भारतीय जुगनुओं की पहली चेकलिस्ट
वैज्ञानिकों ने भारत में पाए जाने वाले जुगनुओं की पहली प्रकार की सूची तैयार की है, जिसके लिये 260 से अधिक वर्षों के वैज्ञानिक अभिलेखों का संकलन किया गया। इसमें वर्ष 1881 से 2025 तक के प्रलेखन को सम्मिलित करते हुए 27 वंशों से संबंधित 92 प्रजातियों की पहचान की गई है।
- भारतीय जुगनुओं पर उपलब्ध आधुनिक जानकारी को सुदृढ़ करने तथा भविष्य के वर्गिकी अनुसंधान के लिये एक आधारभूत संदर्भ के रूप में कार्य करने हेतु इस सूची का निर्माण किया गया।
मुख्य निष्कर्ष
- उच्च स्थानिकता (हाई एंडेमिज़्म): उल्लिखित प्रजातियों में से 60% से अधिक भारत के स्थानिक (एंडेमिक) हैं। उल्लेखनीय है कि 50 से अधिक प्रजातियाँ 1800 के दशक में किये गए मूल विवरण के बाद से पुनः अभिलिखित नहीं की गई हैं।
- भौगोलिक वितरण: अध्ययन में 22 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में जुगनुओं की उपस्थिति को दर्शाया है। पश्चिमी घाट 25.33% प्रजातियों के साथ सबसे समृद्ध आवास के रूप में उभरा, उसके बाद पूर्वोत्तर (22.66%), गंगा के मैदान (17.33%) और प्रायद्वीपीय पठार (दक्कन प्रायद्वीप) (13.33%) का स्थान है। मरुस्थलीय और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के जुगनू को दर्ज नहीं किया गया।
जुगनू (फायरफ्लाई)
- परिचय: जुगनू, जिन्हें प्रायः मक्खियाँ अथवा कीट प्रजाति का समझा जाता है, वास्तव में कोलॉप्टेरा गण (भृंग) के अंतर्गत लैंपाइरिडे परिवार से संबंधित मुलायम शरीर वाले भृंग हैं। ये जैव प्रदीप्ति (बायोल्यूमिनेसेंस) के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करने की अपनी उल्लेखनीय क्षमता के लिये जाने जाते हैं।
- जैव प्रदीप्ति तंत्र: इनसे प्रकाश सब्सट्रेट ल्यूसिफेरिन, एंज़ाइम ल्यूसिफेरेज़, ऑक्सीजन और एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) से संबंधित एक रासायनिक अभिक्रिया के कारण उत्पन्न होता है। इनके पास एक प्रकाश-उत्सर्जक अंग होता है जिसे फोटोफोर कहा जाता है, जो उनके उदर के नीचे की तरफ स्थित होता है।
- इस अभिक्रिया से "शीतल प्रकाश" उत्पन्न होता है, जो लगभग 100% ऊर्जा-कुशल होता है, जिससे वस्तुतः कोई ऊष्मा उत्पन्न नहीं होती है। प्रकाश आमतौर पर पीला-हरा होता है।
- जैव प्रदीप्ति का उद्देश्य: वयस्क जुगनुओं में जैव प्रदीप्ति का प्राथमिक कार्य संभोग संचार है, जिसमें प्रत्येक प्रजाति का एक अद्वितीय फ्लैश पैटर्न होता है।
- लार्वा (जिन्हें ग्लोवर्म के रूप में जाना जाता है) में, प्रकाश शिकारियों के लिये एक चेतावनी संकेत (अपोसेमेटिज़्म) के रूप में कार्य करता है जो अरुचिकरता का संकेत देता है।
- आवास और व्यवहार: जुगनू अंटार्कटिका को छोड़कर प्रत्येक महाद्वीप पर आर्द्र, वनस्पति वाले वातावरण में निवास करते हैं, जो वनों, खेतों और आर्द्रभूमि जैसे आर्द्र क्षेत्रों को पसंद करते हैं। वे गोधूलि और रात में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं (सांध्यकालीन/निशाचर)।
- प्रकाश प्रदूषण और शहरीकरण के कारण जुगनू तेज़ी से कम हो रहे हैं, जो अनुसंधान और संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने OBC क्रीमी लेयर के मानदंडों को स्पष्ट किया
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने निर्णय दिया है कि केवल अभिभावकों की आय के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों की ‘क्रीमी लेयर’ स्थिति निर्धारित नहीं की जा सकती। यह निर्णय सिविल सेवा परीक्षाओं में आरक्षण नियमों के अनुप्रयोग को लेकर लंबे समय से चली आ रही भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करता है।
- वर्ष 2004 के स्पष्टीकरण पत्र को निरस्त करना: यह निर्णय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन तथा वर्ष 2004 के स्पष्टीकरण पत्र द्वारा उत्पन्न भ्रम का समाधान करता है।
- वर्ष 1993 के DoPT कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वेतन से प्राप्त आय तथा कृषि भूमि से आय को क्रीमी लेयर निर्धारण हेतु आय/संपत्ति जाँच में शामिल नहीं किया जाएगा।
- हालाँकि, वर्ष 2004 के DoPT स्पष्टीकरण में सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) तथा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की वेतन आय को शामिल करने का निर्देश दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप सरकारी कर्मचारियों के बच्चों तथा PSU/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच असमान व्यवहार की स्थिति उत्पन्न हुई।
- आय-आधारित नहीं, बल्कि स्थिति-आधारित निर्धारण: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि क्रीमी लेयर का निर्धारण स्थिति-आधारित है, न कि पूर्णतः आय-आधारित और इसमें माता-पिता की रोज़गार स्थिति तथा पद श्रेणी (समूह A/B/C/D) पर विचार किया जाना चाहिये, न कि केवल आय पर।
- संवैधानिक वैधता: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सरकार ने निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को माता-पिता के पद की स्थिति के आधार पर OBC आरक्षण के लाभ बरकरार रखने की अनुमति देकर "प्रतिकूल भेदभाव" किया, भले ही वेतन में वृद्धि हुई हो।
- सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों/निजी क्षेत्र के समकक्ष कर्मचारियों के बच्चों को केवल इसलिये OBC आरक्षण से वंचित कर दिया गया क्योंकि माता-पिता का वेतन 8 लाख रुपये से अधिक था, जो समान लोगों के साथ असमान व्यवहार करना एवं संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन करना है।
- PSU/PSB कर्मचारियों के बच्चों को राहत: यह निर्णय OBC आरक्षण की पात्रता का विस्तार कर सकता है, विशेषकर उन PSU कर्मचारियों तथा निजी क्षेत्र के श्रमिकों के बच्चों के लिये जिन्हें पहले वेतन-आधारित गणना के कारण बाहर कर दिया गया था।
- न्यायालय ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो तो उन उम्मीदवारों को शामिल करने के लिये अतिरिक्त पद सृजित किये जाएँ जिन्हें पहले वेतन-आधारित गणना के कारण बाहर कर दिया गया था।
- क्रीमी लेयर: "क्रीमी लेयर" की अवधारणा का प्रथम प्रयोग 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के निर्णय में किया गया था, जिसका उद्देश्य सामाजिक रूप से उन्नत OBC वर्गों को आरक्षण लाभ से बाहर रखना था।
- वर्तमान नियमों के अंतर्गत: ग्रुप A के अधिकारियों के बच्चों या 40 वर्ष की आयु से पहले पदोन्नत हुए अधिकारियों के बच्चों को OBC कोटा से बाहर रखा जाता है।
- ग्रुप B के दो अधिकारियों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में आते हैं।
- गैर-सरकारी व्यवसायों के लिये क्रीमी लेयर की आय सीमा ₹8 लाख प्रतिवर्ष (2017 से) निर्धारित है।
- वर्तमान नियमों के अंतर्गत: ग्रुप A के अधिकारियों के बच्चों या 40 वर्ष की आयु से पहले पदोन्नत हुए अधिकारियों के बच्चों को OBC कोटा से बाहर रखा जाता है।
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और पढ़ें: क्रीमी लेयर: OBC |
2025 के भूकंपीय कोड पुनः प्रभावी
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं के बाद वर्ष 2025 के सीस्मिक कोड (IS 1893) को वापस ले लिया है। वर्ष 2016 का पिछला मानक, IS 1893, अब पुनः प्रभावी हो गया है।
- आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) ने गंभीर चिंताएँ व्यक्त कीं, जैसे कि निर्माण लागत में भारी वृद्धि क्षेत्र V और VI में भवनों के लिये लगभग 10–15% तथा अवसंरचना परियोजनाओं के लिये 50% तक और संहिता को अंतिम रूप देने से पहले हितधारकों से पर्याप्त परामर्श का अभाव।
- यह संशोधन संभाव्य भूकंपीय खतरा आकलन (PSHA), सक्रिय भ्रंश मानचित्रण और निकट-भ्रंश प्रभावों जैसी उन्नत वैज्ञानिक विधियों पर आधारित था।
- सीस्मिक कोड: सीस्मिक कोड विनियमों और मानकों का एक समूह है, जिसे यह सुनिश्चित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है कि इमारतें और अन्य संरचनाएँ भूकंप से उत्पन्न बलों का सामना कर सकें।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य संरचनात्मक पतन के जोखिम को कम करके, संपत्ति के नुकसान को कम करके और भूकंपीय घटना के दौरान जान बचाकर सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
- वर्तमान में लागू मानक: मार्च 2026 तक भारत का भूकंपीय क्षेत्र भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी IS 1893 (भाग 1):2016 द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
- यह मानक देश को चार भूकंपीय क्षेत्रों अर्थात् ज़ोन II (निम्न), ज़ोन III (मध्यम), ज़ोन IV (उच्च) और ज़ोन V (बहुत उच्च) में विभाजित करता है, जिसमें भारत का लगभग 59% भूभाग भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
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पेप्टाइड थेरैपी
बीमारियों के उपचार और स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिये पेप्टाइड-आधारित थेरैपी में बढ़ती वैश्विक रुचि ने चिकित्सकीय अवसरों के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी जन्म दिया है और विशेषज्ञों ने अधिक सतर्कता और नियमन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
- पेप्टाइड्स: ये अमीनो एसिड की छोटी शृंखलाएँ हैं, जो जीवन का मौलिक निर्माण खंड (Fundamental Building Blocks) मानी जाती हैं।
- ये मूलतः प्रोटीन के संक्षिप्त रूप होते हैं। जबकि प्रोटीन सामान्यतः 50 या उससे अधिक अमीनो एसिड से मिलकर जटिल 3D संरचना में व्यवस्थित होते हैं, वहीं पेप्टाइड्स में आमतौर पर 2 से 50 अमीनो एसिड होते हैं।
- जैविक भूमिका: मानव शरीर में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले पेप्टाइड्स महत्त्वपूर्ण सिग्नलिंग अणु के रूप में कार्य करते हैं।
- वे हॉर्मोन, न्यूरोट्रांसमीटर और स्थानीय नियामक के रूप में काम करते हैं और कोशिकाओं को चयापचय (Metabolism), प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया तथा ऊतक मरम्मत के संदर्भ में निर्देश देते हैं।
- यह सिंथेटिक या प्राकृतिक पेप्टाइड्स का उपयोग दवाओं के रूप में करती है, जो शरीर के प्राकृतिक सिग्नलिंग अणुओं की नकल करते हैं।
- ये पेप्टाइड्स विशिष्ट सेल रिसेप्टर्स से ‘लॉक-एंड-की’ तंत्र के माध्यम से जुड़ते हैं, जिससे लक्षित जैविक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं और पारंपरिक दवाओं की तुलना में कम दुष्प्रभाव होते हैं।
- चूँकि पेप्टाइड्स को पाचन एंज़ाइम आसानी से खंडित कर देते हैं, इसलिये अधिकांश पेप्टाइड थेरैपी मौखिक गोलियों की बजाय उपचर्म (Subcutaneous) इंजेक्शन के माध्यम से दी जाती है।
- प्रमुख चिकित्सकीय अनुप्रयोग: पेप्टाइड-आधारित दवाओं का उपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है और इन्हें मधुमेह, कैंसर, बाँझपन, विकास संबंधी विकार और हाॅर्मोनल रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
- एक प्रमुख उदाहरण GLP-1 आधारित पेप्टाइड दवाएँ हैं, जो मधुमेह (diabetes) और मोटापा (obesity) के इलाज में रक्त शर्करा और भूख को नियंत्रित करने के लिये व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं।
- कैंसर चिकित्सा में पेप्टाइड्स ट्यूमर रिसेप्टर्स को लक्षित कर सकते हैं या दवाओं को सीधे कैंसर कोशिकाओं तक पहुँचाने के लिये उपयोग किये जा सकते हैं, जिससे उपचार की सटीकता बढ़ती है।
- पुनर्योजी चिकित्सा (Regenerative Medicine) में माँसपेशियों, नसों और टेंडन में ऊतक मरम्मत के लिये पेप्टाइड्स का अध्ययन किया जा रहा है।
- पेप्टाइड्स का उपयोग त्वचाविज्ञान, घाव भरने, ऑस्टियोपोरोसिस, हृदय संबंधी बीमारियों और वायरल संक्रमणों में भी किया जा रहा है।
- दुरुपयोग का जोखिम: बायोहैकिंग और उम्र बढ़ने को रोकने के रुझानों से प्रेरित होकर कई लोग ऑनलाइन खरीदी गई अप्रयुक्त ‘रिसर्च केमिकल्स’ को स्वयं इंजेक्ट कर रहे हैं।
- चूँकि इनमें मानव नैदानिक परीक्षणों की कमी है, ये गंभीर जोखिमों का सामना करते हैं, जिसमें अंतःस्रावी असंतुलन, चयापचय विकार और गंभीर हृदय संबंधी जोखिम शामिल हैं।
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और पढ़ें: बायोएक्टिव पेप्टाइड्स |
कोविड-19 वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों हेतु नो-फॉल्ट मुआवज़ा नीति
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकार को कोविड-19 टीकाकरण अभियान के पश्चात इसके गंभीर प्रतिकूल प्रभावों या इसके कारण जिन व्यक्तियों की मृत्यु हुई उनके लिये "नो-फॉल्ट" देयता मुआवज़ा नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।
कोविड-19 वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों हेतु मुआवज़े के दावों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्णय रहा?
- नो-फॉल्ट देयता का सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने नो-फॉल्ट देयता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए निर्णय लिया कि पीड़ित व्यक्तियों या उनके परिवारों को वित्तीय राहत प्राप्त करने हेतु वैक्सीन निर्माता या राज्य की लापरवाही अथवा साशय किये गए कदाचार को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होगी।
- यह सिद्धांत भारतीय विधि में पहले से विद्यमान है (जैसे– मोटर वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में) और ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम तथा जापान जैसे देशों में वैक्सीन-जनित क्षति मुआवज़ा योजनाओं का एक मानक घटक है।
- व्यक्तिगत मुकदमों की अस्वीकृति: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि पीड़ित परिवारों को वैक्सीन निर्माताओं के विरुद्ध लापरवाही या कदाचार के लिये दीवानी या उपभोक्ता न्यायालयों की सहायता लेनी चाहिये।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नागरिकों के “अनेक व्यक्तिगत कानूनी संघर्षों” से भिन्नात्मक और असमान परिणामों की स्थिति उत्पन्न होगी तथा इससे संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
- राज्य का सकारात्मक दायित्व: अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, जिसमें स्वास्थ्य शामिल है) का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने ज़ोर देते हुए कहा कि संविधान राज्य को एक "दूरस्थ दर्शक" के बजाय एक "सक्रिय कल्याण और गरिमा का संरक्षक" मानता है।
- चूँकि सामूहिक टीकाकरण कार्यक्रम एक राज्य-नेतृत्व वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप था, इसलिये राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह उन लोगों का समर्थन करे जिन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़े, चाहे वे कितने ही दुर्लभ क्यों न हों (उदाहरण के लिये, भारत में कुछ रक्त के थक्के से संबंधित विकारों के लिये प्रति दस लाख खुराक पर केवल 0.001)।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि अभियान आधिकारिक तौर पर "स्वैच्छिक" था, इसे अनवैक्सीनेटेड व्यक्तियों पर प्रशासनिक प्रतिबंधों के माध्यम से प्रभावी रूप से अनिवार्य बना दिया गया था।
- मुआवज़ा निगरानी का अनुसरण करना: एक अलग चिकित्सा बोर्ड स्थापित करने से इनकार करते हुए इसने माना कि टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटना (AEFI) संबंधी समितियाँ पर्याप्त हैं, लेकिन इस बात पर बल दिया कि राज्य की ज़िम्मेदारी "केवल निगरानी तक सीमित नहीं रह सकती है, उचित मुआवज़ा प्रदान करने तक विस्तारित
- उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मुआवज़ा संबंधी नीति केंद्र सरकार द्वारा दायित्व की स्वीकारोक्ति के समान नहीं है।होनी चाहिये।"
- पिछला न्यायिक रुख:
- गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ मामला, 2021: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को कोविड-19 मौतों के लिये अनुग्रह अनुदान (एक्स ग्रेशिया) सहायता हेतु दिशा-निर्देशों की सिफारिश करने का निर्देश दिया, राशि प्राधिकरण पर छोड़ दी।
- इसके बाद, NDMA ने दिशा-निर्देश जारी किये, जिसमें प्रति मृतक 50,000 रुपये निर्धारित किये गए, जो राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से राज्यों द्वारा देय थे।
- अस्वीकृति को रोकने के लिये एक सरलीकृत प्रक्रिया स्थापित की गई अर्थात सकारात्मक परीक्षण के 30 दिनों के भीतर होने वाली मौतों को कोविड-19 मौतों के रूप में माना जाता था और मृत्यु प्रमाण-पत्र पर विवादों को हल करने के लिये ज़िला-स्तरीय शिकायत निवारण समितियाँ स्थापित की गईं।
- जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ मामला, 2022: उच्चतम न्यायालय ने वैक्सीन अनुमोदन प्रक्रिया की वैधता और सरकार के टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटना (AEFI) निगरानी तंत्र को बरकरार रखा, साथ ही यह फैसला सुनाया कि शारीरिक अखंडता अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है और किसी भी व्यक्ति का जबरन टीकाकरण नहीं किया जा सकता है।
- गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ मामला, 2021: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को कोविड-19 मौतों के लिये अनुग्रह अनुदान (एक्स ग्रेशिया) सहायता हेतु दिशा-निर्देशों की सिफारिश करने का निर्देश दिया, राशि प्राधिकरण पर छोड़ दी।
कोविड-19 वैक्सीन के दुष्प्रभाव
- सामान्य दुष्प्रभाव: ये दुष्प्रभाव सामान्यतः हल्के से मध्यम होते हैं और विशेषतः 1–3 दिनों के भीतर स्वयं ठीक हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, थकान, सिरदर्द, बुखार आदि।
- दुर्लभ गंभीर प्रतिकूल प्रभाव: ये दुष्प्रभाव असामान्य रूप से उत्पन्न होते हैं, लेकिन कठोर निगरानी प्रणालियों के माध्यम से इनकी पुष्टि की गई है।
- मायोकार्डिटिस और पेरिकार्डिटिस: हृदय की माँसपेशी या उसकी आस्तरण में सूजन। यह mRNA वैक्सीनों (जैसे–फाइज़र-बायोएनटेक, मॉडर्ना) से संबंधित पाया गया है और अधिकतर किशोरों एवं युवा पुरुषों में दूसरी खुराक के बाद देखा गया है।
- थ्रोंबोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) के साथ थ्रोंबोसिस: एक असामान्य रक्त स्कंदन बनने वाली बीमारी जिसमें प्लेटलेट्स की संख्या कम होती है, जो मुख्यतः कुछ वायरल वेक्टर वैक्सीनों (जैसे– एस्ट्राजेनेका या जैनसेन के पहले के फॉर्मूलेशन) से जुड़ी होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आदेशित "नो-फॉल्ट देयता" सिद्धांत क्या है?
इसका अर्थ है कि COVID-19 वैक्सीन से हुए चोट के शिकार व्यक्तियों या उनके परिवारों को, निर्माताओं या राज्य की लापरवाही या जानबूझकर की गई गलती साबित किये बिना, आर्थिक राहत प्राप्त करने का अधिकार है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का आधार कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद थे?
निर्णय में अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, जिसमें स्वास्थ्य शामिल है) एवं अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) पर आधारित तर्क प्रस्तुत किया गया और यह माना गया कि व्यक्तिगत वादों के कारण असंगत परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
3. कोविड-19 वैक्सीन से जुड़े दो असामान्य लेकिन गंभीर दुष्प्रभाव क्या हैं?
मायोकार्डिटिस/पेरिकार्डिटिस (हृदय की सूजन), जो युवा पुरुषों में mRNA टीकों से जुड़ी है और थ्रोंबोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) के साथ थ्रोंबोसिस, जो वायरल वेक्टर टीकों से जुड़ा एक असामान्य रक्त स्कंदन विकार है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. कोविड-19 वैश्विक महामारी को रोकने के लिये बनाई जा रही वैक्सीनों के प्रसंग में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- सीरम संस्थान ने mRNA प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर कोविशील्ड नामक कोविड-19 वैक्सीन निर्मित की।
- स्पुतनिक V वैक्सीन रोगवाहक (वेक्टर) आधारित प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर बनाई गई है।
- कोवैक्सीन एक निष्कृत रोगजनक आधारित वैक्सीन है।
उपर्युक्त कथनों में कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. 'रिकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन' के संबंध में हाल के घटनाक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- इन टीकों के विकास में जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग किया जाता है।
- बैक्टीरिया और वायरस का उपयोग वेक्टर के रूप में किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
प्रश्न. भारत में न्यूमोकोकल संयुग्मी वैक्सीन के उपयोग का क्या महत्त्व है? (2020)
- ये वैक्सीन न्यूमोनिया और साथ ही तानिकाशोथ और सेप्सिस के विरुद्ध प्रभावी हैं।
- उन प्रतिजैविकियों पर निर्भरता कम की जा सकती है जो औषध-प्रतिरोधी जीवाणुओं के विरुद्ध प्रभावी नहीं हैं।
- इन वैक्सीन के कोई गौण प्रभाव नहीं हैं और न ही ये वैक्सीन कोई प्रत्यूर्जता संबंधी अभिक्रियाएँ करती हैं।
नीचे दिये गए क्रूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1,2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही नहीं है? (2019)
(a) यकृतशोथ B विषाणु HIV की तरह ही संचरित होता है।
(b) यकृतशोथ C का टीका होता है, जबकि यकृतशोथ B का कोई टीका नहीं होता।
(c) सार्वभौम रूप से यकृतशोथ B और C विषाणुओं से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या HIV से संक्रमित लोगों की संख्या से कई गुना अधिक है।
(d) यकृतशोथ B और C विषाणुओं से संक्रमित कुछ व्यक्तियों में अनेक वर्षों तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते।
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत सरकार द्वारा चलाया गया 'मिशन इंद्रधनुष' किससे संबंधित है? (2016)
(a) बच्चों और गर्भवती महिलाओं का प्रतिरक्षण
(b) पूरे देश में स्मार्ट सिटी का निर्माण
(c) बाहरी अंतरिक्ष में पृथ्वी-सदृश ग्रहों के लिये भारत की स्वयं की खोज
(d) नई शिक्षा नीति
उत्तर: (a)


