भारतीय महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता | 07 Jan 2020

संदर्भ:

हाल ही में “लोकनीती CSDS (Centre for Study of Developing Societies) और कोनराड एडेनॉयर स्टिफटंग (Konrad Adenauer Stiftung)” ने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की, जिसमें भारतीय महिलाओं और उनकी राजनीतिक सक्रियता से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन किया गया।

सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी:

  • सर्वेक्षण में पाया गया कि महिलाओं की चुनावी भागीदारी में उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति का विशेष प्रभाव होता है। उच्च सामाजिक वर्ग (जाति) व आर्थिक वर्गों की महिलाओं में राजनीतिक भागीदारी अधिक पाई गई, जबकि निम्न सामाजिक-आर्थिक तबके की महिलाओं में यह भागीदारी अत्यधिक कम थी।
  • हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में चुनावों में मतदाता के रूप में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। अनेक राज्यों में हुए विभिन्न चुनावों में महिलाएँ पुरुषों के समान मतदान कर रही हैं, जबकि कई स्थानों पर वे पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान कर रही हैं।
  • इसके अलावा महिलाएँ अपनी राजनैतिक पसंद को लेकर भी स्वायत्त हो रही हैं किंतु यह प्रचलन भी शहरी क्षेत्र की तथा शिक्षित महिलाओं में अधिक देखा गया।

राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व:

  • इस सर्वेक्षण के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में पुरुषों का वर्चस्व मुख्य बाधकों में से एक है। 50 वर्ष से अधिक उम्र की दो-तिहाई महिलाओं का मानना है कि पुरुषों के राजनीतिक वर्चस्व के कारण महिलाओं को राजनीति में अवसर नहीं मिलता, जबकि 20-25 वर्ष की आधी महिलाओं की राय इसके विपरीत है।
  • इसके अलावा अधिकांश महिलाओं का मानना है कि भारतीय मतदाता महिलाओं की तुलना में पुरुष उम्मीदवारों के पक्ष में अधिक मत देते हैं।
  • राजनीतिक अवसरों में किसी चुनाव लड़ना, राजनीतिक दल का टिकट मिलना तथा चुनाव जीतने की प्रायिकता आदि को शामिल किया गया है।

सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि:

  • सर्वेक्षण के माध्यम से यह पता चला कि किसी महिला के लिये राजनीति में भाग लेने के लिये उसकी पृष्ठभूमि महत्त्वपूर्ण है। अधिकांश महिलाओं ने यह माना कि ऊँची जाति की महिलाओं के लिये राजनीति में हिस्सा लेना आसान है, जबकि निम्न जाति की महिलाओं के लिये यह तुलनात्मक रूप से कठिन है।
  • इसके अलावा राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली महिला के लिये किसी गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली महिला की तुलना में राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना आसान है।

घरेलू स्तर पर राजनीतिक निर्णयन में पितृसत्ता का प्रभाव:

  • अधिकांश महिलाओं का मानना है कि घरों में राजनीतिक निर्णय लेने में उन्हें कम स्वायत्तता प्राप्त होती है। इसका मुख्य कारण पितृसत्तात्मक समाज तथा रूढ़िवादी सामाजिक ढाँचा है।

राजनीतिक समाचारों में रुचि:

  • इस सर्वेक्षण द्वारा यह पाया गया कि 71% महिलाओं ने विभिन्न माध्यमों से राजनीतिक समाचारों को पढ़ने में रुचि प्रदर्शित की। ये माध्यम मीडिया, न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप आदि हो सकते हैं।
  • समाचारों में रुचि भी महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुसार प्रभावित होती है। उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग की महिलाओं में यह प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है।
  • इसके अलावा कम उम्र की कॉलेज में पढ़ने वाली, अविवाहित तथा शहरी महिलाओं में राजनीतिक समाचारों के प्रति रुचि अधिक होती है।

सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक भागीदारी:

  • सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीति में भागीदारी करने के मामले में महिलाओं की संख्या काफी कम है।
  • सर्वेक्षण में केवल 17% महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे किसी भी प्रकार से सोशल मीडिया पर राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, जबकि 83% महिलाओं ने कहा कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक रूप से बिल्कुल सक्रिय नहीं हैं।

राजनीतिक भागीदारी में महिलाओं की स्वायत्तता:

  • हालाँकि विगत कुछ वर्षों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि हुई है लेकिन सर्वेक्षण में लगभग 66% महिलाओं ने कहा कि वे राजनीतिक निर्णय लेने के मामले में अभी भी स्वायत्त नहीं हैं।

राजनीति में महिलाओं की कम भागीदारी के निम्नलिखित कारण हैं:

पितृसत्तात्मक समाज:

  • राजनीति में महिलाओं की कम भागीदारी के मुख्य कारणों में पितृसत्तात्मक समाज तथा इसकी संरचनात्मक कमियाँ हैं। इसकी वजह से महिलाओं को कम अवसर मिलते हैं तथा वे राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में पुरुषों से काफी पीछे रह जाती हैं।
  • लगभग एक-तिहाई महिलाओं ने पितृसत्तात्मक समाज को उनकी राजनीतिक भागीदारी में बाधा के रूप में देखा।

घरेलू जिम्मेदारियाँ:

  • सर्वेक्षण में अधिकांश महिलाओं ने स्वीकार किया कि घरेलू ज़िम्मेदारियाँ जैसे- बच्चों की देखभाल, घर के सदस्यों के लिये खाना बनाना व अन्य पारिवारिक कारणों से वे राजनीति में भाग नहीं ले पातीं।
  • लगभग 13% महिलाओं ने राजनीति में उनकी कम भागीदारी के लिये घरेलू ज़िम्मेदारियों को कारण माना।

व्यक्तिगत कारण:

  • कई महिलाएँ व्यक्तिगत कारणों की वजह से भी राजनीति में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेतीं। ये व्यक्तिगत कारण हैं- राजनीति में रुचि न होना, जागरुकता का अभाव, शैक्षिक पिछड़ापन आदि।
  • लगभग 10% महिलाएँ व्यक्तिगत कारणों से राजनीति में हिस्सा लेने में सक्षम नहीं हैं।

सांस्कृतिक प्रतिबंध एवं रूढ़िवाद:

  • सांस्कृतिक मानदंडों तथा रूढ़िवादिता के कारण भी महिलाएँ राजनीति में भाग नहीं ले पातीं। सांस्कृतिक प्रतिबंधों में पर्दा प्रथा, किसी अन्य पुरुष से बातचीत न करना, महिलाओं का बाहर न निकलना आदि शामिल हैं।
  • लगभग 7% महिलाओं ने माना की सांस्कृतिक कारणों से वे राजनीति में भाग नहीं लेतीं।

सामाजिक-आर्थिक कारण:

  • कमज़ोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में अवरोध उत्पन्न करते हैं।

राजनीति की नकारात्मक छवि:

  • आम लोगों में राजनीति की नकारात्मक छवि तथा इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से भी महिलाएँ राजनीति में कम रूचि लेती हैं।

महिलाओं को लेकर राजनीतिक दलों की उदासीनता:

  • राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर देश के राजनीतिक दलों तथा सरकारों ने उदासीनता प्रदर्शित की है।
  • प्रस्तावित महिला आरक्षण विधेयक (Women Reservation Bill), जो कि संसद तथा राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करता है, को पारित करने में सभी राजनैतिक दल निरुत्साहित प्रतीत होते हैं। \
  • इसका मुख्य कारण यह है कि पुरुष राजनीतिज्ञों को इस बात का भय रहता है कि महिलाओं के निर्वाचन से उनके दोबारा चुने जाने की संभावना कम या समाप्त हो सकती है जिसके लिये वे तैयार नहीं हैं।

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हेतु आवश्यक उपाय:

संसद में महिलाओं के लिये आरक्षण:

  • हालाँकि भारतीय संविधान में 73वें और 74वें संशोधन द्वारा महिलाओं के लिये स्थानीय निकाय की एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है लेकिन राजनीति में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये अन्य प्रयास किये जाने की भी आवश्यकता है।
  • महिलाओं को लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में 33% आरक्षण प्रदान करने संबंधी महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल पुरःस्थापित एवं पारित किये जाने की आवश्यकता है।

राजनीतिक दलों में महिलाओं के लिये आरक्षण:

  • यद्यपि यह कदम महिला सांसदों की संख्या में वृद्धि के संबंध में कोई ठोस आश्वासन प्रदान नहीं करता है किंतु राजनीति में महिलाओं की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करने के लिये यह ठोस कदम हो सकता है।
  • विश्व के कई देशों में यह प्रावधान किया गया है जैसे- स्वीडन, नॉर्वे, कनाडा, ग्रेट ब्रिटेन और फ्राँस आदि।

महिलाओं के सर्वांगीण विकास हेतु माहौल प्रदान करना:

  • राजनीति व अन्य विविध क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये आवश्यक है कि समाज में प्रत्येक स्तर पर महिला सशक्तीकरण तथा उनकी सामुदायिक भागीदारी के लिये प्रयास किये जाएँ ताकि उनमें आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता आदि गुणों का विकास हो।