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CBD की छठी राष्ट्रीय रिपोर्ट | 10 Apr 2019 | विविध

परिचय

राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य

कई राज्यों के अपने राज्य जैव विविधता एक्शन प्लान्स (SBAPs) हैं, जिन्हें NBTs की मदद से लागू किया जा रहा है।

NBT- 1

वर्ष 2020 तक जनसंख्या के एक बड़े हिस्से, विशेष तौर पर युवाओं, को जैव विविधता के महत्त्व, इसके संरक्षण एवं सतत् उपयोग के प्रति जागरूक करना।

NBT-1 से संबंधित अभिसमय:

  1. जैव विविधता पर अभिसमय (CBD), 1993
  2. के प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS), 1983
  3. वन्यजीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES), 1975
  4. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  5. वनस्पति संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय (IPPC), 1952
  6. खाद्य और कृषि के लिये पादप आनुवंशिक संसाधन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ITPGRFA), 2004
  7. मरुस्थलीकरण को रोकने हेतु संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD), 1996
  8. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC), 1994

यह आइची लक्ष्य संख्या 1 (जैव विविधता मूल्यों के प्रति जागरूकता) को समाहित करता है।

NBT- 2

वर्ष 2020 तक राष्ट्रीय एवं राज्य योजनाओं, विकास कार्यक्रमों तथा गरीबी उन्मूलन से जुडी योजनाओं को जैव विविधता के मूल्यों के साथ एकीकृत करना।

NBT-2 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  3. ITPGRFA, 2004
  4. UNFCCC, 1994
  5. UNFF, 2000

यह आइची लक्ष्य संख्या 2 (जैव विविधता मूल्यों का एकीकरण) को समाहित करता है।

NBT- 3

वर्ष 2020 तक पर्यावरणीय अमलीकरण और मानव कल्याण के लिये सभी प्राकृतिक आवासों के क्षरण, विखंडन और हानि की दर को कम करने के लिये रणनीति को अंतिम रूप देना।

NBT-3 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  3. UNFCCD, 1996
  4. समुद्री क़ानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS), 1994
  5. संयुक्त राष्ट्र फोरम ऑन फॉरेस्ट (UNFF), 2000
  6. UNFCCC, 1994

यह आइची लक्ष्य संख्या 5 (आवासों का विखंडन),15 (पारिस्थितिकी तंत्र का लचीलापन) और SDG 6, 7, 11, 13, 14 तथा 15 को समाहित करता है।

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NBT- 4

वर्ष 2020 तक आक्रामक विदेशी प्रजातियों एवं उनके आने के मार्गों की पहचान कर प्राथमिकता वाले आक्रामक विदेशी प्रजातियों की आबादी को प्रबंधित करने के लिये रणनीति तैयार करना।

NBT-4 से संबंधित अभिसमय:

  1. CMS, 1983
  2. CITES, 1975
  3. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  4. IPPC, 1952
  5. UNCLOS, 1994
  6. UNFCCC, 1994
  7. सैनेटरी और फाइटोसैनेटरी (Phytosanitary) उपायों के उपयोग पर समझौता, 1995
  8. द इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द कंट्रोल एंड मैनेजमेंट ऑफ शिप्स बैलास्ट वाटर एंड सेडिमेंट्स (BWM कन्वेंशन), ​​2004

यह आइची लक्ष्य संख्या 14 (आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ) एवं SDG 15 को समाहित करता है।

NBT- 5

वर्ष 2020 तक कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन के सतत्प्रबंधन के लिये उपाय अपनाए जाने हैं।

NBT-5 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. IPPC, 1952
  3. ITPGRFA, 2004
  4. UNCCD, 1996
  5. UNCLOS, 1994
  6. UNFF, 2000
  7. UNFCCC, 1994

यह आइची लक्ष्य संख्या 6 (सतत् मत्स्य पालन), 7 (स्थायी या सतत् प्रबंधन के तहत क्षेत्र) एवं 8 (प्रदूषण को न्यूनतम करना) को समाहित करता है।

NBT- 6

पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण भूमि, जल, तटीय एवं समुद्री क्षेत्र (विशेष तौर पर वे क्षेत्र जो किसी खास प्रजाति के लिये महत्त्वपूर्ण हैं) को समान और प्रभावी रूप से संरक्षित क्षेत्र, प्रबंधन और अन्य आधारों पर संरक्षित किया जा रहा है। 2020 तक व्यापक परिदृश्य और समुद्री क्षेत्रों को एकीकृत करते हुए देश के भौगोलिक क्षेत्र का 20% से अधिक भाग इसके अंतर्गत शामिल कर लिया जाएगा।

NBT-6 से संबंधित अभिसमय:

  1. CMS, 1983
  2. CITES, 1975
  3. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  4. खाद्य और कृषि के लिये प्लांट जेनेटिक रिसोर्स पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ITPGRFA), 2004
  5. विश्व धरोहर सम्मेलन, 1977
  6. UNFF, 2000
  7. CBD, 1993

यह आइची लक्ष्य संख्या 10 (सुभेद्य पारिस्थितिकी तंत्र), 11 (संरक्षित क्षेत्र), 12 (प्रजातियों को विलुप्त होने से रोकना) एवं SDG 6, 11, 14 और 15 की उपलब्धि में योगदान देता है।

NBT- 7

कृषि, कृषि में उपयोग होने वाले पशुधन, वनों में पाई जाने वाली इनकी प्रजातियाँ साथ ही अन्य सभी प्रजितियाँ, जो सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण हैं, की आनुवंशिक विविधता को बनाए रखा गया है। आनुवंशिक क्षरण को कम करने के लिये आनुवंशिक विविधता को संरक्षित करने हेतु रणनीतियाँ बनाई और लागू की गई हैं।

NBT-7 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. IPPC, 1952
  3. ITPGRFA, 2004
  4. आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और उनके उपयोग से होने वाले लाभों का उचित तथा न्यायसंगत साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल, 2014

यह आइची लक्ष्य संख्या 13 (कृषि जैव विविधता के माध्यम से आनुवंशिक विविधता को बनाए रखना) एवं SDG 2 और 3 का समर्थन करता है।

NBT- 8

वर्ष 2020 तक जल, मानव स्वास्थ्य, आजीविका और कल्याण से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं की गणना की जा रही है तथा उन्हें सुरक्षित करने के उपायों की पहचान महिलाओं और स्थानीय समुदायों, विशेषकर निर्धन और सुभेद्य वर्ग की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए की जा रही है।

यह आइची लक्ष्य संख्या 14 (आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को सुरक्षित रखना) एवं एसडीजी 3, 4, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 14 और 15 की आवश्यकता को पूरा करता है।

NBT – 9

वर्ष 2015 तक नागोया प्रोटोकॉल के अनुसार आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग (GRs) तक पहुँच और इसके उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बँटवारा हेतु संगत राष्ट्रीय कानून।

NBT-9 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और इनके उपयोग से होने वाले लाभों का उचित तथा न्यायसंगत साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल, 2014

1. यह आइची लक्ष्य संख्या 16 (आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और उनके उपयोग से होने वाले लाभों का उचित तथा न्यायसंगत साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल, 2014) को समाहित करता है।

NBT- 10

वर्ष 2020 तक एक प्रभावी भागीदारी तथा अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता योजना को शासन के विभिन्न स्तरों पर संचालित किया जाना है।

NBT-10 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. CMS, 1983
  3. CITES, 1975
  4. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के वेटलैंड्स पर अभिसमय, विशेष रूप से जलपक्षी आवास (रामसर कन्वेंशन), ​​1975
  5. IPPC, 1952
  6. ITPGRFA, 2004
  7. अनवरत कार्बनिक प्रदूषकों (Persistent Organic Pollutants-POPs) पर स्टॉकहोम सम्मेलन, 2004
  8. UNCCD, 1996
  9. UNFF, 2000
  10. UNFCCC, 1994
  11. विश्व विरासत सम्मेलन (WHC), 1977

यह आइची लक्ष्य संख्या 3 (प्रोत्साहन), 4 (प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग), 17 (NBSAPs) को समाहित करता है।

NBT - 11

वर्ष 2020 तक राष्ट्रीय विधानों एवं अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के तहत जैव विविधता से संबंधित समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का उपयोग कर राष्ट्रीय पहलों को मज़बूत किया जा रहा है ताकि इस ज्ञान को संरक्षित किया जा सके।

NBT-11 से संबंधित अभिसमय:

  1. CBD, 1993
  2. IPPC, 1952
  3. WHC, 1977
  4. विश्व बौद्धिक संपदा अधिकार संगठन (WIPO) सम्मेलन (1967)

यह आइची लक्ष्य संख्या 18 (पारंपरिक ज्ञान) एवं SDG 6, 9, 11, 12 और 14 से संबंधित है।

NBT- 12

वर्ष 2020, जैव विविधता 2011-2020 के लिये रणनीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुगम बनाने हेतु वित्तीय, मानव और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने का अवसर है तथा राष्ट्रीय लक्ष्यों की पहचान की जा रही है एवं संसाधन जुटाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

यह आइची लक्ष्य संख्या 20 (संसाधन जुटाना) से संबंधित है।

कार्यान्वयन के उपाय, उनकी प्रभावशीलता और बाधाएँ

NBT -1

मुख्य उपाय:

A. प्रमुख नीतियों, कानूनी एवं कार्यक्रम के उपायों में शामिल हैं:

  1. जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अनुसार सरकार जैव विविधता के संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिये अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं सार्वजनिक शिक्षा को प्रोत्साहित करती है।
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 पर्यावरण संरक्षण के लिये व्यक्तिगत व्यवहार में सामंजस्य बढ़ाने के महत्त्व पर ज़ोर देती है।
  3. राष्ट्रीय युवा नीति, 2014 पर्यावरण संरक्षण सहित विभिन्न पहलों में युवाओं की भागीदारी का आह्वान करती है।
  4. शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति, 1986 (1992 में संशोधित) में कहा गया है कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता के विषय को स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षण में शामिल करना चाहिये।
  5. राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों को अपना CEPA (Communication, Education & Public Awareness) कार्यक्रम लागू करना चाहिये।
  6. जैव विविधता के मुद्दों के बारे में समझ एवं जागरुकता बढ़ाने के लिये प्रत्येक वर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (IDB) मनाया जाता है।

B. अन्य उपाय:

CEPA के लिये एक समग्र दृष्टिकोण को विशिष्ट कार्यक्रमों / पहलों के माध्यम से अपनाया गया है।

CEPA कार्यक्रम और पहल

  1. सभी स्कूल और कॉलेज स्तरों पर पर्यावरण शिक्षा का समावेश
  2. स्कूली बच्चों के लिये सह-पाठ्यक्रम कार्यक्रम
  3. युवाओं और अन्य लोगों के लिये जागरूकता और क्षमता निर्माण कार्यक्रम
  4. उद्योग और कॉर्पोरेट क्षेत्र की पहल
  5. BMCs (जैव विविधता प्रबंधन समिति), PRI (पंचायती राज संस्थान), समुदायों और CSO के माध्यम से स्थानीय स्तर पर उपाय

B1. सभी स्कूल और कॉलेज स्तरों पर पर्यावरण शिक्षा (EE) का समावेश

B1.1 जैव विविधता संरक्षण तथा सतत् उपयोग पर्यावरण शिक्षा (EE) के अभिन्न अंग है। EE को पूरे देश में शिक्षा के सभी स्तरों पर पाठ्यक्रमो में अनिवार्य घटक बनाया गया है।

B1.2 विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षकों और संकायों की क्षमता निर्माण किया जा रहा है। EE के संचालन के लिये शिक्षा-विषयक उपकरण पेशेवर रूप से बनाए गए हैं।

B2. स्कूली बच्चों के लिये सह-पाठयक्रम कार्यक्रम

B3. युवाओं और अन्य लोगों के लिये जागरूकता एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम

B3.1 जागरूकता और क्षमता निर्माण: जागरूकता और क्षमता निर्माण के लिये की गई पहल

  1. UNDP-GEF-ABS क्षमता निर्माण परियोजना
  2. UNEP-GEF-MoEFCC-ABS परियोजना
  3. GIZ ने ABS साझेदारी प्रोजेक्ट का समर्थन किया
  4. GEF UNDP सुरक्षित हिमालय परियोजना
  5. GEF UNDP लघु अनुदान कार्यक्रम
  6. आसियान इंडिया ग्रीन फंड
  7. सीमा पार परियोजना
  8. क्षेत्रीय पहल

CEPA ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई करने हेतु जागरूकता निर्माण एवं क्षमता पैदा करने के लिये एक प्रभावी उपकरण साबित हुआ है। आवास, वनस्पतियों और जीवों की प्रजातियों की पहचान, रक्षा एवं संरक्षण के कार्य कई बार लोगों द्वारा दूसरों की प्रेरणा के माध्यम से किया जाता हैं परंतु अक्सर यह कार्य स्व-प्रेरणा द्वारा भी किया जाता है।

कुछ सैंपल केस स्टडी यहाँ दिये जा रहे हैं।

असम के दादरा, पचरिया और सिंगिमारी गाँवों में प्रत्येक में पाँच सदस्यों वाले चौदह स्व-सहायता समूह शामिल हैं, जिन्होंने आमतौर पर Greater Adututant Stork के खिलाफ प्रतिकूल व्यवहार को रोकने एवं बदलने के लिये 70 महिलाओं की हरगिला सेना के रूप में खुद को तैयार किया तथा IUCN की लाल सूची में सूचीबद्ध इस पक्षी को उनके गाँवों से गायब होने से बचाया, जो कि इन पक्षियों का एक महत्त्वपूर्ण निवास स्थान हुआ करता था। यह सब CEPA के प्रभावी उपयोग के साथ एक महिला पक्षी शोधकर्त्ता द्वारा शुरू किया गया, जो इन गाँवों में ग्रेटर एडजुटैंट निवास स्थान को बचाने के लिये दृढ़-संकल्प थी। एक बार इस कार्य के लिये प्रेरित होने के बाद इन महिलाओं ने अपने बच्चों एवं अपने घरों तथा आसपास के अन्य सदस्यों को इसमें शामिल करके ग्रेटर एडजुटैंट के लिये समर्थन के आधार को व्यापक किया। महिलाओं द्वारा लगातार किये जा रहे प्रयास ने प्रशासन, पुलिस, वन, स्वास्थ्य और राज्य चिड़ियाघर प्राधिकरण आदि विभागों के साथ-साथ ज़िला अधिकारियों का समर्थन भी प्राप्त किया तथा प्रत्येक ने समन्वित तरीके से इस "ग्रेटर एडजुटैंट बचाओ" लक्ष्य में योगदान दिया।

महत्त्वपूर्ण परिणामों में से एक सभी कदंब पेड़ों (नियोल्मरकेडिया कैदम्बा) का बचाव करना भी शामिल है जो ग्रेटर एडजुटैंट स्टॉर्क के निवास स्थान के रूप में कार्य करते हैं। इनकी संख्या 2008 में 28 थी जो 2015 में बढ़कर 143 हो गई है। असम राज्य चिड़ियाघर के सहयोग से घायल पक्षियों के बचाव तथा पुनर्वास प्रणाली की स्थापना की गई, इसके तहत 14 स्वयं सहायता समूहों के बीच 28 हथकरघा वितरित किये गए हैं। इसके अतिरिक्त यह समुदाय के लिये वैकल्पिक आजीविका विकल्पों हेत्तु कार्यक्रम के रूप में भी शुरू किया गया है। इसके तहत महिलाओं के लिये फैशन और वस्त्र डिज़ाइनिंग डिप्लोमा कोर्स (विशेष तौर पर ग्रेटर एडजुटैंट सारस की डिज़ाइन में) की शुरुआत की गई हैं। पक्षीयों के संरक्षण के लिये 10,000 से अधिक लोग आगे आए।

रुडयार्ड किपलिंग के उपन्यास 'जंगल बुक ’के एक काल्पनिक चरित्र मोगली के नाम पर इस उत्सव को मध्य प्रदेश राज्य द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है, जो स्कूली बच्चों को जैव विविधता से संबंधित मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाता है। SBB ने राज्य में चार राष्ट्रीय उद्यानों- कान्हा नेशनल पार्क, माधव नेशनल पार्क, बांधवगढ़ नेशनल पार्क और सतपुड़ा नेशनल पार्क में 2017 में महोत्सव का आयोजन किया तथा बच्चों को पार्क सफारी, निवास स्थान की खोज, प्रश्नोत्तरी गतिविधि, पेंटिंग प्रतियोगिताओं, बैनर, नाटकों एवं अन्य रोमांच केघटनाओं पर संदेश लेखन जैसी गतिविधियों की ओर प्रोत्साहित किया। 2017 में आयोजित उत्सव में लगभग 300 छात्रों और 100 से अधिक शिक्षकों ने भाग लिया। प्रत्येक वर्ष उत्सव में होने वाले कार्यक्रमों के विजेताओं को प्रमाण पत्र और पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं। यह जैव विविधता के मूल्यों के बारे में जागरूक करने और उन्हें संरक्षण देने के कार्य हेतु हितधारकों के रूप में युवाओं तक पहुँच बनाने का एक प्रभावी साधन साबित होता है।

NBT-2

A. मुख्य नीतियों और विधायी उपायों में शामिल हैं:

  1. राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य-योजना (NBSAP) जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिये परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों के पूर्व मूल्यांकन को एक अभिन्न अंग बनाने का प्रावधान करती है।
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (NEP), 2006 जैव विविधता संसाधनों को महत्त्व देते हुए लागत-लाभ विश्लेषण के माध्यम से विकासात्मक परियोजना के मूल्यांकन की मांग करती है तथा अतुलनीय मूल्यों वाली संस्थाओं के रूप में हॉटस्पॉट्स एवं जैव विविधता विरासत स्थलों पर विचार करने पर बल देती है।
  3. जैव विविधता अधिनियम, 2002 जैव विविधता के महत्त्व को मान्यता देता है तथा इसका उद्देश्य जैव विविधता के संरक्षण एवं सतत् उपयोग को सुनिश्चित करना है।
  4. राष्ट्रीय वन नीति, 1988 यह निर्धारित करती है कि ऐसी परियोजनाएँ, जिनमें वन भूमि का परिवर्तन गैर-वन भूमि में करना हो, लागू करने पर पुन: वनीकरण करने के लिये निवेश कोष से राशि प्रदान करनी होगी, साथ ही अन्य विकल्प अपनाने होंगे।
  5. राष्ट्रीय वन नीति 1988, वन संरक्षण अधिनियम 1980, वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत जारी किये गए नियम और दिशानिर्देश किसी भी उद्देश्य के लिये परिवर्तित किये गए वन क्षेत्र के बराबर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण के लिये शुद्ध वर्तमान मूल्य निधियों की प्राप्ति के लिये अधिकृत करती हैं।

B. अन्य उपाय:

  1. पारिस्थितिकी तंत्र के मूल्यांकन पर पारिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता अर्थशास्त्र (TEEB) भारत पहल (TII) परियोजना का कार्यान्वयन विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के संस्थानों तथा विशेषज्ञों के सहयोग से MoEFCC द्वारा किया गया है।
  2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), हर खेत को पानी, जनजातीय उत्पादों का बाज़ार विकास / उत्पादन (TRIFED), कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिये अटल मिशन (AMRUT), गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम जैसे-MGNREGA तथा अन्य प्रासंगिक कार्यक्रमों की रणनीतियों की योजना और डिज़ाइनिंग में जैव विविधता मूल्यों पर विचार करना शामिल है।
  3. नीतियों का अंतिम उद्देश्य सौर ऊर्जा को जीवाश्म ऊर्जा के प्रतिस्पर्द्धी रूप में स्थापित करना है, जैसे:

1. विशेष सौर पार्कों की स्थापना करना तथा सौर परियोजनाओं को आधारभूत संरचना का दर्जा देना।
2. हरित ऊर्जा गलियारा परियोजना के माध्यम से बिजली पारेषण नेटवर्क का विकास।
3. राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति।
4. रूफटॉप परियोजनाओं के लिये बड़े सरकारी परिसरों / भवनों की पहचान।
5. लक्ष्य प्राप्त करने के लिये ग्रीन क्लाइमेट फंड के माध्यम से धन जुटाना।

NBT- 3:

जंगलों, कृषि एवं गैर-कृषि भूमि वाले तटीय तथा स्थलीय निवास सहित जलीय क्षेत्रों को लक्ष्य के तहत कवर किया गया है। पहले से मौजूद विधायी एवं नीति तंत्र लक्ष्य के प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये बुनियादी ढाँचा प्रदान करते हैं। अन्य विधायी, नीति और कार्यक्रमों के साथ मिलकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये रणनीतियों के डिज़ाइन और कार्यान्वयन का एक मज़बूत तंत्र बनाया गया है।

A. मुख्य उपाय

वन, जलीय और अन्य स्थलीय निवास के लिये विधायी और नीतिगत उपाय किये गए हैं।

वन पर्यावास

जलीय निवास स्थान

मरुस्थलीकरण को रोकना (Combating Desertification)

अन्य स्थलीय निवास स्थान

B. संस्थागत व्यवस्था सहित अन्य उपाय:

♦ ग्रीन इंडिया मिशन
♦ राष्ट्रीय सौर मिशन
♦ ऊर्जा दक्षता में वृद्धि पर राष्ट्रीय मिशन
♦ सतत्कृषि के लिये राष्ट्रीय मिशन
♦ स्थायी निवास पर राष्ट्रीय मिशन,
♦ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिये राष्ट्रीय मिशन
♦ जलवायु परिवर्तन के लिये रणनीतिक ज्ञान पर राष्ट्रीय मिशन
♦ राष्ट्रीय जल मिशन जैव विविधता के मूल्यों को पहचानना है तथा आवासों में हो रहे क्षय को रोकने एवं पुनर्वास करने में योगदान देन।

पर्यटन मंत्रालय द्वारा सतत् पर्यटन को बढ़ावा दिया गया:

पर्यटन मंत्रालय (MoT) द्वारा उत्तरदायी पर्यटन को बढ़ावा देने तथा प्राकृतिक आवासों को पर्यटन के किसी भी हानिकारक प्रभाव से बचाने के लिये पहल की जाती है।

मंत्रालय वार्षिक राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कारों के माध्यम से पारिस्थितिकी को बढ़ावा देने एवं ऐसे अभ्यास करने के लिये हितधारकों को प्रोत्साहित करता है जैसे कि सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण के अनुकूल होटल, सर्वोत्तम उत्तरदायी पर्यटन परियोजना, विभिन्न क्षेत्रों में टूर ऑपरेटरों द्वारा सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार।

NBT- 4

A. उपाय

नीतियाँ और उपाय जो मुख्य उपायों का समर्थन करते हैं:

B. अन्य उपाय

2009 में शुरू हुई वन प्रबंधन योजना की गहनता (Intensification of Forest Management Scheme- IFMS) में घटक के रूप में वन आक्रामक प्रजातियों का नियंत्रण और उन्मूलन शामिल है।

NBT- 5

A. स्थायी कृषि प्रबंधन के लिये मुख्य नीति और विधायी उपायों में शामिल हैं:

अन्य उपायों में शामिल हैं:

लिंग (Gender) मुख्यधारा के उपायों में शामिल हैं:

सतत् कृषि सुनिश्चित करने के लिये राष्ट्रीय मिशन (NMSA)

  1. सतत् कृषि के लिये राष्ट्रीय मिशन (NMSA), 2014
  2. राष्ट्रीय कृषि विस्तार और प्रौद्योगिकी मिशन (NMAET), 2014
  3. ऑयलसीड्स एंड ऑयल पाम के लिये राष्ट्रीय मिशन (NMOOP), 2014
  4. बागवानी के एकीकृत विकास के लिये मिशन (MIDH), 2014

निम्नलिखित उपायों द्वारा जैव कृषि के लिये समर्थन और प्रोत्साहन:

जल उपयोग तथा ऊर्जा दक्षता का वैज्ञानिक प्रबंधन:

NBT- 6

A. मुख्य उपाय:

B. अन्य उपाय:

NBT-7
A. मुख्य उपाय (नीति और विधायी):

B. अन्य उपाय:

  1. कृषि की महत्त्वपूर्ण आनुवंशिक विविधता के संरक्षण के लिये ICAR प्रणाली के तहत बनाए गए राष्ट्रीय स्तर के ब्यूरो / संगठन।
  2. जलवायु आधारित कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA) जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि का लचीलापन बढ़ाता है।
  3. नई दिल्ली के नेशनल हरबेरियम ऑफ कल्टिवेटेड प्लांट्स (NHCP) में मुख्य रूप से देशी/स्थानीय एवं जंगली मूल की फसलों के आनुवंशिक रूप से समान पौधों एवं कृषि से प्राप्त करों को संग्रहित किया जाता हैं।
  4. खाद्य, चारा, ईंधन, फाइबर, ऊर्जा और औद्योगिक उपयोग हेतु नए संयंत्र स्रोतों का पता लगाने और उनका घरेलूकरण करने के लिये संभावित फसलों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान नेटवर्क (AICRNPC)।
  5.  मेरा गाँव मेरा गौरव (My Village My Pride) वैज्ञानिकों / अधिकारियों द्वारा गाँवों को गोद लेकर और व्यक्तिगत दौरों के माध्यम से विनियमित समय-सीमा में किसानों को तकनीकी एवं अन्य संबंधित पहलुओं की जानकारी उपलब्ध कराने के लिये उनके दरवाज़े तक तकनीकी सेवाएँ प्रदान करने की एक पहल है।
  6. राष्ट्रीय गोकुल मिशन 2014 में स्वदेशी नस्लों के विकास और संरक्षण, चयनात्मक प्रजनन और गैर-विवरणीय गोजातीय आबादी के आनुवंशिक उन्नयन के लिये शुरू किया गया था। मिशन के दो घटक हैं:

1. किसानों को अधिक पारिश्रमिक देने के लिये दुग्ध उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिये गोवंश उत्पादकता पर राष्ट्रीय मिशन।
2. वैज्ञानिक एवं समग्र तरीके से स्वदेशी नस्लों के संरक्षण तथा विकास के लिये तंत्र की स्थापना करके गोवंश प्रजनन हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम।

पशु प्रजनन संरक्षण में केस स्टडीज
बारगुर मवेशियों का संरक्षण

बारगुर मवेशी मूलतः पश्चिमी तमिलनाडु में ईरोड जिले के एंथियूर तालुक के बारगुर वन पहाड़ियों में पाए जाते हैं। वे अपने धीरज और गति क्षमता के लिये जाने जाते हैं। उनकी संख्या में तेज़ी से गिरावट आ रही थी तथा अतीत में उन क्षेत्रों तक पहुँच बहुत सीमित होने के कारण उन्हें बचाने के लिये कोई उपाय नहीं किये जा सके। 2013 में इस नस्ल के बीस नर बछड़ों की खरीद की गई तथा एक संगठित झुंड में उनका पालन-पोषण किया गया और 15 बैलों का वीर्य एकत्र किया गया। अब उन क्षेत्रों में कृत्रिम गर्भाधान (AI) सेवाएँ प्रदान की जाती हैं तथा औसतन 40 से 50 कृत्रिम गर्भाधान (AI) प्रतिमाह किये जाते हैं। NBAGR के जीन बैंक में 10,000 वीर्य की खुराक संरक्षण करने की क्षमता है।

वेचुर नस्ल की गाय का संरक्षण

गाय की वेचुर नस्ल केरल की एक देशी नस्ल है, जो अपने दूध एवं घी के औषधीय महत्त्व के लिये महत्त्वपूर्ण है तथा यह लगभग 60 साल पहले एक लोकप्रिय गाय की नस्ल थी। हालाँकि, प्रजनन कार्यक्रमों के माध्यम से उच्च उत्पाद देने वाले मवेशियों को बढ़ावा देने की सरकार की नीति के कारण राज्य में इस नस्ल में गिरावट आई हैं। सुश्री सोसम्मा अय्यप (Sosamma Iype), केरल कृषि विश्वविद्यालय के एक संकाय सदस्य ने अपने छात्रों के साथ मिलकर, इस नुकसान को रोकने के लिये स्वैच्छिक कार्य प्रारंभ किया तथा वर्ष 1998 में संरक्षण प्रयासों की शुरुआत की गई। वेचुर मवेशियों को पालने वाले किसानों की पहचान की गई तथा अच्छे उत्तम बैलों का चयन करके एक प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया गया। अनुसंधान के साथ-साथ प्रजातियों के बारे में CEPA आयोजित किया गया था तथा किसानों को मवेशियों को पालने के लिये प्रेरित किया गया। इन मवेशियों में बीमारी की कम आशंका के कारण इन्हें पालना आसान है। ये धूप तथा बारिश का सामना कर सकते हैं और गोबर एवं मूत्र का उपयोग प्राकृतिक खाद के रूप में किया जाता है। समूह के कार्यों के परिणामस्वरूप 26 वर्षों में इस नस्ल की आबादी 41 से बढ़कर 3,000 तक पहुँच गई है। इससे कासरगोड एवं चेरूबली मवेशियों तथा अट्टापडी बकरी जैसी नस्लों का संरक्षण भी हुआ है।

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A. मुख्य उपाय:

मानव विकास सूचकांक के बुनियादी तत्त्व जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य, जल एवं ऊर्जा, कनेक्टिविटी एवं शहरी हरित वातावरण, आबादी, स्थानीय समुदायों और पारंपरिक चिकित्सकों का संरक्षण तथा टिकाऊ उपयोग में उनकी भूमिका को समझने एवं निर्वहन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

1. प्रमुख आजीविका कार्यक्रम:

2. शहरी हरित क्षेत्र (Greenspaces)

3. हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना

4. सड़क संपर्क

5. शिक्षा

6. स्वास्थ्य सेवाएँ

7. पीने का पानी:

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मुख्य नीति और विधायी उपायों में शामिल हैं:

B. संस्थागत तंत्र

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A. मुख्य नीति और विधायी उपायों में शामिल हैं:

B. अन्य उपाय:

♦ जैविक खेती
♦ गुणवत्ता वाले जैव उर्वरकों का उपयोग।
♦ NMSA, NMOOP, NMAET, MIDH के माध्यम से स्थायी कृषि को बढ़ावा देना।

C. स्थायी उत्पादन के लिये हितधारकों को प्रोत्साहित करने वाले उपाय:

1. उद्योग:

2. कृषि क्षेत्र:

♦ नमामि गंगे- गंगा संरक्षण, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की राष्ट्रीय योजना।
♦ सतत्समुद्री संसाधन: NETFISH 2007, एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम (ICZMP)।

♦ उपयुक्त उत्पादन तकनीकों को अपनाकर कच्चे माल की खपत के अनुकूलन तथा अपशिष्ट उत्पादन को कम करने के लिये अनुदान सहायता योजना, स्वच्छ प्रौद्योगिकी का विकास और संवर्द्धन, 1994।

♦ राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम, डेज़र्टिफिकेशन एंड लैंड डिग्रेडेशन एटलस ऑफ़ इंडिया 2016 का विकास।
♦ मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता की निगरानी।
♦ परियोजना नियोजन और डिज़ाइन के प्रारंभिक चरण में संभावित पर्यावरणीय समस्याओं / चिंताओं को दूर करने तथा उन पर ध्यान देने के लिये EIA और EMP प्रबंधन उपकरण।

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मुख्य उपाय
1. कानून और नियम

2. नीतियाँ

A. अन्य उपाय
1. एजेंसियाँ ​​और संस्थागत उपाय:

2. आयुष मंत्रालय के अंतर्गत संस्थागत तंत्र और कार्यक्रम, जो सीधे औषधीय पौधों के उपयोग से संबंधित हैं

आयुष मंत्रालय के तहत योजनाएँ

  1. औषधीय पौधों का संरक्षण, विकास और सतत्प्रबंधन योजना
  2. औषधीय पादप संरक्षण क्षेत्र
  3. राष्ट्रीय रॉ ड्रग भंडार (NRDR)

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जैव विविधता अधिनियम 2002, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 और संबंधित क्षेत्रीय नीतियाँ गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों सहित एक साथ सभी विकास योजनाओं और कार्यक्रमों में जैव विविधता की मुख्यधारा पर बल देती हैं।