डेली न्यूज़ (28 Apr, 2022)



नए आईटी कानून की आवश्यकता

प्रिलिम्स के लिये:

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, साइबर अपराध, स्प्लिंटरनेट, आईटी अधिनियम की धारा 66A, डेटा संरक्षण कानून

मेन्स के लिये:

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, साइबर सुरक्षा, आईटी और कंप्यूटर, सरकारी नीतियों और हस्तक्षेपों की समीक्षा की आवश्यकता

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (IT) ने 22 वर्ष पुराने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में विधायी संशोधन (Overhaul) की आवश्यकता पर बात की।

नए आईटी कानून की आवश्यकता क्यों?

  • डिजिटल युग में भारत का प्रवेश: भारत कुछ ही वर्षों में एक ट्रिलियन-डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है और बड़ी संख्या में भारतीय व्यवसाय इंटरनेट के माध्यम से संचालित होंगे। 
    • इसलिये एक खुला और सुरक्षित इंटरनेट हमारे देश का एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक घटक बन गया है।
  • स्प्लिंटरनेट का उदय: जैसा कि हम जानते हैं, वैश्विक इंटरनेट आक्रामक राष्ट्रीय नीतियों, व्यापार विवादों, सेंसरशिप और बड़ी तकनीकी कंपनियों के असंतोष के कारण राष्ट्रीय नेटवर्क छोटे-छोटे भागों में विखंडित होने की कगार पर है।  
    • एक विखंडित इंटरनेट या 'स्प्लिंटरनेट', नवाचार की संभावनाओं को कम करने का प्रयास   करता है, जो एक प्रमुख डिजिटल शक्ति बनने के क्रम में भारत के लक्ष्यों को बाधित कर सकता है।
    • इसके दूरगामी परिणाम होंगे जो अंतर्रष्ट्रीय यूनियनों, डेटा उद्यमों और व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को समान रूप से प्रभावित करेगा।
    • वर्तमान में विखंडित इंटरनेट का सबसे परिष्कृत उदाहरण चीन का ग्रेट फायरवॉल है।  
    • गूगल सर्च, मैप्स और पश्चिमी सोशल मीडिया तथा इसी तरह की अन्य आवश्यक सेवाओं को चीन द्वारा साइबर संप्रभुता के नाम पर वीबो जैसे चीनी विकल्पों द्वारा पूर्ण रूप से प्रतिस्थापित और प्रतिबंधित किया गया है।

नए आईटी कानून (आंतरिक मुद्दे) की आवश्यकता: 

  • भारत में अधिकांश साइबर अपराध ज़मानती अपराध हैं: एक ऐतिहासिक त्रुटि तब हुई जब आईटी (संशोधन) अधिनियम, 2008 में कुछ ही अपराधों को छोड़कर लगभग सभी साइबर अपराधों को ज़मानती अपराध बना दिया गया।
    • नागरिक उत्तरदायित्व को बढ़ाने और सज़ा को कम करने पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है, जो यह दर्शाता है कि देश में साइबर अपराध के दोषियों की संख्या एकल अंकों में क्यों है।
  • प्रतिबंधित साइबर सुरक्षा उपाय: आईटी अधिनियम मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, भोपाल, बंगलूरू आदि जैसे महानगरीय शहरों में प्रभावी है, लेकिन यह दूसरे स्तर के शहरों में कमज़ोर है क्योंकि प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कानून के बारे में जागरूकता बढ़ाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
    • आईटी अधिनियम मोबाइल के माध्यम से किये गए अधिकांश अपराधों पर प्रभावी नहीं है। इसमें सुधार की आवश्यकता है।

साइबर सुरक्षा के लिये वर्तमान सरकारी पहल:

आगे की राह 

  • सरकार नए नियम बनाने की क्षमताओं के साथ एक नए विधायी ढाँचे के निर्माण पर विचार कर रही है जो डिजिटल स्पेस से संबंधित विभिन्न मुद्दों से निपटने में सक्षम होगा। इसमें निम्नलिखित प्रावधान शामिल होने चाहिये:
    • अधिकांश साइबर अपराधों को गैर-जमानती अपराध बनाने की आवश्यकता है।
    • इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिये एक व्यापक डेटा सुरक्षा व्यवस्था को कानून में शामिल करने की आवश्यकता है।
    • साइबर युद्ध को एक अपराध के रूप में आईटी अधिनियम के तहत लाने  की आवश्यकता है।
    • आईटी अधिनियम की धारा 66 ए भारत के संविधान के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों से स्वतंत्र हैं। अतः नए प्रावधानों को कानूनी रूप से मज़बूती प्रदान करने के लिये पुराने प्रावधानों समन्वय की ज़रूरत है। 
    • देशों के बीच बढ़ती द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्थाओं को इस तरह से विकसित करना होगा कि वे इंटरनेट के संबंध में एक-दूसरे पर आश्रित रहें। (जैसे चीन का ग्रेट फ़ायरवॉल)। 

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (पीवाईक्यू):

प्रश्न: भारत में निम्नलिखित में से किसके लिये साइबर सुरक्षा घटनाओं पर रिपोर्ट करना कानूनी रूप से अनिवार्य है? (2017) 

  1. सेवा प्रदाता
  2. डेटा केंद्र
  3. बॉडी कॉर्पोरेट 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3 
(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: (d) 

व्याख्या:  

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 की धारा 70 B के अनुसार, केंद्र सरकार की  अधिसूचना द्वारा घटना की प्रतिक्रिया हेतु राष्ट्रीय एजेंसी के रूप में कार्य करने के लिये भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERTIn) का गठन किया गया है। 

स्रोत: द हिंदू 


वर्ल्ड इकोनाॅमिक आउटलुक: आईएमएफ

प्रिलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, वर्ल्ड इकोनाॅमिक आउटलुक, सकल घरेलू उत्पाद

मेन्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जारी ‘वर्ल्ड इकोनाॅमिक आउटलुक’ रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

चर्चा में क्यों? 

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा जारी ‘वर्ल्ड इकोनाॅमिक आउटलुक’ के नवीनतम संस्करण में वित्त वर्ष 2022-23 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि से संबंधित अपने पूर्वानुमान को घटाकर 8.2% कर दिया गया है। इसके बावजूद भारत विश्व में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ रही प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जिसकी विकास दर चीन के 4.4% की तुलना में लगभग दो गुनी है।

IMF के वृद्धि संबंधी अनुमान:

  • भारतीय परिदृश्य: 
    • इसने वर्ष 2021 की इसी अवधि के दौरान अपने पिछले पूर्वानुमान (9%) को वर्ष 2022-23 के लिये भारत में वृद्धि अनुमान को 0.8% अंक कम कर दिया है। 
      • वर्ष 2021 में भारत ने 8.9% की वृद्धि दर दर्ज की।
      • वर्ष 2023-24 में भारत की अर्थव्यवस्था के 6.9% की दर से बढ़ने का अनुमान है।
    • IMF का अनुमान है कि वस्तु और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण आयात बिल बढ़ने के साथ वित्त वर्ष 2022-23 में भारत का चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2021-22 के 1.6% से बढ़कर 3.1% हो जाएगा।
    • भारत "रूस-यूक्रेन युद्ध औरकी वजह से लागू नकारात्मक व्यापार शर्तों के कारण कई अन्य देशों की तरह पीड़ित था" क्योंकि उच्च खाद्य और ऊर्जा की कीमतें व्यापार संतुलन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही थीं।
    • इसके अतिरिक्त बाहरी मांग में भी नरमी आ रही थी क्योंकि शेष विश्व की वृद्धि प्रभावित हुई थी। 
  • वैश्विक परिदृश्य:
    • IMF द्वारा वर्ष 2022 और वर्ष 2023 में वैश्विक विकास दर 3.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है, जो जनवरी 2022 के पूर्वानुमान की तुलना में क्रमश: 0.8 और 0.2 फीसदी कम है।
      • वैश्विक विकास में गिरावट भारत की विकास संभावनाओं को विशेष रूप से कमज़ोर करती है क्योंकि इससे भारतीय निर्यात की मांग कम हो जाएगी।
    • यह गिरावट काफी हद तक रूस और यूक्रेन युद्ध के प्रत्यक्ष प्रभावों को दर्शाती है। 
    • कोविड के मामलों के बढ़ने के कारण शेनझेन और शंघाई (चीन) जैसे प्रमुख विनिर्माण और व्यापारिक केंद्रों में हालिया लॉकडाउन की वजह से इस क्षेत्र में तथा इसके बाहर आपूर्ति बाधित होने की संभावना है। 

आईएमएफ के सुझाव:

  • मौद्रिक सख्ती:
    • इसने यूक्रेन में युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बीच मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रण में रखने के लिये केंद्रीय बैंकों से मौद्रिक सख्ती की सिफारिश की।
      • आईएमएफ ने चेतावनी दी कि युद्ध "वैश्विक सुधार को बुरी तरह से प्रभावित करने, विकास की गति को धीमा करने के साथ ही मुद्रास्फीति को बढ़ा देगा।  
  • बढ़ती कीमतों की निगरानी: 
    • मौद्रिक प्राधिकरणों को घरेलू मुद्रास्फीति की संभावनाओं के चलते बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारणों की सावधानीपूर्वक निगरानी करनी चाहिये। 
  • परिवारों को लक्षित आय सहायता: 
    • आईएमएफ रिपोर्ट ने अत्यधिक मूल्य वृद्धि का सामना कर रहे देशों में घरेलू बजट पर दबाव को कम करने के लिये सरकारों द्वारा परिवारों हेतु लक्षित आय का समर्थन किया। 

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष: 

  • परिचय:
    • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद युद्ध में  तबाह देशों के पुनर्निर्माण में सहायता के लिये विश्व बैंक के साथ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की गई।
      • अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान इन दोनों संगठनों की स्थापना पर सहमति बनी। इसलिये इन्हें ब्रेटन वुड्स के जुड़वाँ संतानों यानी ब्रेटन वुड्स ट्विन्स के रूप में भी जाना जाता है।
    • IMF की स्थापना 1945 में हुई थी, यह उन 189 देशों द्वारा शासित और उनके प्रति जवाबदेह है जो इसके वैश्विक सदस्य हैं। भारत ने  27 दिसंबर, 1945 को IMF की सदस्यता ग्रहण की।
    • IMF का प्राथमिक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करना है, यह  विनिमय दरों और अंतर्राष्ट्रीय भुगतान की प्रणाली है जो देशों (और उनके नागरिकों) को एक-दूसरे के साथ लेन-देन करने में सक्षम बनाती है।
      • वर्ष 2012 में एक कोष के जनादेश  के अंतर्गत  वैश्विक स्थिरता से संबंधित सभी व्यापक आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र के मुद्दों को शामिल करने के लिये इसको अद्यतित  किया गया। 
  •  IMF की रिपोर्ट: 
  • वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक
    • यह IMF का एक सर्वेक्षण है जिसे आमतौर पर वर्ष में दो बार- अप्रैल और अक्तूबर के महीनों में प्रकाशित किया जाता है।
    • यह निकट और मध्यम अवधि के दौरान वैश्विक आर्थिक विकास का विश्लेषण तथा भविष्यवाणी करता है। 
    • पूर्वानुमान के अपडेट्स की बढ़ती मांग को देखते हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अपडेट जनवरी और जुलाई में प्रकाशित किया जाता है, जो आमतौर पर अप्रैल व अक्तूबर में प्रकाशित होने वाली मुख्य WEO रिपोर्ट्स के बीच का समय है। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs): 

वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' किसके द्वारा तैयार की जाती है? (2016)

(a) यूरोपीय सेंट्रल बैंक
(b) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(c) पुनर्निर्माण हेतु अंतर्राष्ट्रीय बैंक और विकास
(d) आर्थिक सहयोग के लिये संगठन और विकास

उत्तर: B 

स्रोत: फाइनेंसियल एक्सप्रेस


सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144

प्रिलिम्स के लिये:

धारा 144, सीआरपीसी, उच्च न्यायालय, मौलिक अधिकार, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम

मेन्स के लिये:

धारा 144 सीआरपीसी के साथ मुद्दे, निर्माण और नीतियों के कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में उत्तराखंड के हरिद्वार ज़िला प्रशासन ने रुड़की शहर के पास दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure- CrPC), 1973 की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू की।

धारा 144 

  • परिचय: 
    • यह कानून भारत में किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के मजिस्ट्रेट को एक निर्दिष्ट क्षेत्र में चार या अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने का आदेश पारित करने का अधिकार देता है। 
    • यह उन उपद्रव या किसी घटना के संभावित खतरे के मामलों में लगाया जाता है जिसमें मानव जीवन को परेशानी या संपत्ति को क्षति पहुंँचाने की संभावना होती है। 
    • यह आदेश किसी विशेष व्यक्ति या आम जनता के खिलाफ पारित किया जा सकता है। 
  • धारा 144 की विशेषताएँ 
    • यह दिये गए क्षेत्राधिकार में किसी भी प्रकार के हथियार रखने या ले जाने पर प्रतिबंध लगाता है। 
    • इस तरह के कृत्य के लिये अधिकतम दंड तीन वर्ष है
    • इस धारा केअंतर्गत पारितआदेश के अनुसार, जनता की आवाजाही नहीं होगी और सभी शिक्षण संस्थान बंद रहेंगे 
    • साथ ही इस आदेश के संचालन की अवधि के दौरान किसी भी प्रकार की जनसभा या रैलियांँ करने पर पूर्ण रोक होती है। 
    • कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा किसी गैर-कानूनी सभा को भंग न करना एक दंडनीय अपराध माना जाता है।
    • यह अधिकारियों को क्षेत्र में इंटरनेट एक्सेस को ब्लॉक करने का अधिकार भी देता है। 
    • धारा 144 का अंतिम उद्देश्य उन क्षेत्रों में शांति और व्यवस्था बनाए रखना है जहांँ देनिक गतिविधयों को बाधित करने से परेशानी हो सकती है। 
  • धारा 144 के आदेश की अवधि:
    • इस धारा के तहत कोई भी आदेश 2 महीने से अधिक की अवधि के लिये लागू नहीं हो सकता है।
    • राज्य सरकार के विवेक के तहत इसकी वैधता को दो और महीनों के लिये बढ़ाया जा सकता है जिसकी वैधता अधिकतम छह महीने तक हो सकती है।
    • स्थिति सामान्य होने पर धारा 144 को वापस लिया जा सकता है।

धारा 144 और कर्फ्यू में अंतर:

  • धारा 144 संबंधित क्षेत्र में चार या अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाती है, जबकि कर्फ्यू के दौरान लोगों को एक विशेष अवधि के लिये घर के अंदर रहने का निर्देश दिया जाता है। कर्फ्यू  के समय सरकार यातायात पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। 
  • कर्फ्यू के दौरान बाज़ार, स्कूल, कॉलेज और कार्यालय बंद रहते हैं, जबकि केवल आवश्यक सेवाओं को ही पूर्व सूचना पर खोलने की अनुमति प्रदान की जाती है।

धारा 144 की आलोचना के कारण:

  • यह पूर्ण शक्ति प्रदान करती है: 
    • यह एक व्यापक धारा है जिसके प्रावधान एक मजिस्ट्रेट को पूर्ण शक्ति प्रदान करने के लिये पर्याप्त हैं, जिसका प्रयोग वह अनुचित तरीके से कर सकता है।
      • इस तरह के आदेश के खिलाफ तत्काल उपाय स्वयं मजिस्ट्रेट के लिये पुनरीक्षण योग्य होते हैं।
  • अधिकारों का उल्लंघन:
    • किसी पीड़ित व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होने पर वह रिट याचिका दायर कर उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है ।
      • हालाँकि ऐसी आशंकाएँ भी हैं कि उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले ही अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है
  • बड़े क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाना न्यायोचित नहीं:
    • एक बहुत बड़े क्षेत्र पर निषेधाज्ञा लागू करना उचित नहीं है क्योंकि सुरक्षा की स्थिति अलग-अलग जगहों पर भिन्न होती है और इससे एक ही तरीके से नहीं निपटा जा सकता है।

धारा 144 पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: 

  • डॉ. राम मनोहर लोहिया वाद, 1967: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "कोई भी लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता है जब तक कि 'सार्वजनिक व्यवस्था' में नागरिकों के एक वर्ग को स्वतंत्र रूप से हस्तक्षेप करने की अनुमति प्राप्त है"।
  • 'मधु लिमये बनाम सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेट, 1970:  
    • भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम हिदायतुल्ला की अध्यक्षता वाली सात-न्यायाधीशों की पीठ के अनुसार, धारा 144 के तहत मजिस्ट्रेट की शक्ति “प्रशासन की एक सामान्य शक्ति नहीं है, बल्कि न्यायिक तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली शक्ति है और इसकी न्यायिक जांँच की जा सकती है। 
      • हालांँकि न्यायालय ने कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया कि धारा 144 के माध्यम से लगाए गए प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत निर्धारित मौलिक अधिकारों के लिये "उचित प्रतिबंध" के अंतर्गत आते हैं। 
      • न्यायालय के अनुसार, यह सही है कि कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है, अतः इसे रद्द करने का कोई कारण नहीं है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में रामलीला मैदान में सो रहे आंदोलनकारियो के खिलाफ धारा 144 का इस्तेमाल करने पर सरकार की आलोचना की थी।  
    • न्यायालय के अनुसार, इस तरह के प्रावधान का इस्तेमाल केवल गंभीर परिस्थितियों में ही सार्वजनिक शांति बनाए रखने हेतु किया जा सकता है।
    • प्रावधान की प्रभावकारिता कुछ हानिकारक घटनाओं को तुरंत रोकने से संबंधित है अर्थात् आपातकालीन स्थिति अचानक से उत्पन्न हुई हो और इसके परिणाम पर्याप्त रूप से गंभीर हो।
  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, इस तरह के प्रावधान का इस्तेमाल नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने के मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध लगाने के लिये नहीं किया जा सकता है। इसे शिकायत अथवा विचार की अभिव्यक्ति अथवा किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग को रोकने हेतु एक 'उपकरण' की  भांँति इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। 

आगे की राह

  • आपात स्थिति से निपटने में मदद के लिये धारा 144 एक उपयोगी उपकरण है। हालाँकि विशिष्ट उद्देश्यों के साथ व्यापक कार्यकारी शक्तियों के किसी भी संकीर्ण उद्देश्य की अनुपस्थिति कार्यकारी शाखा पर बहुत सीमित न्यायिक निरीक्षण के साथ इसे दुरुपयोग के योग्य बना देती है।
  • इस धारा के तहत आगे बढ़ने से पहले मजिस्ट्रेट को जाँच करनी चाहिये और मामले की तात्कालिकता को रिकॉर्ड करना चाहिये।
  • आपात स्थितियों से निपटने के लिये विधायिका द्वारा पूर्ण शक्तियाँ प्रदान करने और संविधान के मौलिक अधिकारों के तहत नागरिकों को दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अन्य प्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा करने की आवश्यकता को संतुलित करने की आवश्यकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विश्व बाल और किशोर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), मध्याह्न भोजन योजना, एनीमिया मुक्त भारत अभियान

मेन्स के लिये:

भारत में बाल और किशोर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली एवं संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में विश्व के बाल और किशोर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली (Child and Adolescent Healthcare Systems of the World) पर एक सीरीज़ प्रकाशित हुई।

  • चार पत्रों की इस सीरीज़ ने वर्तमान स्थिति को विश्व स्तर पर किये गए लाभ के साथ निर्धारित किया है, जो वैश्विक परिदृश्य में स्पष्ट भिन्नताओं को इंगित करता है, कुछ देशों ने दूसरों की तुलना में अधिक उल्लेखनीय सुधार प्रदर्शित किये हैं।

Child-and-Adolescent-Healthcare-Systems

सीरीज़ के प्रमुख निष्कर्ष:

  • अनुमान के अनुसार, वर्ष 2019 में 28 सप्ताह के गर्भ के दौरान और 20 वर्ष की आयु के बीच 8.62 मिलियन से अधिक मौतें हुईं।
    • इन मौतों में आधे से अधिक हिस्सेदारी मातृ मृत्यु (23%) और नवजात मृत्यु (28%) के मामलों की थी, जबकि इनके अलावा अन्य एक-तिहाई (32%) में एक से पाँच वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु शामिल थी।  
    • इन मौतों में से आधे से अधिक मृत्यु जन्म के दौरान (23%) और नवजात शिशुओं  (28%) की थी , जबकि एक तिहाई (32%) मौतें एक महीने से पाँच वर्ष आयु वर्ग के बच्चों कीं हुईं। 
  • यह बाल मृत्यु दर और रुग्णता में कमी को प्रगति के रूप में दर्ज करता है। 
    • हालाँकि इसमें अत्यधिक असमानताएँ देखी जा सकती हैं, कई बच्चे और किशोर जीवित नहीं बचते क्योंकि इनके लिये कम लागत वाली सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

महामारी का प्रभाव:  

  • कोविड-19 महामारी के कारण बच्चों कि देखभाल और शिक्षा में जो अंतराल आया है, इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है।
    • समान और लचीली सेवाओं के पुनर्निर्माण के प्रयास के रूप में बच्चों एवं परिवारों की उभरती ज़रूरतों को पूरा करने हेतु स्वास्थ्य व सामाजिक प्रणालियों को एक साथ काम करने के लिये उचित ढंग से संगठित किया जाना चाहिये।
  • कोविड-19 महामारी के दौरान बच्चों और परिवारों की \ज़रूरतों को पूरा करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है उसे वैश्विक समुदाय के समक्ष चेतावनी के रूप में रेखांकित करते हुए वैश्विक स्तर पर बाल व किशोर स्वास्थ्य एजेंडा को बदलने की तत्काल आवश्यकता है।

सिफारिशें:

  • विखंडित दृष्टिकोण :
    • शृंखला में बच्चों को पालन-पोषण में मदद करने वाली सेवाओं की फिर से कल्पना करने के संदर्भ में उल्लेख किया गया है कि विखंडित दृष्टिकोण केवल कुछ आयु समूहों के लिये खाद्य संकट से निपटने का सबसे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है।
  • व्यापक देखभाल की आवश्यकता:
    • जर्नल में पोषण, निवारक स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक और सामुदायिक सहायता, पूर्व की निर्मित अवधारणा से लेकर 20 वर्ष की आयु तक के सभी आयु समूहों को केंद्रित किया गया है।
      • इसमे परिवारों की निकट भागीदारी, विशेष रूप से गर्भावस्था के चरण से ही सहायता प्रदान करने, प्रासंगिक वर्षों के दौरान बच्चे को भोजन उपलब्ध कराने हेतु भी दृढ़तापूर्वक अनुशंसा की गई है। 
  • साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप की आवश्यकता:
    • इसमें पांँच साल से कम उम्र के बच्चों के लिये साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप को बढ़ाने का आह्वान करते हुए स्कूल जाने वाले बच्चों के लिये हस्तक्षेप और बचपन से किशोरावस्था में संक्रमण की अवधि पर प्रकाश डाला गया है।
      • इसमें मानसिक स्वास्थ्य का समर्थन करने, अनजाने में लगी चोटों, गैर-संचारी रोगों और उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों को दूर करने हेतु सिफारिशें की गई हैं।

भारत द्वारा की गई संबंधित पहलें:

विगत वर्षों के प्रश्न: 

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' के उद्देश्य हैं? (2017)  

  1. गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण के बारे में जागरूकता पैदा करना।
  2. छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया की घटनाओं को कम करना।
  3. बाजरा, मोटे अनाज और बिना पॉलिश किये चावल की खपत को बढ़ावा देना।
  4. मुर्गी के अंडों की खपत को बढ़ावा देना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4

उत्तर: (a)  

  • राष्ट्रीय पोषण मिशन (पोषण अभियान) महिला और बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम है, जो आंँगनवाड़ी सेवाओं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, स्वच्छ-भारत मिशन आदि जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के साथ अभिसरण सुनिश्चित करता है।   
  • राष्ट्रीय पोषण मिशन (एनएनएम) का लक्ष्य 2017-18 से शुरू होकर अगले तीन वर्षों के दौरान 0-6 वर्ष के बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की पोषण स्थिति में समयबद्ध तरीके से सुधार करना है। अतः कथन 1 सही है।
  • एनएनएम का लक्ष्य स्टंटिंग, अल्पपोषण, एनीमिया (छोटे बच्चों, महिलाओं और किशोर लड़कियों के बीच) को कम करना और बच्चों के जन्म के समय कम वज़न की समस्या को कम करना है। अत: 2 सही है।
  • एनएनएम के तहत बाजरा, बिना पॉलिश किये चावल, मोटे अनाज और अंडों की खपत से संबंधित ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। अत: कथन 3 और 4 सही नहीं हैं।

स्रोत: द हिंदू


H3N8 बर्ड फ्लू से संबंधित पहला मानव केस

प्रिलिम्स के लिये:

H3N8 बर्ड फ्लू, इन्फ्लूएंज़ा, SARS-CoV-2, इन्फ्लूएंज़ा वायरस के प्रकार का पहला मानव मामला

मेन्स के लिये:

स्वास्थ्य, पशु-पालन का अर्थशास्त्र, बर्ड फ्लू और इन्फ्लूएंज़ा

चर्चा में क्यों?

चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग (NHC) ने बताया की एक चार वर्षीय लड़का बर्ड फ्लू के H3N8 वेरिएंट के कारण  बुखार सहित कई लक्षणों के साथ संक्रमित पाया गया है।

  • H3N8 वेरिएंट इससे पहले विश्व में घोड़ों, कुत्तों, पक्षियों व सील में पाया गया है।
  • हालांँकि इससे पहले H3N8 का कोई मानवीय मामला सामने नहीं आया है। 

बर्ड फ्लू:

  • एवियन इन्फ्लूएंज़ा जिसे अनौपचारिक रूप से एवियन फ्लू या बर्ड फ्लू के रूप में जाना जाता है, इसे "पक्षियों के अनुकूल वायरस के कारण होने वाला इन्फ्लूएंज़ा" के रूप में संदर्भित किया जाता है। 
    • अधिकांश एवियन इन्फ्लूएंज़ा वायरस मनुष्यों को संक्रमित नहीं करते हैं; हालांँकि कुछ, जैसे-  A (H5N1) और A (H7N9) लोगों में गंभीर संक्रमण का कारण बनते हैं।
  • H5N1 हेतु कोई टीका उपलब्ध नहीं है।
  • अधिकांश एवियन इन्फ्लूएंज़ा वायरस मनुष्यों को संक्रमित नहीं करते हैं, हालाँकि कुछ, जैसे- A (H5N1) और A (H7N9), प्रजातियों की बाधा को पार करते हुए मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में भी बीमारी या उप-संक्रमण का कारण बनते हैं। 
  • एवियन (H5N1) वायरस उप-प्रकार, एक अत्यधिक रोगजनक वायरस ने वर्ष 1997 में हांँगकांँग, चीन में एक पोल्ट्री महामारी के प्रकोप के दौरान पहली बार मनुष्यों को संक्रमित किया था।

इन्फ्लूएंज़ा वायरस के प्रकार: 

  • इन्फ्लूएंज़ा वायरस चार प्रकार के होते हैं: इन्फ्लूएंज़ा A, B, C और D
    • इन्फ्लूएंज़ा A और B दो प्रकार के इन्फ्लूएंज़ा लगभग प्रत्येक वर्ष मौसमी संक्रमण जनित महामारी का कारण बनते हैं।
    •  इन्फ्लूएंज़ा विषाणु C सामान्यतः मनुष्यों में प्रभाव डालता है लेकिन यह विषाणु कुत्तों एवं सूअरों को भी प्रभावित करता है। 
    • इन्फ्लूएंज़ा D मुख्य रूप से मवेशियों में पाया जाता है। इस विषाणु के अब तक मनुष्यों में संक्रमण या बीमारी उत्पन्न करने के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
    • एवियन इन्फ्लूएंज़ा टाइप A वायरस
  • इन्फ्लूएंज़ा A वायरस को दो प्रकार के प्रोटीन HA (Hemagglutinin) और NA (Neuraminidase) के आधार पर 18HA और 11NA उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। 
  • इन दो प्रोटीनों के कई संयोजन संभव हैं जैसे- H5N1, H7N2, H9N6, H17N10, H18N11 आदि।
  • इन्फ्लूएंज़ा A के सभी ज्ञात उप-प्रकार H17N10 और H18N11 उप-प्रकारों को छोड़कर अन्य सभी वायरस पक्षियों को संक्रमित कर सकते हैं, जो केवल चमगादड़ों में पाए गए हैं।

बर्ड फ्लू वायरस संबंधी चिंता का कारण:

  • SARS-CoV-2 की उत्पत्ति के बारे में अटकलों ने पशु और पक्षी-जनित वायरस के बारे में चिंताएँ बढ़ा दी हैं।  
  • नए स्ट्रेन का उद्भव, विशेष रूप से पालतू जानवरों और पक्षियों के बीच विकास व अनिवार्यता का क्रम है तथा मनुष्यों को संक्रमित करने वाले नए वायरस की छिटपुट रिपोर्टें मिली हैं।  
  • जब तक एवियन इन्फ्लूएंज़ा वायरस पोल्ट्री में फैलते हैं, तब तक मनुष्यों में एवियन इन्फ्लूएंज़ा का हल्के स्तर पर संक्रमण होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है लेकिन यह इन्फ्लूएंज़ा महामारी के लगातार बढ़ते खतरे के प्रति एक चेतावनी के रूप में कार्य कर रहा है।

मनुष्यों में प्रसार का तरीका:

  • एवियन इन्फ्लूएंजज़ा वायरस के कई उप-प्रकार और स्ट्रेन अब विश्व भर में पाए जाते हैं, उनमें से कुछ मनुष्यों की मौत का कारण बने हुए हैं और अन्य कुक्कुट किसानों को गंभीर नुकसान पहुंँचाते हैं।
  • हालांँकि मानव से मानव संचरण जो ज़्यादातर अंतरंग और निरंतर शारीरिक संपर्क के बाद होता है दुर्लभ माना जाता है जो बड़े स्तर पर घातक है तथा अनुमानित 60% मामलों में घातक साबित होता है। 
  • पक्षी के अंतर्ग्रहण के माध्यम से फैलने वाले फ्लू के कोई ज्ञात उदाहरण नहीं हैं, भले ही लोग किसी संक्रमित पक्षी का सेवन करते समय उचित सुरक्षा और सावधानी बरतते हो।  
  • मनुष्यों में पक्षी संक्रमण के लक्षण किसी भी अन्य मौसमी फ्लू के समान होते हैं जैसे-बुखार, शरीर में दर्द, गले में खराश, नाक बहना, सिरदर्द, थकान, आदि। हालाँकि यह बहुत जल्दी गंभीर रूप धारण कर सकता है और श्वसन संकट का कारण बन सकता है।

बर्ड फ्लू के खतरे से निपटने के उपाय: 

  • एक बड़े पोल्ट्री उद्योग के साथ एक प्रमुख कृषि राष्ट्र के रूप में भारत ने एवियन इन्फ्लूएंज़ा से निपटने के लिये केंद्र के पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग द्वारा तैयार की गई एक कार्य योजना को लागू किया है।
    • इसमें प्रकोप की सूचना देने, प्रभावित क्षेत्र से पक्षियों को हटाने और किसानों को मुआवज़ा देने के लिये निवारक जाँच और परीक्षण हेतु एक स्पष्ट प्रोटोकॉल शामिल है। 
    • वायरस के उप-प्रकारों का शीघ्र पता लगाने व पहचान करने से रोकथाम के उपायों को शुरू करने में मदद मिलती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश, प्रकोप के दौरान कुक्कुट खपत पर सलाह के साथ साथ-साथ अफवाह फैलने से रोकना आवश्यक है।
  • उपायों की प्रभावशीलता स्वाभाविक रूप से उस तत्परता पर निर्भर करती है जिसके साथ राज्य स्तर पर पशुपालन विभाग नमूने एकत्र करता है और जब किसी बीमारी का प्रकोप बढ़ने वाला हो तो चेतावनी जारी करता है।

विगत  वर्ष के प्रश्न:

H1N1 वायरस का कभी-कभी समाचारों में उल्लेख किया जाता है, निम्नलिखित में से यह  किस रोग से संबंधित है? (2015)

(a) एड्स
(b) बर्ड फ्लू
(c) डेंगू
(d) स्वाइन फ्लू

उत्तर: (D)

व्याख्या:

  • H1N1 वायरस स्वाइन फ्लू से संबंधित है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2009 में H1N1 के कारण होने वाले फ्लू को वैश्विक महामारी घोषित किया था।
  • स्वाइन फ्लू के लक्षणों में बुखार, खाँसी, गले में खराश, ठंड लगना, कमज़ोरी और शरीर में दर्द शामिल हैं।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारत की श्रम शक्ति भागीदारी दर

प्रिलिम्स के लिये:

भारत की श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR), भारत में बेरोज़गारी के प्रकार, बेरोज़गारी से निपटने हेतु सरकार द्वारा की गई पहलें।

मेन्स के लिये:

भारत में बेरोज़गारी के प्रकार, भारत में बेरोज़गारी का समाधान।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकाॅनमी (Centre for Monitoring Indian Economy- CMIE) के आंँकड़ों के अनुसार, भारत की श्रम शक्ति भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate- LFPR) जो वर्ष 2016 में कम (47%) थी, घटकर सिर्फ 40% रह गई है। 

  • आंँकड़ों से इस बात का भी पता चलता है कि कामकाजी आयु वर्ग (15 वर्ष और उससे अधिक) में भारत की आधी से अधिक आबादी नौकरियों को छोड़ने का फैसला कर रही है, तथा साथ ही ऐसे लोगों का अनुपात बढ़ता जा रहा है। 

Labour-Chart

 प्रमुख बिंदु 

 श्रम शक्ति भागीदारी दर (CMIE):

  • CMIE के अनुसार, श्रम बल में 15 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोग शामिल हैं तथा जो  निम्नलिखित दो श्रेणियों में से किसी एक से संबंधित हैं:
    • रोज़गारयुक्त/कार्यरत।
    • बेरोज़गार तथा कार्य करने के इच्छुक तथा जो सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में हैं।
  • इन दो श्रेणियों में लोग "नौकरी की मांग" करते हैं। यह मांग LFPR को संदर्भित करती है।
  • इस प्रकार LFPR अनिवार्य रूप से कामकाजी उम्र (15 वर्ष या अधिक) की आबादी का प्रतिशत है जो नौकरी की मांग करता है।
    • यह किसी भी अर्थव्यवस्था में नौकरियों हेतु "मांग" का प्रतिनिधित्व करता है।
    • इसमें रोज़गार पाने वाले और जो बेरोज़गार हैं, दोनों शामिल होते हैं। 
  • बेरोज़गारी दर (UER), जिसका नियमित रूप से उल्लेख समाचारों में किया जाता है, श्रम बल के अनुपात के रूप में बेरोज़गारों (श्रेणी 2) की संख्या को दर्शाता है।   
  • भारत में श्रम शक्ति भागीदारी दर न सिर्फ बाकी दुनिया के मुकाबले कम है बल्कि इसमें गिरावट भी  जारी है।
    • भारत में यह पिछले 10 वर्षों में घट रहा है और 2016 में 47% से घटकर दिसंबर 2021 तक केवल 40% रह गया है।

 भारत में श्रम शक्ति भागीदारी दर में गिरावट के कारण: 

  • भारत के श्रम शक्ति भागीदारी दर के कम होने का मुख्य कारण महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर   का बेहद निम्न स्तर पर होना है। 
  • CMIE के आँकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2021 तक पुरुष श्रम शक्ति भागीदारी दर  67.4% थी, जबकि वहीं महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर 9.4% थी।  
  • दूसरे शब्दों में भारत में 10 कामकाजी उम्र की महिलाओं में से केवल एक   काम की मांग कर रही हैं।
  • विश्व बैंक से प्राप्त डेटा के अनुसार भारत की महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर लगभग 25% है, जबकि यह वैश्विक औसत श्रम शक्ति भागीदारी 47% के आस-पास है।
  • महिलाओं की  श्रम शक्ति भागीदारी दर कम होने के प्रमुख कारण अनिवार्य रूप से काम करने की परिस्थितियों से संबंधित हैं, जैसे- कानून और व्यवस्था, कुशल सार्वजनिक परिवहन, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, सामाजिक मानदंड आदि महिलाओं के लिये अनुकूल नहीं हैं। 
    • इसके अलावा भारत में बहुत सी महिलाएँ विशेष रूप से अपने घर के कार्यों  में शामिल रहती  हैं (जैसे अपने परिवार की देखभाल करना आदि )। 

 श्रम शक्ति भागीदारी दर की गणना से संबंधित सीमाएँ: 

  • बेरोज़गारी दर केवल उस व्यक्ति की गणना करती है जो बेरोज़गार हैं, लेकिन कुल कितने लोगों ने काम की मांग करना बंद कर दिया है यह इस बात की गणना नहीं करता है। 
    • आमतौर पर ऐसा तब होता है जब कामकाजी उम्र के लोग काम न मिलने से निराश हो जाते हैं। 
  • इस प्रकार एक और बिंदु पर ध्यान देना आवश्यक है- रोज़गार दर (ER)।
    • ER कार्यशील आयु की आबादी के प्रतिशत के रूप में नियोजित लोगों की कुल संख्या को संदर्भित करता है।

भारत में बेरोज़गारी के प्रकार: 

  • प्रच्छन्न बेरोजगारी: यह एक ऐसी घटना है जिसमें वास्तव में आवश्यकता से अधिक लोगों को रोज़गार दिया जाता है।
    • यह मुख्य रूप से भारत के कृषि और असंगठित क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • मौसमी बेरोज़गारी: यह एक प्रकार की बेरोज़गारी है, जो वर्ष के कुछ निश्चित मौसमों के दौरान देखी जाती है।
    • भारत में खेतिहर मज़दूरों के पास वर्ष भर काफी कम काम होता है।
  • संरचनात्मक बेरोज़गारी: यह बाज़ार में उपलब्ध नौकरियों और श्रमिकों के कौशल के बीच असंतुलन होने से उत्पन्न बेरोज़गारी की एक श्रेणी है।
    • भारत में बहुत से लोगों को आवश्यक कौशल की कमी के कारण नौकरी नहीं मिलती है और शिक्षा के खराब स्तर के कारण उन्हें प्रशिक्षित करना मुश्किल हो जाता है।
  • चक्रीय बेरोज़गारी: यह व्यापार चक्र का परिणाम है, जहाँ मंदी के दौरान बेरोज़गारी बढ़ती है और आर्थिक विकास के साथ घटती है।
    • भारत में चक्रीय बेरोज़गारी के आँकड़े नगण्य हैं। यह एक ऐसी घटना है जो अधिकतर पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में पाई जाती है।
  • तकनीकी बेरोज़गारी: यह प्रौद्योगिकी में बदलाव के कारण नौकरियों का नुकसान है।
    • वर्ष 2016 में विश्व बैंक के आँकड़ों ने भविष्यवाणी की थी कि भारत में ऑटोमेशन से खतरे में पड़ी नौकरियों का अनुपात साल-दर-साल 69% है।
  • घर्षण बेरोज़गारी: घर्षण बेरोज़गारी का आशय ऐसी स्थिति से है, जब कोई व्यक्ति नई नौकरी की तलाश कर रहा होता है या नौकरियों के बीच स्विच कर रहा होता है, तो यह नौकरियों के बीच समय अंतराल को संदर्भित करता है।
  • सुभेद्य रोज़गार: इसका मतलब है कि लोग बिना उचित नौकरी अनुबंध के अनौपचारिक रूप से काम कर रहे हैं और इस प्रकार इनके लिये कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है।
    • इन व्यक्तियों को 'बेरोज़गार' माना जाता है क्योंकि उनके कार्य का रिकॉर्ड कभी भी बनाया नहीं जाता हैं।
    • यह भारत में बेरोज़गारी के मुख्य प्रकारों में से एक है

सरकार की पहल:

आगे की राह

  • श्रम गहन उद्योगों को बढ़ावा देना: भारत में खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा और जूते, लकड़ी के निर्माता और फर्नीचर, कपड़ा तथा परिधान एवं वस्त्र जैसे कई श्रम गहन विनिर्माण क्षेत्र हैं।
    • रोज़गार सृजित करने हेतु प्रत्येक उद्योग के लिये व्यक्तिगत रूप से डिज़ाइन किये गए विशेष पैकेजों की आवश्यकता होती है।
  • उद्योगों का विकेंद्रीकरण: औद्योगिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण आवश्यक है ताकि हर क्षेत्र के लोगों को रोज़गार मिल सके।
    • ग्रामीण क्षेत्रों के विकास से शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण लोगों के प्रवास को कम करने में मदद मिलेगी जिससे शहरी क्षेत्र की नौकरियों पर दबाव कम होगा।
  • राष्ट्रीय रोज़गार नीति का मसौदा तैयार करना: एक राष्ट्रीय रोज़गार नीति (एनईपी) की आवश्यकता है जिसमें बहुआयामी हस्तक्षेपों का एक समूह शामिल हो जिसमें कई नीति क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले सामाजिक और आर्थिक मुद्दों की एक पूरी शृंखला शामिल हो, न कि केवल श्रम और रोज़गार के क्षेत्र।
    • राष्ट्रीय रोज़गार नीति के अंतर्निहित सिद्धांतों में शामिल हो सकते हैं:
      • कौशल विकास के माध्यम से मानव पूंजी में वृद्धि करना।
        • औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने के इच्छुक नागरिकों के लिये पर्याप्त अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियांँ पैदा करना।
        • श्रम बाज़ार में सामाजिक एकता और समता को मज़बूत करना।
        • सरकार द्वारा शुरू की गई विभिन्न पहलों में अभिसरण और सामंजस्य स्थापित करना।
        • उत्पादक उद्यमों में प्रमुख निवेशक बनने के लिये निजी क्षेत्र की सहायता करना।
        • स्व-नियोजित व्यक्तियों का समर्थन करते हुए उनकी क्षमताओं को मज़बूत कर आय को बढ़ावा देना।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs): (2013)

प्रच्छन्न बेरोज़गारी का आमतौर पर अर्थ होता है:

(a) बड़ी संख्या में लोग बेरोज़गार रहते हैं
(b) वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध नहीं है
(c) श्रम की सीमांत उत्पादकता शून्य है
(d) श्रमिकों की उत्पादकता कम है

उत्तर: C

  • एक अर्थव्यवस्था प्रच्छन्न बेरोज़गारी को प्रदर्शित करती है जब उत्पादकता कम होती है और बहुत से श्रमिक कार्य कर रहे हों।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस