डेली न्यूज़ (27 Jan, 2020)



रोहिंग्या मामले में ICJ की कार्रवाई

प्रीलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय-ICJ,

मेन्स के लिये: 

रोहिंग्या समस्या, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2016-17 के दौरान म्याँमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुस्लिमों के विरुद्ध हुई हिंसा के मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) ने 22 जनवरी, 2020 को (अंतिम फैसला आने तक रोहिंग्या लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये) कुछ अंतरिम निर्देश जारी किये हैं।

मुख्य बिंदु:

  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) ने म्याँमार में रोहिंग्या जनसंहार मामले में गाम्बिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए म्याँमार सरकार के लिये कुछ निर्देश जारी किये हैं।
  • न्यायालय ने म्याँमार को रोहिंग्या मुस्लिमों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य एवं प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिये।
  • इसके साथ ही न्यायालय ने अपने आदेश में म्याँमार को नरसंहार के आरोपों से जुड़े साक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा।

क्या था मामला?

  • नवंबर 2019 में म्याँमार पर पश्चिमी अफ़्रीकी देश गाम्बिया (Republic of Gambia) ने नरसंहार पर संयुक्त राष्ट्र के समझौते (Genocide Convention) के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए रोहिंग्या मामले को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष उठाया था।
  • गाम्बिया ने इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय से म्याँमार सरकार के खिलाफ 6 अंतरिम निर्देशों को जारी करने की मांग की थी, जिसमें म्याँमार सरकार द्वारा रोहिंग्या मामले की जाँच कर रही संयुक्त राष्ट्र की संस्था का सहयोग करना भी शामिल था।

नरसंहार पर संयुक्त राष्ट्र का समझौता (Genocide Convention): 

संयुक्त राष्ट्र महासभा में कनवेंशन ऑन द प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जेनोसाइड (Convention on the Prevention and Punishment of the Crime of Genocide) का मसौदा 9 दिसंबर, 1948 को प्रस्तुत किया गया था। 12 जनवरी, 1951 से यह समझौता सदस्य देशों पर लागू हुआ। इस समझौते का उद्देश्य युद्ध या अन्य परिस्थितियों में जनसंहार को रोकना और जनसंहार में शामिल लोगों/समूहों को दंडित कराना है।

  • इस मामले में 10 दिसंबर, 2019 को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अपने देश का पक्ष रखते हुए म्याँमार की राज्य सलाहकार आंग सान सू की ने गाम्बिया पर घटनाओं को गलत ढंग से प्रस्तुत करने का आरोप लगाया था।
  • सू की ने मामले को ‘आंतरिक संघर्ष’ की संज्ञा देते हुए इसे सेना द्वारा स्थानीय चरमपंथियों के खिलाफ की गई कार्रवाई बताया था।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेश का म्याँमार पर प्रभाव:

  • यद्यपि म्याँमार के खिलाफ न्यायालय का कोई भी फैसला विश्वपटल पर म्याँमार की छवि धूमिल करता है परंतु मामले में न्यायालय द्वारा जारी अंतरिम निर्देश म्याँमार पर नरसंहार के आरोपों की पुष्टि नहीं करते हैं।
  • वास्तव में मामले में न्यायालय द्वारा किसी राष्ट्र के खिलाफ जारी अंतरिम निर्देश (जब तक कोई मामला लंबित हो) निरोधक आदेश मात्र हैं, इन्हें ज़्यादा-से-ज़्यादा प्रतिबंधों की तरह देखा जा सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा किसी देश के खिलाफ एक बार जारी अंतरिम आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती और साथ ही सदस्य देश इनका पालन करने के लिये बाध्य होते हैं।
  • हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसलों को लागू कराने की सीमा की बात विधि-विशेषज्ञों द्वारा अक्सर दोहराई जाती रही है।

न्यायालय के फैसलों को लागू कराने की सीमाएँ: 

  • संयुक्त राष्ट्र संघ घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 94 के अनुसार, सभी सदस्य देशों के लिये अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है। हालाँकि किसी भी देश से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों के अनुरूप कार्रवाई, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में रहकर और संबंधित देश की सहमति से ही कराई जा सकती है।
  • यदि कोई देश अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करता है और इससे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा तथा शांति को खतरा हो, तो उस स्थिति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) संबंधित देश पर प्रतिबंध लगाकर उसे आदेशों का पालन करने के लिये बाध्य कर सकती है। (हालाँकि आज तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों का पालन न करने के मामले में किसी देश के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की है।) 
    · सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप के बाद भी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों के क्रियान्वयन में कई अन्य बाधाएँ हैं।
  • सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य देशों में से कोई भी देश अपने निषेधाधिकार (Veto Power) का उपयोग कर अपने या अपने किसी सहयोगी देश के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों पर रोक लगा सकता है।
  • उदाहरण के लिये वर्ष 1989 के निकारागुआ बनाम संयुक्त राष्ट्र अमेरिका मामले में न्यायालय ने अमेरिका (USA) द्वारा निकारागुआ के खिलाफ की गई गैर-कानूनी सैनिक कार्रवाई के आरोप में अमेरिका को दोषी पाया था, परंतु अमेरिका ने न्यायालय के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया था।

निष्कर्ष:

  • हालाँकि म्याँमार की सर्वोच्च नेता सू की ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अपने देश का पक्ष रखते हुए नरसंहार के आरोपों को पूरी तरह गलत बताया था, परंतु उन्होंने रोहिंग्या लोगों के पुनर्वास के लिये म्याँमार सरकार की प्रतिबद्धता को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में दोहराया था। ऐसे में न्यायालय के हालिया आदेश से रोहिंग्या लोगों के पुनर्वास और क्षेत्रीय शांति की उम्मीद को बल मिला हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के इतिहास को देखकर ऐसा नहीं लगता कि इस मामले में अंतिम फैसला जल्दी आ सकता है या न्यायालय म्याँमार के खिलाफ कोई फैसला देगा। 
  • परंतु रोहिंग्या मामले पर वर्तमान वैश्विक दृष्टिकोण को देखते हुए म्याँमार भी कोई ऐसा कदम उठाने से बचेगा जिससे अंतर्राष्ट्रीय पटल पर उसकी छवि और अधिक धूमिल हो। 

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस 


भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला

प्रीलिम्स के लिये:

भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला 

मेन्स के लिये:

भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला परियोजना की स्थापना से उत्पन्न सामाजिक तनाव की स्थिति के कारण

चर्चा में क्यों?

गणतंत्र दिवस के अवसर पर तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों में ग्रामीणों द्वारा हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला (India-based Neutrino Observatory- INO) परियोजनाओं जैसी पहलों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिये ग्राम सभा की बैठकें आयोजित की गईं।

मुख्य बिंदु:

  • ग्रामीणों के अनुसार, ये परियोजनाएँ अपने संबंधित क्षेत्रों के लिये पर्यावरणीय रूप से घातक सिद्ध होंगी।

हाइड्रोकार्बन अन्वेषण परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव:

  • ग्रामीणों के अनुसार, केंद्र सरकार ने तमिलनाडु के पुदुकोट्टई (Pudukottai) ज़िले के नेदुवासल किझक्कू पंचायत (Neduvasal Kizhakku panchayat) में एक हाइड्रोकार्बन अन्वेषण परियोजना की पर्यावरण मंज़ूरी प्राप्त करने के लिये सार्वजनिक सलाह नहीं ली।
  • ग्रामीणों के अनुसार, यह परियोजना संबंधित क्षेत्र की उपजाऊ भूमि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगी।
  • इस परियोजना के विरोध में लगभग 300 से 400 ग्रामीणों ने स्वयं के हस्ताक्षर वाली एक याचिका पंचायत को सौंपी।
  • ग्रामीणों के अनुसार, इस परियोजना को पुदुकोट्टई ज़िले के उपजाऊ क्षेत्रों में क्रियान्वित नहीं किया जाना चाहिये।
  • किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले ग्रामीणों से भी राय ली जानी चाहिये क्योंकि ऐसी परियोजनाओं से उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है।
  • यह परियोजना कृषि पर निर्भर समुदाय, खेत मज़दूरों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को प्रभावित करेगी।
  • इस परियोजना के क्रियान्वयन से कृषि में संलग्न व्यक्ति रोज़गार की तलाश हेतु कस्बों और शहरों में प्रवास करने के लिये विवश होंगे। 

INO के खिलाफ प्रस्ताव:

  • थेनी (Theni) ज़िले के पोट्टीपुरम पंचायत के ग्रामीणों ने INO के विरोध में भी एक प्रस्ताव पारित किया।
  • ग्रामीणों के अनुसार, इस परियोजना का क्रियान्वयन पर्यावरण और पश्चिमी घाट के लिये हानिकारक सिद्ध होगा।

अन्य कारण:

  • रामनाथपुरम ज़िले की ‘कडलूर’ (Kadalur) ग्राम पंचायत के ग्रामीणों ने 2x800 मेगावाट की ‘उप्पुर सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट’ (Uppur Supercritical Thermal Power Plant) परियोजना के क्रियान्वयन के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया।
  • वर्ष 2016 में इसकी आधारशिला रखे जाने के बाद से इसे ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

कडलूर पंचायत में पर्यावरणीय क्षति:

  • यह क्षेत्र महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र के अंतर्गत आता है क्योंकि यहाँ मैंग्रोव और आर्द्रभूमि स्थित हैं।
  • इस पंचायत में लगभग 5000 व्यक्ति रहते हैं जिनमे से कुछ मछली पकड़ने के व्यवसाय पर आश्रित हैं परंतु संयंत्र के निर्माण कार्य से उत्पन्न मलबे को समुद्र में फेंका जा रहा है, जो मछली पकड़ने के व्यवसाय को प्रभावित कर रहा है।
  • ग्रामीणों के अनुसार, इस संयंत्र के क्रियान्वयन से किसानों को लगभग 300 एकड़ कृषि योग्य भूमि से वंचित कर दिया जाएगा।

भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला:

  • भारत स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला (INO) एक बड़ी वैज्ञानिक परियोजना है।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा वर्ष 2015 में तमिलनाडु के थेनी ज़िले में एक न्यूट्रिनो वेधशाला की स्थापना संबंधी परियोजना को मंज़ूरी दी गई थी।
  • इसका उद्देश्य न्यूट्रिनो कणों का अध्ययन करना है। न्यूट्रिनो मूल कण होते हैं जिनका सूर्य, तारों एवं वायुमंडल में प्राकृतिक रुप से निर्माण होता है।
  • INO की योजना न्यूट्रिनो भौतिकी के क्षेत्र में प्रयोगों के लिये छात्रों को विश्व स्तरीय अनुसंधान सुविधा प्रदान करने की है।

विदित हो कि सूर्य से आने वाला न्यूट्रिनो हो या वायुमंडल में पहले से ही मौजूद न्यूट्रिनो, यह किसी भी प्रकार से हमारे वातावरण को क्षति पहुँचाने वाला नहीं है, क्योंकि यह बहुत ही कमजोर कण है जो अन्य कणों से अंतःक्रिया करने में लगभग असमर्थ है, जिसे हम बिना किसी वेधशाला की मदद के देख या महसूस तक नहीं कर सकते हैं। अतः इस वेधशाला के प्रति व्यक्त चिंताएँ निर्मूल हैं और लोगों को यह समझना होगा। 


राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान

मेन्स के लिये:

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान में मौजूद विसंगतियाँ

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (Rashtriya Uchchatar Shiksha Abhiyan- RUSA) के क्रियान्वयन में कई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।

मुख्य बिंदु:

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (Ministry of Human Resource Development- MoHRD) ने एक पूर्व संयुक्त सचिव तथा ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़’ (Tata Institute of Social Sciences- TISS) के एक प्रोफेसर द्वारा RUSA के कार्यान्वयन में किये गए कथित भ्रष्टाचार को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister’s Office- PMO) से संपर्क किया है।

पृष्ठभूमि:

  • केंद्र सरकार द्वारा अक्तूबर 2013 में RUSA को प्रारंभ किया गया था।
  • RUSA का उद्देश्य राज्यों में उच्चतर शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न प्रयास करना है।
  • इस अभियान के तहत राज्यों के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समानता, सभी की पहुँच और उत्कृष्टता बढ़ाने के लिये आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
  • वर्ष 2016-17 से केंद्र सरकार RUSA पर हर साल औसतन 1,500 करोड़ रुपए खर्च करती है।

क्या है मामला:

  • वर्ष 2019 में TISS द्वारा किये गए एक ऑडिट में केरल काडर के एक आईएएस अधिकारी द्वारा RUSA फंड के 23 लाख रुपए को निजी यात्राओं में खर्च किये जाने का मामला सामने आया था।
  • ऑडिट में यह भी खुलासा हुआ था कि RUSA के नेशनल को-ऑर्डिनेटर (National Co-ordinator) ने कथित तौर पर योजना फंड से 2.02 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितता को अंजाम दिया था।
  • RUSA के नेशनल को-ऑर्डिनेटर ने 1.26 करोड़ रुपए के खर्च दिखाने के लिये हाथ से लिखे टैक्सी बिल जमा किये थे।
  • मंत्रालय ने आरोपित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिक जाँच भी शुरू कर दी है।
  • हालाँकि ऑडिट के खुलासे के बाद दोनों आरोपित अधिकारियों ने कुछ धन TISS को वापस कर दिया था।

क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी?

  • नवंबर 2013 से TISS इस अभियान को क्रियान्वित करने वाली एजेंसी के रूप में कार्य कर रही है।
  • TISS के साथ हुए केंद्र सरकार के समझौते के अनुसार, यह संस्था MoHRD को RUSA के क्रियान्वयन में हुए व्यय के संबंध में जानकारी देती है तथा प्रतिपूर्ति (Reimbursement) संबंधी दावे पेश करती है।

आगे की राह:

  • कथित भ्रष्टाचार संबंधी ऐसे कदम राज्यों में उच्च शिक्षण संस्थानों के कामकाज को सुव्यवस्थित करने के केंद्र के प्रयासों को कमज़ोर करते हैं।
  • RUSA का लक्ष्य निर्धारित मानदंडों और मानकों को सुनिश्चित करके उच्च शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता में सुधार करना है।
  • देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिये प्रारंभ किये गए RUSA जैसे अभियानों की उचित निगरानी की जानी चाहिये तथा संबंधित अधिकारियों एवं ज़िम्मेदार व्यक्तियों को भी नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इन योजनाओं के परिणामों को सकारात्मक रूप में बदलने का प्रयास करना चाहिये।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस


खादी वस्तुओं के लिये अंतर्राष्ट्रीय ट्रेडमार्क

प्रीलिम्स के लिये:

ट्रेडमार्क, KVIC, WIPO

मेन्स के लिये:

बौद्धिक संपदा अधिकार से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

खादी ग्रामोद्योग निगम (Khadi Village Industries Corporation- KVIC) पेरिस समझौते के तहत खादी हेतु अंतर्राष्ट्रीय ट्रेडमार्क प्राप्त करने पर विचार कर रहा है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • KVIC का उद्देश्य इस कदम के माध्यम से खादी की वस्तुओं को अंतर्राष्ट्रीय पहचान प्रदान करना है तथा साथ ही इस कदम से किसी भी उत्पाद को राष्ट्रीय या विश्व स्तर पर 'खादी' के रूप में प्रदर्शित होने से रोका जा सकता है।
  • KVIC जर्मनी सहित कई देशों में खादी ट्रेडमार्क नियमों के उल्लंघन के मामले में संघर्ष कर रहा है।
  • ध्यातव्य है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा वर्ष 2013 में जारी किये गए विनियम KVIC को खादी ट्रेडमार्क पंजीकरण प्रदान करने और किसी भी निर्माता से रॉयल्टी लेने का अधिकार देते हैं।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से ही खादी को स्वदेशी का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है। शब्द ‘खादी’, ‘कुटीर’, ‘सर्वोदय’, एवं खादी इंडिया तथा चरखा का लोगो इस भावना का अग्रदूत है और इसलिये इसे संरक्षित किया जाना चाहिये।

ट्रेडमार्क की प्राप्ति से खादी को होने वाले संभावित लाभ:

  • खादी को ट्रेडमार्क प्राप्त होने से राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी उत्पाद को 'खादी' के रूप में प्रदर्शित होने से रोका जा सकता है, जिससे खादी को संरक्षण प्रदान किया जा सकेगा।
  • चूँकि ट्रेडमार्क का कार्य विशेष रूप से उत्पादों या सेवाओं के वाणिज्यिक स्रोत या उत्पत्ति की पहचान करना है अतः इससे खादी की वस्तुओं को पहचान प्राप्त होने के साथ ही उनके स्रोतों की सही पहचान की जा सकेगी।
  • एक पंजीकृत ट्रेडमार्क के तहत बेचे जा रहे उत्पाद या सेवा से ग्राहकों के मन में विश्वास, वस्तु या सेवा की विश्वसनीयता, गुणवत्ता और उसके प्रति सद्भावना कायम करने में मदद मिलती है। साथ ही खादी की वस्तुओं को ट्रेडमार्क प्राप्त होने से उनकी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति बढ़ेगी और खादी के व्यापार में भी वृद्धि होगी।

पेरिस समझौते से संबंधित तथ्य

  • पेरिस समझौता एक बहुपक्षीय संधि है जो व्यापक अर्थों में औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण से संबंधित है।
  • यह विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organization- WIPO) द्वारा प्रशासित है।
  • ध्यातव्य है कि WIPO संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसियों में से एक है और बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्द्धन से संबंधित है।

ट्रेडमार्क के बारे में

  • ट्रेडमार्क एक प्रकार की बौद्धिक संपदा है, जिसमें पहचान हेतु एक चिह्न, डिज़ाइन या अभिव्यक्ति शामिल होती है।
  • ट्रेडमार्क का स्वामी एक व्यक्ति, व्यावसायिक संगठन या कोई कानूनी इकाई हो सकता है।
  • ट्रेडमार्क के लिये आवेदन निजी फर्मों, व्यक्तियों, कंपनियों, LLP (Limited Liability Partnership) या NGO (Non-Governmental Organisation) द्वारा किया जा सकता है। गैर-सरकारी संगठनों (NGO), LLP या कंपनियों के मामले में, ट्रेडमार्क को संबंधित व्यवसाय के नाम पर पंजीकरण हेतु आवेदन करना होगा।
  • वर्ष 1883 के पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 में शस्त्रागार बेयरिंग, राज्य के झंडे और अन्य राज्य प्रतीकों की रक्षा की गई है।

भारत में ट्रेडमार्क से संबंधित तथ्य

  • भारत में ट्रेडमार्क गतिविधियों का संचालन व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (Trademark Act, 1999) के अंतर्गत ‘ट्रेडमार्क रजिस्ट्री’ (Trademark Registry) के द्वारा किया जाता है।
  • ध्यातव्य है कि ‘ट्रेडमार्क रजिस्ट्री’ देश में ट्रेडमार्क मामलों में समन्वयक की भूमिका निभाती है।
  • भारत के ट्रेडमार्क नियमों के अनुसार, ध्वनि, लोगो, शब्द, वाक्यांश, रंग, चित्र, प्रतीक, आद्याक्षर या इन सभी के संयोजन जैसी वस्तुओं को ट्रेडमार्क किया जा सकता है। 

स्रोत: इकोनोमिक टाइम्स 


मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-संचारी रोग

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, गैर-संचारी रोग

मेन्स के लिये:

भारत में स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे, सरकार द्वारा स्वास्थ्य की दिशा में उठाए गए कदम 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission- NHM) के अंतर्गत की गई एक जाँच में यह बात सामने आई है कि मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-संचारी रोगों में वृद्धि हुई है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अनुसार, मध्य प्रदेश के ग्रामीण गैर-आदिवासी क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में उच्च रक्तचाप, मधुमेह एवं कैंसर जैसे गैर-संचारी रोगों में वृद्धि हुई है जिसका मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की कमी है।
  • दिसंबर 2019 में राज्य में 30 वर्ष से अधिक आयु के 30 लाख लोगों की स्क्रीनिंग (Screening) की गई थी जिससे पता चलता है कि रायसेन, होशंगाबाद और सिवनी ज़िलों पर बीमारियों का सबसे अधिक बोझ है।
  • प्रदेश में की गई 89 आदिवासी क्षेत्रों की स्क्रीनिंग से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में इन बीमारियों का कम प्रभाव है, यह आँकड़ा आश्चर्यचकित कर देने वाला है। ध्यातव्य है कि इन 89 जनजातीय क्षेत्रों में कम स्वास्थ्य जागरूकता के बावजूद देश की सबसे बड़ी जनजातीय जनसंख्या निवास करती है।

मध्य प्रदेश में गैर-संचारी रोगों से संबंधित तथ्य

  • मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या का लगभग 20% हिस्सा उच्च रक्तचाप से पीड़ित है।
  • वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2014 के अनुसार, भारत के लगभग 100 ज़िलों में उच्च रक्तचाप के अत्यधिक मामले पाए गए हैं जिनमें से 15 ज़िले मध्य प्रदेश के हैं।
  • इंदौर में स्कूलों के लगभग 6.8% लड़के एवं 7% लड़कियाँ उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं जो कि राज्य में सर्वाधिक आँकड़ा है।
  • राज्य के लगभग 22% नागरिकों का रक्तदाब (Blood Pressure) औसत से अधिक है।
  • राज्य के पश्चिमी निमाड़ क्षेत्र में उच्च रक्तचाप के सर्वाधिक 29% मामले पाए गए हैं।

Fatty Acid

उच्च रक्तचाप का कारण

  • उच्च रक्तचाप का प्रमुख कारण ट्रांस फैटी एसिड (Trans Fatty Acid) के हाइड्रोजनीकृत (Hydrogenated Forms) रूप का अत्यधिक सेवन करना है।
  • ध्यातव्य है कि ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी खाना पकाने वाले तेल का पुनः उपयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है जो कि उच्च रक्तचाप का महत्त्वपूर्ण कारण है। 

NHM द्वारा संचालित कार्यक्रम से संबंधित बातें

  • इस कार्यक्रम के तहत जाँच के लिये चयनित लोगों में से 86% लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (Primary Health Center- PHC) स्तर पर गैर-संचारी रोगों की पहचान पर ध्यान केंद्रित करने और ज़िला स्तर पर उपचार सुनिश्चित करने और अनुवर्ती उपचार के लिये रखा गया था।
  • इस कार्यक्रम के पहले चरण में लगभग 1200 PHC स्थापित किये गए थे। ध्यातव्य है कि स्वास्थ्य केंद्र पर जाने वाले रोगियों के विपरीत, अब आशा कार्यकर्त्रियाँ पारिवारिक प्रोफाइल का मसौदा तैयार करने और गैर-संचारी रोग संबंधी जाँच करने के लिये घर-घर जाती हैं।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 2,55,420 लोगों की उच्च रक्तचाप की जाँच की गई है तथा आशा कार्यकर्त्रियों द्वारा SMS सेवा के माध्यम से लगातार रोगी से संपर्क भी स्थापित किया गया।

आगे की राह

  • ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर खान-पान एवं बेहतर स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी को प्रसारित करना चाहिये जिससे शहरी क्षेत्रों की भाँति ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोगों को कम किया जा सके। ध्यातव्य है कि शहरी क्षेत्रों में गैर-संचारी रोगों में कमी का मुख्य कारण स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता है।
  • सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य एवं भोजन सुविधाओं को लक्षित किया जाना चाहिये साथ ही पहले से चल रही सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू


मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी अधिनियम)

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महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी अधिनियम

मेन्स के लिये: 

मनरेगा में धन का अभाव एवं राज्य सरकारों पर पड़ने वाले प्रभाव।

चर्चा में क्यों?

केंद्र द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के लिये समय पर बकाया धनराशि का आवंटन न होने के कारण यह चर्चा में है।

मुख्य बिंदु:

  • वर्ष 2019-20 के लिये प्रस्तावित बजट में MGNREGA के लिये 60,000 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई थी। इस राशि का 96% से अधिक हिस्सा अब तक खर्च किया जा चुका है।
  • योजना के लिये आवंटित की जाने वाली 2500 हज़ार करोड़ रुपए की राशि प्राप्त करना शेष है जबकि नई राशि जारी होने में अभी दो महीने का समय और लगेगा।

india

  • योजना के वित्तीय विवरण के अनुसार, 26 जनवरी, 2020 तक पंद्रह ऐसे राज्य चिह्नित किये गए हैं जिनकी बकाया राशि का भुगतान केंद्र सरकार द्वारा किया जाना है। 
  • इस सूची में राजस्थान का सर्वाधिक बकाया ‘निगेटिव नेट बैलेंस’ (Negative Net Balance) 620 करोड़ रुपए है इसके बाद उत्तर प्रदेश का 323 करोड़ रुपए बकाया है।
  • राजस्थान में श्रमिकों की मज़दूरी हेतु मनरेगा राशि का भुगतान अक्तूबर 2019 से नहीं किया गया है। इसकी सूचना राजस्थान सरकार द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र द्वारा दी गई तथा 1,950 करोड़ रुपए बकाया राशि की मांग की गयी है। जिसमें मज़दूरी के भुगतान के लिये 848 करोड़ रुपए और सामग्रियों के लिये 1102 करोड़ रुपए की राशि का भुगतान राजस्थान सरकार को करना है।
  • इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा राजस्थान राज्य सरकार के लिये 200 करोड़ रुपए की बकाया राशि का ही भुगतान किया गया है। अभी भी राज्य सरकार को 600-700 करोड़ रुपए की और आवश्यकता होगी।
  • राजस्थान सरकार 15 दिनों के भीतर 99.57% श्रमिकों हेतु तथा 8 दिनों के भीतर 90.31% श्रमिकों की मज़दूरी के भुगतान के लिये फंड ट्रांसफर ऑर्डर (Fund Transfer Orders) करने में सक्षम है।

स्रोत: द हिंदू 


वाकाटक वंश

प्रीलिम्स के लिये:

वाकाटक वंश के बारे में

मेन्स के लिये:

वाकाटक वंश समकालीन शासन व्यवस्था, शासन में महिलाओं की भूमिका

चर्चा में क्यों?

नागपुर के समीप रामटेक तालुका के नागार्धन में हुई हालिया पुरातात्विक खुदाई में, तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के बीच मध्य एवं दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर शासन करने वाले वाकाटक वंश (Vakataka Dynasty) के जीवन, धार्मिक संबद्धता और व्यापार प्रथाओं के विषय में कुछ ठोस साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

खुदाई स्थल के विषय में

  • नागार्धन/नागवर्धन नागपुर ज़िले का एक बहुत बड़ा गाँव है, जो रामटेक तालुका से लगभग 6 किमी. दक्षिण में अवस्थित है। इस स्थान पर 1 कि.मी. से 1.5 कि.मी. क्षेत्र में पुरातात्विक अवशेष पाए गए।
  • शोधकर्त्ताओं ने वर्ष 2015-2018 के दौरान इस स्थल पर खुदाई की थी।
  • इस क्षेत्र में नदी के किनारे स्थित कोटेश्वर मंदिर 15वीं-16वीं शताब्दी का है। मौजूदा गाँव प्राचीन बस्ती के ऊपर स्थित है।
  • नागार्धन किला वर्तमान के नागार्धन गाँव के दक्षिण में स्थित है। इस किले का निर्माण गोंड राजा के काल में हुआ था और बाद में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी के दौरान नागपुर के भोसलों द्वारा इसका नवीनीकरण और पुनः उपयोग किया गया। किले के आसपास के क्षेत्र में खेती कार्य किया जाता है और यही पर पुरातात्विक अवशेष पाए गए हैं।

यह खुदाई महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के मध्य के शैव शासकों ‘वाकाटकों’ के बारे में बहुत कम जानकारी प्राप्त थी। इस राजवंश के बारे में अभी तक जो भी जानकारी प्राप्त थी वह यह कि ये महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से संबंधित थे, यह जानकारी कुछ साहित्यिक रचनाओं और ताम्रपत्रों के माध्यम से मिली थी।
  • इनके विषय में ऐसी धारणाएँ थीं कि उत्खनित स्थल नागार्धन वाकाटक की पूर्वी शाखा की राजधानी नंदीवर्धन के समान ही है। इस पुरातात्विक साक्ष्य के बाद नागार्धन को वाकाटक साम्राज्य की राजधानी माने जाने की धारणा को बल मिला है।
  • विद्वानों का मत है कि इस स्थल की खुदाई करने वाले पुरातत्त्वविदों ने इस स्थल का  विस्तृत प्रलेखन नहीं किया था इसलिये इसका एक पुरातात्विक अन्वेषण आवश्यक था।
  • पुरातत्वविदों द्वारा की गई खुदाई के दौरान, कुछ नए पहलू सामने आए जिन्होंने वाकाटक वंश के जीवन के विषय में और अधिक जानकारी प्रदान की। इसके अलावा विद्वानों ने इस राजवंश के धार्मिक जुड़ावों, शासकों के निवास स्थलों, महलों के प्रकार, उनके शासनकाल के दौरान प्रसारित हुए सिक्कों और मुहरें, और उनके व्यापारिक व्यवहार के बारे में भी खुलासा किया।

वाकाटक वंश

  • इस वंश की स्थापना 255 ई. में विन्ध्य शक्ति ने की थी।
  • इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक राजा प्रवरसेन प्रथम था। अपने शासनकाल में उसने सम्राट की उपाधि की तथा चार अश्वमेघ यज्ञों का आयोजन किया।
  • वाकाटक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे। ये स्वयं भी ब्राह्मण थे और इन्होंने ब्राह्मणों को खूब भूमि-अनुदान दिये।
  • सांस्कृतिक दृष्टि से वाकाटक राज्य ने ब्राह्मण घर्म के आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं को दक्षिण की ओर बढ़ाने में एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य किया।

इस प्रकार की पुरातात्विक खोजों का क्या महत्त्व है?

  • यह पहली बार है कि जब नागार्धन से हुई खुदाई में मिट्टी से निर्मित मुहरे प्राप्त हुई है। ये अंडाकार मुहरें प्रभातगुप्त, वाकाटक वंश की रानी के समय की है। इन मुहरों पर शंख के चित्रण के साथ ब्राह्मी लिपि में रानी का नाम मुद्रित है।
  • मुहर का वज़न 6.40-ग्राम है, ये मुहरें 1,500 वर्ष पुरानी है, इनकी माप (प्रति मुहर) 35.71 मिमी- 24.20 मिमी, मोटाई 9.50 मिमी है। मुहरों पर मुद्रित शंख के विषय में विद्वानों का तर्क है कि यह वैष्णव संबद्धता का एक संकेत है।
  • इस मुहर को एक विशाल दीवार के ऊपर सजाया गया था, शोधकर्त्ताओं के अनुसार, यह राज्य की राजधानी में अवस्थित एक शाही ढाँचे का हिस्सा हो सकता है। अभी तक वाकाटक लोगों या शासकों के घरों या महलनुमा संरचनाओं के प्रकार के बारे में कोई पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है।
  • रानी प्रभाववती गुप्त द्वारा जारी ताम्रपत्र गुप्तों की एक वंशावली से शुरू होता है, जिसमें रानी के दादा समुद्रगुप्त और उनके पिता चंद्रगुप्त द्वितीय का उल्लेख है। वाकाटक की शाही मुहरों पर मुद्रित वैष्णव उपस्थिति इसके दृढ़ संकेतक हैं, जो इस बात को पुन: स्थापित करते हैं कि रानी प्रभाववती गुप्त वास्तव में एक शक्तिशाली महिला शासक थीं।
  • चूँकि वाकाटक लोग भूमध्य सागर के माध्यम से ईरान तथा अन्य देशों के साथ व्यापार करते थे, इसलिये विद्वानों का मत है कि इन मुहरों का इस्तेमाल राजधानी से जारी एक आधिकारिक शाही अनुमति के रूप में किया जाता होगा। इसके अलावा इनका उपयोग उन दस्तावेज़ों पर किया गया होगा जिनके लिये शाही अनुमति अनिवार्य  होती होगी।

रानी प्रभाववती गुप्त के विषय में प्राप्त जानकारी इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?

  • वाकाटक शासकों को उनके समय के अन्य राजवंशों के साथ कई वैवाहिक गठबंधन स्थापित करने के लिये जाना जाता था। ऐसे ही प्रमुख वैवाहिक गठबंधनों में से एक है शक्तिशाली गुप्त वंश की राजकुमारी प्रभावती गुप्त क्योंकि गुप्त वंश उस समय उत्तर भारत पर शासन कर रहा था।
  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, गुप्त शासक वाकाटकों की तुलना में अधिक शक्तिशाली थे। वाकाटक राजा रुद्रसेना द्वितीय से विवाह करने के बाद, प्रभाववती गुप्त ने मुख्य रानी का पद धारण किया। रुद्रसेना द्वितीय के आकस्मिक निधन के बाद जब उसने वाकाटक राज्य की कमान संभाली, तो महिला वाकाटक शासक के रूप में उसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि एक शासिका के रूप में उसके शासन कल में मुहरें जारी की गई, वह भी राजधानी नागार्धन से।
  • विद्वानों के अनुसार, रानी प्रभाववती गुप्त देश की उन चुनिंदा महिला शासकों में से एक थीं, जिन्होंने प्राचीन काल में किसी राज्य पर शासन किया था। वाकाटक वंश में इसके इतर किसी अन्य महिला उत्तराधिकारी के विषय में कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है।

वैष्णव संबद्धता के संकेत क्या महत्त्व है?

  • वाकाटक शासकों ने हिंदू धर्म के शैव संप्रदाय का अनुपालन किया, जबकि गुप्त वंश वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उत्खननकर्त्ताओं के अनुसार, रामटेक में पाए गए वैष्णव संप्रदाय से जुड़े कई धार्मिक ढाँचे रानी प्रभाववती गुप्त के शासनकाल के दौरान बनाए गए थे। जबकि उसका विवाह एक ऐसे परिवार में हुई था जो शैव संप्रदाय से संबंधित था, रानी को शासिका के रूप में प्राप्त शक्तियों ने उसे अपने आराधक अर्थात् भगवान विष्णु को चुनने का अधिकार प्रदान किया।
  • शोधकर्त्ताओं का मानना ​​है कि महाराष्ट्र में नरसिंह की पूजा करने की प्रथा रामटेक से ही निकली थी, साथ ही महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वैष्णव प्रथाओं के प्रचार में रानी प्रभाववती गुप्त की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। रानी प्रभाववती गुप्त ने लगभग 10 वर्षों तक शासन किया जब तक कि उसके पुत्र प्रवरसेन द्वितीय ने सत्ता नहीं संभाल ली।

नागार्धन से अभी तक कौन-से अवशेष प्राप्त हुए हैं?

  • इस क्षेत्र में पूर्व में हुई खुदाई में मृद्भांड, एक पूजा का स्थल, एक लोहे की छेनी, हिरण के चित्रण वाला एक पत्थर और टेराकोटा की चूड़ियों के रूप में प्रमाण मिले हैं।
  • टेराकोटा से बनी कुछ वस्तुओं में देवताओं, पशुओं और मनुष्यों की छवियों को भी चित्रित किया गया साथ ही ताबीज एवं पहिये आदि भी प्राप्त हुए हैं।
  • भगवान गणेश की एक अखंड मूर्ति, जिसमें कोई अलंकरण नहीं था, वह भी प्राप्त हुई जो इस बात की पुष्टि करती है कि उस काल के दौरान भगवान गणेश की आराधना सामान्य थी।
  • वाकाटक लोगों की आजीविका के साधनों में पशु पालन की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। घरेलू जानवरों की सात प्रजातियों- मवेशी, बकरी, भेड़, सुअर, बिल्ली, घोड़ा और मुर्गे के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

स्रोत: इंडियन एसप्रेस


Rapid Fire: 27 जनवरी, 2020

माइकल देवव्रत पात्रा

हाल ही में केंद्र सरकार ने माइकल देवव्रत पात्रा को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का नया डिप्टी गवर्नर नियुक्त किया है। माइकल देवव्रत पात्रा जून, 2019 में इस पद से इस्तीफा देने वाले विरल आचार्य का स्थान लेंगे। इस संदर्भ में जारी आदेश के अनुसार, माइकल देवव्रत पात्रा का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा। नए डिप्टी गवर्नर इससे पूर्व मौद्रिक नीति विभाग में कार्यकारी निदेशक के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। ज्ञात हो कि भारतीय रिज़र्व बैंक में कुल चार डिप्टी गवर्नर होते हैं जिनकी नियुक्ति सरकार द्वारा गवर्नर की सहमति से की जाती है। नियमों के अनुसार, चार डिप्टी गवर्नर में से दो केंद्रीय बैंक के अधिकारी होते हैं, जबकि एक वाणिज्यिक बैंकिंग क्षेत्र से संबंधित होता है और एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री होता है।


बिरसा मुंडा पर बनेगी फिल्म

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक डॉ. इकबाल दुरानी, अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासियों के संघर्ष के प्रमुख नायक और ‘धरती आबा’ कहे जाने वाले बिरसा मुंडा पर आधारित ‘गांधी के पहले का गांधी’ नामक फिल्म का निर्माण करेंगे। डॉ. इकबाल दुरानी के अनुसार, इस फिल्म के लगभग 50 प्रतिशत कलाकार झारखंड से होंगे, जबकि 30 प्रतिशत कलाकार पड़ोसी राज्य बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से (सभी आदिवासी कलाकार) होंगे। फिल्म के लिये शेष कलाकार अन्य क्षेत्रों से लिये जाएँगे।


‘STEM’ पर महिलाओं का अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन

हाल ही में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय) ने नई दिल्ली में महिलाओं के STEM (S-विज्ञान, T-प्रौद्योगिकी, E-इंजीनियरिंग और M-गणित) पर अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ‘STEM’ क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना था। शिखर सम्मेलन के दौरान अनेक सत्र आयोजित किये गए, जिनमें सफल महिला वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और इंजीनियरों के वास्तविक उदाहरण देकर ‘STEM’ क्षेत्र में महिलाओं को मिली उल्लेखनीय कामयाबी को दर्शाया गया।


कोबी ब्रायंट

प्रसिद्ध अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबी ब्रायंट का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया है। कोबी ब्रायंट को बास्केटबॉल की दुनिया में सबसे महानतम खिलाड़ियों में गिना जाता था। कोबी ब्रायंट का जन्म 23 अगस्त, 1978 को अमेरिका के पेनसिलवेनिया में हुआ था। वे अमेरिका की मशहूर बास्केटबॉल प्रतियोगिता NBA की टीम लॉस एंजेल्स लेकर्स से जुड़े हुए थे। वे वर्ष 1996 से लेकर 2016 तक लॉस एंजेल्स लेकर्स के साथ ही जुड़े रहे। उन्होंने अपने कॅरियर में कुल 33,643 पॉइंट्स स्कोर किये। वे वर्ष 2008 के बीजिंग ओलिंपिक तथा वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली अमेरिकी बास्केटबॉल टीम का हिस्सा भी थे।