फॉरेन एक्सचेंज पर डायरेक्ट लिस्टिंग | 07 Nov 2023

प्रिलिम्स के लिये:

डायरेक्ट लिस्टिंग, डिपॉज़िटरी रसीद, आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (IPO)

मेन्स के लिये:

भारत में विदेशी मुद्रा विनिमय, पूंजी बाज़ार, वृद्धि एवं विकास

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

भारत सरकार ने कुछ भारतीय कंपनियों को वैश्विक पूंजी तक पहुँच के लिये प्रत्यक्ष विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध होने की अनुमति दी है।

  • 30 अक्तूबर, 2023 से प्रभावी यह प्रावधान कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2020 के माध्यम से पेश किया गया था।
  • यह घरेलू सार्वजनिक कंपनियों के कुछ वर्गों को कुछ प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं (जैसे प्रॉस्पेक्टस, शेयर पूंजी, लाभकारी स्वामित्व आवश्यकताओं और लाभांश वितरित करने में विफलता) से छूट के साथ अहमदाबाद, गुजरात में GIFT अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) सहित विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों पर अपनी प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध करने की अनुमति देता है। 

नोट:

  • IFSC एक वित्तीय केंद्र है जो घरेलू अर्थव्यवस्था के अधिकार क्षेत्र से बाहर के ग्राहकों को सेवाएँ प्रदान करता है।
  • भारत में IFSC को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) द्वारा विनियमित किया जाता है, जो एक वैधानिक प्राधिकरण है जिसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण अधिनियम, 2019 के तहत स्थापित किया गया था।
    • इसका मुख्यालय गुजरात में GIFT सिटी, गांधीनगर में है।
  • वर्तमान में GIFT IFSC भारत में नवीन IFSC है।
  • IFSC में, सभी लेनदेन विदेशी मुद्रा (INR को छोड़कर) में होने चाहिये। हालाँकि प्रशासनिक और वैधानिक खर्च INR में किये जा सकते हैं।

डायरेक्ट लिस्टिंग:

  • डायरेक्ट लिस्टिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई कंपनी नए शेयर जारी किये बिना या निवेशकों से पूंजी जुटाए बिना अपने शेयरों को विदेशी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कर सकती है।
  • डायरेक्ट लिस्टिंग पारंपरिक प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (IPO) से अलग है, जहाँ एक कंपनी अपने शेयरों का एक हिस्सा जनता को बेचती है और निवेशकों से धन जुटाती है।
  • डायरेक्ट लिस्टिंग डिपॉज़िटरी रिसीट (Depositary Receipt- DR) रूट से भी अलग है, जहाँ एक कंपनी एक कस्टोडियन बैंक को अपने शेयर जारी करती है, जो फिर विदेशी निवेशकों को DR जारी करता है।
    • DR परक्राम्य प्रमाणपत्र हैं जो कंपनी के अंतर्निहित शेयरों का प्रतिनिधित्व करते हैं और विदेशी मुद्रा पर व्यापार करते हैं।
  • प्रत्यक्ष लिस्टिंग से कंपनी को निवेशकों के एक बड़े और अधिक विविध पूल तक पहुँचने, उसकी दृश्यता तथा ब्रांड मूल्य बढ़ाने एवं उसके कॉर्पोरेट प्रशासन व अनुपालन मानकों में सुधार करने की अनुमति मिलती है।

भारतीय कंपनियों का वर्तमान में विदेशी मुद्रा पर सूचीबद्ध होना:

  • वर्तमान में भारतीय कंपनियाँ अमेरिकी डिपॉज़िटरी रसीदों (ADR) और ग्लोबल डिपॉज़िटरी रसीदों (GDR) सहित डिपॉजिटरी रसीदों का उपयोग करके विदेशी बाजारों में सूचीबद्ध होती हैं।
    • विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध होने के लिये, भारतीय कंपनियाँ अपने शेयर एक भारतीय संरक्षक को सौंपती हैं, जो फिर विदेशी निवेशकों को डिपॉजिटरी रसीदें (DR) जारी करता है।
  • वर्ष 2008 और वर्ष 2018 के बीच 109 कंपनियों ने ADR/GDR के माध्यम से 51,000 करोड़ रुपए से अधिक जुटाए।
  • हालाँकि वर्ष 2018 के बाद किसी भी भारतीय कंपनी ने इस प्रकार से विदेशी लिस्टिंग को आगे नहीं बढ़ाया।

नोट:

  • ADR एक अमेरिकी डिपॉज़िटरी बैंक द्वारा जारी किये गए एक परक्राम्य प्रमाणपत्र को संदर्भित करता है जो शेयरों की एक निर्दिष्ट संख्या का प्रतिनिधित्व करता है, आमतौर पर यह एक विदेशी कंपनी के स्टॉक का एक हिस्सा है।
  • GDR डिपॉज़िटरी बैंक द्वारा जारी किया गया एक प्रमाणपत्र है जो एक विदेशी कंपनी में शेयरों का प्रतिनिधित्व करता है और उन्हें एक खाते में जमा करता है। GDR का कारोबार ज्यादातर यूरोपीय बाज़ारों में होता है।
  • डायरेक्ट फॉरेन लिस्टिंग के लाभ:
  • बड़े और अधिक तरल बाज़ार तक पहुँच, जिससे उनके शेयरों की मांग तथा मूल्यांकन बढ़ सकता है।
  • व्यापक और अधिक परिष्कृत निवेशक आधार तक पहुँचने की क्षमता, जो उनकी प्रतिष्ठा एवं विश्वसनीयता को बढ़ा सकती है।
    • फंड जुटाने और अपनी वैश्विक प्रोफाइल बढ़ाने के इस तरीके से स्टार्टअप और यूनिकॉर्न कंपनियों को लाभ हो सकता है।
  • IPO या DR प्रक्रिया में समय और शामिल लागत, जैसे-अंडरराइटिंग शुल्क, लिस्टिंग शुल्क, कानूनी शुल्क इत्यादि की बचत।
  • नए शेयर या DR जारी करने के साथ आने वाले स्वामित्व और नियंत्रण को कमज़ोर होने से बचाना।
  • विदेशी क्षेत्राधिकार की सर्वोत्तम प्रथाओं और नियमों के संपर्क में आने से उनके प्रशासन तथा पारदर्शिता में सुधार हो सकता है।
  • डायरेक्ट फॉरेन लिस्टिंग में शामिल चुनौतियाँ:
  • विदेशी क्षेत्राधिकार के कानूनों और नियमों का अनुपालन, जो भारत से भिन्न या अधिक कठोर हो सकते हैं।
  • डायरेक्ट फॉरेन लिस्टिंग में चुनौतियों में मूल्यांकन के मुद्दे शामिल हैं, क्योंकि वैश्विक निवेशक भारत के समान मूल्यांकन की पेशकश नहीं कर सकते हैं, जो संभावित रूप से कंपनी की बाज़ार धारणा और मूल्य निर्धारण को प्रभावित कर सकता है।
  • मुद्रा में उतार-चढ़ाव और विदेशी मुद्रा की बाज़ार अस्थिरता के संपर्क में आने से उनके शेयर की कीमत तथा रिटर्न पर असर पड़ सकता है।
    • भारत या विदेश में मौजूदा शेयरधारकों, नियामकों या कर अधिकारियों के साथ संभावित टकराव या विवाद।
  • सार्वजनिक कंपनियों के वर्ग जो इस पद्धति का उपयोग कर सकते हैं, प्रतिभूतियाँ जिनको सूचीबद्ध किया जा सकता है, विदेशी क्षेत्राधिकार एवं लिस्टिंग के लिये अनुमोदित स्टॉक एक्सचेंज तथा प्रक्रियात्मक अनुपालन के संबंध में इन कंपनियों को प्रदान की जाने वाली छूट सभी को स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. पंजीकृत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा उन विदेशी निवेशकों को, जो स्वयं को सीधे पंजीकृत कराए बिना भारतीय स्टॉक बाज़ार का हिस्सा बनना चाहते हैं, निम्नलिखित में से क्या जारी किया जाता है? (2019)

(a) जमा प्रमाण-पत्र
(b) वाणिज्यिक पत्र
(c) वचन-पत्र (प्राॅमिसरी नोट)
(d) सहभागिता पत्र (पार्टिसिपेटरी नोट)

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. 'वाणिज्यिक पत्र' एक अल्पकालिक प्रतिभूति रहित वचन पत्र है।
  2.  'जमा प्रमाण-पत्र' भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा एक निगम को जारी किया जाने वाला एक दीर्घकालिक प्रपत्र है।
  3. 'शीघ्रावधि द्रव्य' अंतर-बैंक लेन-देनों के लिये प्रयुक्त अल्प अवधि का वित्त है। 
  4. ‘शून्य-कूपन बॉण्ड' अनुसूचित व्यापारिक बैंकों द्वारा निगमों को निर्गत किये जाने वाले ब्याज सहित अल्पकालिक बॉण्ड हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2 
(b) केवल 4
(c) केवल 1 और 3 
(d) केवल 2, 3 और 4

उत्तर: (c)