महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट्स की जिस्ट

दूसरी ए.आर.सी. रिपोर्ट- विवाद सुलझाने के लिये क्षमता निर्माण | 03 Aug 2019 | शासन व्यवस्था

अध्याय 1 : परिचय

विवाद की परिभाषा दो अथवा अधिक पक्षकारों के बीच एक ऐसी स्थिति के रूप में की गई है जो अपने परिदृश्य को असंयोज्य समझते हैं। विवादों का एक नकारात्मक लाभप्रद अर्थ अभिधान है किंतु कुछ विवाद वांछनीय हैं क्योंकि उनसे परिवर्तन आता है।

सोलहवीं शताब्दी के एक कवि जॉन डोने ने लिखा था, ‘‘कोई भी व्यक्ति अपने आपमें एक द्वीप नहीं हैं।’’ व्यक्ति अपने आपको अनेक समूहों के सदस्य समझते हैं जो अपने अनेक हितों पर बल देते हैं। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति की भौगोलिक उत्पत्ति, लिंग, श्रेणी, भाषा, राजनीति, वांशिक प्रथा, व्यवसाय और सामाजिक प्रतिबद्धताएँ उसे विभिन्न समूहों का सदस्य बनाती हैं। इनमें से प्रत्येक समूह, जिससे व्यक्ति संबंधित है, उसे एक विशेष पहचान प्रदान करते हैं, किंतु सभी को मिलाकर उसकी अनेक पहचान है।

पहचान की खोज एक सशक्त मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक ताकत है जिसने मानव सभ्यता को बढ़ावा दिया है। पहचान प्राय: एक आह्वान है। यह एक भ्रम अथवा कल्पित समुदाय से संबंधित है जिसमें राजनीतिक अभिप्रेरण के लिये आवश्यक सभी शक्ति और क्षमता मौजूद है। पहचान की भावना किसी व्यक्ति के अन्यों के साथ, जैसे कि उसके पड़ोसी, उसके समुदाय के सदस्यों, साथी नागरिकों अथवा एक ही धर्म का पालन करने वाले लोगों के साथ, संबंधों में ताकत और उकसाहट पैदा करने में अपार योगदान कर सकती है और फिर भी पहचान से आघात भी पहुँच सकता है।

बहुत से मामलों में किसी एक समूह से संबंधित होने की एक मज़बूत तथा अनन्य भावना से विवाद उत्पन्न हो सकता है। आजकल अनेक विवाद एक अनूठी और पसंदहीन पहचान के भ्रम के ज़रिये बने हुए हैं। ऐसे मामलों में, घृणा पैदा करने की कला कुछ कथित प्रभावशाली पहचान की कल्पित शक्ति प्राप्त करने का रूप ले लेती है जो अन्यों पर बिल्कुल हावी हो जाती है। उपयुक्त उकसाहट के साथ, एक समूह के लोगों के साथ पहचान की एक थोपी गई भावना प्राय: अन्यों पर अत्याचार करने का एक सशक्त साधन बन जाता है तथा उसका नतीजा घृणा और हिंसा की तीव्रता समाज के ताने-बाने के लिये एक वास्तविक खतरा पैदा करती है।

अध्याय 2: विवाद समाधान-एक वैचारिक ढाँचा

संघर्ष के स्तर-एक जीवन चक्र दृष्टिकोण

कोई संघर्ष एकल घटना लक्षण नहीं है बल्कि एक गतिशील प्रक्रिया है जिसके भिन्न-भिन्न चरण हैं-

विवाद समाधान और संविधान

अध्याय 3: वाम उग्रवाद (Left Extremism)

A. वाम उग्रवाद: प्रसार और तीव्रता

वाम उग्रवाद प्रकोप, जिसे बाद में नक्सली आंदोलन के नाम से जाना जाने लगा, प. बंगाल में दार्जिलिंग ज़िले के तीन पुलिस स्टेशन इलाकों (नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा) में मार्च 1967 शुरू हुआ। आंदोलन का नक्सलबाड़ी चरण (1967-68) ने मई-जून 1967 के दौरान तेज़ी पकड़ी किंतु जुलाई-अगस्त 1967 तक उस पर नियंत्रण पा लिया गया। आजकल, वाम उग्रवाद आंदोलन एक जटिल कड़ी है जो बहुत से राज्यों में पैला है। गृह मंत्रालय के अनुसार इस समय नौ राज्यों, यथा- आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और प. बंगाल में 76 ज़िले चरमपंथी वाम उग्रवाद से प्रभावित है जिन्होंने एक लगभग सतत् नक्सल गलियारा बना लिया है।

B. आंदोलन की प्रकृति

वाम उग्रवादी आंदोलन मुख्यत: कृषि संबंधी रहा है कि इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष और कुशासन को अभिप्रेरित करना है।

C. वाम उग्रवाद के प्रसार के कारण

1. भू-संबद्ध कारक

2. विस्थापन और ज़बरदस्ती बेदखली

3. आजीविका-संबद्ध कारण

4. सामाजिक बहिष्कार

5. सरकार संबद्ध कारक

D. वाम उग्रवादी संघर्षों का समाधान- सफलताएँ और असफलताएँ

बहुत से वाम उग्रवादी आंदोलनों का, विशेष रूप से नक्सलवादी के उत्थान का, सफलतापूर्वक समाधान हो सकता है।

E. वाम उग्रवाद का प्रबंधन- राजनीतिक प्रतिमान

हिंसक वाम उग्रवाद से निपटने के लिये धरना क्षमता निर्माण

वाम उग्रवाद द्वारा उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये विभिन्न साधनों और राज्य व सिविल सोसायटी के घटकों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत है-

नक्सली उत्पात से निपटने के लिये सरकारी नीति

नक्सलियों के धन स्रोतों को समाप्त करना

सिफारिशें

अध्याय4: भू-संबद्ध मुद्दे (Land Related Issues)

यद्यपि 1950 और 1960 के दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों में भू-सुधारों के सफल कार्यान्वयन से बिचौलिये समाप्त हो गए तथा कृषि असंतोष मे काफी कमी आई, तथापि इसके फलस्वरूप मालिकों की एक नई श्रेणी का जन्म हुआ। भूमिहीन श्रमिकों और छोटे तथा सीमांत किसानों को भूमि स्वामित्व प्रदान करने में कृषि जोतों की अधिकतम सीमा तय करने से सीमित सफलता मिली।

सिफारिशें:

(i) विस्थापन को कम करना तथा विस्थापित न करने वाले अथवा कम से कम विस्थापन करने वाले विकल्पों का पता लगाना।

(ii) परियोजना प्रभावित परिवारों (Project Affected Families- PAFs) के पुनर्वास और पुन:स्थापन की योजना तैयार करना, जनजातियों और भेद्य वर्गों की विशेष ज़रूरतों सहित।

(iii) पी.ए.एफ. के लिये बेहतर रहन-सहन की व्यवस्था करना

(iv) परस्पर सहयोग के माध्यम से अपेक्षाकर्त्ता निकाय और PAFs के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध सुकर बनाना।

नई राष्ट्रीय पुनर्वास और पुनर्स्थापन (Resettlement and Rehabilitation) नीति

विशेष आर्थिक क्षेत्र

(i) अतिरिक्त आर्थिक कार्यकलाप का सृजन;

(ii) वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन;

(iii) घरेलू और विदेशी स्रोतों से निवेश को प्रोत्साहन;

(iv) रोज़गार अवसरों का सृजन;

(v) आधारिक सुविधाओं का विकास।

SEZ के संबंध में विवाद समाधान के लिये प्रशासनिक व्यवस्था

भू-अभिलेख के संदर्भ में सिफारिशें

क- कृषि क्षेत्रक में कठिनाई को दूर करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिये-

SEZ के संबंध में वर्तमान दृष्टिकोण को निम्नलिखित के अनुसार बदलने की ज़रूरत है-

अध्याय 5: जल संबद्ध मुद्दे (Water Related Issues)

अंतर-राज्य जल विवाद

1. कृष्णा और गोदावरी

कृष्णा जल विवाद अधिकरण

2,55,949 वर्ग किमी. के कुल पृष्ठ क्षेत्र में से 6821 वर्ग किमी. महाराष्ट्र में, 1,11,959 वर्ग किमी. कर्नाटक में और 75369 वर्ग किमी. आंध्र प्रदेश में है।

कृष्णा जल विवाद अधिकरण का अप्रैल 1969 में गठन किया गया।

आयोग नदी बोर्ड अधिनियम के स्थान पर एक ऐसे विधान की स्थापना की सिफारिश करता है जिसके अंतर्गत प्रत्येक अंतर-राज्य नदी के लिये बेसिन संगठनों की स्थापना के अलावा लक्ष्यों, ज़िम्मेदारियों और आर.बी.ओ. के संबंध में प्रबंधन की व्यवस्था की जाए।

A- लक्ष्य:

  1. बेसिन के विकास के लिये सिद्धांतों का प्रतिपादन,
  2. बड़ी परियोजनाओं के संबंध में मार्गनिर्देश जारी करना,
  3. तकनीकी मानक निर्धारित करना,
  4. सभी लाभदायक उपयोगों हेतु जल की गुणवत्ता बनाए रखना व उसमें सुधार करना,
  5. भू-जल के विकास के लिये एक रूपरेखा निर्धारित करना,
  6. भू-अवनयन को नियंत्रित करना,
  7. भू-संसाधनोें के संधारणीय उपयोग और बेसिन के प्राकृतिक परिवेश को संरक्षित रखने के लिये उनका पुनर्वास।

B- ज़िम्मेदारियाँ

  1. राज्यों के लिये आवंटन और विभिन्न प्रमुख प्राकृतिक संसाधन कार्यनीतियों का प्रशासन,
  2. जल गुणवत्ता, भू-संसाधनों, प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक सहयोग हेतु तकनीकी ज़िम्मेदारी,
  3. डाटा का संग्रहण

C- जल प्रबंधन ज़िम्मेदारियाँ

  1. अंतर-राज्य नदियों के विनियमन का अनेक प्रयोजनार्थ, घरेलू उपभोक्ताओं और सिंचाई हेतु आपूर्ति सहित, जल का प्रवाह और कोटि बनाए रखने के लिये जल गुणवत्ता के मॉनीटरन का कार्यक्रम।
  2. उपयुक्त भू-उपभोग प्रथाओं, जल उपचार के सर्वोत्तम व्यावहारिक साधनों तथा नदी से बाहर निपटान को प्रोत्साहन।
  3. पारि-पद्धति के परिरक्षण और परती भूतियों के प्रबंधन के समन्वयन हेतु कार्यक्रम तैयार करने की ज़िम्मेदारी।

राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद

राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद की स्थापना मार्च 1983 में भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित कार्यों के निष्पादन के लिये की गई थी:

(i) राष्ट्रीय जल नीति निर्धारित करना तथा उसकी समय-समय पर समीक्षा करना,

(ii) इसे राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी और नदी बेसिन आयोग द्वारा प्रस्तुत जल विकास योजनाओं पर विचार और उनकी समीक्षा करना।

(iii) जल योजनाओं को ऐसे संशोधनों के साथ स्वीकृति की सिफारिश करना जिन्हें उपयुक्त और आवश्यक समझा जाए।

(iv) जल योजनाओं के विशिष्ट घटकों के संबंध में अंतर-राज्य मतभेद तथा ऐसे अन्य मुद्दों का समाधान करने के लिये क्रियाविधियों के बारे में सलाह देना, जो परियोजनाओं की योजना तैयार और कार्यान्वित करने के दौरान उठें।

(v) विभिन्न लाभार्थियों द्वारा जल संसाधनों के उचित विभाजन और उपयोग हेतु प्रथाओं और प्रक्रिया, प्रशासनिक व्यवस्थाओं के संबंध में सलाह देना।

(vi) ऐसी अन्य सिफारिशें करना जिनसे विभिन्न क्षेत्रों में जल संसाधनों के शीघ्र और पर्यावरणीय सुदृढ़ तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले।

जल के संबंध में एक राष्ट्रीय कानून की ज़रूरत

जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सितंबर 1987 में एक राष्ट्रीय जल नीति तैयार की गई थी, किंतु मार्गनिर्देशों के अभाव में इसे अब प्रचालनात्मक रूप लेना शेष है। राज्यों के हितों और ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्रीय जल कानून अधिनियमित किया जाना चाहिये। यह ज़रूरी है कि कानून में कम-से-कम निम्नलिखित को शामिल किया जाना चाहिये:

(i) राष्ट्रीय जल कानून, सभी मामलों में, सार्वजनिक हित के निर्धारण, जल के संबंध में सभी पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों सहित संविधान के अध्यधीन और अनुरूप होना चाहिये।

(ii) सभी जल का उपयोग, चाहे वह जल-चक्र में कहीं से भी पैदा होता हो, निर्धारित निकायों के जरिये विनियमन के अध्यधीन होना चाहिये।

(iii) भूमि की दृष्टि से जल संसाधनों का स्थान स्वयं में उपयोग का कोई प्राथमिकतापूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करेगा।

(iv) जल-चक्र की यूनिटी और इसके अंतर-निर्भरता वाले तत्त्वों को स्वीकार किये जाने की ज़रूरत है।

(v) संसाधन आयोजना एक जल विज्ञानीय इकाई के रूप में, जैसे कि कुल मिलाकर अथवा उप-बेसिन के संबंध में, नाली व्यवस्था के रूप में की जानी चाहिये।

(vi) यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्येक को पर्याप्त पेय जल सुलभ हो, अपेक्षित जल संरक्षित किया जाना चाहिये।

(vii) प्रस्तावित कानून का कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये एक अथवा अधिक विनियामक निकायों की स्थापना करने के लिये प्रावधान किया जाना चाहिये।

(viii) केंद्रीय, राज्य और बेसिन स्तर एजेंसियों को एकीकृत व मज़बूत करते हुए तथा डाटा की गुणवत्ता व प्रसंस्करण क्षमताओं में सुधार करते हुए डाटा बैंकों और डाटाबेसों के एक नेटवर्क के साथ एक मानकीकृत राष्ट्रीय सूचना पद्धति कायम की जानी चाहिये।

सिफारिशें

अध्याय 6: अनुसूचित जातियों से संबद्ध मुद्दे

संवैधानिक सुरक्षा

समाज के कमज़ोर वर्गों के हितों की सुरक्षा करने के लिये संविधान की स्कीम, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था पर आधारित अनु. जातियों और अनु. जनजातियों की स्थिति में बदलाव करने के लिये एक तीन-आयामीय कार्यनीति को परिलक्षित करती है। इसमें सम्मिलित हैं-

(i) संरक्षण: समानता लागू करने और अयोग्यताएँ दूर करने के लिये उपाय।

(ii) क्षतिपूरक भेदभाव: सार्वजनिक सेवाओं, प्रातिनिधिक निकायों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण प्रावधान लागू करना।

(iii) विकास: अनुसूचित जाति यों व अन्य समुदायों की आर्थिक स्थितियों और सामाजिक स्थिति के बीच विशाल अंतर को पाटने के लिये उपाय, संसाधनों के आवंटन और लाभों के विभाजन को शामिल करते हुए।

विधायी संरचना

विधायी संरचना का मूल्यांकन

संस्थागत संरचना

राष्ट्रीय अनु. जाति आयोग

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग

संस्थागत प्रणाली के कार्यकरण का मूल्यांकन

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा सलाह

(i) अस्पृश्यता और अत्याचारों का मुकाबला करने के विषय पर प्रकाश डालते हुए हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं में इश्तहारों/पुस्तिकाओं का मुद्रण और वितरण।

(ii) आम जनता के लिये विशाल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जाने चाहिये।

(iii) कांस्टेबुलरी और पुलिस स्टेशन स्तर के पुलिस अधिकारियों का प्रवेश स्तर पर और पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण।

(iv) अस्पर्श्यता के उन्मूलन के लिये इसके स्वरूपों और कारणों का विनिर्धारण करने के लिये आवश्यक उपायों हेतु अनुसंधान अध्ययनों का वित्त पोषण करना।

(v) अत्याचार-प्रधान क्षेत्रों का विनिर्धारण।

(vi) भू-सुधारों का प्रभावी कार्यान्वयन।

(vii) विनिर्धारण अत्याचार-प्रधान/संवेदनशील क्षेत्रों के विकास के लिये एक विशेष पैकेज तैयार करना।

(viii) एक वर्ष से अधिक अवधि तक न्यायालयों में लंबित मामलों की समीक्षा करना।

(ix) न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम का कठोरतापूर्वक प्रवर्तन किया जाना चाहिये।

(x) सामाजिक सुरक्षा के कवरेज का विस्तार।

अपेक्षित प्रशासनिक कार्रवाई

अत्याचारों और भेदभाव प्रथाओं की विशालता को देखते हुए आयोग का मत है कि एक बहु-आयामी कार्यनीति तैयार की जानी चाहिये जिसमें निम्नलिखित को शामिल किये जाने की ज़रूरत है:

सिफारिशें

अध्याय 7: अनु. जनजातियों से संबद्ध मुद्दे

परिचय

जनजातियों की स्थिति सामाजिक संरचना के इर्द-गिर्द घूमती है। जनजातीय लोगों की सामाजिक असमानताओं के शोषण के विभिन्न रूप हैं, जैसे कि बंधुआ मज़दूर, बलित श्रम और ऋणग्रस्तता, व्यापारियों, साहूकारों और वन ठेकेदारों द्वारा भी उनका शोषण किया जाता है। अनु. जनजातियों के मानव विकास सूचक (HDI), सभी प्रतिमानों, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आय आदि की दृष्टि से, शेष आबादी की तुलना में कम हैं।

A. सामाजिक न्याय

B. पंचायत (अनु. क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996

C. जनजातियों का विस्थापन

D. प्रशासन में क्षमता निर्माण

E. जनजातीय नीति

F. अनु. जनजातियों की सूची में समावेशन से संबद्ध विवाद

संविधान के अनुच्छेद 342 में विनिर्धारित है:

(1) राष्ट्रपति, राज्यपाल के साथ परामर्श करने के बाद, एक सार्वजनिक नोटिस द्वारा जनजातियों अथवा जनजातियों के अंदर किसी भाग अथवा समूह को अथवा जनजातीय समुदायों को अधिसूचित कर सकते हैं।

(2) संसद, कानून के जरिये, खंड (1) के अंतर्गत जारी किसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनु. जनजाति को किसी जनजाति अथवा जनजाति समुदाय के अंदर शामिल अथवा अलग कर सकती है।

जून 1999 में, सरकार ने अनु. जनजातियों की सूचियों में सम्मिलित किये जाने अथवा उसमें से अलग करने के संबंध में प्रक्रियाएँ अनुमोदित की थीं।

इस प्रकार, ऐसे सभी प्राधिकारियों को इकट्ठा करने की एक पद्धति होनी चाहिये, जिसके अंतर्गत प्रमुख रूप से जनजातीय आबादी वाले राज्यों के परामर्श से, स्पष्ट रूप से परिभाषित प्राचलों (Parameters) के साथ, एक व्यापक क्रियाविधि तय करने का प्रयास किया जाना चाहिये।

G. सिफारिशें

यद्यपि पाँचवीं अनुसूची में सभी राज्यों ने ‘पेसा’ की दृष्टि से अनुपालन विधान अधिनियमित किये हैं, तथापि ग्राम सभा से निकायों को अन्य निकायों को उनकी शक्तियाँ प्रदान करके, उसके प्रावधानों को शिथिल कर दिया गया है।

असम में जनजाति विशिष्ट परिषदें

स्थानीय शासन के अन्य मुद्दों के लिये सिफारिशें

क्षेत्रीय संस्थानों में क्षमता निर्माण पर सिफारिशें

अध्याय-8 अन्य पिछडे़ वर्गों से संबद्ध मुद्दे

प्रस्तावना

सामाजिक सशक्तीकरण

आर्थिक सशक्तीकरण

सिफारिशें

अध्याय-9   धार्मिक संघर्ष

प्रस्तावना

व्यवस्था संबंधी समस्याएँ

प्रशासनिक कमियाँ

दंगा पश्चात् प्रबंधन कमियाँ

सामुदायिक पुलिस व्यवस्था

इसके सामान्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

परिभाषा

सामुदायिक पुलिस पद्धति में आयोग के सुझाव

ज़िला प्रशासन तथा नागरिक शांति समितियाँ

सांप्रदायिक हिंसा (रोकथाम, नियंत्रण और पीड़ितों का पुनर्वास) विधेयक, 2005

(Communal Violation [Prevention, Control and Rehabilation of Victims] Bill, 2005)

संक्षेप में इनमें सम्मिलित हैं:

1. धारा 295 किसी श्रेणी के धर्म को बेइज्जत करने के उद्देश्य से धर्म स्थल को नुकसान पहुँचाना अथवा अपवित्र करना।

2. धारा 295 ।- किसी श्रेणी के धार्मिक विश्वास अथवा धर्म को बेइज्जत करके उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य।

3. धारा 296 - धार्मिक सभा में गड़बड़ी करना।

4. धारा 297 - कब्रगाह स्थलों आदि पर अतिक्रमण।

5. धारा 298 - किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से शब्द उच्चारित करना आदि।

प्रावधान निम्न प्रकार हैं:

(a) उचित अथवा निष्पक्ष अथवा अत्यंत शीघ्रता से पूरा होने की संभावना नहीं है;

(b) शांति भंग हुए बिना व्यवहार्य होने की संभावना नहीं है अथवा अभियुक्त, गवाहों, सरकारी अभियोजक और जज अथवा उनमें से किसी एक की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो;

(c) अन्यथा न्याय के हित में नहीं है, वह केंद्रीय सरकार से, ऐसे सांप्रदायिक अशांत क्षेत्र की दृष्टि से, राज्य से बाहर एक अतिरिक्त विशेष न्यायालय स्थापित करने का अनुरोध कर सकती है।

इन्हें IPC और CrPC में ही सम्मिलित किया जाना चाहिये, विशेष रूप से क्योंकि सरकारी व्यवस्था के अनुरक्षण से संबंधित अनेक समर्थनकारी और पूरक प्रावधान विद्यमान हैं जिनसे उपरोक्त प्रावधानों का प्रभावी कार्यान्वयन सुकर हो सकता है।

सिफारिशें

(i) सांप्रदायिक अपराधों के लिये वर्द्वित दंड।

(ii) सांप्रदायिक हिंसा से संबद्ध मामलों के शीघ्र विचारण के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना।

(iii) सांप्रदायिक अपराधों के मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रटों को रिमांड की शक्तियाँ प्रदान करना।

(iv) राहत और पुनर्वास के मानदंडों का निर्धारण।

अध्याय-10  राजनीति और विवाद

प्रस्तावना

राजनीति तथा पहचान संबंधी मुद्दे

सिफारिशें

अध्याय 11: क्षेत्रीय असमानताएँ

संदर्भ

अंतर-राज्य विषमताएँ

प्रशासनिक दृष्टिकोण

पिछड़े क्षेत्रों का विनिर्धारण

विकास के लिये समग्र परिवेश

सिफारिशें

1. मानव विकास के संकेतकों के आधार पर निर्धनता, साक्षरता और शिशु मृत्यु दरों सहित, सामाजिक और आर्थिक अवस्थापना के सूचकों के साथ-साथ पिछड़े क्षेत्रों का विनिर्धारण करने के लिये (एक यूनिट के रूप में ब्लॉक के साथ) एक मिश्रित मापदंड योजना आयोग द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिये तैयार किया जाना चाहिये।

2. केंद्रीय और राज्य सरकारों को अधिक पिछड़े क्षेत्रों को लक्षित करते हुए निधियों के ब्लॉक-वार अंतरण हेतु एक सूत्र अपनाना चाहिये।

3. राज्य के अंदर अधिक पिछड़े क्षेत्रों को विशेष रूप से सुदृढ़ करने के लिये अधिशासन ज़रूरतों को सुदृढ़ किया जाना चाहिये। ‘विशेष प्रयोजन इकाइयों,’ जैसे कि पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड और प्राधिकरणों की अंतर राज्य विषमताओं को कम करने में, भूमिका की समीक्षा करने की ज़रूरत है। स्थानीय शासनों को सुदृढ़ बनाने और उन्हें उत्तरदायी तथा जवाबदेह बनाना परामर्श योग्य है।

4. अंतर-राज्य विषमताओं में पर्याप्त रूप से कमी प्राप्त करने वाले राज्यों को (विकसित राज्यों सहित) पुरस्कृत करने की एक पद्धति लागू की जानी चाहिये।

5. कम विकसित राज्यों और ऐसे राज्यों में पिछड़े क्षेत्रों में अंतर-ज़िला स्तर पर प्रमुख अवस्थापना का निर्माण करने के लिये अतिरिक्त निधियाँ उपलब्ध कराए जाने की ज़रूरत है। सहायता की मात्रा ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या के अनुपात होनी चाहिये।

6. ऐसे सभी निधियन के लिये दृष्टिकोण परिणामोन्मुखी होना चाहिये। कार्यनीति, मानव और स्थानीय विकास के स्वीकार्य न्यूनतम मानदंडों की परिभाषा इस प्रकार से करने की होनी चाहिये, जिसे देश में प्रत्येक ब्लॉक द्वारा प्राप्त किया जाए तथा नीतियाँ, पहल और वित्त पोषण के ढंग अंतरों को पाटने तथा इस प्रकार परिभाषित करने के विचार द्वारा मार्गदर्शित होनी चाहिये।

अध्याय 12: पूर्वोत्तर में संघर्ष

प्रस्तावना

बगावत की जड़ें:

संघर्षों की प्रकृति

1. राष्ट्रीय संघर्ष: एक पृथक् राष्ट्र के रूप में एक भिन्न ‘गृह भूमि’ की अवधारणा तथा इसके समर्थकों द्वारा इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रयास।

2. जातिगत संघर्ष: राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली जनजातीय समूह के विरुद्ध संख्या में कम और कम प्रभुत्व वाले जनजातीय समूहों द्वारा ज़ोर दिया जाना। असम में यह स्थानीय और प्रवासी समुदायों के बीच तनाव का रूप भी लेता है।

3. उप-क्षेत्रीय संघर्ष: ऐसे आंदोलनों वाले, जिनमें उप-क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वाीकार किया जाना शामिल है और प्राय: राज्य सरकारों अथवा स्वायत्त परिषदों के साथ सीधे ही संघर्षरत रहते हैं।

राज्य विशिष्ट संघर्ष स्थिति

एक-चौथाई मणिपुर (जो घाटी है) इसकी 70 प्रतिशत से अधिक आबादी के लिये निवास स्थान है, जो प्रमुख रूप से सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट ‘मेइतई’ समुदाय से है। राज्य पर ‘मेइतई’ शासकों द्वारा शाही रूप से शासन किया गया था (बाद में शाही राज्य)। आज़ादी के बाद समाजार्थिक क्षेत्रों में ‘मेइतई’ प्रभाव में कमी आ गई तथा जनजातीय लोग अग्रणी बन गए, जिसका कारण आरक्षणों का होना था। राज्य के भारतीय संघ के विलय के बारे में भी ‘मेइतई’ सोसायटी के एक वर्ग में नाराजगी थी-जिस नाराजगी की वजह से 1960 के दशक से मेइतई विद्रोह उत्पन्न हुआ। जनजातीय लोगों की संख्या राज्य की आबादी में लगभग 30 प्रतिशत है तथा वे मुख्यत: नागा, कुकी, चिन और मिजो समूहों से संबंधित हैं। बगावत नगालैंड और मिज़ोरम से उस राज्य में भी फैल गई। ‘मेइतई लोगों’ से जनजातियों की सांस्कृतिक दूरी और भी विस्तृत हो गई, जबकि 1930 के दशक तक लगभग सभी जातियाँ ‘ईसाई धर्म’ के तहत आ गईं।

1. अंतिम राजनीतिक निपटारे का लंबित मुद्दा, जिसमें ‘विशाल नगालैंड’ अथवा ‘नगालिम’ की मांग सहित, जैसा कि पहले नोट किया गया है, निकटवर्ती क्षेत्रों में, विशेष रूप से मणिपुर में अशांति पैदा कर रहा है।

2. राज्य के सीमित संसाधनों के लिये बढ़ती प्रतियोगिता तथा शिक्षित युवाओं की बेरोज़गारी की समस्या।

संघर्ष समाधान की विधियाँ

संघर्ष समाधान के लिये क्षमता निर्माण

क्षेत्र में संघर्ष समाधान के लिये क्षमता निर्माण हेतु ज़रूरी विशिष्ट क्षेत्रों पर निम्न चर्चा की गई है:

  1. प्रशासन में क्षमता निर्माण
  2. पुलिस में क्षमता निर्माण
  3. स्थानीय शासन प्रणालियों में क्षमता निर्माण
  4. क्षेत्रीय प्रणालियों में क्षमता निर्माण
  5. अन्य प्रणालियों में क्षमता निर्माण

प्रशासन में क्षमता निर्माण के लिये सिफारिशें

पुलिस में क्षमता निर्माण के लिये सिफारिशें

स्थानीय शासन प्रणालियों में क्षमता निर्माण सिफारिशें

जनजातीय पूर्वोत्तर में ग्राम स्तर स्व: शासन हेतु सिफारिशें

अन्य क्षेत्रीय संस्थान

NEC द्वारा संचालित किये गए जाने वाले दस से भी अधिक अंतर-राज्य/क्षेत्रीय तकनीकी, मेडिकल और व्यावसायिक शिक्षा संस्थान तथा पूर्वोत्तर केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय हैं, जिसके सभी राज्यों में (सिक्किम सहित) असम को छोड़कर परिसर हैं, जिन्होेंने पिछले वर्षों के दौरान क्षेत्र के मानव संसाधनों के उन्नयन और संवर्द्धित अंतर-राज्य समझ बूझ और सहयोग में महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध किया है।

सिफारिशें

NEC पूरे क्षेत्र के लिये एकसमान विविध मुद्दों का समाधान करने के लिये विज्ञानों, समाज विज्ञानों और मानविकियों में उच्च अध्ययन के केेंद्र के रूप में ‘नेहू’ (North Eastern Hill University — NEHU) का विकास करने के लिये एक विस्तृत योजना तैयार कर सकती है। NEC, NEIGRIHMS को तृतीयक स्वास्थ्य उपचार के लिये विशेष रूप से निम्न आय वर्गों के लिये, एक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिये राज्य सरकारों के साथ व्यवस्था को भी सक्रिय रूप से समन्वित कर सकती है।

भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर

(National Register of Indian Citizens)

सिफारिशें

आयोग द्वारा अंतिम सिफारिशें

अध्याय 13: संघर्ष प्रबंधन के लिये प्रचालनात्मक व्यवस्था

(Operational Arrangements for Conflict Management)

प्रस्तावना:

सिविल सोसाइटी में संस्थानों के अनेक संवैधानिक, सांविधिक और कार्यपालक-संस्थान हैं, जिनमें विवाद निवारण और समाधान की भूमिका निभाने की क्षमता है। इनमें से अनेक संस्थान, उदाहरण के लिये पुलिस, संघर्षपूर्ण स्थितियों में सबसे पहले दखल देती है और इसलिये उनकी कार्रवाई अथवा कार्रवाई न करने से वस्तुत: संघर्ष रुक सकता है।

कार्यपालिका तथा संघर्ष प्रबंधन- पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेसी

सिफारिशें

न्यायिक देरियाँ तथा वैकल्पिक विवाद समाधान

किसी सभ्य समाज में विवाद समाधान का सर्वोत्तम मंच न्यायपालिका है। कहा जा सकता है कि ‘विवाद’ ‘संघर्ष’ से भिन्न है, क्योंकि संघर्ष के अंतर्गत विरोधी दावे करने वाले बड़ी संख्या में ‘विरोधी’ सम्मिलित हैं- अनेक संघर्ष प्राय: न्यायिक देरियों के कारण विवादों का निपटान न होने के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं।

आयोग के निष्कर्ष

सिफारिशें

सिविल सोसाइटी और संघर्ष समाधान

सिफारिशें

अध्याय 14: संघर्ष प्रबंधन के लिये संस्थागत व्यवस्था

प्रस्तावना

राज्य की रूपरेखा के अंदर अनेक संस्थान और पद्धतियाँ हैं, जिनका कार्य संभावित और वास्तविक संघर्ष स्थितियों से निपटना है। इनमें से कुछेक को संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त है तथा अन्यों का गठन संविधियों अथवा कार्यकारी आदेशों के माध्यम से किया गया है।

भारतीय संविधान में प्रमुख प्रावधान

उपरोक्त के अलावा, अन्य प्रावधान हैं, जिनमें शामिल है:

महत्त्वपूर्ण अधिकारिक विवाद निवारण/समाधान एजेंसियाँ

1. संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत स्थापित संस्थान

2. विधायी अधिनियमनों के अंतर्गत संस्थान

3. सरकार के कार्यपालक आदेशों के तहत जारी विचार-विमर्शी मंच अथवा संस्थान।

A संविधान के तहत संस्थान

अंतर-राज्य परिषद (Inter State Council)

अंतर-राज्य परिषद के संबंध में प्रावधान यदि किसी समय राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि निम्नलिखित कर्त्तव्य सौंपकर एक परिषद की स्थापना द्वारा सार्वजनिक हित की पूर्ति होगी:

(a) राज्यों के बीच उत्पन्न हुए विवादों के संबंध में जाँच करना तथा उनके संबंध में सलाह देना।

(b) उन विषयों की जाँच-पड़ताल और चर्चा करना, जिनमें कुछ अथवा सभी राज्यों का अथवा संघ अथवा एक अथवा अधिक राज्याें का सामान्य हित हो।

(c) ऐसे किसी विषय पर सिफारिशें देना और विशेष रूप से विषय के संबंध में नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वयन हेतु सिफारिशें करना।

अंतर-राज्य परिषद की संरचना

आयोग के निष्कर्ष

सिफारिशें

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग

(National Commision for Scheduled Castes and National Commission For Scheduled Tribes)

दोनाें निकायों की ज़िम्मेदारी के सामान्य क्षेत्र हैं:

  1. संविधान अथवा अन्य कानूनों के तहत व्यवस्थित अनु. जाति/अनु. जनजाति के लिये सुरक्षोपायों के कार्यान्वयन की जाँच-पड़ताल और निगरानी।
  2. इन समूहों के लिये व्यवस्थित सुरक्षोपायों के उल्लंघनों के विशिष्ट मामलों की जाँच।
  3. आयोजना और समाजार्थिक विकास में भागीदारी तथा संघ और राज्यों में ऐसे कार्यक्रमों के प्रभाव का मूल्यांकन।
  4. अनु. जाति/अनु. जनजाति के लिये सुरक्षोपायों के कामकाज के बारे में संसद को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
  5. सुरक्षापायों के बेहतर कार्यान्वयन और संगत समूहों के समाजार्थिक विकास के लिये सिफारिशें करना।

आयोग के निष्कर्ष

सिफारिशें

सांविधिक निकाय (Institutions Under Legislative Enactments)

क्षेत्रीय परिषद (Zonal Councils)

  1. आर्थिक और सामाजिक आयोजना के क्षेत्र में समान हित का कोई मामला।
  2. सीमा विवाद, भाषायी अल्पसंख्यकों अथवा अंतर-राज्य परिवहन से संबंधित कोई मामला।
  3. राज्यों के पुनर्गठन से उत्पन्न अथवा संबंधित कोई मामला।

आयोग के निष्कर्ष

सिफारिश

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

(National Human Right Commission)

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

(National Minorities Commission and National Commission for Backward Classes)

राष्ट्रीय एकता परिषद (National Integration Council-NIC)

NIC की स्थापना, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई पहल का परिणाम है, जिन्होेंने जबलपुर में तथा मध्य भारत में कतिपय अन्य स्थानों पर प्रमुख सांप्रदायिक समूहों को देखते हुए, सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रीयता, भाषायी उन्माद और संकीर्णता आदि की बुराइयाें से जूझने के लिये साधनोपाय खोजने के वास्ते सितंबर 1961 मेें एक राष्ट्रीय एकता सम्मेलन बुलाया।

आयोग के निष्कर्ष

सिफारिशें

राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council- NDC)

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता और सदस्यों के रूप में राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ एक शीर्ष निकाय (NDC) के रूप में 1952 में स्थापित इसका मूल उद्देश्य राष्ट्र को पंचवर्षीय योजनाओं के समर्थन में अभिप्रेरित करने तथा संतुलित और तीव्र विकास के लिये आर्थिक नीतियाँ प्रोन्नत करना था।

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड

(Central Advisory Board on Education- CAB)

CABE प्रधान इस समूह में अनूठा है, न केवल इसलिये कि यह अपनी किस्म का एक प्राचीनतम निकाय है, जिसकी स्थापना 1921 में की गई थी बल्कि इसलिये भी कि इसने गंभीर विवादोें के समाधान में तथा शिक्षा से संबंधित, विशेष रूप से 1976 से पहले की अवधि के दौरान, जब ‘शिक्षा’ एकमात्र रूप से राज्यों के क्षेत्राधिकार केे तहत थी, मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति कायम करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। अत्यंत जटिल और भावात्मक मुद्दे, जैसे कि ‘त्रि-भाषा सूत्र’ (Three Language Formula) राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समाधान भी CABE के माध्यम से कर लिया गया। दुर्भाग्यवश, इस महत्त्वपूर्ण सहमति कायम करने वाले मंच को 1990 के दशक के दौरान निष्क्रिय रहने दिया गया, 2004 से इसका पुनरुज्जीवन एक उत्तम संकेत है।

सिफारिश

राष्ट्रीय विकास परिषद और अन्य शीर्ष स्तर निकायों के संबंध में क्रियाविधि संबंधी विशिष्ट नियम तैयार किये जाने चाहिये, ताकि संकेंद्रित विचार-विमर्श सुनिश्चित हो सके।

अन्य संस्थागत नूतनताएँ

समिति के निष्कर्ष

सिफारिशें

निष्कर्ष