एडिटोरियल (02 Apr, 2026)



भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी का पुनर्मूल्यांकन

यह एडिटोरियल 02/04/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘India must reboot neighbourhood policy- trade is the key’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख व्यापार-प्राथमिकता आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने के भारत के दुर्लभ अवसर को रेखांकित करता है। यह पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से हटकर पारस्परिक रूप से लाभकारी क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण की अनिवार्यता पर प्रकाश डालता है।

प्रिलिम्स के लिये: नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी, गुजराल सिद्धांत, यूपीआई, अगरतला-अखौरा रेल लिंक, कलादान मल्टी-मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KMMTTP), ऑपरेशन सागर बंधु, ऑपरेशन ब्रह्मा 

मुख्य परीक्षा के लिये: भारत द्वारा अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी के तहत उठाए गए प्रमुख कदम और भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी नीति की प्रभावशीलता में बाधक प्रमुख मुद्दे।

भारत अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी (NFP) के एक निर्णायक मोड़ पर खडा है, जहाँ बांग्लादेश, नेपाल तथा श्रीलंका में स्थापित नई सरकारों ने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने के लिये नवीन अवसरों का सृजन किया है। फिर भी, इस परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्त्वपूर्ण तथा अपेक्षाकृत उपेक्षित साधन अभी भी व्यापार ही बना हुआ है। व्यापार, अन्य किसी भी साधन से कहीं अधिक, राजनयिक सद्भावना को स्थायी क्षेत्रीय साझेदारी में बदलने की कुंजी है। वैश्विक व्यापार व्यवस्था के विखंडन तथा क्षेत्रीय परस्पर निर्भरता के बढ़ते महत्त्व के संदर्भ में, भारत को तत्काल पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण का परित्याग कर पारस्परिक लाभ पर आधारित 'व्यापार-प्रथम पड़ोस रणनीति' को अपनाना चाहिये।

भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी क्या है? 

  • परिचय: भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी (NFP)' उसकी विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ है, जिसके अंतर्गत दक्षिण एशिया तथा हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित अपने निकटवर्ती पड़ोसी देशों के साथ मज़बूत, सहयोगात्मक एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंधों के निर्माण को प्राथमिकता प्रदान की जाती है।
  • मूल दर्शन और उत्पत्ति: यह नीति इस मौलिक सिद्धांत पर आधारित है कि भारत एक शांतिपूर्ण एवं समृद्ध पड़ोस के अभाव में न तो अपनी वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं को साकार कर सकता है और न ही अपने घरेलू विकास लक्ष्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त कर सकता है।
    • इस नीति को वर्ष 2014 में उस समय विशेष गति प्राप्त हुई, जब प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) के सभी नेताओं को आमंत्रित किया गया।
  • गुजराल सिद्धांत से संबंध: यह नीति गुजराल सिद्धांत (1996) से प्रेरित है, जो 'गैर-पारस्परिकता' के सिद्धांत का समर्थन करता है, अर्थात छोटे पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान एवं बांग्लादेश) को उनसे अपेक्षित प्रतिफल की तुलना में अधिक लाभ प्रदान करता है, ताकि विश्वास निर्माण को सुदृढ़ किया जा सके।

प्रमुख उद्देश्य: 

भारत ने अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी के तहत कौन-कौन से प्रमुख कदम उठाए हैं?

  • रणनीतिक ऊर्जा एकीकरण: भारत एक बिजली-अधिशेष वाले पड़ोसी देश से आगे बढ़ते हुए एक क्षेत्रीय 'ऊर्जा ग्रिड हब' के रूप में उभर रहा है, जहाँ द्विपक्षीय ऊर्जा संबंधों को बहुपक्षीय उप-क्षेत्रीय ढाँचे में रूपांतरित किया जा रहा है।
    • इस कदम से भारत की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर एक साझा दक्षिण एशियाई ऊर्जा स्रोत बनाया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा भारतीय अधोसंरचना पर निर्भर हो जाएगी।
    • उदाहरण के लिये वर्ष 2025 में, भारत और नेपाल ने उच्च क्षमता वाली सीमा पार संचरण लाइनों (इनारुवा-न्यू पूर्णिया और लामकी/डोडोधारा-बरेली) को विकसित करने के लिये दो महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये।
    • दोनों देशों में संयुक्त उद्यमों के माध्यम से क्रियान्वित इन परियोजनाओं का उद्देश्य बिजली व्यापार को प्रोत्साहित करना, ग्रिड की मज़बूती को सुदृढ़ करना तथा क्षेत्रीय ऊर्जा कनेक्टिविटी को विस्तार देना है।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) कूटनीति: भारत स्टैक (India Stack), विशेषतः यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का अंतर्राष्ट्रीयकरण, व्यापार सरलीकरण तथा 'डॉलर पर निर्भरता' को कम करने के लिये एक प्रभावी सॉफ्ट-पावर उपकरण के रूप में प्रयुक्त हो रहा है, जो प्रायः छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
    • रीयल-टाइम भुगतान प्रणालियों के एकीकरण के माध्यम से भारत अपने पड़ोसी देशों को एक निर्बाध डिजिटल आर्थिक क्षेत्र में सम्मिलित कर रहा है, जिससे प्रत्यक्ष जन-जन (P2P) एवं व्यवसाय-से-व्यवसाय (B2B) वाणिज्यिक संबंधों को सुदृढ़ बल प्राप्त होता है।
    • उदाहरण के लिये जुलाई 2025 में भारत ने श्रीलंका और नेपाल में सफल शुरुआत के बाद UPI लॉन्च करने के लिये मालदीव मौद्रिक प्राधिकरण के साथ एक नेटवर्क-टू-नेटवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किये।
  • प्रमुख आर्थिक प्रतिक्रियाकर्त्ता: भारत स्वयं को 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' एवं 'फर्स्ट इकोनॉमिक रिस्पॉन्डर' के रूप में पुनर्स्थापित करते हुए हिंद महासागर क्षेत्र में ऋण-जाल संबंधी आशंकाओं के विरुद्ध स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
    • वर्तमान में ध्यान उच्च-ब्याज ऋणों से हटकर स्थायी ऋण प्रबंधन एवं अवसंरचना अनुदानों पर केंद्रित हो गया है, जिससे राजकोषीय राहत पैकेजों तथा आवश्यक आपूर्ति गारंटी के माध्यम से दीर्घकालिक रणनीतिक निष्ठा सुनिश्चित की जा सके।
    • वर्ष 2023 में भारत ने श्रीलंका के आर्थिक सुधार के लिये अपने निरंतर समर्थन के संकेत के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को श्रीलंका के वित्तपोषण और ऋण पुनर्गठन के लिये अपना समर्थन पत्र सौंपने वाला प्रथम देश होने का दायित्व निभाया।
    • इसके पूर्व, वर्ष 2022 में भारत ने कोलंबो को उसकी गंभीर आर्थिक स्थिति से उबारने हेतु लगभग 4.5 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की थी।
    • हाल ही में जुलाई 2025 में मालदीव की राजकीय यात्रा के दौरान भारत ने वहाँ की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिये लगभग ₹4,850 करोड़ रुपये की ऋण रेखा का विस्तार किया तथा वार्षिक ऋण चुकौती दायित्वों में भी राहत प्रदान की।
  • बहुआयामी कनेक्टिविटी और 'एक्ट ईस्ट' समन्वय: नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी (NFP) अब 'एक्ट ईस्ट नीति' के साथ समन्वित हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर भारत एक भू-आबद्ध सीमांत क्षेत्र से परिवर्तित होकर क्षेत्रीय पारगमन के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित हो रहा है।
    • बांग्लादेश के साथ तटीय जहाजरानी एवं अंतर्देशीय जलमार्गों का संचालन करके भारत अपने भू-आबद्ध राज्यों के लिये परिवहन लागत एवं समय को न्यूनतम कर रहा है, साथ ही बंगाल की खाड़ी के एकीकरण को भी सुदृढ़ कर रहा है।
    • अगरतला–अखाउरा रेल लिंक तथा चटगांव एवं मोंगला बंदरगाहों तक पहुँच इस तथ्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि NFP किस प्रकार 'एक्ट ईस्ट नीति' की पूरक रणनीति के रूप में कार्य कर रही है।
    • इसके अतिरिक्त, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद कलादान मल्टी-मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KMMTTP) एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना के रूप में निरंतर प्रासंगिक बना हुआ है।
  • जलविद्युत-आधारित रणनीतिक परस्पर निर्भरता: भारत सीमा-पार जलविद्युत सहयोग के माध्यम से अपने पड़ोस के साथ दीर्घकालिक आर्थिक एवं रणनीतिक एकीकरण को सुदृढ़ कर रहा है।
    • हिमालयी पड़ोसी देशों से स्वच्छ ऊर्जा का सह-विकास एवं आयात करके भारत न केवल अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्थाओं को अपनी ऊर्जा ग्रिड से जोड़कर स्थायी परस्पर निर्भरता भी स्थापित करता है।
    • उदाहरणार्थ, फरवरी 2026 में भारत और भूटान ने पुनात्सांगचू-II (1020 मेगावाट) परियोजना की समीक्षा की, पुनात्सांगचू-I (1200 मेगावाट) के शीघ्र क्रियान्वयन पर बल दिया तथा वर्ष 2040 तक विद्युत संचरण योजना प्रारंभ की, जिससे ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
  • संस्थागत मानवीय सहायता (HADR): भारत आकस्मिक आपदा राहत से आगे बढ़कर एक संरचित ‘क्षेत्रीय प्रथम प्रत्युत्तरदाता’ (Regional First Responder) ढाँचा विकसित कर रहा है, जिसमें उसकी सैन्य लॉजिस्टिक क्षमता क्षेत्रीय मानवीय सुरक्षा का आधार बनती है।
    • यह परिवर्तन भारत को ग्लोबल साउथ में एक अपरिहार्य सुरक्षा आधार के रूप में स्थापित करता है, जो तीव्र स्तर पर संसाधनों की तैनाती कर रणनीतिक विश्वास को सुदृढ़ करता है तथा बाह्य शक्तियों के प्रभाव को संतुलित करता है।
    • उदाहरणार्थ, वर्ष 2025 में भारत ने चक्रवात दितवाह के उपरांत श्रीलंका की सहायता हेतु ऑपरेशन सागर बंधु का शुभारंभ किया।
      • इसके अतिरिक्त, ऑपरेशन ब्रह्मा के अंतर्गत भारतीय सेना द्वारा म्याँमार में भूकंप प्रभावितों को चिकित्सीय सहायता प्रदान की गई, जो भारत की HADR क्षमताओं की प्रभावशीलता को रेखांकित करता है।

भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी की प्रभावशीलता में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की व्यवस्थित उपेक्षा: दक्षिण एशिया विश्व के सबसे कम एकीकृत क्षेत्रों में एक बना हुआ है, क्योंकि भारत एवं उसके पड़ोसी देशों ने एक सुसंगत क्षेत्रीय मूल्य शृंखला के निर्माण के स्थान पर वैश्विक बाज़ारों तथा संरक्षणवादी 'संवेदनशील सूचियों' को प्राथमिकता प्रदान की है।
    • इकोनॉमिक "स्टिकनेस" की इस कमी का अर्थ है कि पड़ोसी देशों के पास चीन जैसी बाह्य शक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में जाने से रोकने हेतु कोई ठोस संरचनात्मक अथवा वित्तीय अवरोध उपलब्ध नहीं है, जो त्वरित, भले ही उच्च ऋण-आधारित, वाणिज्यिक विकल्प प्रदान करती हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, दक्षिण एशिया में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार कुल व्यापार का 5% से भी कम है, जबकि ASEAN में यह लगभग 25% के स्तर पर है, जो एक स्पष्ट असमानता को दर्शाता है।
    • यद्यपि वित्त वर्ष 2025–26 के अप्रैल–जनवरी अवधि के दौरान भारत के कुल माल एवं सेवाओं के निर्यात में लगभग 36 अरब अमेरिकी डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई, फिर भी पड़ोसी देशों के साथ व्यापार प्रायः स्थिर बना रहा।
  • सीमा विवाद एवं क्षेत्रीय तनाव: अनसुलझे सीमा विवाद NFP के लिये प्रमुख संरचनात्मक अवरोध बने हुए हैं, क्योंकि पड़ोसी देश बढ़ते हुए ‘मानचित्रिक आक्रामकता’ (Cartographic Aggression) के माध्यम से अपनी संप्रभुता तथा घरेलू राष्ट्रवादी छवि को सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं।
    • विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों में ये क्षेत्रीय तनाव भारत को एक संसाधन-गहन ‘रक्षात्मक स्थिति’ (Defensive Crouch) में धकेलते हैं, जहाँ सैन्य तैनाती और सीमा अवसंरचना विकास को अक्सर क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण या सॉफ्ट पावर पहल पर प्राथमिकता दी जाती है।
    • पाकिस्तान के साथ LoC, चीन के साथ LAC पर बार-बार तनाव तथा अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावे (स्थानों के प्रतीकात्मक नामकरण सहित) रणनीतिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
    • इसी प्रकार, नेपाल अपने संशोधित राजनीतिक मानचित्र पर अडिग है, जिसमें कालापानी–लिपुलेख–लिम्पियाधुरा त्रिकोण को अपने क्षेत्र का अभिन्न भाग प्रदर्शित किया गया है।
      • ये विवाद कूटनीतिक प्रक्रियाओं को जटिल बनाते हैं तथा क्षेत्रीय एकीकरण की गति को धीमा करते हैं।
  • चीन की आक्रामक ‘चेकबुक कूटनीति’: चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) एक प्रकार का ‘रणनीतिक घेराव’ (Strategic Encirclement) तथा ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का निर्माण करती है, जिसके अंतर्गत वह छोटे पड़ोसी देशों को उच्च ब्याज दरों पर अवसंरचनात्मक ऋण प्रदान करता है, जिन्हें वे ऋण-जाल के जोखिम के बावजूद अस्वीकार नहीं कर पाते।
    • यह आर्थिक प्रभाव धीरे-धीरे सैन्य पहुँच में परिवर्तित हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भारत की पारंपरिक ‘प्राथमिक सुरक्षा प्रदाता’ की भूमिका को चुनौती मिल रही है तथा क्षेत्रीय प्रभाव के लिये एक ‘बिडिंग वार’ (bidding war) की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
    • उदाहरणार्थ, चीन ग्वादर (पाकिस्तान) तथा हंबनटोटा (श्रीलंका) जैसे रणनीतिक बंदरगाहों तथा नेपाल और बांग्लादेश के साथ गहरे संबंधों के माध्यम से दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जिससे भारत के आसपास शक्ति संतुलन परिवर्तित हो रहा है; जबकि इसके विपरीत भारत की प्रत्युत्तर रणनीति ‘डायमंड ऑफ नेकलेस’ अपेक्षाकृत मंद एवं सीमित प्रभावशीलता वाली बनी हुई है।
  • पड़ोसी देशों में निरंतर राजनीतिक अस्थिरता: पड़ोसी देशों की राजधानियों में लगातार बनी रहने वाली राजनीतिक अस्थिरता भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक निवेशों के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक जोखिम बनी हुई है। 
    • आंतरिक सत्ता परिवर्तन अक्सर ‘शून्य-योग (Zero-Sum)’ विदेश नीति को जन्म देते हैं, जहाँ नई सरकारें पूर्ववर्ती शासन द्वारा समर्थित भारत-समर्थित परियोजनाओं की समीक्षा या निरस्तीकरण कर देती हैं, ताकि वे घरेलू राष्ट्रवादी भावनाओं को संतुष्ट कर सकें।
    • उदाहरणस्वरूप, मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान ने प्रारंभिक रूप से संबंधों को तनावपूर्ण बनाया, यद्यपि बाद में नीति में पुनर्संतुलन हुआ।
    • इसी प्रकार, नेपाल और बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक परिवर्तन दर्शाते हैं कि घरेलू घटनाक्रम सीधे भारत की क्षेत्रीय सहभागिता को प्रभावित करते हैं।
  • 'वितरण की कमी' और कार्यान्वयन में विलंब : भारत को अक्सर ‘बिग ब्रदर’ दृष्टिकोण के लिये आलोचना का सामना करना पड़ता है, जहाँ वह बड़े अवसंरचनात्मक परियोजनाओं की घोषणा तो करता है, परंतु उन्हें निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण नहीं कर पाता, विशेषकर चीन की तीव्र निष्पादन क्षमता की तुलना में।
    • यह नौकरशाही जटिलताओं और लालफीताशाही के कारण उत्पन्न विलंब विश्वास की कमी (trust deficit) को बढ़ाते हैं, जिससे पड़ोसी देश अपनी तात्कालिक विकास आवश्यकताओं के लिये अधिक सक्षम साझेदारों की ओर उन्मुख होते हैं।
    • उदाहरण के लिये, कलादान मल्टी-मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KMMTTP), जो म्याँमार के सितवे बंदरगाह के माध्यम से कोलकाता को मिज़ोरम से जोड़ने के लिये बनाई गई एक रणनीतिक पहल है, में अत्यधिक विलंब हुआ तथा अब इसकी समय-सीमा को संशोधित कर वर्ष 2027 तक बढ़ा दिया गया है।
  • सीमा-पार प्रवासन की चुनौतियाँ: भारत की भूमि सीमाएँ जातीय तनाव और अवैध प्रवास का केंद्र बिंदु बनी हुई हैं, जो प्रायः बांग्लादेश और म्याँमार जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय राजनयिक संकटों में परिवर्तित हो जाती हैं।
    • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) या संघर्ष क्षेत्रों से शरणार्थियों के आगमन जैसे मुद्दे 'पहचान-आधारित तनाव' उत्पन्न करते हैं जो आर्थिक सहयोग को कमज़ोर करता है। 
    • म्याँमार गृहयुद्ध के बाद से 40,000 से अधिक शरणार्थी मिज़ोरम में प्रवेश कर चुके हैं, जिसके चलते भारत को मुक्त आवागमन व्यवस्था (FMR) को निलंबित करना पड़ा है। 
    • सुरक्षा दृष्टिकोण से यह जरूरी था, लेकिन इसके कारण औपचारिक सीमा व्यापार प्रभावित हुआ।
  • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में सुरक्षा संबंधी विरोधाभास: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अभूतपूर्व 'सैन्यीकरण' देखा जा रहा है, जहाँ समुद्री डकैती जैसे पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों की जगह अब उच्च-स्तरीय नौसैनिक प्रतिस्पर्द्धा और ‘दोहरे उपयोग’ वाली बंदरगाह सुविधाओं ने ले ली है। 
    • भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (सुरक्षा प्रदाता) की भूमिका को इस तरह संतुलित करे कि वह न तो वर्चस्ववादी लगे और न ही सेशेल्स या मॉरीशस जैसे छोटे द्वीपीय देशों की समुद्री संप्रभुता का उल्लंघन करे।
    • हाल के वर्षों में चीनी ट्रैकिंग पोत युआन वांग 5 का नियमित रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में देखे जाना भारत के लिये संभावित निगरानी और सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाता है।
  • पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद: पाकिस्तान द्वारा राज्य प्रायोजित आतंकवाद का निरंतर उपयोग भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी के लिये सबसे गंभीर बाधा बना हुआ है।
    • भारत को निशाना बनाने वाले सीमा पार आतंकी नेटवर्क विश्वास को कमज़ोर करते हैं और निरंतर राजनयिक जुड़ाव को कठिन बनाते हैं।
    • उदाहरण के लिये पहलगाम आतंकी हमले (2025) ने लगातार बने रहने वाले सुरक्षा खतरों को उजागर किया, जिसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से भारत ने सुनियोजित प्रतिक्रिया दी।
    • इस तरह की घटनाएँ क्षेत्रीय सहयोग को कमज़ोर देती हैं और भारत को विकास साझेदारी की बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिये मजबूर करती हैं।
      • जब तक पाकिस्तान अपने आतंकी ढाँचे को समाप्त नहीं करता, सार्थक क्षेत्रीय एकीकरण गंभीर रूप से बाधित रहेगा।

भारत अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी को और मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है?

  • 'संस्थागत बहुपक्षवाद' (BIMSTEC+) की ओर संक्रमण: भारत को एक स्थायी क्षेत्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना करके BIMSTEC को SAARC के उच्च-कार्यशील विकल्प के रूप में संरचनात्मक रूप से परिवर्तित करने का नेतृत्व करना चाहिये। 
    • द्विपक्षीय 'हब-एंड-स्पोक' कूटनीति से हटकर नियम-आधारित बहुपक्षीय ढाँचे की ओर बढ़ने से भारत 'बिग ब्रदर' की धारणा को कम कर सकता है और पड़ोसियों को विवाद समाधान के लिये एक सामूहिक मंच प्रदान कर सकता है। 
    • यह संस्थागतकरण समान हिस्सेदारी की भावना को बढ़ावा देता है, जिससे क्षेत्रीय एकीकरण व्यक्तिगत शासन परिवर्तनों या 'इंडिया आउट' की लोकलुभावन प्रवृत्तियों से सुरक्षित रहता है।
  • क्षेत्रीय समग्र सुरक्षा ढाँचे का निर्माण: भारत को अपने पड़ोसियों के तटीय रडार और डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों को एकीकृत करने वाली एक साझा समुद्री और साइबर-सुरक्षा तंत्र बनाकर 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में अपनी भूमिका को औपचारिक रूप देना चाहिये।
    • संयुक्त गश्त, HADR के लिये सामंजस्यपूर्ण मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) और एक क्षेत्रीय साइबर-थ्रेट इंटेलिजेंस हब के माध्यम से भारत एक 'सुरक्षा-एक-सेवा' मॉडल पेश कर सकता है जो बाह्य सैन्य अतिक्रमण का सामना करता है।
    • यह ‘एकीकृत रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र’ एक उच्च-प्रौद्योगिकीय निर्भरता का सृजन करता है, जो पारंपरिक राजनयिक संबंधों की तुलना में कहीं अधिक स्थायी सिद्ध होती है तथा प्रत्यक्ष रूप से भारत की समुद्री ‘रेड लाइन’ को सुरक्षित करती है।
  • 'दक्षिण एशियाई ऊर्जा और डिजिटल ग्रिड' का कार्यान्वयन: एकीकृत सीमा पार विद्युत बाज़ार और भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के क्षेत्रीयकरण के माध्यम से 'अपरिवर्तनीय अंतरनिर्भरता' बनाने की दिशा में ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।
    • समान विचारधारा वाले देशों को एक साझा राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड में एकीकृत करके और UPI-आधारित सीमा पार भुगतान को बढ़ावा देकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसके पड़ोसियों की आर्थिक स्थिरता भारत के अपने विकास से भौतिक रूप से जुड़ी हुई है।
    • यह 'अधोसंरचना पर आधारित कूटनीति' किसी भी पड़ोसी सरकार के लिये, उनकी राजनीतिक विचारधारा की परवाह किये बिना, भारत से दूरी बनाने की लागत को अत्यधिक महॅंगा बना देती है।
  • ‘तनाव-मुक्त सीमा आर्थिक क्षेत्र’ (IBEZ) का विकास: भारत को अपनी भूमि सीमाओं को ‘सुरक्षा बाधाओं’ से ‘आर्थिक द्वार’ में बदलना चाहिये, जिसके लिये इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP) को पूर्ण औद्योगिक हब और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) में अपग्रेड किया जाए।
    • सिंगल-विंडो डिजिटल कस्टम क्लियरेंस और सीमा-पार उद्योगों का सह-स्थान सुनिश्चित करने से टेक्सटाइल, कृषि-प्रसंस्करण और फार्मास्यूटिकल्स में साझा मूल्य शृंखलाओं का निर्माण होगा। 
    •  यह उपाय 'परिधि' को 'मुख्य' आर्थिक संपत्ति में परिवर्तित करता है, जिससे सीमावर्ती आबादी और स्थानीय सरकारों को शांति बनाए रखने और औपचारिक व्यापार में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिये प्रोत्साहन मिलता है।
  • 'सॉफ्ट पावर 2.0' और ज्ञान कूटनीति: भारत को पारंपरिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान से आगे बढ़कर 'ज्ञान-आधारित एकीकरण' की ओर बढ़ना चाहिये, जिसके लिये IIT/IIM उपकैंपस स्थापित किये जाने चाहिये और क्षेत्रीय उद्यमियों के लिये 'डिजिटल रेजीडेंसी' कार्यक्रम पेश किये जाने चाहिये। 
    • मानकीकृत व्यावसायिक प्रमाण-पत्र और ‘पड़ोसी पहले’ छात्रवृत्ति कोष के माध्यम से दक्षिण एशियाई प्रतिभा को भारत के शैक्षिक और आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा जा सकता है।
    • इससे दीर्घकालिक संज्ञानात्मक विश्वास’ (Cognitive Trust) का निर्माण होता है और एक ऐसे पेशेवर वर्ग का निर्माण होता है जो भारत को अपनी व्यक्तिगत और राष्ट्रीय समृद्धि के प्राथमिक इंजन के रूप में देखता है, जिससे सूचना-युद्ध की धारणाओं का सामना होता है।
  • अंतरिक्ष और जलवायु ‘साझा संसाधन’ प्रबंधन: एक क्षेत्रीय अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत को सटीक कृषि, भूजल प्रबंधन और हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) की निगरानी के लिये वास्तविक समय के उपग्रह डेटा को साझा करके अपने पड़ोसियों को 'पर्यावरणीय संप्रभुता' प्रदान करनी चाहिये। 
    • क्षेत्रीय जलवायु अनुकूलन कोष और एक साझा 'हिमालय-महासागरीय डेटा बैंक' की स्थापना से भारत जलवायु परिवर्तन के अस्तित्वगत खतरे के समाधान प्रदाता के रूप में स्थापित हो सकेगा
    • यह ‘ग्रीन कूटनीति’ 2030 की गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों को संबोधित करती है और भारत की उच्च-तकनीकी क्षमताओं को उसके छोटे पड़ोसी देशों की अस्तित्व संबंधी प्रवृत्ति के साथ जोड़ती है।
  • 'ब्लू इकोनॉमी' में संयुक्त उद्यम: भारत को समुद्री सुरक्षा से आगे बढ़कर 'समुद्री संसाधन सह-प्रबंधन' की ओर बढ़ना चाहिये, जिसके लिये बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के गहरे समुद्र में खनन, सतत मत्स्यपालन और अपतटीय पवन ऊर्जा में संयुक्त उद्यम शुरू करने होंगे।
    • हिंद महासागर को ‘साझा विरासत’ के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए, भारत अपने पड़ोसी द्वीपीय देशों को ऋण-जाल के जोखिम से बचाते हुए उनके विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) के इष्टतम दोहन हेतु प्रौद्योगिकी एवं पूंजी उपलब्ध करा सकता है।
    • इससे संबंध ‘प्रोटेक्टर-प्रोटेक्टेड’ से ‘कमर्शियल पार्टनर्स’ में बदल जाता है, जिससे 'स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक' को बनाए रखने में एक साझा वित्तीय हिस्सेदारी का निर्माण होता है।

निष्कर्ष: 

भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी की सफलता, पारंपरिक सुरक्षा प्रदाता की भूमिका से हटकर गहन संरचनात्मक एकीकरण के माध्यम से एक अपरिहार्य आर्थिक आधारशिला बनने पर निर्भर करती है। ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और व्यापार में ‘अपरिवर्तनीय अंतरनिर्भरता’ स्थापित करके भारत बाहरी प्रतिस्पर्द्धा तथा पड़ोसी देशों की राजनीतिक अस्थिरता को कम कर सकता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ‘संस्थागत बहुपक्षवाद’ की ओर संक्रमण अनिवार्य है, जिसके अंतर्गत साझा समृद्धि एवं तकनीकी समन्वय के माध्यम से दक्षिण एशिया को एक विखंडित सीमा क्षेत्र से रूपांतरित कर एक समेकित, भारत-नेतृत्व वाले वैश्विक विकास इंजन के रूप में विकसित किया जा सकता है।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न: 

प्रश्न: 'भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी सद्भावना-आधारित दृष्टिकोण से विकसित होकर रणनीतिक अंतरनिर्भरता पर केंद्रित हो गई है, फिर भी इसे संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।' इस कथन के आलोक में, इस नीति की प्रमुख उपलब्धियों एवं चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये तथा इसकी प्रभावशीलता में वृद्धि हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: 

1. भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी में व्यापार को सबसे महत्त्वपूर्ण साधन क्यों माना जाता है?
व्यापार क्षेत्रीय संबंधों में संरचनात्मक अंतरनिर्भरता उत्पन्न करता है, जिससे संबंध केवल राजनीतिक न रहकर आर्थिक रूप से अपरिवर्तनीय (irreversible) बन जाते हैं। सहायता या कूटनीति के विपरीत, यह स्थिरता में साझा हित (mutual stakes) विकसित करता है, बाह्य प्रभाव (विशेषकर चीन) को कम करता है तथा दीर्घकालिक क्षेत्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करता है।

2. भारत किस प्रकार द्विपक्षीय साझेदार से क्षेत्रीय प्रणाली एकीकरणकर्त्ता के रूप में परिवर्तित हो रहा है?
भारत ऊर्जा (सीमा-पार विद्युत व्यापार), डिजिटल (UPI) तथा कनेक्टिविटी गलियारों के माध्यम से क्षेत्रीय ग्रिड एवं नेटवर्क विकसित कर रहा है। यह परिवर्तन ‘परियोजना-आधारित कूटनीति’ से ‘प्रणाली-आधारित एकीकरण’ की ओर संकेत करता है, जिससे पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ धीरे-धीरे भारतीय अवसंरचना पर निर्भर होती जा रही हैं।

3. नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी की सफलता को सीमित करने वाली प्रमुख संरचनात्मक बाधाएँ क्या हैं?
प्रमुख बाधाओं में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार का निम्न स्तर (<5%), लगातार सीमा विवाद, चीन का BRI-प्रेरित प्रभाव और पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, भारत के कार्यान्वयन में विलंब ('वितरण घाटा') चीन जैसे तेज़ी से प्रगति करने वाले देशों की तुलना में इसकी विश्वसनीयता को कमज़ोर करती है।

4. चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिये किस प्रकार चुनौती पेश करती है?
BRI परियोजनाओं और रणनीतिक बंदरगाहों (जैसे ग्वादर, हंबनटोटा) के माध्यम से चीन की चेकबुक कूटनीति आर्थिक निर्भरता और संभावित सैन्य प्रभाव उत्पन्न करती है। इससे रणनीतिक घेराबंदी ('मोतियों की माला') की स्थिति उत्पन्न होती है, जो भारत को एक प्रतिक्रियात्मक और संसाधन-गहन संतुलनकारी भूमिका निभाने के लिये मजबूर करती है।

5. भारत की पड़ोस नीति को अधिक प्रभावी बनाने के लिये किस रणनीतिक परिवर्तन की आवश्यकता है?
भारत को पितृसत्तात्मक, सहायता-आधारित मॉडल से हटकर व्यापार-प्रधान, परस्पर निर्भरता-आधारित ढाँचे की ओर बढ़ना होगा। इसमें बहुपक्षीय संस्थाओं (BIMSTEC+), एकीकृत ऊर्जा और डिजिटल ग्रिडों और सीमावर्ती आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण शामिल है, जिससे सतत और पारस्परिक रूप से लाभकारी क्षेत्रीय साझेदारियाँ सुनिश्चित हो सकें।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. कभी-कभी समाचारों में देखा जाने वाला एलिफेंट पास का उल्लेख निम्नलिखित में से किन मामलों के संदर्भ में किया जाता है? (2009)

(a) बांग्लादेश

(b) भारत

(c) नेपाल

(d) श्रीलंका

उत्तर: (d) 


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2020) 

  1. पिछले दशक में भारत-श्रीलंका व्यापार के मूल्य में सतत् वृद्धि हुई है।
  2.  भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले व्यापार में ‘कपड़े और कपड़े से बनी चीज़ों’ का व्यापार प्रमुख है। 
  3.  पिछले पाँच वर्षों में, दक्षिण एशिया में भारत के व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार नेपाल रहा है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 3

(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: (b)


मेन्स:

प्रश्न. "चीन अपने आर्थिक संबंधों और सकारात्मक व्यापार अधिशेष को एशिया में संभाव्य सैनिक शक्ति हैसियत को विकसित करने के लिये उपकरणों के रूप में इस्तेमाल कर रहा है"। इस कथन के प्रकाश में उसके पड़ोसी के रूप में भारत पर इसके प्रभाव की चर्चा कीजिये। ( 2017)