डेली न्यूज़ (08 Aug, 2020)



सौर वातावरण के चुंबकीय क्षेत्र का मापन

प्रीलिम्स के लिये:

सूर्य की आंतरिक संरचना, सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र 

मेन्स के लिये:

सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र 

चर्चा में क्यों?

‘जर्नल साइंस’ (Journal Science) में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सौर भौतिकविदों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम; जिसमें चीन तथा अमेरिका के वैज्ञानिक शामिल थे, ने पहली बार सूर्य के कोरोना अर्थात सूर्य के बाहरी वातावरण के चुंबकीय क्षेत्र का वैश्विक पैमाने पर मापन की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है।

प्रमुख बिंदु:

  • ऐसा खगोलीय पिंड जिसकी अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश होता है, उसे तारा (Star) कहा जाता है। सूर्य पृथ्वी के सबसे नज़दीक स्थित तारा है।
  • वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से सूर्य का अध्ययन कर रहे हैं परंतु अभी भी इससे संबंधित कई पहेलियों (Puzzles) को अभी तक सही से नहीं समझा गया है।

Structure-of-the-sun

शोध प्रक्रिया:

  • शोध टीम द्वारा कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र का मापन करने के लिये ‘कोरोनल सिस्मोलॉजी’ या ‘मैग्नेटोसिस्मोलॉजी’ नामक तकनीक का प्रयोग किया गया। 
  • इस विधि में ‘मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक’ (MHD) तरंगों के गुणों तथा कोरोना के घनत्व के एक साथ मापन की आवश्यकता होती है।
  • अतीत में इन तकनीकों का उपयोग उपकरणों की सीमाओं के कारण बहुत सीमित रूप में किया जाता था।
  • शोध टीम ने कोरोनल चुंबकीय क्षेत्र के मापन के लिये उन्नत 'कोरोनल मल्टी-चैनल पोलरिमीटर' (CoMP) तथा उन्नत डेटा विश्लेषण तकनीक का प्रयोग किया है। 
  • सैद्धांतिक गणना से  यह दिखाया जा सकता है कि अनुप्रस्थ MHD तरंगे प्रत्यक्षत: चुंबकीय क्षेत्रों की तीव्रता और कोरोना के घनत्व से संबंधित हैं।
  • एक बार जब CoMP उपकरण के माध्यम से चुंबकीय तरंगों के गुणों और कोरोना के घनत्व का मापन कर लिया जाए तो गणितीय सूत्र (MHD सिद्धांत से व्युत्पन्न) के माध्यम से कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की गणना की जा सकती है। 

मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक (MHD) तरंगें:

  • तरंगों के गुण उस माध्यम पर निर्भर करते हैं जिसमें वे यात्रा करते हैं। तरंग के कुछ गुणों को मापकर उस माध्यम की विशेषताओं का अनुमान लगाया जा सकता है, जिस माध्यम से होकर उन्होंने यात्रा की है। तरंगे अनुदैर्ध्य तरंगें (ध्वनि तरंगें) या अनुप्रस्थ तरंगें  (झील की सतह पर तरंगे) हो सकती हैं।
  • एक चुंबकीय प्लाज्मा के माध्यम से गुजरने वाली तरंगों को मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक (MHD) तरंगें कहा जाता है।

उन्नत 'कोरोनल मल्टी-चैनल पोलरिमीटर' (CoMP):

  • CoMP एक उपकरण है, जो हवाई द्वीप पर उच्च ऊँचाई पर स्थित वेधशाला द्वारा संचालित है। जिसका उपयोग कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र के अध्ययन में किया जाएगा। 

CoMP

शोध का महत्त्व: 

  • सूर्य के कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की गणना निम्नलिखित सौर समस्याओं को समझने में मदद मिलेगी:

कोरोना की उष्णता (Coronal Heating): 

  • सूर्य के कोर का तापमान लगभग 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस है जबकि इसकी बाहरी परत अर्थात फोटोस्फीयर (Photosphere) का तापमान मात्र 5700 डिग्री सेल्सियस है। 
  • कोरोना (Corona); जो सूर्य के ब्राह्य वातावरण का निर्माण करता है, का तापमान फोटोस्फीयर की तुलना में बहुत अधिक अर्थात एक मिलियन डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक है।
  • वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से इस पहेली को समझने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कौन-से कारक हैं जिनके कारण कोरोना अर्थात सूर्य के वायुमंडल का तापमान फोटोस्फीयर अर्थात सूर्य की सतह की तुलना में इतना अधिक है। 
  • वैज्ञानिकों के अध्ययन में ‘कोरोना की उष्णता’ पहेली को समझाने के लिये कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की पहचान की है। इसलिये यह शोधकार्य इन सिद्धांतों को बेहतर ढंग से समझने और सत्यापित करने में मदद करेगा।

सूर्य में विस्फोट की प्रक्रिया (Mechanisms of Eruptions of the Sun):

  • सूर्य के विस्फोट की प्रक्रिया से संबंधित समस्याएँ जैसे कि 'सौर फ्लेयर्स' (Solar Flares) और 'कोरोनल मास इजेक्शन' (Coronal Mass Ejections- CME) आदि को समझना भी वैज्ञानिक समुदाय के समक्ष चुनौतीपूर्ण रहा है।
  •  शोध के अनुसार, ये घटनाएँ सूर्य के कोरोना में होने वाले ‘चुंबकीय सामंजस्य’ (Magnetic Reconnection) द्वारा संचालित होती हैं।
  • ‘चुंबकीय सामंजस्य’ या मैग्नेटिक रिकनेक्शन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें विपरीत ध्रुवीयता वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे में मिल जाती हैं जिससे कुछ 'चुंबकीय ऊर्जा', 'ऊष्मा ऊर्जा' और 'गतिज ऊर्जा' में बदल जाती है, जो कोरोना की उष्णता तथा सोलर फ्लेयर्स आदि का कारण बनती है।

भारत का प्रयास:

  • भारत सूर्य से संबंधित परीक्षण के लिये ‘आदित्य L-1 मिशन’ को भेजने की तैयारी कर रहा है। यह सूर्य के वातावरण तथा चुंबकीय क्षेत्र का नज़दीक से अध्ययन करेगा। यह न केवल कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र को समझने में अपितु सौर विस्फोटों और संबंधित अंतरिक्ष आधारित घटनाओं की पूर्व घोषणा करने में भी मदद करेगा। 

निष्कर्ष:

  • कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र का नियमित मापन बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सौर कोरोना अत्यधिक गतिशील है तथा लगातार परिवर्तित होता रहता है। इसमें कुछ सेकंड या कुछ मिनट में ही व्यापक पैमाने पर परिवर्तन देखने को मिलता है। नवीन परिष्कृत तकनीक का उपयोग से कोरोना के चुंबकीय क्षेत्रों का व्यापक पैमाने पर मापन करने में मदद मिलेगी।

स्रोत: द हिंदू


दिवाला और शोधन अक्षमता संबंधी नियमों में संशोधन

प्रीलिम्स के लिये

 दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016, भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड

मेन्स के लिये

 दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता का उद्देश्य, इसका महत्त्व और इसकी विशेषताएँ

चर्चा में क्यों?

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (The Insolvency and Bankruptcy Board of India-IBBI) ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट्स के लिये दिवालियापन समाधान प्रक्रिया) नियम, 2016 और भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) नियम, 2017 में संशोधन किया है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट्स के लिये दिवालियापन समाधान प्रक्रिया) नियम, 2016 में संशोधन

  • संशोधन: हालिया संशोधन के अनुसार, अंतरिम समाधान पेशेवर द्वारा प्रस्तुत किये गए तीन इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल (IP) उसी राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश से होने चाहिये, जहाँ से कॉर्पोरेट देनदार के रिकॉर्ड के अनुसार सबसे अधिक लेनदार हैं।
    • पृष्ठभूमि: वित्तीय लेनदारों को सरलीकृत तरीके से प्रतिनिधित्त्व प्रदान करने के उद्देश्य से दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016 की धारा 21 के प्रावधानों के तहत दिवालिया प्रस्ताव के लिये लेनदारों की समिति (Committee of Creditors-CoC) के समक्ष अपनी चिंताएँ व्यक्त करने हेतु एक अधिकृत प्रतिनिधि (Authorised Representative-AR) नियुक्त किया जा सकता है।
    • नियमों के अनुसार, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अंतरिम समाधान पेशेवर (Interim Resolution Professional) अधिकृत प्रतिनिधि (AR) के तौर पर कार्य करने के लिये कुल तीन इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल (IP) का विकल्प प्रस्तुत करेगा और लेनदारों द्वारा अपने प्रतिनिधित्त्व के लिये अधिकृत प्रतिनिधि (AR) के तौर पर किसी एक इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल (IP) का चुनाव किया जाएगा।
    • लाभ: इसके माध्यम से इससे अधिकृत प्रतिनिधि (AR) और लेनदारों के बीच समन्वय और संचार में आसानी होगी।
  • संशोधन: भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) द्वारा किये गए हालिया संशोधन में यह प्रावधान है कि मूल्यांकन मैट्रिक्स (Evaluation Matrix) के अनुसार सभी समाधान योजनाओं का मूल्यांकन करने के बाद, लेनदारों की समिति (CoC) सभी समाधान योजनाओं पर एक साथ मतदान करेगी।
  • इसके तहत जिस भी समाधान योजना को सबसे अधिक मत प्राप्त होंगे उसे अनुमोदित किया जाएगा, हालाँकि ये मत कुल मतदान के 66 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिये।
    • पृष्ठभूमि: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016 में दिये गए नियमों के अनुसार, लेनदारों की समिति (CoC) मूल्यांकन मैट्रिक्स के अनुसार सभी अनुरूप समाधान योजनाओं का मूल्यांकन करेगी ताकि उनमें से सर्वश्रेष्ठ समाधान योजना की पहचान की जा सके और इसे अनुमोदित किया जा सके।
    • यहाँ मूल्यांकन मैट्रिक्स का अभिप्राय किसी समाधान योजना के अनुमोदन हेतु लेनदारों की समिति द्वारा निर्धारित किये गए मापदंडों और उन्हें लागू करने की विधि से है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) नियम, 2017 में संशोधन

  • संशोधन: नियमों में किये गए संशोधन के अनुसार, कॉरपोरेट व्यक्ति अपने वर्तमान परिसमापक (Liquidator) के स्थान पर किसी अन्य दिवाला पेशेवर (इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल) को एक सामान्य प्रस्ताव के माध्यम से परिसमापक (Liquidator) के रूप में नियुक्त कर सकता है।
    • पृष्ठभूमि: भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 एक कॉर्पोरेट व्यक्ति को स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया शुरू करने में सक्षम बनाती है, यदि उस पर कोई ऋण नहीं है या वह परिसंपत्तियों की आय से अपने ऋण का पूरी तरह से भुगतान करने में सक्षम है। 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016

  • अगर कोई कंपनी कर्ज़ वापस नहीं चुकाती तो दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016 (IBC) के तहत कर्ज़ वसूलने के लिये उस कंपनी को दिवालिया घोषित किया जा सकता है।
  • इस संहिता की धारा 7 किसी कंपनी के विरुद्ध दिवालिया प्रक्रिया की शुरुआत से जुड़ी है अर्थात् जब कोई कर्ज़ देने वाला व्यक्ति, संस्था या कंपनी, कर्ज़ नहीं चुकाने वाली कंपनी के खिलाफ दिवालिया कोर्ट में अपील दायर करती है।
  • संहिता की धारा 12 दिवालिया प्रक्रिया को पूरी किये जाने की समयसीमा को तय करती है। इस धारा के तहत यह पूरी प्रक्रिया 180 दिनों के भीतर पूरी की जानी अनिवार्य है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI)

  • भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) की स्थापना दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016 के तहत 1 अक्तूबर, 2016 को हुई थी।
  • भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) मुख्य तौर पर  दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता,  2016 को सही ढंग से लागू करने के लिये ज़िम्मेदार है।
  • वर्तमान में डॉ. एम.एस. साहू भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के अध्यक्ष के तौर पर कार्यरत हैं।

स्रोत: पी.आई.बी


ट्राइफेड: डिजिटाइज़ेशन ड्राइव

प्रीलिम्स के लिये:

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ,न्यूनतम समर्थन मूल्य, विश्व स्वास्थ्य संगठन

मेन्स के लिये:

भारत में जनजातीय समुदायों के कल्याण के लिये TRIFED द्वारा किये जा रहे प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल  ही में 6 अगस्त, 2020 को भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (Tribal Cooperative Marketing Development Federation of India-TRIFED) द्वारा अपना 33 वाँ स्थापना दिवस मनाया गया तथा उसी दिन TRIFED द्वारा अपने स्वयं के आभासी कार्यालय (Virtual Office) का भी उदघाटन किया गया।

प्रमुख बिंदु

  • आभासी कार्यालय: 
    • इस कार्यालय में 81 ऑनलाइन वर्क स्टेशन एवं 100 अतिरिक्त कन्वर्जिंग स्टेट एजेंसी वर्क स्टेशन शामिल हैं जो आदिवासी लोगों को मुख्यधारा के विकास के करीब लाने की दिशा में देश भर में अपने भागीदारों के साथ मिलकर TRIFED की टीम के सदस्यों की मदद करेंगे।
    • कर्मचारियों में आपसी तालमेल के स्तर का पता लगाने तथा उनके प्रयासों को अधिक सुगम्य बनाने के लिये, डैशबोर्ड लिंक के साथ एक ‘एम्प्लॉई इंगेजमेंट एंड वर्क डिस्ट्रिब्यूशन मैट्रिक्स’ (Employee Engagement and Work Distribution Matrix) को भी लॉन्च किया गया है।
  • कारण:
    • COVID -19 महामारी के कारण , खरीददारी, बैंकिंग, तथा अन्य कार्य ऑनलाइन हो गए हैं तथा यह देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद भी ऑनलाइन कार्यों में वृद्धि हुई है। 
    • ये सभी संगठनात्मक पहल ट्राइफेड के महत्त्वाकांक्षी डिजिटाइज़ेशन ड्राइव (Digitisation Drive) का एक अभिन्न अंग है जो अंतर्राष्ट्रीय  मानकों पर आधारित आर्ट  ई-प्लेटफ़ॉर्म (Art e-Platforms) मानकों पर आदिवासियों की  वाणिज्यिक गतिविधियों  को बढ़ावा देने, आदिवासियों के ग्रामीण उत्पादों तथा आदिवासी कारीगरों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ने, के लिये प्रोत्साहित करता है ।

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (TRIFED): 

  • गठन: 
    • TRIFED का गठन वर्ष 1987 में जनजातीय कार्य मंत्रालय के तत्त्वावधान में राष्ट्रीय नोडल एजेंसी के रूप में किया गया।
    • इसे बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 1984 (Multi-State Cooperative Societies Act) के तहत पंजीकृत गया था।
    • इसने अपने कार्यों की शुरुआत वर्ष 1988 में नई दिल्ली स्थित मुख्य कार्यालय से की।
  • उद्देश्य: जनजातीय लोगों का सामाजिक-आर्थिक विकास, आर्थिक कल्याण को बढ़ावा देना, ज्ञान, उपकरण और सूचना के साथ जनजातीय लोगों का सशक्तीकरण एवं क्षमता निर्माण करना।
  • कार्य: यह मुख्य रूप से दो कार्य करता है पहला-लघु वन उपज ( Minor Forest Produce (MFP) विकास, दूसरा खुदरा विपणन एवं  विकास (Retail Marketing and Development) हैं।

पहल और भागीदारी:

  • TRIFED द्वारा वर्ष 1999 में नई दिल्ली में ट्राइब्स इंडिया (Tribes India) नामक अपने पहले रिटेल आउटलेट के माध्यम से आदिवासी कला और शिल्प वस्तुओं की खरीद और विपणन का कार्य शुरू किया गया।
  • TRIFED द्वारा वन धन योजना (Van Dhan Yojana) के तहत उत्पादन को बढ़ाने के लिये वन धन इंटर्नशिप कार्यक्रम (Van Dhan Internship Programme) का आयोजन किया गया है।
  • TRIFED द्वारा जनजातियों में  उद्यमशीलता को विकसित करने के लिये राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (Institutes of National Importance-INI) के साथ मिलकर एक परिवर्तनकारी टेक फॉर ट्राइबल्स प्रोग्राम (Transformational Tech For Tribals Program) को शुरू किया गया है।
  • सूक्ष्म वन उत्पादों  के संवर्द्धित मूल्य को बढ़ावा देने के लिये ट्राईफूड योजना (TRIFOOD Scheme) खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय, जनजातीय मामलों के मंत्रालय और TRIFED की एक संयुक्त पहल है।
  • सूक्ष्म वन उत्पादों (Minor Forest Produce-MFP) के विपणन के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price-MSP) के माध्यम से एक तंत्र विकसित किया गया तथा वर्ष 2013 में  MFP के लिये एक मूल्य श्रृंखला को लागू किया गया था ताकि वन निवासी अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes-STs) और अन्य पारंपरिक वनवासियों के उत्पादों का उचित मूल्य सुनिश्चित किया जा सके।
  •  TRIFED द्वारा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (United Nations Children’s Fund- यूनिसेफ) एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) के सहयोग से COVID -19 महामारी पर वेबिनार का आयोजन किया है।
  • इस वेबिनार में COVID -19 के लिये बेसिक दिशा-निर्देशों के संदर्भ में TRIFED प्रशिक्षक और स्वयंसेवक संघों (Self Help Groups-SHG) के लिये एक आभासी प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। 

स्रोत: पी आई बी


सिज़ोफ्रेनिया तथा इसके संभावित कारण

प्रीलिम्स के लिये:

सिज़ोफ्रेनिया, एलील, गुणसूत्र

मेन्स के लिये:

सिज़ोफ्रेनिया से संबंधित शोध का चिकित्सा क्षेत्र में महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सिज़ोफ्रेनिया रिसर्च फाउंडेशन (Schizophrenia Research Foundation-SCARF) और जीवन स्टेम सेल फाउंडेशन (Jeevan Stem Cell Foundation) चेन्नई द्वारा सिज़ोफ्रेनिया रोग से ग्रसित ‘विशिष्ट जातीय’ समूह के लोगों पर एक प्रारंभिक अध्ययन किया गया। जिसमें  रोग के साथ एक विशिष्ट प्रकार के एलील (विशिष्ट जीन के प्रकार) समहू को देखा गया।

प्रमुख बिंदु:

वर्तमान अध्ययन:

  • वर्तमान अध्ययन के अनुसार, HLA, प्रतिरक्षा प्रणाली के सुचारु रूप से कार्य करने के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण पूर्ण है तथा इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन प्रतिरक्षा प्रणाली में 
  • ऑटोइम्यून बीमारियों (एंटीबॉडी/लिम्फोसाइटों के कारण होने वाली बीमारी) में, जब शरीर मस्तिष्क में एन-मिथाइल-डी-एस्पेरेट (N-methyl-D-aspartate-NMDA) की प्रतिक्रिया के विरुद्ध एंटीबॉडी का निर्माण करता है तो ऐसी स्थिति में ये एंटीबॉडी मस्तिष्क से प्राप्त होने वाले सामान्य संकेतों/सिग्नलों को बाधित करती हैं जिसके कारण मस्तिष्क में  सूजन (Encephalitis) उत्पन्न हो जाती है इससे पुरुष एवं महिला दोनों ही प्रभावित होते हैं तथा यह स्थिति  सिज़ोफ्रेनिया का कारण बन सकती हैं।
  • एन-मिथाइल-डी-एस्पेरेट (N-methyl-D-aspartate- NDMA) एक ग्लूटामेट ग्राही (Receptor) एवं आयन चैनल (Ion Channel) प्रोटीन है जो तंत्रिका कोशिकाओं (Nerve Cells) में पाया जाता है तथा स्मृति कार्यों के लिये महत्त्वपूर्ण  है।      
  • अध्ययन में शोधकर्त्ताओं द्वारा सिज़ोफ्रेनिया से ग्रसित व्यक्तियों में ‘एचएलए वर्ग I एलील्स’ (HLA Class I Alleles) की उच्च आवृत्ति देखी गई।
  • इन एलील्स के वाहक व्यक्तियों में  सिज़ोफ्रेनिया के होने की आशंका व्यक्त की जा सकती है।
  • अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों  में  सिज़ोफ्रेनिया का प्रभाव कम देखा गया उनके एलील्स के मध्य एक नकारात्मक सह-संबंध (Negative Correlation) विद्यमान था।
  • पहली बार, रोगियों के HLA अणुओं में अमीनो एसिड के स्तर का भी अध्ययन किया गया।
  • शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में माना है कि सिज़ोफ्रेनिया के कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन शायद चयन तथा पूर्व में हुए चयनात्मक दबावों की 'स्मृति' इसकी रोग के शुरुआती लक्षणों का कारण हो सकती है।
  • हालांकि, विकार पैदा करने वाले सटीक कारकों का आगे अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। सिज़ोफ्रेनिया से ग्रसित लोगों में अलग-अलग एलील का होना समस्या नहीं है, लेकिन सटीक एलील की पहचान करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य  है।
  • प्रारंभिक अध्ययन इस बात को और इशारा करते हैं कि अलग-अलग जातीय समूहों में विभिन्न एलील विदयमान हो सकते हैं। उदाहरण के लिये, सऊदी अरब, ट्यूनीशिया और जापान में किये गए अध्ययन में सिज़ोफ्रेनिया के जोखिम को उत्पन्न करने के लिये भिन्न-भिन्न  एलील उत्तरदायी रहे हैं।

सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia):

  • यह मानसिक विकारों के समूह के लिये प्रयोग होने वाला शब्द है जिसमें व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक कार्यपद्धति में विकृति या ह्रास उत्पन्न होने के परिणामस्वरूप व्यक्ति में अव्यवस्थित विचा , विचित्र धारणाएँ, असामान्य भावनात्मक स्थिति तथा मोटर डिसअर्डर जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।
  • यह कमज़ोरी लाने वाला ( किसी को कमजोर तथा दुर्बल बनाने वाला) एक विकार है।
  • सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर सिज़ोफ्रेनिया की कीमत रोग से ग्रसित व्यक्तियों के साथ-साथ  उसके परिवारों एवं समाज़ दोनों को चुकानी पड़ती है।
  •  सामन्यत: इस रोग की शुरुआत किशोर अवस्था के अंत में या फिर व्यस्क अवस्था के शुरुआत में होती है।  

लक्षण:

  • सिज़ोफ्रेनिया से ग्रसित व्यक्ति में अतिरिक्त विकृतिपूर्ण या विचित्र लक्षण जुड़ जाते हैं जिसमें  भ्रम की स्थिति, अव्यस्थित तरीके से सोचना एवं बोलना, अत्यधिक कल्पनाशील तथा रोगी की सोच का विकृत होना इत्यादि शामिल हैं।
  • ये लक्षण सिज़ोफ्रेनिया से ग्रसित व्यक्ति के विकृतिपूर्ण लक्षणों में कमी या नकारात्मक पक्षों को दर्शाते हैं, जैसे- रोगी द्वारा कम बोलना, भावनाओं को कम या फिर अभिव्यक्त ही न करना, इच्छा शक्ति का अभाव तथा समाज से दूरी बना लेना इत्यादि।
  • रोगी में स्वतः स्फूर्ति का अभाव, रोगी द्वारा चहरें के भावों को बेहद विकृत एवं विचित्र प्रकार से प्रकट करना तथा इशारों में बात करना।

कारण: 

  • सिज़ोफ्रेनिया का वास्तविक कारण अभी तक ज्ञात नहीं है। इसके संभावित कारणों एवं अन्य संबंधों को जानने के लिये विश्व भर में विभिन्न जातीय समूहों के बीच विभिन्न अध्ययन किये गए हैं।
    • इन अध्ययनों में इस रोग का संबंध ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (Human Leukocyte Antigen- HLA) से संबंधित विभिन्न एलीलों के साथ देखा गया है।
    • HLA प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण अंग है जो गुणसूत्र संख्या छह पर स्थित जीन के एक समूह से संबंधित है।
    • HLA जीन अत्यंत परिवर्तनशील होते हैं और मानव जातियों में भिन्न-भिन्न होते हैं।
  • विशिष्ट एलील जो सिज़ोफ्रेनिया से ग्रसित लोगों में देखा गया वह प्रत्येक नृजातीय समूह में अलग-अलग था।

उपचार: 

इस रोग में थेरेपी तथा लोगों का सहयोग ग्रसित लोगों को सामाजिक कौशल सीखने में मदद कर सकता है, शुरुआत में ही लक्षणों की पहचान करके तथा उन्हें एक चेतावनी की तरह लेते हुए इस समस्या से बचा जा सकता है।

स्रोत: द हिंदू


आंगनवाड़ी सेवाओं का कार्यान्वयन

प्रीलिम्स के लिये

आंगनवाड़ी, एकीकृत बाल विकास सेवा योजना

मेन्स के लिये

महामारी के दौरान में खाद्य सुरक्षा से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

‘राइट टू फूड कैंपेन’ द्वारा महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी को दिये गए ज्ञापन में आग्रह किया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों को पके हुए भोजन का प्रावधान फिर से शुरू करना चाहिये और आंगनवाड़ी सेवाओं का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिये।

प्रमुख बिंदु

  • पृष्ठभूमि 
    • गौरतलब है कि 25 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन के बाद, 8 करोड़ से अधिक लाभार्थियों, जिसमें छह वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ और स्तनपान कराने वाली माताएँ आदि शामिल हैं, के लिये लगभग 14 लाख आंगनवाड़ियों में पका हुआ भोजन और घर पर राशन लेने का प्रावधान बंद हो गया था। 
    • मार्च, 2020 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने राज्य सरकारों को याद दिलाया था कि यदि वे आंगनवाड़ियों में कार्यान्वित एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (Integrated Child Development Services-ICDS) के तहत अनिवार्य भोजन अथवा खाद्यान्न की होम डिलीवरी करने में असमर्थ हैं तो उन्हें प्रत्येक लाभार्थी को मिलने वाले खाद्य सुरक्षा भत्ते का विस्तार करना होगा।

  • समस्या
    • ‘राइट टू फूड कैंपेन’ के अनुसार, न केवल बच्चों के विकास के स्तर पर नज़र रखने और कुपोषितों की सहायता करने संबंधी महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ रोक दी गईं, बल्कि घर-घर तक भोजन पहुँचाने जैसे बुनियादी और मूल प्रावधान भी कई स्थानों पर सही ढंग से लागू नहीं किये गए।
    • इस असाधारण समय में उक्त प्रावधानों को बंद करने से कुपोषण के प्रति संवेदनशील बच्चों को एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (ICDS) के तहत मिलने वाले पोषक खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
    • ‘राइट टू फूड कैंपेन’ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को लिखे अपने पत्र में कहा है कि ‘हमें देश भर से रिपोर्ट मिली है कि एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) के माध्यम से प्रदान किये जाने वाले पोषक खाद्य पदार्थ, जिसे होम डिलीवरी के माध्यम से लॉकडाउन के दौरान जारी रखा जाना था, अधिकांश स्थानों पर वितरित नहीं किया जा रहा है।
    • जून 2020 में संकलित ‘पोषण COVID-19 मॉनिटरिंग रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत में 14 सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में से 10 ने कुपोषित बच्चों का सामुदायिक प्रबंधन (Community Management) नहीं किया था और 8 राज्य छह वर्ष तक के बच्चों के विकास मापदंडों को मापने में असमर्थ रहे हैं। 

आंगनवाड़ी 

  • आंगनवाड़ी राज्यों अथवा केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा कार्यान्वित एक केंद्र प्रायोजित योजना है जो भारत में ग्रामीण बच्चों और मातृ देखभाल केंद्र के रूप में कार्य करती है।
  • एक कार्यक्रम के तौर पर इसकी शुरुआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 1975 में बाल कुपोषण की समस्या से निपटने के लिये की गई थी।
  • सुझाव
    • ‘राइट टू फूड कैंपेन’ ने आंगनवाड़ियों के माध्यम से बच्चों को दिये जाने वाले खाद्य पैकेज में बदलाव की भी मांग की है, साथ ही इनसे कुपोषण और भूख के प्रति संवेदनशील बच्चों की सुरक्षा के लिये महामारी के दौरान पके हुए भोजन और सूखे राशन जैसे- अनाज, दाल, तेल और अंडे सहित एक व्यापक पैकेज प्रदान करने की सिफारिश की है।
    • इसके साथ ही आशा (ASHAs) और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं जैसे फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं के लिये कोरोना वायरस (COVID-19) संबंधी सुरक्षा उपकरणों की भी मांग की है।
    • इसके अलावा बीते माह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनिसेफ (UNICEF), विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के शीर्ष अधिकारियों ने इस समस्या से निपटने के लिये पोषण तक पहुँच सुनिश्चित करने, मातृ और बाल पोषण में निवेश को बढ़ाने और कुपोषण की जल्द पहचान सुनिश्चित करने के प्रयासों में तेज़ी लाने पर ज़ोर दिया था।

स्रोत: द हिंदू