डेली न्यूज़ (24 Jun, 2020)



मुक्त व्यापार समझौता: भारत और यूरोपीय संघ

प्रीलिम्स के लिये

यूरोपीय संघ

मेन्स के लिये 

मुक्त व्यापार क्षेत्र के कारण व प्रभाव 

चर्चा में क्यों?

हाल ही  में निर्यातकों के समूह ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन’ ( Federation of Indian Export Organisations-FIEO) ने सरकार से यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Area-FTA) के मुद्दे पर विचार करने का आह्वान किया है

प्रमुख बिंदु 

  • भारत और यूरोपीय संघ एक व्यापक मुक्त व्यापार क्षेत्र के मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं, जिसे आधिकारिक तौर पर द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते (Bilateral Trade and Investment Agreement-BTIA) के रूप में जाना जाता है
  • वर्ष 2013 से विभिन्न मुद्दों  पर मतभेद के कारण द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते संबंधी वार्ता रुकी हुई है।
  • फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार, भारत का निकटतम प्रतिद्वंदी वियतनाम पूर्व में ही यूरोपीय संघ के साथ एक मुक्त व्यापार क्षेत्र संबंधी समझौता कर चुका है, जिसके अगस्त 2020 तक प्रभावी होने की संभावना है।
  • यूरोपीय संघ, भारत के बड़े निर्यात साझेदारों में से एक है। भारत अपने कुल निर्यात का लगभग 18 प्रतिशत यूरोपीय संघ के देशों को निर्यात करता है।

यूरोपीय संघ

  • यूरोपीय संघ (European Union- EU) कुल 27 देशों की एक आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता है। ये 27 देश संधि के द्वारा एक संघ के रूप में जुड़े हुए हैं, जिससे कि व्यापार को आसान बनाया जा सके और विभिन्न देशों के मध्य विवाद उत्पन्न न हो।
  • गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के कुल 19 देश यूरो को अपनी आधिकारिक मुद्रा के रूप में प्रयोग करते हैं, जबकि शेष देशों की अपनी अलग मुद्रा है।
  • यूरोपीय संघ ने कानूनों की मानकीकृत प्रणाली के माध्यम से एक आंतरिक एकल बाज़ार विकसित किया है, जो कि सदस्य देशों के उन सभी मामलों पर लागू होती हैं, जिन सदस्य देशों ने सहमति व्यक्त की है।
  • यूनाइटेड किंगडम (UK) 31 जनवरी, 2020 को  यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने वाला अंतिम देश था, जिसके बाद सदस्यों की संख्या 27 रह गई।
  • वर्ष 2019 में यूरोपीय संघ के साथ भारत का निर्यात लगभग 58.4 बिलियन डॉलर था जबकि भारत के प्रतिद्वंदी वियतनाम का निर्यात 52.2 बिलियन डॉलर था।
  • यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार संबंधी समझौते के कारण वियतनाम के उत्पादों का मूल्य भारत के उत्पादों की तुलना में और कम हो जाएगा।
  • यूरोपीय संघ-वियतनाम निवेश संरक्षण समझौते पर भी हस्ताक्षर किये गए हैं और इस कारण वियतनाम, चीन से निकलने वाले कई निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। इन निवेशकों में अधिकांश वे निवेशक हैं, जिनके उत्पाद यूरोपीय संघ के बाज़ारों में लोकप्रिय हैं।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन

  • फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइज़ेशन वैश्विक बाज़ार में भारतीय उद्यमियों की उद्यमशील भावना का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1965 में हुई थी।
  • यह भारत में निर्यात संवर्द्धन परिषद, विभिन्न सामुदायिक बोर्ड और विकास प्राधिकरणों का एक सर्वोच्च निकाय है।
  • यह केंद्र और राज्य सरकारों, वित्तीय संस्थानों, बंदरगाहों, रेलवे और सभी निर्यात व्यापार सुविधा में लगे हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समुदाय के बीच महत्त्वपूर्ण इंटरफेस प्रदान करता है।
  • आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत ने यूरोपीय संघ को 7 बिलियन डॉलर का निर्यात किया, जबकि वियतनाम ने 7.80 बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इसी प्रकार, भारत ने इसी वर्ष  4.9 बिलियन डॉलर मूल्य के विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का निर्यात किया तो वहीं वियतनाम ने 22 बिलियन डॉलर का निर्यात किया।

स्रोत: इकोनॉमिक्स टाइम्स


शस्त्र व्यापार संधि में शामिल होगा चीन

प्रीलिम्स के लिये

शस्त्र व्यापार संधि, संधि में शामिल देश

मेन्स के लिये

अंतर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता में शस्त्र व्यापार संधि की भूमिका, संधि को लेकर भारत का पक्ष

चर्चा में क्यों?

विश्व में शांति और स्थिरता के प्रयासों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए चीन ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की शस्त्र व्यापार संधि (Arms Trade Treaty-ATT) में शामिल होने की घोषणा की है। 

प्रमुख बिंदु

  • हाल ही में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व ने संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि में शामिल होने के विषय में निर्णय लेने हेतु मतदान किया।
  • चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, संधि में शामिल होना ‘बहुपक्षवाद (Multilateralism) का समर्थन करने हेतु चीन का एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल, 2019 में संयुक्त राष्ट्र की इस संधि से बाहर निकलने की घोषणा की थी। 
    • ध्यातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि भी उन कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों में से एक है, जिन्हें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पूरा किया गया और अब जिन्हें राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा वापस लिया जा रहा है, इसमें जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौता और ईरान परमाणु समझौता आदि शामिल हैं।

क्यों लिया था अमेरिका ने यह निर्णय?

  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, यह संधि अमेरिका के आतंरिक कानून में दखल देती है। इसके अलावा यह संधि दूसरे संशोधन विधेयक में मिले अधिकारों का भी हनन करती है।
  • दरअसल, अमेरिका में द्वितीय संशोधन विधेयक के तहत प्रत्येक नागरिक को हथियार रखने का अधिकार मिला हुआ है।
  • राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन लंबे समय से इस संधि का विरोध कर रहा था। यह अमेरिका स्थित बंदूक के अधिकार की वकालत करने वाला एक नागरिक संगठन है, जिसके तकरीबन 5 मिलियन से भी अधिक सदस्य हैं ।
  • कई जानकार मानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन को नाराज़ नहीं करना चाहते थे, क्योंकि यह उनके राजनीतिक हित में नहीं था।

शस्त्र व्यापार संधि- पृष्ठभूमि 

  • 24 दिसंबर, 2014 को शस्त्र व्यापार संधि (Arms Trade Treaty-ATT) के लागू होने से पूर्व विश्व में हथियारों के व्यापार को विनियमित करने के लिये कोई भी अंतर्राष्ट्रीय कानून नहीं था, इस कमी को महसूस करते हुए कई वर्षों तक विभिन्न नागरिक संगठनों ने वैश्विक कार्रवाई का आह्वान किया।
  • वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार किया कि पारंपरिक हथियारों के हस्तांतरण हेतु एक सामान्य अंतर्राष्ट्रीय मानक की अनुपस्थिति दुनिया भर में सशस्त्र संघर्ष, लोगों के विस्थापन, अपराध और आतंकवाद को बढ़ावा देने में योगदान देती है।
    • इसके कारण वैश्विक स्तर पर शांति, सामंजस्य, सुरक्षा, स्थिरता और सतत्  सामाजिक एवं आर्थिक विकास के प्रयास कमज़ोर होते हैं।
  • इन्ही तथ्यों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हथियारों के हस्तांतरण हेतु एक सामान्य अंतर्राष्ट्रीय मानक की स्थापना करने वाली एक संधि की व्यवहार्यता की जाँच करने के लिये एक प्रक्रिया शुरू कर दी।
  • विभिन्न सम्मेलनों और बैठकों के बाद इस प्रकार की संधि को अंतिम रूप दिया गया और अंततः संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2 अप्रैल, 2013 को इसे अपना लिया गया तथा यह संधि 24 दिसंबर 2014 से लागू हो गई।
  • ध्यातव्य है कि अब तक कुल 130 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें से 103 देशों ने अपने क्षेत्राधिकार में इसे लागू भी कर दिया है।

शस्त्र व्यापार संधि- प्रमुख प्रावधान

  • शस्त्र व्यापार संधि (ATT) एक बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संधि है जो पारंपरिक हथियारों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करने के लिये प्रतिबद्ध है।
  • इस संधि का उद्देश्य संघर्ष वाले क्षेत्रों में हथियारों के प्रवाह पर नियंत्रण लगाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और घातक हथियारों को समुद्री डाकुओं, गिरोहों तथा अपराधियों के हाथों में पहुँचने से रोकना है।
  • इस संधि के तहत छोटे हथियारों से लेकर युद्ध टैंक, लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों के व्यापार के लिये नियम बनाने का भी प्रावधान है।
  • इस संधि के तहत सदस्य देशों पर प्रतिबंध है कि वह ऐसे देशों को हथियार न दें जो नरसंहार, मानवता के प्रति अपराध या आतंकवाद में शामिल होते हैं।
  • ध्यातव्य है कि यह संधि घरेलू हथियारों के व्यापार या सदस्य देशों में शस्त्र रखने के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं करती है। साथ ही यह संप्रभु देशों को प्राप्त आत्मरक्षा के वैधानिक अधिकारों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती है।

शस्त्र व्यापार संधि और चीन 

  • चीन के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि चीन विश्व में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिये निरंतर प्रयास करेगा।
  • चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, चीन ने सदैव सैन्य उत्पादों के निर्यात को सख्ती से नियंत्रित किया है। चीन इस प्रकार के सैन्य उत्पादों का निर्यात केवल संप्रभु राष्ट्रों को भी करता है न कि गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं को।
  • उल्लेखनीय है कि संधि में शामिल होने की घोषणा से पूर्व भी चीन का मानना था कि पारंपरिक हथियारों के कारोबार को नियंत्रित करने की दिशा में इस संधि की सकारात्मक भूमिका है।
  • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (Stockholm International Peace Research Institute) द्वारा इसी वर्ष जनवरी माह में किये गए एक अध्ययन से ज्ञात हुआ था कि चीन अमेरिका के पश्चात् विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार उत्पादक है।

शस्त्र व्यापार संधि पर भारत का पक्ष

  • वर्ष 2014 में संधि के अस्तित्त्व में आते ही भारत ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया था, भारत का मत है कि इस तरह की संधि का उद्देश्य हथियारों के गलत प्रयोग और तस्करी को रोकना होना चाहिये। ATT का लाभ पूरी दुनिया को तब होगा जब आतंकवादियों के हाथों में घातक हथियार न पहुँच पाएँ।
  • वर्ष 2013 में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय हथियार संधि के प्रस्ताव को कमज़ोर और एकतरफा बताया था और संधि में शामिल नहीं हुआ था। भारत का मानना था कि संधि के प्रस्ताव में संतुलन नहीं है। संधि के अंतर्गत हथियार निर्यात करने वाले देशों और आयात करने वाले देशों की नैतिक ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिये।
  • इसके अतिरिक्त भारत का मानना था कि संधि के मसौदे में आतंकवादियों और नॉन-स्टेट एक्टर्स पर नियंत्रण हेतु कोई सख्त नियम नहीं है। साथ ही ऐसे लोगों के हाथ में घातक हथियार न पहुँचे इसके लिये कोई विशेष प्रतिबंध नहीं किया गया है।
  • हालाँकि इसके बावजूद भारत ATT वार्ता में एक सक्रिय भागीदार रहा है और भारत ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि ATT निर्यात और आयात करने वाले राष्ट्रों के बीच दायित्त्वों का संतुलन सुनिश्चित करे।

आगे की राह

  • गरीबी, अभाव और असमानता की स्थिति का सामना करने वाले अत्यधिक संवेदनशील वर्ग को अकसर स्टेट और नॉन-स्टेट एक्टर्स द्वारा हथियारों के प्रयोग के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ता है, दोनों के बीच के संघर्ष में अक्सर आम आदमी और वंचित वर्ग को ही पीड़ा होती है।
  • हथियारों के हस्तांतरण पर अपर्याप्त नियंत्रण से उनकी उपलब्धता और दुरुपयोग को बढ़ावा मिलाता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति और स्थिरता कायम रखने के प्रयास कमज़ोर होते हैं।

स्रोत: द हिंदू


इस्पात उत्पादों पर एंटी-डंपिंग शुल्क

प्रीलिम्स के लिये

डंपिंग और एंटी-डंपिंग शुल्क का अर्थ

मेन्स के लिये

भारत के इस निर्णय के निहितार्थ, घरेलू उद्योगों पर डंपिंग का प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत ने चीन, वियतनाम और कोरिया से कुछ प्रकार के विशिष्ट इस्पात उत्पादों के आयात पर एंटी-डंपिंग शुल्क (Anti-Dumping Duty) लगाने की घोषणा की है।

प्रमुख बिंदु

  • आयात पर लागू किये जाने वाला यह शुल्क 13.07 डॉलर प्रति टन से लेकर 173.1 डॉलर प्रति टन हो सकता है।
  • इस संबंध में जारी अधिसूचना के अनुसार, चीन, वियतमान और कोरिया पर अधिरोपित किया गया एंटी-डंपिंग शुल्क पाँच वर्ष की अवधि के लिये प्रभावी होगा।

कारण

  • ध्यातव्य है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की जाँच शाखा व्यापार उपचार महानिदेशालय (Directorate General of Trade Remedies- DGTR) ने अपनी जाँच में यह निष्कर्ष निकाला कि उक्त देशों (चीन, वियतनाम और कोरिया) द्वारा भारत में अपने उत्पादों का निर्यात सामान्य मूल्य से भी से कम मूल्य पर किया गया, जिसके परिणामस्वरूप घरेलू उद्योगों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा।

व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR)

  • भारत सरकार ने वर्ष 2018 में ‘डंपिंग रोधी एवं संबद्ध शुल्क महानिदेशालय’ (Directorate General of Anti-Dumping and Allied Duties-DGAD) के स्थान पर ‘व्यापार उपाय महानिदेशालय’ (DGTR) का सृजन किया।
  • DGTR का सृजन देश में एक व्यापक एवं त्वरित व्यापार सुरक्षा व्यवस्था के निर्माण के उद्देश्य से किया गया था।

निहितार्थ

  • सरकार के इस कदम का उद्देश्य चीन, वियतनाम और कोरिया जैसे देशों से आने वाले सस्ते आयात से घरेलू इस्पात उद्योग और निर्माताओं की रक्षा करना है।
  • आधिकारिक सूचना के अनुसार, सरकार के इस निर्णय का उद्देश्य निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं को सुनिश्चित करना और विदेशी उत्पादकों तथा निर्यातकों के समक्ष घरेलू उत्पादकों को एक समान अवसर प्रदान करना है।
  • ध्यातव्य है कि भारत सरकार द्वारा यह एंटी-डंपिंग शुल्क ऐसे समय में अधिरोपित किया गया है, जब भारत-चीन के संबंधों में तनाव काफी अधिक बढ़ गया है, भारत-चीन सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद खास तौर पर भारत में चीन विरोधी स्वर तेज़ हो रहे हैं, ऐसे में भारत के इस निर्णय को चीन के लिये एक संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है।

डंपिंग और एंटी-डंपिंग शुल्क का अर्थ?

  • प्रायः डंपिंग शब्द का प्रयोग सर्वाधिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून के संदर्भ में ही किया जाता है, जहाँ डंपिंग का अभिप्राय किसी देश के एक निर्माता द्वारा किसी उत्पाद को या तो इसकी घरेलू कीमत से नीचे या इसकी उत्पादन लागत से कम कीमत पर किसी दूसरे देश में निर्यात करने करने से होता है।
  • उल्लेखनीय है कि डंपिंग, आयात करने वाले देश में उस वस्तु की कीमत को प्रभावित करने के साथ-साथ वहाँ के घरेलू उद्योग के लाभ को कम करती हैं।
  • वैश्विक व्यापार मानदंडों के अनुसार, एक देश को अपने घरेलू निर्माताओं की रक्षा करने और उन्हें एक समान अवसर प्रदान करने के लिये इस प्रकार की डंपिंग पर शुल्क लगाने की अनुमति है।
  • हालाँकि यह शुल्क किसी अर्द्ध-न्यायिक निकाय जैसे- भारत में व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) द्वारा गहन जाँच के बाद ही अधिरोपित किया जा सकता है।
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO-World Trade Organisation) की स्वीकृति से, जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड General Agreement on Tariff & Trade-GATT) का अनुच्छेद VI देशों को डंपिंग के खिलाफ कार्रवाई करने का विकल्प चुनने की अनुमति देता है।
  • इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जब कोई देश अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा करने और उनके नुकसान को कम करने के लिये निर्यातक देश में उत्पाद की लागत और अपने यहाँ उत्पाद के मूल्य के अंतर के बराबर शुल्क लगा दे तो इसे ही डंपिंगरोधी शुल्क यानी एंटी-डंपिंग शुल्क कहा जाता है।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स


क्रय शक्ति समता एवं भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार

प्रीलिम्स के लिये:

क्रय शक्ति समता , सकल घरेलू उत्पाद

मेन्स के लिये:

क्रय शक्ति समता सिद्धांत का महत्त्व एवं वैश्विक तथा क्षेत्रीय स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति

चर्चा में क्यों?

विश्व बैंक’ ने 'अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम’ (International Comparison Program- ICP) के तहत संदर्भ वर्ष 2017 के लिये नई ‘क्रय शक्ति समानताएँ’ (Purchasing Power Parities-PPPs) जारी की हैं, जो विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में जीवन की लागत के अंतर को समायोजित करती हैं।

प्रमुख बिंदु:

  •  ‘अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम’ के वर्ष 2017 के इस चक्र में विश्व की 176 अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किया गया ।
  • अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम, ‘संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकीय आयोग’ (UN Statistical Commission- UNSC) के दिशा-निर्देशन में विश्व में डेटा संग्रह की सबसे बड़ी पहल है।

क्रय शक्ति समता :

  • यह अंतर्राष्ट्रीय विनिमय का एक सिद्धांत है।
  • इसका अर्थ किन्हीं दो देशों के बीच वस्तु या सेवा की कीमत में मौजूद अंतर से लिया जाता है।
  • क्रय शक्ति समता के आधार पर  किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार का पता लगाया जा सकता है।
  •  क्रय शक्ति समता के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि दो देशों के बीच मुद्रा की क्रयशक्ति में कितना अंतर या फिर समता मौजूद है। 
  • क्रय शक्ति समता द्वारा मुद्रा विनिमय दर को तय किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकीय आयोग:

  •  यह राष्ट्रीय आँकड़ों के विकास को प्रोत्साहन देता है तथा उनको तुलना योग्य बनता है।
  • 20 अक्तूबर को विश्व सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है, इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में हुई थी।
  •  इसकी घोषणा संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग द्वारा की गई थी। जिसे पॉँच वर्ष में एक बार मनाया जाता है। 

अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम का उद्देश्य: 

  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य विश्व की अर्थव्यास्थों में क्रय शक्ति समानताओं का उत्पादन  करना है जो सभी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तुलना किये जाने के लिये, आर्थिक गतिविधियों के उपायों को रूपांतरित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • क्रय शक्ति समानता के साथ-साथ, अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम, मूल्य स्तर सूचकांकों (Price Level Indices- PLI) एवं जीडीपी व्यय के अन्य क्षेत्रीय तुलना योग्य समुच्चयों का भी उत्पादन करता है।

मूल्य स्तर सूचकांक:

  • मूल्य स्तर सूचकांक किसी अन्य देश के सापेक्ष दिये गए देश के मूल्य स्तर को वर्तमान नाम मात्र विनिमय दर से क्रय शक्ति समता (पीपीपी) को विभाजित करके व्यक्त करता है।
  • यह संकेतक एक सूचकांक के रूप में मापा जाता है।
  • वर्ष 1970 में 'अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम’ की शरुआत  के बाद से भारत लगभग सभी ICP चक्रों में शामिल हो चुका है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय भारत के लिये राष्ट्रीय कार्यान्वयन एजेंसी (NIA) है, जिसे ‘राष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम’ गतिविधियों की योजना, समन्वय और कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी दी गई है। 
  • भारत को ICP के वर्ष 2017 चक्र के लिये ऑस्ट्रिया के साथ-साथ आईसीपी गवर्निंग बोर्ड का सह-अध्यक्ष बनने का गौरव भी हासिल होता रहा  है।

विश्वव्यापी स्थिति:

  • सकल घरेलू उत्पाद ( Gross Domestic Product- GDP) के स्तर पर प्रति डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपए की क्रय शक्ति समानता वर्ष 2017 में 20.65 है जो वर्ष 2011 में 15.55 रही थी। 
  • भारतीय रूपए की अमेरिकी डॉलर के साथ विनिमय दर समान वर्ष की इसी अवधि के 46.67 के तुलना में बढ़कर अब 65.12 पर है।
  •  इसके अनुसार ‘बाज़ार विनिमय दर’ (Market Exchange Rate) की क्रय शक्ति समानता का अनुपात-मूल्य स्तर सूचकांक (Price Level Index- PLI) का उपयोग भारत की अर्थव्यवस्था की कीमतों के स्तरों की तुलना करने के लिये किया जाता है जो वर्ष 2011 के 42.99 की तुलना में वर्ष 2017 में 47.55 है।

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति: 

  • वर्ष 2017 में, भारत द्वारा PPP के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी वैश्विक स्थिति को बनाए रखा गया है जो क्रमशः चीन (16.4 प्रतिशत) एवं अमेरिका (16.3 प्रतिशत) की तुलना में PPP के लिहाज से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 6.7 प्रतिशत (वैश्विक रूप से कुल 119,547 बिलियन अमेरिकी डॉलर में से 8,051 बिलियन अमेरिकी डॉलर) रहा।
  • भारत वैश्विक वास्तविक एकल उपभोग एवं वैश्विक सकल पूंजी निर्माण में अपनी क्रय शक्ति समता आधारित हिस्से के लिहाज से भी तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थिति:

  • वर्ष 2017 में, भारत ने विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी क्षेत्रीय स्थिति बनाए रखी जो पीपीपी के लिहाज से क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20.83 प्रतिशत (एशिया प्रशांत के कुल 232,344 बिलियन हांगकांग डॉलर में से 48,395 हांगकांग डॉलर) था ।
  • वही चीन 50.76 प्रतिशत के साथ प्रथम तथा इंडोनेशिया 7.49 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर रहा । 

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति:

  • भारत क्षेत्रीय वास्तविक एकल उपभोग एवं क्षेत्रीय सकल पूंजी निर्माण में अपने पीपीपी आधारित हिस्से के लिहाज से भी दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
  • भारतीय रुपए से हांगकांग डॉलर की विनिमय दर इसी अवधि की तुलना में 6.00 % से बढ़कर 8.36 % हो गई है।
  • वही भारत का मूल्य स्तर सूचकांक (Price Level Index-PLI ) वर्ष 2011 के 71.00 की तुलना में घटकर वर्ष 2017 में 64.00 रहा है।
    • अगली ICP तुलना संदर्भ वर्ष 2021 के लिये की जानी है ।

स्रोत: पीआईबी


विभिन्न आयु के तारों का सह-अस्तित्त्व

प्रीलिम्स के लिये:

एनजीसी 381, एनजीसी 2360 तथा बर्कले 68

मेन्स के लिये: 

खगोलविदों द्वारा किये गए इस अध्ययन का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार के ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग’ (Department of Science and Technology- DST) के अंतर्गत स्थापित स्वायत्त विज्ञान संस्थान ‘आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्ज़र्वेशनल साइंसेस’ (Aryabhatta Research Institute of Observational Sciences- ARIES) के खगोलविदों द्वारा इस बात का पता लगाया गया है कि विभिन्न समूहों के तारे, खुले समूहों या क्लस्टर्स  में एक साथ रह सकते हैं। परंतु वैज्ञानिकों के समक्ष पहले यह जानना एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है कि एक खुले समूह में सभी तारे की उम्र समान होती है।

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प्रमुख बिंदु:

  • वैज्ञानिकों द्वारा खुले समूहों में तारों के विकास का अध्ययन करने के लिये हिमालय स्थित देवस्थल से 1.3-M दूरबीन (M,एक खगोलीय दूरबीन की न्यूनतम आवर्धन शक्ति है) के माध्यम से तीन खुले तारों के समूहों/क्लस्टर NGC 381, NGC 2360, तथा बर्कले 68 का अध्ययन करते हुए प्रकाश की माप ली गई ।
  • वैज्ञानिकों द्वारा क्लस्टर एनजीसी, 2360 में दो अलग नक्षत्रीय विकास क्रम देखने को मिले, जो अब तक आकाशगंगा में बहुत कम खुले समूहों में देखे गए हैं। 
  • शोधकर्त्ताओं द्वारा तीन खुले समूहों NGC 381, NGC2360 और बर्कले 68 में हजारों सितारों का अवलोकन किया गया। 
  • इन तीनों तारों के क्लस्टर्स/गुच्छे अपेक्षाकृत अधिक आयु के पाए गए, जिनकी आयु 446 मिलियन वर्ष से 1778 मिलियन वर्ष तक हो सकती है।
  • नक्षत्रीय विकास के अलावा, शोधकर्त्ताओं द्वारा पहली बार इन समूहों के सक्रिय विकास का भी अध्ययन किया गया। 
  • क्लस्टर से संबंधित तारों के द्रव्यमान के फैलाव को देखते हुए यह जानकारी मिली कि क्लस्टर्स के भीतरी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में तारों का अधिक फैलाव देखा गया, जबकि बाहरी क्षेत्र की ओर कम द्रव्यमान वाले तारे पाए गएहैं।
  • यह माना जाता है कि बहुत कम द्रव्यमान वाले तारों में से कुछ अपने मूल समूहों को छोड़ चुके हैं तथा वे सूर्य की भाँति एक स्वतंत्र तारे के रूप में घूम रहे हैं।
  • इस शोध कार्य को ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा प्रकाशित खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी क्षेत्र की एक प्रमुख पत्रिका ‘मंथली नोटिस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ (Monthly Notices of the Royal Astronomical Society) में प्रकाशित किया गया है।

तारों की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणा: 

  • हमारी आकाशगंगा  में तारों का निर्माण आकाशगंगा में मौजूद आणविक बादलों द्वारा होता  हैं।
  • यह माना जाता है कि हमारी आकाशगंगा में अधिकांश तारें क्लस्टर्स/गुच्छों  के रूप में विद्यमान हैं। 
  • यह तारों के गुच्छे तारे की उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझने के लिये एक महत्त्वपूर्ण सूत्र प्रदान करते हैं। 
  • तारों का खुला समूह गुरुत्वाकर्षण से बंधे तारों की एक व्यवस्था है जिसमें तारों का उत्पत्ति एक ही तरह के आणविक बादलों से होती है। 

आणविक बादल:

  • खगोलशास्त्र में आणविक बादल अंतरतारकीय माध्यम/इन्टरस्टॅलर स्पेस में स्थित ऐसे अंतरतारकीय बादल/इन्टरस्टॅलर क्लाउड को कहा जाता है जिनका घनत्व एवं आकार अणुओं को बनाने के लिए पार्यप्त होता है।
  • ये बादल अधिकतर  हाइड्रोजन (H2) अणुओं  के बने होते हैं।
  • एक समूह के तारों की उत्पत्ति के समय सभी तारे अपने प्रारंभिक तारों के ही विकासवादी अनुक्रम का पालन करते हैं।
  • खुले समूह आकाशगंगा की उत्पत्ति और विकास की खोज के लिये भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यह पूरी आकाशगंगा के सीमा क्षेत्र में फैले होते हैं।

शोध का महत्त्व:  

  • इस शोध में इन समूहों के नक्षत्रीय और गतिशील विकास के विषय में महत्त्वपूर्ण  जानकारी दी है।
  • इस शोध दल के वैज्ञानिक भविष्य में अंतरिक्ष अभियानों से प्राप्त पूरक आँकड़ों के साथ अपने संस्थान में उपलब्ध अवलोकन संबंधी सुविधाओं का उपयोग करके भविष्य में और अधिक खुले तारों के गुच्छों/क्लस्टर्स का गहन विश्लेषण करने की योजना बना रहे हैं।

स्रोत: पीआईबी


Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 24 जून, 2020

पीएम केयर्स फंड के तहत धनराशि का आवंटन 

हाल ही में पीएम केयर्स फंड ट्रस्ट (PM CARES Fund Trust) ने सभी राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में सरकार द्वारा चलाए जा रहे COVID-19 समर्पित अस्पतालों को 50,000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर की आपूर्ति के लिये 2,000 करोड़ रुपए आवंटित किये हैं। इसके अतिरिक्त प्रवासी कामगारों के कल्याण के लिये 1,000 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई है। उल्लेखनीय है कि अभी तक कुल 2,923 वेंटिलेटर बनाए जा चुके हैं, जिनमें से 1,340 वेंटिलेटरों की आपूर्ति राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों को कर दी गई है। वेंटिलेटर प्राप्त करने वाले प्रमुख राज्यों में महाराष्ट्र (275), दिल्ली (275), गुजरात (175), बिहार (100), कर्नाटक (90) और राजस्थान (75) आदि शामिल हैं। जून, 2020 के अंत तक सभी राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों को अतिरिक्त 14,000 वेंटिलेटर की आपूर्ति कर दी जाएगी। इसके अलावा प्रवासी कामगारों के कल्याण के लिये राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों को 1,000 करोड़ रुपए की धनराशि पहले ही जारी की जा चुकी है। इस सहायता को प्रवासियों के आश्रय, भोजन, चिकित्सा उपचार और परिवहन की व्यवस्था आदि में उपयोग किया जाना है। इस धनराशि को प्राप्त करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र (181 करोड़ रुपए), उत्तर प्रदेश (103 करोड़ रुपए), तमिलनाडु (83 करोड़ रुपए), गुजरात (66 करोड़ रुपए), दिल्ली (55 करोड़ रुपए), पश्चिम बंगाल (53 करोड़ रुपए), बिहार (51 करोड़ रुपए), मध्य प्रदेश (50 करोड़ रुपए) राजस्थान (50 करोड़ रुपए) और कर्नाटक (34 करोड़ रुपए) आदि प्रमुख हैं।

इंदिरा रसोई योजना

राजस्थान सरकार जल्द ही राजस्थान में गरीबों और ज़रूरतमंदों को रियायती दरों पर दो वक्त का पौष्टिक भोजन प्रदान करने के लिये पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर एक नई रसोई योजना शुरू करेगी। आधिकारिक सूचना के अनुसार, राज्य सरकार ‘इंदिरा रसोई योजना’ पर प्रत्येक वर्ष तकरीबन 100 करोड़ रुपए खर्च करेगी। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के अनुसार, राज्य सरकार की ‘इंदिरा रसोई योजना’ राज्य के किसी भी व्यक्ति को भूखा न रहने देने के सरकार के वादे को पूरा करेगी। ध्यातव्य है कि इस योजना के कार्यान्वयन के लिये गैर-सरकारी संगठनों (Non-Governmental Organisations- NGOs) को चुना जाएगा और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) की मदद से कार्यान्वयन की प्रभावी निगरानी की जाएगी। इस योजना के लिये अभी तक भोजन का शुल्क तय नहीं किया गया है, हालाँकि भोजन राज्य की प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्र की आवश्यकताओं और स्वाद को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि तीन वर्ष पूर्व, दिसंबर 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने तमिलनाडु की ‘अम्मा कैंटीन’ (Amma Canteen) की तर्ज पर क्रमशः 5 रुपए और 8 रुपए में नाश्ता और दोपहर का भोजन प्रदान वाली योजना 'अन्नपूर्णा रसोई योजना' (Annapurna Rasoi Yojana) शुरू की थी। हालाँकि इसी वर्ष 31 मार्च को ‘अन्नपूर्णा रसोई योजना’ का कार्यकाल समाप्त हो गया था।

अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस

प्रत्येक वर्ष 23 जून को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस (International Olympic Day) का आयोजन किया जाता है। इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य मानवीय जीवन में खेल के महत्त्व को चिह्नित करना और दुनिया भर में खेल और खेलों में भागीदारी को बढ़ावा देना है। ध्यातव्य है कि अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (International Olympic Committee) की स्थापना 23 जून, 1894 को पेरिस में की गई थी, इसी को ध्यान में रखते हुए 23 जून को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति के स्थापना दिवस को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। इस अवसर पर विश्व के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिसमें प्रत्येक वर्ग के लोग और  खिलाड़ी शामिल होते हैं। 23 जून, 1894 को IOC की स्थापना की गई थी और यह ओलंपिक का सर्वोच्च प्राधिकरण है। यह एक गैर-लाभकारी स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो खेल के माध्यम से एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिये प्रतिबद्ध है। यह ओलंपिक खेलों के नियमित आयोजन को सुनिश्चित करता है, सभी संबद्ध सदस्य संगठनों का समर्थन करता है और उचित तरीकों से ओलंपिक के मूल्यों को बढ़ावा देता है। वर्ष 1948 से हर चार वर्ष में एक बार ओलंपिक आयोजित होते हैं।

चीन के उपकरणों का प्रयोग नहीं करेगा भारतीय भारोत्तोलन महासंघ

भारत-चीन के संबंधों के बीच तनाव को देखते हुए, देश में चीन विरोधी स्वर काफी तेज़ हो गए हैं। ऐसे में भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (Indian Weightlifting Federation-IWF) ने चीन से आने वाले उपकरणों का प्रयोग न करने का निर्णय लिया है। भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (IWF) ने भारतीय खेल प्राधिकरण (Sports Authority of India-SAI) को पत्र लिखकर इस संबंध में सूचना दी है। भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (IWF) के अनुसार, कुछ समय पूर्व महासंघ ने चीन से कुछ उपकरण मँगाए थे, किंतु वे सभी उपकरण खराब निकले हैं। ध्यातव्य है कि वर्तमान में भारतीय टीम स्वीडन में बने उपकरणों के साथ अभ्यास कर रही है। भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (IWF) की घोषणा के अनुसार, IWF द्वारा भविष्य में अब केवल भारतीय या अन्य देशों (चीन के अलावा) की कंपनियों द्वारा निर्मित उपकरणों का प्रयोग ही किया जाएगा। भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (IWF) भारत में भारोत्तोलन के लिये नियंत्रित निकाय है। भारतीय भारोत्तोलन महासंघ (IWF) का गठन वर्ष 1935 में किया गया था।