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भारत के जनजातीय समुदायों पर शाशा समिति | 03 Jul 2019 | सामाजिक न्याय

भारत राज्य के लिये यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि समाज के सभी वर्ग देश की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि में हिस्सेदारी करें। यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से, विशेष रूप से जनजातीय (जनजातीय) समुदायों को, पिछले छह दशकों में कार्यान्वित विकास परियोजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिला है बल्कि इस अवधि के दौरान कार्यान्वित विकास परियोजनाओं का उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

परिचय

अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes-ST)

राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास

अनुसूचित जनजातियों और विभिन्न समितियों को परिभाषित करना

अध्ययन और विश्लेषण

पाँच महत्त्वपूर्ण मुद्दों: (1) आजीविका व रोज़गार, (2) शिक्षा, (3) स्वास्थ्य, (4) अनैच्छिक विस्थापन और प्रवासन, और (5) विधिक एवं संवैधानिक मामलों का अध्ययन शाशा समिति द्वारा किया गया है।

इन पाँच मुद्दों में से, पहले तीन मुद्दे ऐसे विषयों से संबंधित हैं जो जनजातियों के लिये उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के विकास एजेंडे के मूल में रहे हैं: आजीविका व रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य।

अन्य अवलोकन

अपर्याप्त संसाधन आवंटन, अप्रभावी कार्यान्वयन या जनजातीय परंपराओं की चिंताओं से परे, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विकास के वृहत् प्रश्न से संलग्न होना अधिक आवश्यक समझा गया।

इन निराशाजनक स्थितियों ने जनजातीय क्षेत्रों में वामपंथी अतिवाद (Left-Wing Extremism) के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया है।

वामपंथी अतिवाद (LWE)

समिति ने विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मापदंडों के आधार पर विषयगत खंड तैयार किये:

1. भौगोलिक और जनसांख्यिकीय ढाँचा

2. जनजाति: कानूनी और प्रशासनिक ढाँचा

अनुसूचित क्षेत्र

पाँचवीं अनुसूची

भारतीय संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची के बीच अंतर

छठी अनुसूची

स्वायत्त ज़िला परिषद:-

राज्य विधायी और प्रशासनिक संरचना
अरुणाचल प्रदेश अनुच्छेद 371H. कोई स्वायत्त परिषद, पंचायती राज संस्थाएँ मौजूद नहीं।
असम छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371B. तीन स्वायत्त परिषद विद्यमान।
मणिपुर अनुच्छेद 371C, मणिपुर पहाड़ी ग्राम प्राधिकार अधिनियम और मणिपुर पहाड़ी क्षेत्र ज़िला परिषद।
मिज़ोरम छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371G. तीन स्वायत्त परिषद विद्यमान।

विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियाँ

विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs)

3. आजीविका और रोज़गार की स्थिति

अनुशंसाएँ

4. शिक्षा

'गुणवत्तायुक्त' शिक्षकों की कमी: RTE अधिनियम के तहत निर्धारित पात्रता मानदंड को पूरा करने वाले शिक्षकों की कमी भी जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा के अधिकार की पूर्ति में एक बाधा है। प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण जनजातीय छात्रों की उपलब्धि का स्तर कम रहता है।

जनजातीय छात्रों के लिये भाषायी बाधाएँ: भारत में अधिकांश जनजातीय समुदायों की अपनी मातृभाषा है, लेकिन अधिकांश राज्यों में, कक्षा शिक्षण के लिये आधिकारिक/क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग किया जाता है, जिन्हें प्राथमिक स्तर पर जनजातीय बच्चे नहीं समझ पाते।

घुमंतू जनजातियों की शिक्षा: घुमंतू जनजातियाँ मौसम, व्यवसायों और आजीविका के अवसरों के आधार पर लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गमन करती रहती हैं। इस कारण इस समुदाय के बच्चे प्राथमिक स्तर की स्कूली शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

अनुशंसाएँ

5. स्वास्थ्य

अनुशंसाएँ

राज्य स्तर पर जनजातीय सलाहकार परिषद: इन परिषदों के पास जनजातीय स्वास्थ्य परिषदों द्वारा तैयार की गई स्वास्थ्य योजनाओं को मंज़ूरी देने और कार्य निष्पादन की समीक्षा करने की शक्ति हो।

6. भूमि हस्तांतरण, विस्थापन और बाध्य प्रवासन

जनजातीय भूमि हस्तांतरण के तरीके:

अनुशंसाएँ

7. विधिक और संवैधानिक मुद्दे

वन अधिकार अधिनियम, 2006

पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996

जनजातीय क्षेत्रों में आपराधिक कानून का अनुपालन

सलवा जुडूम

नियामगिरी का अनुभव

प्रवासन और शोषणकारी श्रम के मामले

अनुशंसाएँ

8. सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं का वितरण

भारत में योजना प्रक्रिया ने अपनी स्थापना के समय से ही अनुसूचित जनजातियों सहित वंचित समुदायों को शामिल करने पर जोर दिया है। प्रारंभ में इसने अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिये पर्याप्त संसाधनों को निर्देशित करने के साथ-साथ वस्तुओं और सेवाओं के वितरण के लिये संस्थानों और तंत्रों की स्थापना पर ध्यान केंद्रित किया।

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