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बौद्ध और जैन धर्म में नैतिकता | 19 Sep 2019 | एथिक्स

बौद्ध धर्म में नैतिकता (Ethics in Buddhism) -

बौद्ध धर्म में धर्माचरण

जीवन के लिये तीन आवश्यक बातें

पंचशील(Pancasila)

बौद्ध धर्म आपसी विश्वास और सम्मान के साथ समाज में रहने के लिये स्वेच्छा से पांच उपदेशों को अपनाने हेतु आमंत्रित करता है। ये हैं:

दस विधर्मी कर्म

लोगों को सलाह दी जाती है कि वे लालच, घृणा, और कपट से दूर रहें क्योंकि इससे दूसरों को पीड़ा पहुँचेगी।

इन दस कामों को तीन सेटों में बाँटा गया है:

1. शारीरिक क्रियाएँ : शारीरिक क्रिया जैसे- जीवित प्राणियों की हत्या, चोरी करना और अनैतिक संभोग।

2. मौखिक क्रियाएँ: झूठ बोलना, निंदा करना, कठोर भाषण, और व्यर्थ की बातें करना।

3. मानसिक क्रियाएँ: लोभ या इच्छा, विशेष रूप से दूसरों से संबंधित चीजों की, वैमनस्य , गलत विचार।

जैन धर्म में नैतिकता (Ethics in Jainism)

मोक्ष की प्राप्ति के लिये जैन धर्म त्रिरत्न (तीन रत्नों) के रूप में जाना जाने वाला मार्ग प्रदान करता है :

  1. सही विश्वास (सम्यक दर्शन),
  2. सही ज्ञान (सम्यक ज्ञान),
  3. सही आचरण (सम्यक चरित्र)

इस प्रकार मोक्ष की प्रक्रिया इन तीनों तत्त्वों के समन्वय पर टिकी हुई है

पंच-महाव्रत (Pancha-mahavratas)

सामान्य तौर पर जैन नैतिकता में पंच-महाव्रतों का पालन करना आवश्यक होता है जो कि सही आचरण के तत्त्व हैं।

अहिंसा - इसका अर्थ है- मन, वचन, कर्म से किसी को भी कष्ट न पहुँचाना।

सत्य - असत्य से संयम अर्थात मन, वचन, कर्म से असत्य का त्याग कर देना।

यदि जीवन खतरे में हो तो भी व्यक्ति को सच बताने में संकोच नहीं करना चाहिये।

लेकिन यदि सत्य का परिणाम दूसरों को नुकसान पहुँचाता है, तो ऐसे मामले में झूठ बोला जा सकता है।

अस्तेय - चोरी करने से संयम।

चोरी के विभिन्न आयाम हैं जैसे - दूसरों की संपत्ति चुराना, दूसरों को चोरी करने के लिये निर्देशित करना, चोरी की संपत्ति प्राप्त करना।

ब्रह्मचर्य - कामुक और आकस्मिक सुखों से संयम।

अपरिग्रह - इसका अर्थ है किसी भी प्रकार के साधनों का संग्रह न करना।