भारत का पहला लेग्ड मोबाइल मैनिपुलेटर | उत्तर प्रदेश | 16 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
IIT कानपुर के शोधकर्त्ताओं ने SCORP (फोर-लेग्ड कोलैबोरेटिव रोबॉटिक प्लेटफॉर्म) का अनावरण किया, जो भारत का पहला स्वदेशी फोर-लेग्ड (चार-पैरों वाला) मोबाइल मैनिपुलेटर है।
मुख्य बिंदु:
- SCORP: यह भारत का पहला लेग्ड मोबाइल मैनिपुलेटर है, जो एक अत्याधुनिक रोबोट है जो चार पैरों वाले (‘रोबोट डॉग’) प्लेटफॉर्म की मोबिलिटी को रोबोटिक आर्म (मैनिपुलेटर) की वर्सेटिलिटी के साथ जोड़ता है।
- विकास: इसे xTerra रोबोटिक्स नामक एक भारतीय स्टार्टअप ने IIT कानपुर की सहायता से विकसित किया है, जो देश की रोबोटिक्स क्षमताओं में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को दर्शाता है।
- मैनिपुलेशन क्षमता: गति के साथ-साथ, SCORP में एक रोबोटिक आर्म है जो उपकरण पकड़ सकती है, वस्तुओं का निरीक्षण कर सकती है और पर्यावरण के साथ इंटरैक्ट कर सकती है, जिससे इसकी उपयोगिता केवल चलने तक सीमित नहीं रहती।
- स्वदेशी तकनीक: IIT कानपुर के टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब (TIH) के तहत विकसित इस रोबोट में स्थानीय रूप से डिज़ाइन किये गए एक्ट्यूएटर्स और नियंत्रण प्रणालियाँ उपयोग की गई हैं, जो आत्मनिर्भर भारत मिशन के अनुरूप है।
- अनुप्रयोग: SCORP को उच्च-जोखिम वाले वातावरण के लिये डिज़ाइन किया गया है, जैसे - आपदा क्षेत्र, औद्योगिक स्थल, सुरंगें या ऐसे स्थान जहाँ मनुष्यों का पहुँचना असुरक्षित है। इसकी गतिशीलता और मैनिपुलेशन क्षमता इन स्थानों पर मानव कार्यकर्त्ताओं के जोखिम को कम कर सकती है।
- अंतरिक्ष अन्वेषण: भविष्य में इसके उन्नत संस्करण चंद्रमा या मंगल जैसी चट्टानी सतहों का अन्वेषण करने वाले ग्रह-रोवर्स के रूप में उपयोग किये जा सकते हैं।
- महत्त्व: SCORP भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करता है जो उन्नत लेग्ड रोबोटिक्स विकसित कर रहे हैं, जिससे महँगे आयातों पर निर्भरता कम होती है।
गुजरात में हाई-रिस्क पैथोजेन हेतु भारत की पहली राज्य-वित्तपोषित BSL-4 लैब | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 16 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
गुजरात में भारत की पहली राज्य-वित्तपोषित बायोसेफ्टी लेवल-4 (BSL-4) प्रयोगशाला की आधारशिला रखी गई। यह सुविधा भारत में उच्च-संरक्षण अनुसंधान के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जो पहले केवल केंद्रीय सरकारी संस्थानों तक सीमित था।
मुख्य बिंदु:
- समेकित परिसर: यह लैब बहु-स्तरीय संरचना के रूप में तैयार की गई है, जिसमें BSL-4, BSL-3 और BSL-2 मॉड्यूल शामिल हैं।
- पशु अनुसंधान: महत्त्वपूर्ण रूप से, इसमें ABSL-3 और ABSL-4 (एनिमल बायोसेफ्टी लेवल) मॉड्यूल भी शामिल हैं, जो वैज्ञानिकों को घातक वायरस के जीवित प्राणियों के साथ परस्पर क्रिया का अध्ययन करने में सक्षम बनाते हैं, जो वैक्सीन विकास की एक आवश्यक प्रक्रिया है।
- वित्तपोषण मॉडल: भारत की मौजूदा BSL-4 लैब्स (जैसे पुणे स्थित NIV) जो ICMR द्वारा केंद्रीय रूप से वित्तपोषित है, उनसे अलग यह परियोजना पहली ऐसी पहल है जिसे किसी राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित और प्रबंधित किया जा रहा है।
- समयरेखा: COVID-19 महामारी से स्थानीय स्तर पर निदान क्षमता और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता का एहसास होने के बाद, इस उच्च-सुरक्षा केंद्र की योजना का प्रारंभ वर्ष 2022 के मध्य में किया गया।
- महामारी तैयारी: यह सुविधा गुजरात को ‘डिज़ीज़ X’ या किसी नए वायरल प्रकोप की पहचान और अनुसंधान स्थानीय स्तर पर करने में सक्षम बनाएगी, जिससे सभी नमूनों को पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रतिक्रिया समय में महत्त्वपूर्ण बचत होगी।
- वन हेल्थ दृष्टिकोण: एनिमल बायोसेफ्टी (ABSL) मॉड्यूल्स को एकीकृत करके, यह लैब ‘वन हेल्थ’ फ्रेमवर्क का समर्थन करती है, जो मानवीय, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच संबंध को स्वीकार करती है तथा जूनोटिक रोग प्रसार को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बायोसेफ्टी लेवल (BSL)
- BSL-1 और BSL-2: इनका उपयोग मध्यम जोखिम वाले रोगजनकों (जैसे E. coli या सामान्य फ्लू) के लिये किया जाता है, जो मनुष्यों में हल्की बीमारी उत्पन्न करते हैं।
- BSL-3: इसका उपयोग स्वदेशी या विदेशी रोगजनकों के लिये किया जाता है, जो गंभीर या संभावित रूप से घातक बीमारी का कारण बन सकते हैं और वायु के माध्यम से फैल सकते हैं (उदाहरण: क्षय रोग, SARS-CoV-2)।
- BSL-4 (उच्च-संरक्षण स्तर): यह स्तर अत्यंत खतरनाक एवं दुर्लभ रोगजनकों के लिये होता है, जो जीवन-घातक बीमारी का उच्च जोखिम उत्पन्न करते हैं, जिनके लिये कोई ज्ञात टीका या उपचार उपलब्ध नहीं होता और जो एरोसोल के माध्यम से आसानी से फैल सकते हैं।
- उदाहरण: इबोला, मारबर्ग और निपाह वायरस।
और पढ़ें: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, वन हेल्थ दृष्टिकोण
विश्व आर्थिक मंच ने ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 जारी की | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 16 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 जारी की है, जो वैश्विक जोखिम धारणाओं और संभावित खतरों के उसके वार्षिक मूल्यांकन का 21वाँ संस्करण है।
मुख्य बिंदु:
- प्रतिस्पर्द्धा का युग: रिपोर्ट 2026 में वैश्विक जोखिम परिदृश्य की प्रमुख विशेषता के रूप में ‘अनिश्चितता’ को रेखांकित करती है और इस तर्क पर प्रकाश डालती है कि विश्व ‘प्रतिस्पर्द्धा के युग’ में प्रवेश कर रहा है, जहाँ भू-राजनीतिक और आर्थिक टकराव सहयोग को पीछे छोड़ रहे हैं तथा पारंपरिक बहुपक्षीय प्रणालियाँ दबाव में हैं।
- शीर्ष अल्पकालिक खतरा: तात्कालिक परिदृश्य (2028 तक) में आर्थिक और भू-राजनीतिक तनावों ने पर्यावरणीय चिंताओं को तात्कालिकता के मामले में पीछे छोड़ दिया है।
- भूराजनीतिक-आर्थिक टकराव: वर्ष 2025 में तीसरे स्थान से यह अब पहले स्थान पर आ गया है। इसमें शुल्क, प्रतिबंध और निवेश सीमाओं के माध्यम से व्यापार का ‘हथियारीकरण’ शामिल है।
- गलत सूचना और दुष्प्रचार: AI द्वारा बनाए गए डीपफेक्स के बढ़ते प्रसार के कारण, विशेषकर चुनावी अवधियों में सामाजिक स्थिरता पर गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं।
- सामाजिक ध्रुवीकरण: लोकतांत्रिक प्रणालियों और सार्वजनिक विश्वास पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
- अत्यधिक मौसमी घटनाएँ: कम समय की अहमियत के मामले में वे दूसरे से चौथे स्थान पर आ गए हैं। हालाँकि वे दीर्घकालिक समय के लिये सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।
- दीर्घकालिक जोखिम (10-वर्षीय परिदृश्य): पर्यावरणीय खतरे आगामी दशक के परिदृश्य में प्रमुख बने हुए हैं, जिनमें अत्यधिक मौसमी घटनाएँ और जैव-विविधता ह्रास को सबसे गंभीर जोखिम के रूप में रैंक किया गया है।
- विशेष रूप से, AI तकनीकों के प्रतिकूल परिणाम गंभीरता के मामले में सबसे बड़ी बढ़त दर्ज करते हुए अल्पकालिक सूची में 30वें स्थान से बढ़कर 10-वर्षीय परिदृश्य में 5वें स्थान पर पहुँच गए।
- भारत के लिये प्रमुख निष्कर्ष: रिपोर्ट ने अगले दो वर्षों में भारत को प्रभावित करने की सबसे अधिक संभावना वाले विशिष्ट ‘हॉट स्पॉट’ जोखिमों की पहचान की है—
- साइबर असुरक्षा: भारत में डिजिटल भुगतान और डिजिटल अवसंरचना की तीव्र वृद्धि के कारण इसे शीर्ष जोखिम के रूप में रैंक किया गया है।
- संपत्ति और आय असमानता: आंतरिक सामाजिक अस्थिरता का प्रमुख कारक है।
- महत्त्वपूर्ण अवसंरचना और संसाधन सुरक्षा: ‘जल सुरक्षा’ को एक बड़े विवाद बिंदु के रूप में रेखांकित किया गया है, विशेषकर सिंधु नदी बेसिन के संदर्भ में।
- आर्थिक बाह्य आघात: वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों और अंतर्राष्ट्रीय शुल्कों के प्रति संवेदनशीलता।