ढाँचे के कारण आवश्यक वैज्ञानिक उपकरणों एवं कच्चे माल के आयात/क्रय में अत्यधिक विलंब होता है, जिससे अनुसंधान की गति गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
- वैज्ञानिक संस्थान प्रायः कठोर पारंपरिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत कार्य करते हैं, जहाँ नौकरशाही संस्कृति शोधकर्त्ताओं की परिचालन स्वायत्तता को सीमित करती है तथा उन्हें वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान के स्थान पर प्रशासनिक अनुपालन में अत्यधिक समय व्यतीत करना पड़ता है।
- “लैब-टू-मार्केट” रूपांतरण अंतराल: भारत में मौलिक शोध-पत्रों पर व्यापक कार्य होता है।
- शैक्षणिक अनुसंधान को व्यावसायिक प्रौद्योगिकियों, पेटेंट अथवा बाज़ार-तैयार समाधानों में रूपांतरित करने में इकोसिस्टम संरचनात्मक रूप से संघर्षरत है।
- स्थानीय नवाचारों को राष्ट्रीय अथवा वैश्विक औद्योगिक अनुप्रयोगों तक विस्तारित करने हेतु समर्पित संस्थागत ढाँचों का अभाव है।
- विखंडित संस्थागत ढाँचे: विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार (UIG) के मध्य समन्वय अत्यंत कमज़ोर एवं विखंडित है। विश्वविद्यालय प्रायः पृथक् रूप से कार्य करते हैं तथा मुख्यतः शैक्षणिक प्रकाशनों तक ही सीमित रहते हैं।
- इसके विपरीत, उद्योग प्रायः स्वदेशी समाधानों के लिये स्थानीय शैक्षणिक प्रयोगशालाओं के साथ सहयोग करने के स्थान पर स्थापित प्रौद्योगिकियों के आयात पर निर्भर रहते हैं।
- इसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़े एक विवाद में भी उजागर किया गया, जहाँ स्वदेशी नवाचार के दावों पर प्रश्न उठे, क्योंकि मौजूदा चीनी प्रौद्योगिकी से संबंध सामने आए। यह भारत में उद्योग-शैक्षणिक सहयोग की कमी को रेखांकित करता है।
- विश्वविद्यालयों के भीतर सख्त विभागीय संरचनाएँ अक्सर अंतर्विषयी (cross-disciplinary) अनुसंधान को हतोत्साहित करती हैं। आधुनिक तकनीकी उपलब्धियाँ प्रायः विभिन्न क्षेत्रों के संगम पर होती हैं (जैसे–जैव प्रौद्योगिकी को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ जोड़ना), लेकिन अलग-थलग विभाग/ साइलोड डिपार्टमेंट्स इस प्रकार के सहयोग को कठिन बना देते हैं।
- इसके विपरीत, उद्योग प्रायः स्वदेशी समाधानों के लिये स्थानीय शैक्षणिक प्रयोगशालाओं के साथ सहयोग करने के स्थान पर स्थापित प्रौद्योगिकियों के आयात पर निर्भर रहते हैं।
- मानव पूंजी एवं प्रतिधारण: विश्व के सबसे बड़े STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) स्नातकों के समूहों में से एक होने के बावजूद, भारत में पूर्णकालिक समतुल्य (FTE) शोधकर्त्ताओं का घनत्व केवल लगभग 260 प्रति मिलियन जनसंख्या है।
- यह संख्या अमेरिका या यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों की तुलना में बहुत कम है, जहाँ प्रति मिलियन जनसंख्या पर 4,000 से अधिक शोधकर्त्ता हैं।
- वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी, योग्यता-आधारित कॅरियर उन्नति मॉडल की कमी, साथ ही प्रारंभिक स्तर के वैज्ञानिकों के लिये अपर्याप्त संस्थागत समर्थन और वित्तपोषण के कारण शीर्ष वैज्ञानिक प्रतिभाओं का पश्चिमी देशों की ओर उल्लेखनीय ‘ब्रेन ड्रेन’ होता है।
- कम पेटेंट प्रतिफल: भारत में पेटेंट आवेदनों में वृद्धि हुई है, लेकिन उन्हें वास्तविक रूप से स्वीकृत पेटेंट में बदलने की दर तथा उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण, उन पेटेंट्स का व्यवहार्य उत्पादों में व्यवसायीकरण अभी भी कम बना हुआ है।
- कम प्रभाव कारक: भारत हर वर्ष लाखों शोध-पत्र प्रकाशित करता है, फिर भी इसका साइटेशन नेटवर्क साइटेशन इंडेक्स (CNCI), जो अनुसंधान की गुणवत्ता और वैश्विक स्तर पर सहकर्मियों द्वारा उद्धृत किये जाने की आवृत्ति को मापता है, अमेरिका और चीन की तुलना में काफी कम बना हुआ है।
- एलीट, हाई-इंपैक्ट जर्नल्स (जैसे– नेचर या जर्नल ऑफ द अमेरिकन केमिकल सोसाइटी) में योगदान बहुत कम है।
कौन-से उपाय भारत के अनुसंधान एवं विकास (R&D) के इकोसिस्टम को सुदृढ़ कर सकते हैं?
- वित्तपोषण का लोकतंत्रीकरण और पुनर्गठन: वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये सरकार को सक्रिय रूप से सकल घरेलू उत्पाद के कम-से-कम 1.5% - 2% तक अनुसंधान एवं विकास हेतु व्यय (GERD) को बढ़ाने के लिये कार्य करना चाहिये।
- सार्वजनिक क्षेत्र से बोझ को हटाते हुए टैक्स प्रोत्साहन, समन्वयी अनुदानों की पेशकश करके और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) हेतु धनराशि को सीधे गहन-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स और विश्वविद्यालय संबंधी कार्यों में संचालित करके निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व का दोहन किया जाए।
- अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के त्वरित और कुशल रोलआउट को सुनिश्चित करना ताकि केवल IIT या IISc जैसे कुलीन संस्थानों में ही नहीं, बल्कि राज्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसंधान एवं विकास को बीजित और बढ़ावा दिया जा सके।
- नौकरशाही और खरीद में सुधार: कठोर "L1" (न्यूनतम बोलीदाता) निविदा नियमों से महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक उपकरणों और कच्चे माल को छूट देकर खरीद संबंधी नीतियों में आमूल-चूल सुधार लागू करना ताकि शोधकर्त्ताओं को मिलने वाली सामग्री महीनों में नहीं, बल्कि दिनों में मिल सके।
- संस्थागत नेताओं और मुख्य अन्वेषकों (PI) को परिणाम-आधारित मैट्रिक्स के आधार पर अधिक वित्तीय और परिचालन स्वायत्तता प्रदान करना।
- "प्रयोगशाला-से-बाज़ार" परिवर्तन को उत्प्रेरित करना: विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार तीनों को जोड़ने वाले औपचारिक, संस्थागत मार्गों का निर्माण करना।
- शैक्षणिक पाठ्यक्रम और अनुसंधान समस्याओं को उद्योग जगत के नेताओं के साथ अभिकल्पित किया जाना चाहिये ताकि बाज़ार की प्रासंगिकता सुनिश्चित हो सके।
- सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में अत्यधिक पेशेवर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालयों (TTO) के निर्माण को अनिवार्य बनाना ताकि वैज्ञानिकों को अपने काम का पेटेंट कराने, बौद्धिक संपदा (IP) कानूनों को समझने और निजी कंपनियों के साथ वाणिज्यिक लाइसेंसिंग प्राप्त करने में मदद मिल सके।
- लक्षित, समय-बद्ध मिशनों के माध्यम से राष्ट्रीय संसाधनों को क्वांटम कंप्यूटिंग, ग्रीन हाइड्रोजन, अर्द्धचालक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विशिष्ट, उच्च-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर केंद्रित करना।
- मानव पूंजी को सशक्त बनाना: शीर्ष-स्तरीय प्रतिभा को बनाए रखने और "प्रतिभा पलायन" को रोकने के लिये सार्वजनिक वैज्ञानिक संस्थानों में वरिष्ठता-आधारित पदोन्नति को योग्यता-आधारित फास्ट-ट्रैक कॅरियर संरचनाओं में समाप्त करना।
- कठोर शैक्षणिक पृथकता को तोड़ने के लिये ऐसी परियोजनाओं को धन प्रदान करना, जिन्हें विभागातीत सहयोग की आवश्यकता हो (जैसे– जैव प्रौद्योगिकी को डाटा विज्ञान के साथ मिश्रित करना)।
निष्कर्ष
भारत विश्वास-आधारित, परिणाम-केंद्रित R&D प्रणाली की ओर संक्रमण करके, निजी निवेश में वृद्धि करके और प्रयोगशाला से बाज़ार के अंतराल को समाप्त करने के लिये नियमों को सरल बनाकर एक वैश्विक वैज्ञानिक शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता है—आत्मनिर्भर भारत के तहत तकनीकी स्वावलंबन को आगे बढ़ाते हुए।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत का R&D इकोसिस्टम प्रतिभा की कमी की तुलना में संरचनात्मक अक्षमताओं से अधिक बाधित है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. ROPE फ्रेमवर्क क्या है?
बाधाओं को दूर करना और प्रोत्साहकों को बढ़ावा देना ताकि अनुसंधान एवं विकास में अड़चनें कम हों और दक्षता में सुधार हो।
2. भारत का GERD स्तर क्या है?
सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.64–0.7%, जो वैश्विक औसत (~1.8%) से काफी नीचे है।
3. प्रयोगशाला-से-बाज़ार अंतर क्या है?
अनुसंधान का वाणिज्यिक उत्पादों और प्रौद्योगिकियों में कमज़ोर रूपांतरण।
4. भारत में अनुसंधान एवं विकास वित्तपोषण में एक प्रमुख मुद्दा क्या है?
सार्वजनिक वित्तपोषण पर अत्यधिक निर्भरता, निजी क्षेत्र के योगदान का निम्न स्तर।
5. NRF की क्या भूमिका है?
यह शिक्षा जगत, उद्योग और अनुसंधान को जोड़ने वाले एक केंद्रीय वित्तपोषण निकाय के रूप में कार्य करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान-भारत (नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया) (NIF) के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2015)
- NIF केंद्रीय सरकार के अधीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की एक स्वायत्त संस्था है।
- NIF अत्यंत उन्नत विदेशी वैज्ञानिक संस्थाओं के सहयोग से भारत की प्रमुख (प्रीमियर) वैज्ञानिक संस्थाओं में अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान को मज़बूत करने की एक पहल है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. अनुप्रयुक्त जैव प्रौद्योगिकी में शोध तथा विकास संबंधी उपलब्धियाँ क्या हैं? ये उपलब्धियाँ समाज के निर्धन वर्गों के उत्थान में किस प्रकार सहायक होंगी? (2021)
प्रश्न. भारतीय विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक अनुसंधान का स्तर गिरता जा रहा है, क्योंकि विज्ञान में कॅरियर उतना आकर्षक नहीं है जितना कि वह कारोबार संव्यवसाय, इंजीनियरी या प्रशासन में है और विश्वविद्यालय उपभोक्ता- उन्मुखी होते जा रहे हैं। समालोचनात्मक टिप्पणी कीजिये। (2014)