सूक्ष्म वित्त संस्थाएँ | 26 Apr 2021

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सूक्ष्म वित्त संस्थाओं (Microfinance Institution) ने केंद्र से आग्रह किया है कि वे अपने कर्मचारियों और स्वयं सहायता समूह (SHG) के कर्मचारियों के लिये टीकाकरण को प्राथमिकता देने पर विचार करें।

  • ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि COVID-19 संक्रमण की बढ़ती दूसरी लहर के बीच गरीबों के लिये ऋण की सुविधा उपलब्ध की जा सके। 

प्रमुख बिंदु:

परिचय:

  • सूक्ष्म ऋण का अभिप्राय अलग-अलग देशों में भिन्न होता है। भारत में 1 लाख रुपए से कम के सभी ऋणों को माइक्रोलोन या सूक्ष्म ऋण माना जा सकता है।
    • इसकी सेवाओं में सूक्ष्म ऋण,सूक्ष्म बचत और सूक्ष्म बीमा शामिल है।
  • MFI वित्तीय कंपनियाँ उन लोगों को छोटे ऋण प्रदान करती हैं जो समाज के वंचित और कमजोर वर्गों से हैं तथा जिनके पास बैंकिंग सुविधाओं तक पहुँच उपलब्ध नहीं है।
    • सूक्ष्म वित्त संस्थाएँ (MFI) उन कंपनियों को कहा जाता है जो निम्न आय वर्ग के लोगों को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिये सस्ती ब्याज दरों पर कर्ज उपलब्ध कराते हैं।
  • तथाकथित ब्याज दरें ज़्यादातर मामलों में सामान्य बैंकों द्वारा वसूल किये जाने वाली दरों से कम होती हैं। अतः कुछ लोगों ने इन माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं पर गरीब लोगों के पैसे में हेरफेर करके लाभ कमाने का आरोप लगाया है।
  • पिछले कुछ दशकों में माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र तेजी से बढ़ा है और वर्तमान में इनके पास भारत की गरीब आबादी के लगभग 102 मिलियन खाते (बैंकों और छोटे वित्त बैंकों सहित) हैं।
  • गरीब लोगों के लिये विभिन्न प्रकार के वित्तीय सेवा प्रदाता उभरे हैं जैसे- गैर-सरकारी संगठन (NGO), सहकारिता, स्व-सहायता समूह , क्रेडिट यूनियन, सामुदायिक-आधारित विकास संस्थान, वाणिज्यिक और राज्य बैंक, बीमा तथा क्रेडिट कार्ड कंपनियाँ, डाकघर आदि।
  • भारत में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (Non Banking Finance Company)  और MFIs का रिज़र्व बैंक के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी -माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (रिज़र्व बैंक) निर्देश, 2011 द्वारा नियमन किया जाता है।

प्रमुख व्यवसाय मॉडल:

  • संयुक्त देयता समूह:
    • यह आमतौर पर एक अनौपचारिक समूह है जिसमें 4-10 व्यक्ति शामिल होते हैं जो आपसी गारंटी पर ऋण प्राप्त करते हैं।
    •  यह ऋण आमतौर पर कृषि उद्देश्यों या संबंधित गतिविधियों के लिये दिया जाता है।
  • स्वयं सहायता समूह:
    • यह समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों का एक समूह है।
    • इस समूह के अंतर्गत छोटे उद्यमी एक छोटी अवधि के लिये एक साथ आते हैं और अपनी व्यावसायिक जरूरतों हेतु एक सामान्य फंड बनाते हैं। इन समूहों को गैर-लाभकारी संगठनों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
      • इस संबंध में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) द्वारा क्रियान्वित ‘स्वयं सहायता समूह का-बैंक’ लिंकेज कार्यक्रम उल्लेखनीय है, क्योंकि इससे SHG बैंकों से अपने पुनर्भुगतान का ट्रैक रिकॉर्ड प्रस्तुत करके ऋण  ले सकते हैं।
  • ग्रामीण मॉडल बैंक:
    • इस मॉडल को वर्ष 1970 के दशक में एक बांग्लादेशी नोबेल विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस द्वारा प्रतिपादित किया गया।
    • इस मॉडल ने भारत में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (Regional Rural Bank) के निर्माण को प्रेरित किया है। इस प्रणाली का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विकास करना है।
  • ग्रामीण सहकारिता:
    • इसकी स्थापना स्वतंत्रता के दौरान की गई।
    • इस प्रणाली में जटिल निगरानी संरचनाएँ थीं साथ ही इससे केवल ग्रामीण क्षेत्र में  ऋण की सुविधा मुहैया कराई जाती थी। इसलिये इस प्रणाली को वह सफलता नहीं मिली जो इससे उम्मीद की गई थी।

लाभ

  • ये बिना किसी ज़मानत के आसानी से ग्राहकों को अल्पावधिक ऋण प्रदान करती हैं।
  • यह अर्थव्यवस्था के गरीब वर्गों को अधिक धन उपलब्ध कराती हैं, जिससे गरीब परिवारों की आय में बढ़ोतरी होती है और रोज़गार का भी सृजन होता है।
  • यह महिलाओं, बेरोज़गारों और द्विव्यांगों समेत समाज के अल्प-वित्तपोषित समूहों को सेवाएँ प्रदान करती हैं।
  • यह समाज के गरीब और असुरक्षित और कमज़ोर वर्गों को उनकी मदद के लिये उपलब्ध वित्तीय साधनों से अवगत कराती है और बचत की विधि विकसित करने में भी मदद करती है।
  • सूक्ष्म-ऋण से लाभ प्राप्त करने वाले परिवार अपने बच्चों को बेहतर और निरंतर शिक्षा प्रदान करने में सक्षम होते हैं।

चुनौतियाँ

  • खंडित डेटा:
    • यद्यपि कुल ऋण खातों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, किंतु ग्राहकों के गरीबी-स्तर पर इन ऋणों का वास्तविक प्रभाव से संबंधित कुछ स्पष्ट तथ्य मौजूद नहीं है, क्योंकि ग्राहकों के सापेक्ष गरीबी-स्तर में सुधार से संबंधित सूक्ष्म वित्त संस्थाओं का डेटा पूर्णतः खंडित है।
  • कोरोना महामारी का प्रभाव:
    • कोरोना वायरस महामारी ने सूक्ष्म वित्त संस्थाओं को काफी अधिक प्रभावित किया है और इसके परिणामस्वरूप ऋण संग्रहण पर प्रारंभिक प्रभाव के साथ ऋण वितरण पर अभी तक कोई सार्थक बढ़ोतरी नहीं हो पाई है।
  • सामाजिक उद्देश्यों की अनदेखी:
    • विकास और लाभप्रदाता उनकी खोज में सूक्ष्म वित्त संस्थाओं के सामाजिक उद्देश्य यानी समाज के वंचित वर्गों के जीवन में सुधार लाने संबंधी उद्देश्य, धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए हैं।
  • गैर-आय सृजन प्रयोजनों के लिये ऋण:
    • गैर-आय सृजन उद्देश्यों के लिये उपयोग किये जाने वाले ऋणों का अनुपात रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित किये गए अनुपात, MFI के कुल ऋण का 30 प्रतिशत, की तुलना में बहुत अधिक हो सकता है।
    • ये ऋण प्रायः अल्प-अवधि के होते हैं और ग्राहकों की आर्थिक प्रोफ़ाइल को देखते हुए इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि वे जल्द ही स्वयं को एक खतरनाक ऋण जाल में पाएंगे, जहाँ उन्हें पहले ऋण के भुगतान के लिये दूसरा ऋण लेना पड़ेगा।

आगे की राह

  • एमएफआई को एक एक स्थायी और स्केलेबल माइक्रो फाइनेंस मॉडल (Scalable Microfinance Model) बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो आर्थिक तथा सामाजिक दोनों के विषय में स्पष्ट हो।
  • एमएफआई को ऋण का 'घोषित उद्देश्य' सुनिश्चित करना चाहिये कि जो अक्सर ऋण-आवेदन के चरण में ग्राहकों से पूछा जाता है तथा ऋण के कार्यकाल के अंत में सत्यापित होता है।
  • RBI को सभी संस्थानों को सामाजिक प्रभाव स्कोरकार्ड के माध्यम से समाज पर उनके प्रभाव की निगरानी के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू