डेली न्यूज़ (28 Aug, 2025)



विकसित भारत 2047 के लिये महिला-नेतृत्व वाले विकास

प्रिलिम्स के लिये: महिला श्रम शक्ति भागीदारी, जेंडर बजट, स्टार्टअप इंडिया, नमो ड्रोन दीदी, मुद्रा ऋण 

मेन्स के लिये: महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण और विकास, भारत के आर्थिक परिवर्तन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, भारत में महिला सशक्तीकरण में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे।

स्रोत: PIB

चर्चा में क्यों?

भारत की विकास गाथा बदल रही है, जहाँ महिलाएँ उच्च कार्यबल भागीदारी, उद्यमिता और वित्तीय पहुँच के माध्यम से आर्थिक विकास को आगे बढ़ा रही हैं। उन्हें सशक्त बनाना अब विकसित भारत 2047 की दृष्टि का केंद्रीय हिस्सा बन गया है। 

भारत के आर्थिक परिवर्तन में महिलाएँ किस प्रकार योगदान दे रही हैं? 

  • कार्यबल भागीदारी: भारत की महिला कार्यबल भागीदारी वर्ष 2017-18 में 22% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 40.3% हो गई, जबकि बेरोजगारी 5.6% से घटकर 3.2% हो गई। 
    • ग्रामीण महिलाओं के रोज़गार में 96% और शहरी महिलाओं में 43% की वृद्धि हुई, जिससे महिलाओं के लिये अवसरों में मज़बूत वृद्धि देखी गई। 
    • स्नातक महिलाओं की रोज़गार क्षमता वर्ष 2013 में 42% से बढ़कर 2024 में 47.53% हो गई, जबकि स्नातकोत्तर और उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त महिलाओं का श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) 2017-18 में 34.5% से बढ़कर 2023-24 में 40% हो गया। 
    • पिछले सात वर्षों में, 1.56 करोड़ महिलाएँ औपचारिक कार्यबल में शामिल हुईं, जबकि 16.69 करोड़ महिला असंगठित श्रमिकों ने ई-श्रम पर पंजीकरण कराया और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच प्राप्त की। 
  • महिला विकास से महिला-नेतृत्व विकास: एक दशक में जेंडर बजट में 429% की वृद्धि हुई, जो 0.85 लाख करोड़ रुपये (2013-14) से बढ़कर 4.49 लाख करोड़ रुपये (2025-26) हो गया, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर बदलाव का संकेत है। 
    • स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं ने महिलाओं की उद्यमिता को बढ़ावा दिया है, जहाँ उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) से पंजीकृत 50% स्टार्टअप्स में कम-से-कम एक महिला निदेशक है। 
    • लगभग दो करोड़ महिलाएँ अब लखपति दीदी बन चुकी हैं, जिन्हें नमो ड्रोन दीदी जैसी पहलों का समर्थन प्राप्त है। 
    • महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। वर्ष 2010-11 में 1 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 1.92 करोड़ हो गई तथा इसने वित्त वर्ष 2021 से 2023 के बीच महिलाओं के लिये 89 लाख अतिरिक्त नौकरियाँ सृजित कीं। 
      • यह बदलाव महिलाओं के लिये विकास से महिलाओं द्वारा विकास की दिशा में एक निर्णायक कदम है। 
    • वित्तीय समावेशन योजनाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही हैं, जहाँ महिलाओं ने MUDRA ऋणों का 68% (लगभग ₹14.72 लाख करोड़) प्राप्त किया और प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना (PM SVANidhi) के अंतर्गत पथ विक्रेताओं में 44% लाभार्थी महिलाएँ हैं। 

महिला-नेतृत्व विकास क्यों महत्त्वपूर्ण है? 

  • नेता के रूप में महिलाएँ: महिलाओं को कल्याण लाभार्थियों से परिवर्तन के वाहक के रूप में बदलना। 
  • लैंगिक समानता: यह रूढ़िवादिता और पीढ़ीगत असमानता को कम करता है, जो महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत 2025 के ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में 148 देशों में 131वें स्थान पर रहा। 
  • आर्थिक विकास: रोज़गार में जेंडर गैप को कम करना भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में संभावित रूप से 30% की वृद्धि कर सकता है। 
  • समावेशी विकास: महिलाओं की भागीदारी उत्पादकता, नवाचार और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाती है। 
    • महिलाओं को सशक्त बनाने से उन्हें स्वायत्तता, अवसरों तक पहुँच और व्यक्तिगत, पेशेवर एवं सामाजिक निर्णयों पर प्रभाव प्राप्त होता है, जो सार्थक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन को गति प्रदान करता है। 

भारत में महिला-नेतृत्व विकास के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं? 

  • सामाजिक और सुरक्षा संबंधी बाधाएँ: पितृसत्ता निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करती है और अवैतनिक घरेलू कार्य को बढ़ाती है। 
    • अल्पायु में विवाह, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ और व्यक्तिगत सुरक्षा के खतरे (क्योंकि भारत में हर घंटे महिलाओं के विरुद्ध 51 अपराध के मामले दर्ज होते हैं) गतिशीलता, करियर प्रगति और समाज में सक्रिय भागीदारी को सीमित करते हैं। 
  • शिक्षा और कौशल अंतराल: महिला साक्षरता दर 65.4% (2011 जनगणना) है, जो वैश्विक औसत से कम है, जिससे अवसर सीमित होते हैं। 
  • शासन और नेतृत्व में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: महिलाएँ राजनीतिक, कॉरपोरेट और संस्थागत निर्णय लेने में अभी भी कम प्रतिनिधित्व रखती हैं, जिससे उन पर प्रभाव डालने वाली नीतियों में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। 
    • भारत में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वैश्विक औसत 25% से काफी नीचे है। 
  • डिजिटल और तकनीकी बहिष्करण: तकनीक, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता तक सीमित पहुँच महिलाओं को आधुनिक अर्थव्यवस्था में पूर्ण भागीदारी से रोकती है। 
  • कार्यबल भागीदारी की बाधाएँ: महिलाएँ असमान वेतन, ग्लास सीलिंग प्रभाव, व्यवसायिक पृथक्करण, कार्यस्थल पर सुरक्षा और औपचारिक एवं उच्च-कौशल वाले क्षेत्रों में सीमित प्रतिनिधित्व जैसी समस्याओं का सामना करती हैं। 

आर्थिक विकास में महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिये भारत क्या उपाय अपना सकता है? 

  • बाल देखभाल एवं केयर इकॉनमी: नेशनल क्रेच ग्रिड की स्थापना करना, कार्यस्थलों पर क्रेच की व्यवस्था होना, देखभाल करने वाले कर्मचारियों का पेशेवरकरण तथा अनौपचारिक क्षेत्रों में भी सवेतन मातृत्व अवकाश का विस्तार किया जाए ताकि कार्यबल में महिलाओं की स्थायी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। 
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर एवं डिजिटल समावेशन: स्वच्छता, परिवहन, जल, आवास में जेंडर-रेस्पोंसिव बजटिंग को अनिवार्य करना। 
  • महिलाओं के डिजिटल सशक्तीकरण के लिये डिजिटल साक्षरता (Digital Saksharta) और पीएम-गति शक्ति डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) को राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे और ग्रामीण इंटरनेट परियोजनाओं में शामिल करना। 
  • प्रतिनिधित्व एवं शासन: बोर्डों, पंचायतों, एमएसएमई परिषदों में लिंग कोटा लागू करना; जेंडर बजट में क्षमता निर्माण करना; महिलाओं के समावेशन के लिये प्रोत्साहनों को जोड़ना। 
  • विकेंद्रीकृत लैंगिक योजना: ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर लैंगिक कार्ययोजनाएँ संस्थागत करना। इन योजनाओं को महिला सभाओं और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के इनपुट के साथ सह-निर्मित तथा वार्षिक विकास योजना एवं वित्तपोषण में एकीकृत किया जाए। 
  • कार्यस्थल पर सुरक्षा एवं महिलाओं की गतिशीलता का सशक्तीकरण: महिला-हितैषी अवसंरचना का निर्माण करना, जिसमें सुलभ स्थान हों और यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 के तहत आंतरिक शिकायत समितियों (ICCs) की स्थापना करना ताकि उत्पीड़न का समाधान हो सके। 
  • शून्य-सहिष्णुता (Zero-Tolerance) की संस्कृति को बढ़ावा देना और शिक्षा, सशक्तीकरण एवं नीतिगत सुधारों के माध्यम से सांस्कृतिक और संरचनात्मक हिंसा का समाधान करना ताकि एक समान एवं सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित हो सके। 

निष्कर्ष: 

महिलाएँ भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रही हैं, ग्रामीण उद्यमों से लेकर कॉर्पोरेट नेतृत्व तक परिवर्तन ला रही हैं, जैसा कि जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था, "किसी राष्ट्र की स्थिति का आकलन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है," भारत नारी शक्ति को मूर्त रूप देते हुए विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है। 

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न: विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों और कार्यबल की भागीदारी की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

 

मुख्य परीक्षा

प्रश्न 1: “महिलाओं का सशक्तीकरण जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।” विवेचना कीजिये। (2019)  

प्रश्न 2: भारत में महिलाओं पर वैश्वीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये? (2015)  

प्रश्न 3: महिला संगठन को लैंगिक पूर्वाग्रह से मुक्त बनाने के लिये पुरुष सदस्यता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। टिप्पणी कीजिये। (2013)


स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

प्रिलिम्स के लिये: असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, रानी लक्ष्मीबाई, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन, सावित्रीबाई फुले 

मेन्स के लिये: भारत के राष्ट्रवादी आंदोलनों और क्रांतिकारी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लैंगिक और सामाजिक सुधार। 

स्रोत: IE

चर्चा में क्यों?

भारत ने अपनी 79वीं स्वतंत्रता दिवस की वर्षगाँठ मनाई, जिसमे राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम को आकार देने में महिलाओं की निर्णायक भूमिका पर प्रकश डाला। इन महिलाओं ने केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि उन सामाजिक बंधनों के खिलाफ भी संघर्ष किया, जो उन्हें अदृश्य बनाए रखना चाहते थे। 

स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका क्या थी? 

  • जन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी: महिलाओं ने "भारत माता" के प्रतीक से प्रेरित होकर क्षेत्रीय और सामुदायिक सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुटता दिखाई। इससे राष्ट्रीय भावना को बल मिला और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक समर्थन जुटाने में मदद मिली। 
    • असहयोग आंदोलन (1920-1922): महिलाओं ने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया, खादी को बढ़ावा दिया, जुलूसों में भाग लिया तथा जेल जाने से भी नहीं हिचकिचाईं, जिससे उनके साहस और राजनीतिक जागरूकता का परिचय मिला। 
    • नमक सत्याग्रह (1930) में सरोजिनी नायडू और कमला नेहरू जैसी हस्तियों ने जुलूसों का नेतृत्व किया, नमक की दुकानों पर धरना दिया और ग्रामीण महिलाओं को संगठित किया, जिससे महिलाएँ मुख्यधारा के संघर्ष में शामिल हो गईं। 
    • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): महिलाओं ने रैलियाँ आयोजित कीं, राष्ट्रवादी संदेश फैलाए, भूमिगत कांग्रेस रेडियो चलाया और पुरुष नेताओं की गिरफ्तारी के दौरान आंदोलन की निरंतरता बनाए रखी। 
  • क्रांतिकारी योगदान:  प्रीतिलता वद्देदार और कल्पना दत्ता जैसे नेताओं ने चटगाँव छापों, ब्रिटिश प्रतिष्ठानों पर हमलों और भूमिगत क्रांतिकारी नेटवर्क में सक्रिय रूप से भाग लिया। 
    • रानी लक्ष्मीबाई, मातंगिनी हाजरा और कनकलता बरुआ जनभागीदारी को प्रेरित करते हुए बलिदान के प्रतीक बन गईं। 
    • महिलाओं ने हथियारों की तस्करी की, पर्चे बांटे तथा गुप्त प्रतिरोध प्रयासों का समन्वय किया, जिससे उनकी रणनीतिक कुशाग्रता उजागर हुई। 
  • नेतृत्व और संगठनात्मक भूमिका: अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) और महिला भारतीय संघ (WIA) जैसे महिला-केंद्रित संगठनों के गठन ने राजनीतिक सक्रियता और सामाजिक सुधार के लिये मंच प्रदान किया। 
    • सरोजिनी नायडू, विजया लक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली और सुचेता कृपलानी जैसी नेताओं ने विरोध प्रदर्शनों का मार्गदर्शन किया, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा राजनीति में महिला नेतृत्व की संस्कृति को बढ़ावा दिया। 
  • सामाजिक सुधार और लैंगिक सशक्तीकरण: सावित्रीबाई फुले जैसी अग्रणी महिलाओं ने स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया, कानूनी समानता और संपत्ति के अधिकार की वकालत की तथा पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी प्रतिबंधात्मक प्रथाओं को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई। 
    • खादी संवर्द्धन, साक्षरता अभियान और नागरिक समाज में भागीदारी के माध्यम से ग्रामीण और शहरी महिलाओं को सशक्त बनाया गया तथा सामाजिक सुधार को राजनीतिक सक्रियता से जोड़ा गया। 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाने वाली महिला नेतृत्त्वकर्त्ता कौन थीं? 

  • रानी लक्ष्मीबाई: झांसी की रानी, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 के भारतीय विद्रोह) में बहादुरी से लड़ीं और राज्य हड़प नीति (Doctrine of Lapse) का विरोध किया। 
  • रानी चेन्नम्मा: कर्नाटक के कित्तूर की रानी जिन्होंने वर्ष 1824 में अंग्रेज़ों के खिलाफ कित्तूर विद्रोह का नेतृत्व किया। यह भारत में महिलाओं के नेतृत्त्व वाले शुरुआती उपनिवेश-विरोधी संघर्षों में से एक था।  
    • यह विद्रोह तब भड़का जब अंग्रेज़ों ने हड़प नीति के तहत उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया। 
  • सावित्रीबाई फुले: भारत की पहली महिला शिक्षिका, जिन्होंने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया, बाल विवाह, जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। 
  • पंडिता रमाबाई: विधवाओं के लिये शारदा सदन की स्थापना की; महिला शिक्षा और मताधिकार को प्रोत्साहित किया; बाल विवाह के विरुद्ध अभियान चलाया। 
  • सरोजिनी नायडू: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष; नमक मार्च (आंदोलन), सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय  भूमिका निभाई। 
  • सुचेता कृपलानी: सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहीं। बाद में भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) बनीं। 
  • कमलादेवी चट्टोपाध्याय: मैंगलोर में जन्मी, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ। उन्होंने अखिल भारतीय महिला कांग्रेस (AIWC) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, मद्रास में विधानसभा चुनाव लड़ने वाली पहली महिला बनीं और उन्होंने गांधीजी को नमक सत्याग्रह में महिलाओं को समान रूप से शामिल करने के लिये प्रेरित किया। 
  • रानी गाइदिन्ल्यू: मात्र 13 वर्ष की आयु में अपने चचेरे भाई हैपोउ जादोनांग द्वारा स्थापित हेराका आंदोलन से जुड़ीं। जादोनांग के वध के बाद आंदोलन का नेतृत्व संभाला, ब्रिटिश शासन का विरोध किया तथा नगा पहचान को बढ़ावा दिया। 
  • एनी बेसेंट: मद्रास होम रूल लीगकी संस्थापक, वर्ष 1917 में कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। शिक्षा और राष्ट्रवादी जागरूकता को प्रोत्साहित किया। 
  • कमला नेहरू: जवाहरलाल नेहरू के साथ असहयोग आंदोलन में भाग लिया। 
  • अरुणा रॉय: आधुनिक सामाजिक कार्यकर्त्ता; पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के अधिनियमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
  • भीकाजी कामा: विदेश में (जर्मनी) पहली बार भारतीय ध्वज फहराया और निर्वासन में रहते हुए भी सक्रियता जारी रखी। 
  • अरुणा आसफ अली: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांग्रेस का झंडा फहराया, जिसके कारण उन्हें '1942 की नायिका' (Heroine of 1942) की उपाधि दी गई। 
  • कस्तूरबा गांधी: महात्मा गांधी के साथ सविनय अवज्ञा तथा अन्य विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहीं और कई बार जेल भी जाना पड़ा। 
  • फातिमा शेख: बालिका शिक्षा और सामाजिक सुधार की अग्रणी। इन्होंने महिला सशक्तीकरण की नींव रखी। 
  • रुक्मिणी देवी अरुंडेल: भारतीय शास्त्रीय नृत्य और कला को पुनर्जीवित एवं प्रोत्साहित किया, जिसके परिणामस्वरूप देश की सांस्कृतिक पहचान सशक्त हुई। 
  • उषा मेहता: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गुप्त तरीके से कांग्रेस रेडियो का संचालन कर स्वतंत्रता का संदेश प्रसारित किया। 
  • बंगाल की महिला क्रांतिकारी:  
    • बीना दास: इन्होंने वर्ष 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह हॉल (Convocation Hall) में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन की हत्या का प्रयास किया था। 
      • उन्होंने खादी पहनकर, प्रतिबंधित साहित्य पर लेखन करते हुए और अपने कॉलेज में क्रांतिकारी साहित्य का वितरण कर शांतिपूर्वक विरोध जताया। इन कार्यों ने ब्रिटिश साम्राज्य और महिलाओं की आवाज़ को दबाने वाले वाले सामाजिक मानदंडों, दोनों को चुनौती दी। 
    • प्रीतिलता वाद्देदार: पहाड़तली यूरोपीयन क्लब पर हमले का नेतृत्व किया (1932); नस्लीय भेदभाव का विरोध करने के लिये स्वयं को बलिदान कर दिया। 
    • कल्पना दत्त: चटगाँव शस्त्रागार छापे में शामिल हुईं और क्रांति में महिलाओं की समान भूमिका को प्रमाणित किया। 
    • कमला दास गुप्ता: क्रांतिकारियों को छुपाने में सहायता की, संदेशों को पहुँचाने का कार्य किया तथा क्रांतिकारियों को हथियार उपलब्ध कराते हुए स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया।  
    • बेगम रुकैया सखावत हुसैन: एक अग्रणी नारीवादी, उन्होंने अपने उपन्यास सुल्ताना का सपना (Sultana’s Dream) में महिलाओं के नेतृत्व में, तर्क एवं शांतिपूर्ण तरीके से शासित और पितृसत्ता एवं उपनिवेशवाद दोनों की बेड़ियों से मुक्त समाज की कल्पना की। 
      • उन्होंने कोलकाता में मुस्लिम लड़कियों के लिये स्कूल स्थापित किये और व्यक्तिगत रूप से परिवारों को अपनी बेटियों को शिक्षित करने के लिये प्रोत्साहित किया। 
    • लाबन्या प्रभा घोष: साक्षरता को एक हथियार के रूप में बढ़ावा दिया, पढ़ने वाले समूहों का आयोजन किया, मुक्ति जैसे राष्ट्रवादी प्रकाशनों के लिये लेखन का कार्य किया और ग्रामीण बंगाल में भूमिगत राष्ट्रवादी बैठकों की मेज़बानी की। 
    • मातंगिनी हाज़रा (गांधी बूड़ि): भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। हाथों में तिरंगा थामे और "वंदे मातरम" का नारा लगाते हुए गोली लगने से हुई उनकी मृत्यु इस बात का प्रतीक थी कि आज़ादी सभी भारतीयों की है, केवल अभिजात वर्ग की नहीं। 

निष्कर्ष: 

महिलाएँ केवल सहभागी ही नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की शिल्पकार भी थीं। उन्होंने साहस, रणनीतिक कार्रवाई और सामाजिक सुधार को मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा तय की। उनका योगदान राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक मुक्ति के संगम का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की बहुआयामी भूमिका पर चर्चा कीजिये। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. एनी बेसेंट थी: 

  1. होमरूल आंदोलन शुरू करने के लिये ज़िम्मेदार   
  2. थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापक  
  3. भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस की अध्यक्ष (एक बार के लिये) 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही कथन/कथनों का चयन कीजिये। 

(a) केवल 1 

(b) केवल 2 और 3 

(c) केवल 1 और 3 

(d) 1, 2 और 3 

उत्तर:  (c) 

प्रश्न. भारतीय इतिहास में 8 अगस्त, 1942 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही है? (2021) 

(a) भारत छोड़ो प्रस्ताव AICC द्वारा अपनाया गया था। 

(b) अधिक भारतीयों को शामिल करने के लिये वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार किया गया। 

(c) सात प्रांतों में काॅन्ग्रेस के मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। 

(d) द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद क्रिप्स ने पूर्ण डोमिनियन स्थिति के साथ एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। 

उत्तर: (a)


मेन्स:

प्रश्न. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में, विशेषकर गाँधीवादी चरण के दौरान, महिलाओं की भूमिका पर चर्चा कीजिये।(2016)