केन-बेतवा परियोजना के विरोध में जनजातीय महिलाओं ने शुरू किया 'चिता आंदोलन' | 20 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
हाल ही में मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना ज़िलों में जनजातीय महिलाओं द्वारा 'चिता आंदोलन' नामक एक तीव्र विरोध प्रदर्शन शुरू किया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर यह दर्शाया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) के तहत उनकी भूमि का जलमग्न होना, उनके समुदाय और संस्कृति के लिये मृत्युदंड के समान है।
मुख्य बिंदु:
- प्रतीकात्मक प्रतिरोध: जनजातीय महिलाओं ने, जिनमें से कुछ अपने शिशुओं को गोद में लिये हुए थीं, दौधन बाँध के निर्माण के विरोध में प्रतीकात्मक चिताओं पर कब्ज़ा कर लिया।
- प्राथमिक मांगें: प्रदर्शनकारी पैतृक भूमि के नुकसान, अपर्याप्त मुआवज़े और उचित ‘भूमि के बदले भूमि’ पुनर्वास नीति की कमी का हवाला देते हुए परियोजना को रोकने की मांग कर रहे हैं।
- दमन के आरोप: जय किसान आंदोलन के प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्त्ताओं ने आरोप लगाया है कि स्थानीय प्रशासन ने विरोध स्थलों तक भोजन एवं पानी की आपूर्ति रोकने के लिये प्रतिबंधात्मक उपायों का उपयोग किया, जिसमें BNSS की धारा 163 (पूर्व में CrPC की धारा 144) लागू करना शामिल है।
- प्रमुख चिंताएँ: इस परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिज़र्व (PTR) का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो जाएगा, जिससे बाघों, गिद्धों और घड़ियालों के आवास को खतरा उत्पन्न होगा।
- वनों की कटाई: अनुमानों के अनुसार करीब 20 लाख पेड़ों की कटाई होगी, जिससे स्थानीय सूक्ष्म-जलवायु और वनों पर निर्भर जनजातीय आजीविकाओं पर प्रभाव पड़ेगा।
- विस्थापन: लगभग 21 गाँव जलमग्न होने की कगार पर हैं। जनजातीय समुदायों का तर्क है कि 'पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम' (PESA) और 'वन अधिकार अधिनियम' (FRA) के तहत उनके संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की गई है।
- जल-वैज्ञानिक व्यवहार्यता: कई पर्यावरणविद केन नदी में ‘अधिशेष’ पानी के दावों पर सवाल उठाते हैं, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की बढ़ती आवृत्ति को देखते हुए।
- संतुलन की आवश्यकता: हालाँकि यह परियोजना 10.62 लाख हेक्टेयर में सिंचाई और 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराकर बुंदेलखंड के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को बदलने का वादा करती है, लेकिन इसे विकासात्मक लक्ष्यों तथा सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाना होगा।
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